सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

राजाका शिकार खेलने जाना - पानी न मिलनेसे व्याकुल होना और कबीर साहबका बाग प्रगट करके राजाका सेनासहित प्राण बचाना

बोधसागर

(१०५)

राजा वीरसिंह वचन

तब राजा अस वचन उच्चार । हम सँग साहिब चलो शिकारा ॥
आगे सेना सबही ठाडे । हस्ती घोडा बाहर काटे ॥
आगे चले निशान नगारा । सवा लक्ष सँग चले असवारा ॥
सवा लक्ष द्रव्य प्यादा दौरा । ठाडे भौंट करत बड शोरा ॥
हरनी स्वान लीन सँग चीता । कोइ सचान वाज कर लीता ॥
बहु दल हस्ती लीनी साथा । यहि विधि चले शिकार नरनाथा
भौंतिन भौंति खिलौना लीना । आयसु सकल लोक कहँ दीना ॥
आगे सेन चली सब साजा । हस्ती बैठि चले गुरु राजा ॥

कवीर वचन

जबही राजा चले रिगायी । तब हम तासों बात सुनायी ॥
राजा संग मोहि ले जाओ । जीव एक मारन नहि पाओ ॥
कोटिक यतन करो तुम राजा । जीवन मिलै होय तोहि लाजा ॥

राजा वीरसिंह वचन

तत्क्षण राजा वचन सुनावें । मारन कहौ तोहि जाइ चुकावें ॥
तब हम कहा हमका कहहीं । यह नहि धर्म मनुषकर अहहीं ॥
यह सुनि राजा घोड कुदावा । शेर शिकारी रूप बतावा ॥
एको जीव फन्द ना परई । क्रोध अग्नि घट भूपति जरई ॥
खेलेत रमत दूर होय गयऊ । कितहुँ न भेंट जीवसे भयऊ ॥
फिरत अहेरे परे भुलाई । कतहुँ न ठौर नीर कहँ पाई ॥
विना नीर सो तडपे राजा । व्यापी तृषा बने नहि काजा ॥

साखी-बहुत दूर राजा गये, पीछे फिरे भुआर ॥

कटक सकल सबही फिरे, व्याकुल सबै अपार ॥

ग्रंथकर्ता अथवा परचात् के लेखक महाशयकी बलिहारी है, शिकारके लिये इतनी तैयारी
बतलायी है ।

(१०६)

बीरसिंह बोध

पानी पानी सबहीं गोहरावैं । विनु पानी सबहीं मरि जावैं ॥
राजा कहै देखो सब जायी । बडो धूप जिव गयो ढरायी ॥
बहुत लोग जल दूँढन लागे । बहुतक लोग भाग चले आगे ॥
ठावैं ठावैं सब गये झुलाई । हस्ती घोरा सबहिं नशायी ॥
राजा तब कहन अस लागा । संशय बहुत तेहि मन पागा ॥

राजा बीरसिंह वचन

आज अहेर एको नहिं आवा । एको जीव जन्तु नहिं पावा ॥
पाना कतहुँ न पावा भाई । कैसी कर्ता कीन गुसाई ॥
जो जनितों अस होइहैं बाता । करन अहेर न आइत ताता ॥
सेना हमार प्राण सम प्यारी । सोऊ मरत प्यासकी मारी ॥
अब कहाँ जाइ केहि विधि करिहैं । विना नीर सब इतही मरिहैं ॥
व्याकुलता बहुतै मन बाढी । बहुत करौं सकौं नहिं काढी ॥
तेहि अवसर चर बहुतक आये । खोजिथके नहिं जलकतहुँ पाये ॥

साखी-सेना सकल मरत है, पानि पानि गोहराय ॥
छाँह छाँह सब दूँढहीं, राजा रहे शिर नाय ॥

चौपाई

तेहि अवसर हम कीन विचारा । राय प्रतीति देखों यहि वारा ॥
बीरसिंहदेव बघेला राजा । देइ प्रतीति करों यहि काजा ॥
विना प्रतीति भक्ति नहिं होई । विना भक्ति जिव जाय विगोई ॥
विनु भक्ती गुरु नाहीं भेटे । विनु गुरु संशय नाहीं भेटे ॥
विनु भेटे हिय संशय भाई । काल दयाल कहु को विलगाई ॥
मन परतीति होय जेहि प्रानी । होय तुरत चौरासी हानी ॥
करे प्रतीति नर सो पावैं । पाइ श्रद्धा गुरु शरणहिं जावैं ॥
गुरुके वचन जाहि विश्वासा । फिर नहिं होय नरकमें बासा ॥

बोधसागर

(१०७)

गुरु विनु मुक्ति न पावत कोई । चौरासी भय मिटत न लोई ॥
याते हम सब कीन्ह उपाई । राजा मन प्रतीति जेहि आई ॥
सरवर रच्यो अनूपम ठामा । बाग बगीचा औ लखेरामा ॥
नाना भांति फूली फुलवागी । बहु मेवा लागे तेहि बारी ॥
नाना भांति फूल तहैं फूले । बास सुवास पाइ मन भूले ॥
नाना पक्षी करत कलोल। जहैं तहैं उड़ैं सो टोलम टोला ॥

छन्द-फूल नाना भांति फूले, केतकी जूही आदि है ॥

चम्पा चमेली मोगरा तहैं फूल दाख गुलाब है ॥

खम्भा कदली खडे तहाँ सेबती दवना बहु अहे ॥

कदम्ब जाही मालती चमेली बहुत सुखदा लहैं ॥

सोरठा-नारियल अम्ब बदाम, कटहर बडहर पीसता ॥

बहुविधि कहे सुनाम, फल लागे चहु ओर सो ॥

चौपाई

ऐसो बाग बनी फुलवारी । बनी सो तुरत लगी नहिं वारी ॥
इहवाँ सैन रही कुम्हलायी । पानी पानी सबै गोहरायी ॥
तब हम कहे राय सुनु बाता । सत्य वचन भाखूं विख्याता ॥
उत्तर दिशा राय पगु धारो । थोडहि दूर जल बहे अपारो ॥
कहे मरत ससैन कुम्हलाई । सेना सकल चलो तहैं भाई ॥
यह सुनि राय ठाढ़ तब भयऊ । दौय कर जोरि सुविन्ती कियऊ ॥

राजा बीरसिंह वचन

सतगुरु वचन कहो जनि ऐसो । पाहन ऊपर जल बह कैसो ॥
बार अनेक अहेरे आये । पर्वत पर जल नाहिं रहाये ॥
साहिब कछु जनि ऐसी बानी । हँसे लोग गुरु झूठ बखानी ॥

१ महल

(१०८)

बीरसिंह बोध

दीवान वचन

राय दिवान कहे अस बाता । गुरुके वचन झूठ नहिं जाता ॥
कहत दिवान जोरि दोउ हाथा । गुरुके वचन सत्य धरु माथा ॥
का जानो को आहि गुसाई । बेगि राय उठि टेके पाई ॥

राजा बीरसिंह वचन

करो क्षमा सुनु हे गुरुराई । दास गुनाहहि देहु बहाई ॥
जस कहिहौ सोई हम करिहैं । बचन तुम्हार सदा अनुसरिहैं ॥

कबीर वचन

तब हम कहयो सुनो तुम राई । उत्तर दिशा तुम देहु रिगाई ॥
सैन सिपाइ ठाढे सब भयऊ । ततक्षण उत्तरदिशि चलि गयऊ ॥
राजा कुंजर दीन रिगाई । बाज निशान भेरि शहनाई ॥
चलत राय देखे चहुँ फेरा । राजा नजर दूर लगि फेरा ॥
दूरिते देखि परा सो ठावा । सुंदर बाग जहाँ रहै शोभावा ॥
राजा देखि हरष मन भरेऊ । गुरुके चरण शीश तब धरेऊ ॥
सरवर निकट राय चलि जाई । देखत बाग रहै हरषाई ॥
अम्ब निम्ब औ कदलि घनेरा । दौना मरुआ लगे बहुतेरा ॥
भांति भांति तहँ मेवा लागा । भई प्रतीति राय मन जागा ॥
ऐसी शोभा बनी बनायी । देखत बने बरनि नहिं जायी ॥

राजा बीरसिंह वचन

छन्द-राय कुंजर उतरि ठाढे चरण सतगुरुकै गहै ॥
हम कुटिल अधम अघकर्म राशी बचन पावन तुव अहै ॥
बालभाव सुभाव पितु हित बचन कबहिक टार जो ॥
पितु कण्ठ लावत आपने हिय तात और न आव सो ॥
सोरठा-जो पितु तामन लाव, तो बालक कासों कहै ॥
अधम उधारन नाव, दीन जानि जन तारिये ॥

बोधसागर

(१०९)

साखी-सैन सरोवर देखिया, उत्तम वरन सो नीर ॥
गिरिवर पर सरवर रचे, धन धन सत्यकवीर ॥

चौपाई

करी प्रणाम राय गहि पाई । महाप्रसाद देहु गुरुराई ॥
कीन प्रसाद राजा कहैं दीना । राजा बहुत लोक मिलि लीना ॥
मेवा सकल लोक मिली पाये । बहुत भांति सब लीन धराये ॥
राजा प्रजा सब करै बडाई । काहि कहौं कछु कहत न जाई ॥
जैसा मेवा सत्यगुरु दीना । नहि मिल सो सुरलोकहि चीना ॥
खात खात सो जनम सिराई । नहि देख्यो अस मेवा भाई ॥
लेइ प्रसाद जल अचवन कीन्हा । दुख संताप मुलाय सो दीन्हा ॥
फिरन लगे सो बगीचा माहीं । नहि गर्मी नहि शीत तहांहीं ॥
परिमल वास उठे चहुँ ओरा । बहुविधि पक्षी करै कलौरा ॥
ज्यों २ देखै झैल बगीचे । त्यों २ मन आनन्द रस सीचे ॥

साखी-तृषा सबनकी बुझि गयी, ऐसा निर्मल नीर ॥
मेवा पाये सब मिली, तृषित भये शरीर ॥

कबीर वचन-चौपाई

तब मैं कहचो सुनो हो राजा । सेना सकल भयो सब काजा ॥
होय असवार जाहु घर राई । जहँको जल तहँ देखै पठाई ॥
अब हम अपने लोक सिधायब । सत्य पुरुषका दर्शन पायब ॥
वहँकी शोभा अनन्त अपारा । शिव ब्रह्मा नहि पावत पारा ॥
सुनत बचन राजा भय माना । जानि विछोहै मनहि सँकाना ॥
हाथ जोरि विन्ती सो कीना । बहुत अधीन भयो परवीना ॥

राजा बीरसिंह

राजा चरण परे अकुलायी । अब सतगुरु जनि करहु दुरायी ॥
अब स्वामी मन्दिर पगु दीजै । सकल जीव अपना कर लीजै ॥