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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 552

(१०८)

बीरसिंह बोध

दीवान वचन

राय दिवान कहे अस बाता । गुरुके वचन झूठ नहिं जाता ॥
कहत दिवान जोरि दोउ हाथा । गुरुके वचन सत्य धरु माथा ॥
का जानो को आहि गुसाई । बेगि राय उठि टेके पाई ॥

राजा बीरसिंह वचन

करो क्षमा सुनु हे गुरुराई । दास गुनाहहि देहु बहाई ॥
जस कहिहौ सोई हम करिहैं । बचन तुम्हार सदा अनुसरिहैं ॥

कबीर वचन

तब हम कहयो सुनो तुम राई । उत्तर दिशा तुम देहु रिगाई ॥
सैन सिपाइ ठाढे सब भयऊ । ततक्षण उत्तरदिशि चलि गयऊ ॥
राजा कुंजर दीन रिगाई । बाज निशान भेरि शहनाई ॥
चलत राय देखे चहुँ फेरा । राजा नजर दूर लगि फेरा ॥
दूरिते देखि परा सो ठावा । सुंदर बाग जहाँ रहै शोभावा ॥
राजा देखि हरष मन भरेऊ । गुरुके चरण शीश तब धरेऊ ॥
सरवर निकट राय चलि जाई । देखत बाग रहै हरषाई ॥
अम्ब निम्ब औ कदलि घनेरा । दौना मरुआ लगे बहुतेरा ॥
भांति भांति तहँ मेवा लागा । भई प्रतीति राय मन जागा ॥
ऐसी शोभा बनी बनायी । देखत बने बरनि नहिं जायी ॥

राजा बीरसिंह वचन

छन्द-राय कुंजर उतरि ठाढे चरण सतगुरुकै गहै ॥
हम कुटिल अधम अघकर्म राशी बचन पावन तुव अहै ॥
बालभाव सुभाव पितु हित बचन कबहिक टार जो ॥
पितु कण्ठ लावत आपने हिय तात और न आव सो ॥
सोरठा-जो पितु तामन लाव, तो बालक कासों कहै ॥
अधम उधारन नाव, दीन जानि जन तारिये ॥