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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

मुनीन्द्रका रावणके पास जाना

अनुरागसागर

( ७७ )

कबीरवचन धर्मदास प्रति

रावण सुनत कोध अतिकीन्ह। जरत हुताशन मनुघृत दीन्ह। ॥
रावण चला शस्त्र लै हाथा। तुरत जाय तिहि काटों माथा॥
मारों ताहि सीस खसि परई। देखों भिक्षुक मोर का करई॥
जहैं मुनींद्र तहैं रावण राई। सत्तर वार अस्त्र कर लाई ॥
लीन्ह मुनींद्र तृण कर ओटा। अति बल रावण मारै चोटा॥

छन्द

तृण ओट यहि कारणे, गर्व धरी राय हो ॥
तेहि कारणे यह युक्ति कीन्ही, लाज रावण आयहो ॥

मन्दोदरी वचन

कहे मन्दोदरि सुनहु राजा, गर्व छोड़ो लाज हो ॥
पांव टेकहु पुरुषके गहि, अटल होवै राज हो ॥५५॥

रावण वचन

सो०-सेवाकरों शिवजाय, जिन मोहि राज अटल दियो
ताकर टेको पांय पल, दंडवत क्षणिताहिको ॥५८॥

मुनींद्रवचन

सुन अस वचन मुनींद्र पुकारी। तुम हो रावण गर्व अहारी ॥
भेद हमारा तुम नहि जाना। वचन एक तोहि कहों निशाना॥
रामचंद्र मारै तुहि आयी। मांस तुम्हार श्वान नहि खायी॥

कबीरवचन धर्मदास प्रति

रावणको कीन्हो अपमाना। अवधनगर पुनि कीन्ह पयाना॥

मधुकरकी कथा छन्द

रावणको अपमान करी, तब अवधनगरहि आयऊ॥
विप्र मधुकर मिलेउ मारग, दरशतिनमन पायऊ ॥

१ इसके बदले पुराने ग्रन्थोंमें ऐसा लिखा है—

“तीन जीव परमोघि लंका, तब अवध नगरहि आयऊ”

( ७८ )

अनुरागसागर

मिलेउ मोकहैं चरणगहि, तबशीसनायअधीनता ॥
करिविनयबहुलेगयोमंदिर, कीन्हबहुविधिदीनता ५६
सो० रंकविप्र थिर ज्ञान, बहुत प्रेममोंसो किया ॥
शब्द ज्ञान सहिदान, सुधासरितविहैंसतवदन॥५९॥

देख्यो ताहि बहुत लवलौन्हा । तासों कह्यो ज्ञानको चीन्हा ॥
पुरुष सँदेश कहेउ तिहि पासा । सुनतवचन जिय भयउ हुलासा ॥
जिमि अंकुर तपै बिन वारी । पूर्ण उदक जो मिले खरारी ॥
अम्बुमिलत अंकुर सुख माना । जैसेहि मधुकर शब्दहि जाना ॥

मधुकरवचन

पुरुष भाव सुनतेहि हरषंता । मोकहैं लोक दिखावहु संता ॥

मूनींद्रवचन

चलहु तोहि लै लोकदिखावों । लोकदिखाय बहुरिलै आवों ॥

कबीरवचन धर्मदास प्रति

राख्यो देह हंस लै धाये । अमर लोकलै तिहि पहुँचाये ॥
शोभा लोक देख हरषाना । तव मधुकरको मन पतियाना ॥

मधुकर वचन

परचोचरण मधुकर अकुलाई । हे साहिब अब तृषा बुझाई ॥
अब मोहिं लेइ चलो जगमाहीं । और जीव उपदेशो ताहीं ॥
और जीव गृहमाहिं जो आई । तिनकहैं हम उपदेशब जाई ॥

कबीर वचन धर्मदासप्रति

हंसहि लै आये संसारा । पैठि देहि जाग्यो द्विजवारा ॥
मधुकर घर षोडशजिव रहई । पुरुष संदेश सबनसों कहई ॥
गहहु चरण समर्थके जाई । यही लेहि जमसों मुक्तार्ई ॥
मधुकर वचन सबन मिलिमाना । मुक्ति जान लौन्हो परवाना ॥