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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( ७८ )

अनुरागसागर

मिलेउ मोकहैं चरणगहि, तबशीसनायअधीनता ॥
करिविनयबहुलेगयोमंदिर, कीन्हबहुविधिदीनता ५६
सो० रंकविप्र थिर ज्ञान, बहुत प्रेममोंसो किया ॥
शब्द ज्ञान सहिदान, सुधासरितविहैंसतवदन॥५९॥

देख्यो ताहि बहुत लवलौन्हा । तासों कह्यो ज्ञानको चीन्हा ॥
पुरुष सँदेश कहेउ तिहि पासा । सुनतवचन जिय भयउ हुलासा ॥
जिमि अंकुर तपै बिन वारी । पूर्ण उदक जो मिले खरारी ॥
अम्बुमिलत अंकुर सुख माना । जैसेहि मधुकर शब्दहि जाना ॥

मधुकरवचन

पुरुष भाव सुनतेहि हरषंता । मोकहैं लोक दिखावहु संता ॥

मूनींद्रवचन

चलहु तोहि लै लोकदिखावों । लोकदिखाय बहुरिलै आवों ॥

कबीरवचन धर्मदास प्रति

राख्यो देह हंस लै धाये । अमर लोकलै तिहि पहुँचाये ॥
शोभा लोक देख हरषाना । तव मधुकरको मन पतियाना ॥

मधुकर वचन

परचोचरण मधुकर अकुलाई । हे साहिब अब तृषा बुझाई ॥
अब मोहिं लेइ चलो जगमाहीं । और जीव उपदेशो ताहीं ॥
और जीव गृहमाहिं जो आई । तिनकहैं हम उपदेशब जाई ॥

कबीर वचन धर्मदासप्रति

हंसहि लै आये संसारा । पैठि देहि जाग्यो द्विजवारा ॥
मधुकर घर षोडशजिव रहई । पुरुष संदेश सबनसों कहई ॥
गहहु चरण समर्थके जाई । यही लेहि जमसों मुक्तार्ई ॥
मधुकर वचन सबन मिलिमाना । मुक्ति जान लौन्हो परवाना ॥