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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

by कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished2,136 pages
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बोधसागर

( १३ )

और बतायानामअद्दम बापका । दशतमें अपनीकहीरहनेको जा ॥

अद्दम शाहके नाम को बलख निवासी स्त्री पुरुष बच्चे से बूढे तक सभी जानते थे । क्यों कि वह शाहजादी पर आशिक था । और शाहजादीका मरजाना भी अद्दमशाहके ही शापका फल लगाना मान रखा था । यही कारण हैकि, अद्दमशाहको सब लोग महात्मा सिद्ध समझते थे । इब्राहीमके मुखसे बादशाह-जादी और अद्दम दोनोंका नाम सुनकर लोगोंको बड़ा आश्चर्य हुआ । बादशाह और बेगमके अन्तःकरणमें न जाने कितनी करुपनाएँ आती थीं और कितनी आशा और निराशा उनके चारों ओर फिर रही थीं । आखिर बादशाह बेगमने अपने हाथसे इब्राहीमको स्नान कराकर अच्छे २ कपडे पहनाया और उत्तम उत्तम पदार्थ उसे खानेको दिया । फिर बादशाह इब्राहीमको बेगमके पास छोड़कर अपने खानगी स्थानमें जा बैठा और इस भेद पर विचार करने लगा । अन्तमें बादशाहने निश्चय किया कि, अद्दमशाहसे इनका वृत्तान्त पूछना चाहिये वह संसार त्यागी फकीर है वह कदापि झूठ नहीं बोलेगा ।

बादशाहके दिलमें आया यों रुयाल ॥

पूछिये अद्दमसे उस दुखतर का हाल ॥

फर्कऊसकीरास्त गौरीमें नहीं । जो कहेगा वह सच्चहै बिल यकीं ॥
मर्द हकहै पाय बन्दे रास्ती । झूठ हर्गिज न बोलेगा कभी ॥

इतना विचार कर बादशाहने दरवान को बुलाकर हुकम दिया कि अगर कोई लड़का लेने आवे तो उसे द्वारपर मत रोकना बल्कि उसे सीधा मेरे पास पहुँचाना । उसको प्रतिष्ठापूर्वक ले आना, खबरदार उसके मनमें किसी प्रकारसे बुरा न लगने पावे इतना हुकम देकर बादशाह अद्दमशाहकी इन्तजारी करने लगा ।

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( ९४ )

सुलतानबोध

उधर अपने नियत समय पर जब अह्मशाह इब्राहीमको लेनेके लिये सुकतबमें आया तब उसे मालूम हुआ कि, इब्राहीमको बादशाह अपने महल में ले गया है और कह गया है कि अह्मशाह वहाँही से उसको लेजावे। उसे किसी प्रकार डरना नहीं चाहिये जिस समय वह आयेगा उसी समय अपना लडका ले जायगा। यह सुनते ही अह्मशाहने बेकरार होकर सीधे बादशाहकी डचोढ़ी पर जा खड़ा हुआ और दरवानसे कहाकि, बादशाहसे जाकर कहदे कि, इब्राहीमका बाप उसे घर लेजाने आया है। जल्दी उसे बाहर भेज दो।

जैसेही अह्मशाहके आनेकी खबर बादशाहको पहुंची वैसेही बादशाहने उसे अन्दर अपने पास बुला लिया और बड़ी प्रतिष्ठा के साथ उच्चासन पर बैठाकर ईश्वरका शपथ देकर उनसे पूछा कि सच बता तुझकोसौगन्देखुदा। नामहैइसतिफलकीमादरकाक्या हैवहकिसकीदुखतरेआलीगोहर। रास्तकहदेकौनहैउसकापदर ॥

बादशाहकी बातको सुनकर अह्मशाहने कहा = “ऐबादशाह वह वही तुम्हरी लडकी है जिसपर मैं आशिक हुआ था”। सुनकरअह्ममनेकहाऐबादशाह। हैवहदुखतर आपकीबेइशतवाह॥ मादरइसकीहैवहीरशकेकमर। जिसपैमैंआशिकहुआथादेखकर॥ नामभीउसकादियाउसकोबता।दुखतरेसुलतानकाजोकुछनामथा॥

अह्मकी बातको सुनकर बादशाहके आश्रयका पारावार नहीं रहा उसने आश्रय मुद्रासे अह्मशाहसे कहा कि मेरी बेटी को मरे हुए तो मुद्दत होगयी। उसको हम लोगोंने कब्रमें गाड़ दिया उसकी तो हड्डी तक गलगयी होगी। वह अब तुम्हारे घरमें कहाँसे आगयी? क्या कोई आज तक मर करके भी जिया है।

बादशाहकी बातको सुनकर अह्मशाहने शाहजादी के जीने और विवाह होने आदिका सब वृत्तान्त कह सुनाया।

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बोधसागर

( १५ )

जबकहा अद्भमने ऐआलमपनाह। सुवतलासकतेमैथीवहरश्कमाह ॥
खल्क उसदुखतरकोसुदाजानकर। कब्रमेंचुपरखकेआयीअपने घर॥
कब्रमें उसकोकिया था दफनजब। एकपहरभरसेसिवागुजरीथीतब॥
मिट्टी जो डाली थीं उससन्दूकपर। जिसकेअन्दरथीवहमाहेसीमवर॥
कुदते हकसे हवाका रास्ता। रहगया था कब्रके अन्दर खुला॥
था जिलाना बसकिमज्जूरे खुदा। इस सबबसे कब्रमें रखना रहा ॥
मुझकोजजे इश्कमें आयी तरंग। कब्रपर उसके गया मैंवे दरंग ॥
पासवान कब्र सोते देखकर। लाशदुखतरकोकिया मैंनेबदर ॥
लाशको मैंने निकाला कब्रसे। फिर कियाहमवारमिट्टीडालकर॥
मैं वले मुर्दाहो उसको जानकर। रखकेउसकीलाशकोबलायसर॥
जल्दतर उस दश्तोबरमें लेगया। थी जहाँ ऐ शह मेरी रहनेकीजा॥
करके रौशन आग मैं बैठ। वहाँ। बाहजार्। दर्द वअन्दोहो फिगा॥
देखता था हुस्नकी उसके बहार। औररोताथा निहायत जारजार॥
कुदरते हकसेहुआ बारिद वहाँ ऐन। उस हालतके अन्दर कारवाँ॥
देखकर आतशको रौशनएकजवाँ। आगलेनेके लिये आया वहाँ ॥

पास वाने कब्र उसको जानकर।

फर्त दहशतसे हुआ दिलमें मुनतशिर ॥

दश्तमें मुर्दे को तनहा देखकुर। होगया दहतसे लरजाँ वह बशर
कारवाँमें जाके दी उसने खबर। उसमें था मर्द तबीबे पुर हुनर॥

साथ लेकर उसको मीरे कारवाँ।

सुनतेही उस बातके आया वहाँ ॥

देखकर दुखतरकोउसने योंकहा। है यह सकते के मर्जमें सुबतला॥

कहके विसमिल्हाह नशतर को लिया।

उससे की झट पट रगे कफान वा ॥

जबकिनिकलाउसकेतनमेंसेलहू। होगयीहुशियारवहफर्बुन्दःसू ॥

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( ९६ )

मुलतानबोध

कर दिया आंखोंको उसने अपने बा । पूछा उन दोनों से क्या है माजरा ॥

कौन हो तुम और यह किसका है मर्का ।

घर से मुझको कौन लाया है यहाँ ॥

मैं भी आखिर सुनके उनका मकाल ।

अन्दर आया करनेको दरियाफत हाल ॥

देखकर जिन्दा मैं उसको ऐ शहा ।

लाया सिजदए शुक्र यजदाँका बजा ॥

पूछा मुझसे फिर उन्होंने माजरा ।

मिन व अन एह वाल मैंने कह दिया ॥

मेरा और दुखतरका एजाबोकबूल। होगया पेशे गवा हानैं अदूल ॥

फिर हुआ जो लुफवइन आमें खुदा। पैदा इब्राहीम यह उससे हुआ ॥

माजरा है यह बेला कम और कास्त ।

जो कहा मैंने यह है सब रास्त रास्त ॥

अब्दमशाहके द्वारा अपनी बेटीका सब वृत्तान्त सुनकर बादशाह मारे खुशीके उछल पड़ा । वह उसी समय उठकर महलमें गया और बादशाह बेगमसे सब वृत्तान्त कह सुनाया । बेगमने बेटीके मिलने की खुशीमें दान पुण्य खेरात करना आरम्भ कर दिया उधर बादशाह ने शाहजादीके बचपनकी सखी सहेलियों और उसको दूध पिलानेवाली बुढ़ियों को पालकी पर सवार करा करा कर शाहजादीकी जाँच करनेको भेज दिया । तब तक आप अब्दमशाह को बातोंमें फँसा रखा ।

थोड़ीदेरमें जाँच करने वालियों ने आकर बादशाहसे कहाकि सचमुच वही शाहजादी है । फिर तो बादशाहने बेगमको साथ लेकर उसी समय बेटी से मिलने के लिये जंगलमें जाने की तैयारी की । आगे आगे बेगमोंके मुहाफ और पीछे सब

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बोधसागर

(१७)

दरवारियों सहित बादशाहकी सवारी रवाना हुई। जब अह्म-शाहकी कुटीके निकट सवारी पहुँची तब बादशाह नीचे उतर पड़ा और बेगम को साथ लेकर पाय प्यादे झोपडी की ओर चला। बादशाहने देखा कि, एक टूटी फूटी झोपडीमें सैकड़ों जगह से फटे हुए कपडे पहनी हुई यास की टूटी चटाईपर बैठी हुई शाहजादी निमाज पढ़ रही है। जब वह निमाज पढ़ चुकी तब लौडियों ने हाथ जोडकर कहा कि, आपके पिता और माता आपसे मिलने को आये हैं। दासीकी बात सुनतेही शाहजादी दौडकर माता पिताके पग पर गिर पडी। फिर दोनों ने उसे उठाकर गले लगाया और शकुन के आंसू बहाकर उसे शाही महल में अपने साथ ले जाने की इच्छा प्रकट की। शाहजादीने कहा आपकी आज्ञा मेरे शिर पर है किन्तु पतिकी आज्ञा विना मैं यहाँ से एक पग भी आगे नहीं बढ़ सकती। बादशाहने अह्मशाह से आज्ञा दिला दी। फिर तो उसके वह फकीरी वेष को उतार कर शाहाना कपडोंसे उसे सजाया और बेगम ने अपनी पालकीमें साथ ही बैठाया। वैसे ही अह्मशाह और बादशाह एक ही सवारीमें बैठ कर शाहीमहल को रवाना हुए। बादशाहने महलमें पहुँच कर उत्सव करने की आज्ञा दी।

राह हकमें माल व जर विलकुल दिया।

इस कदर खैरात की बेइन्तहा ॥

इस प्रकार खूब धूम धामके साथ आनन्द मनाया गया। चौथे दिन अह्मशाहने बादशाहसे कहा कि, फकीरों का एकान्तमें रहना ही अच्छा है इसलिये मुझे तो जंगलमें ही जाने दीजिये। अगर आप चाहें तो मेरी स्त्री और मेरा लडका आपकी सेवामें रहेगा। बादशाह ने बहुत प्रकारसे समझा-

नं. ६ कबीरसागर - ४

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( ९८ )

मुलतानबोध

कर अह्मशाह को अपने पास रखना चाहा किन्तु उन्होंने एक भी नहीं माना आखिर मजबूरीसे बादशाहने उन्हें बिदा किया । अह्मशाह अपनी उसी कुटीमें जाकर रहने लगे जब उनका जी चाहता तब आकर अपने लड़के और स्त्रीको देख जाते । कहते हैं कि, जबतक जीते रहे तबतक उनकी यही रीति रही ।

बादशाहने अपने घर लाकर इब्राहीमको पढ़ाने के लिये अच्छे अच्छे शिक्षक सब प्रकार की विद्या और गुणसे पूर्ण देश देशसे बुलाकर रखा “होनहार विरवानके होत चीकने पात” के अनुसार इब्राहीमकी बुद्धि ऐसी तीव्र थी कि शिक्षक लोग यदि एक बात बतलाते तो इब्राहीम उससे दश अधिक निकालते इस प्रकार सदगुरु की कृपा द्वारा इब्राहीमने थोडे ही वर्षोंमें अनेक विद्या और कला कौशल तथा राजनीतिमें योग्यता प्राप्त कर ली । समय पाकर बादशाहने इब्राहीमको राज्य सिंहासन पर बैठाकर बलख का बादशाह बना दिया ।

नाना की गद्दी पर बैठकर इब्राहीम अब इब्राहीमशाह हुये । राज्यके कामको इस योग्यता से किया कि, शत्रु और राज्य के लालची दूसरे बादशाह लोगोंने स्वयं प्रशंसा करके उनसे दोस्ती कर ली ।

इस प्रकारसे रामराज्य सा राज्य करने पर भी इब्राहीमशाह को फकीरों दुवैशों की संगति का ऐसा चसका लगा था कि, दिन रातमें राजकाजसे जभी अवकाश मिलता तभी साधु सन्तों के पास पहुँचते । चाहे कितने ही दूर पर किसी अच्छे महात्मा के रहने का समाचार पाते जरूर वहाँ जाकर उनसे सतसंग करके लाभ उठाते । इसी प्रकार राज्य करते हुये कई वर्ष

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बोधसागर

( ११ )

बीतने पर उनके नानाका जिन्होंने अपना राज्य इन्हें देकर आप भजनके लिये एकान्त वास किया था देहान्त हो गया ।

नानाके मर जाने पर इब्राहीम शाहके मन पर बड़ा धक्का लगा उनका चित्त संसारसे एकदम वैराग्यको प्राप्त हुआ अब उन्हें दिन रात परलोक की चिन्ता रहने लगी ।

याने इब्राहीमशाहे दो जहाँ ॥
करता था जाहिरमें गो कारे शहाँ ॥
लैक था दुनियासे दिलबरदाशता ॥
बेवफा व बेबका पिन्दाशता ॥
कारदुनियाँस नथी चसपीदगी ॥
कुछ तहेदिलसे नथी गरवीदगी ॥
जानता था कार दुनियाँ सुस्तआर ॥
करता था बहरे जरूरत कारो बार ॥
मुल्करानी उसनेकी वबा आब ताब ॥
दसबरस वरलाह आलम बिलसवाब ॥
अदल अपने असिरमें ऐसा किया ॥
महो सुतलक होगया जौरो जफा ॥
शाम आपरवानेको देत कलीफ अगर ॥
किताजल्द उसका करे गुलगीर सर ॥
जुलमसे तोडे जो बुज ठत्री हरी ॥
फेर दे कस्साब गरदन पर छुरी ॥

इसके आगे नानाकी मृत्यु देखकर इब्राहीमशाहके हृदयमें विरागका अंकुर विशेष वृद्धिको प्राप्त हुआ और सदगुरुने जिस प्रकार उन्हें उपदेश देकर सत्य पदको प्राप्त कराया उसका

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( १०० )

सुलतानबोध

विशेष वृत्तान्त सुलतानबोधमें लिखा है । यद्यपि और और लिखने वालोंके विचार और लिखनेसे सुलतानबोधमें बहुत कुछ भेद पड़ता है तथापि सबका लक्ष एकही है और सबने अन्त में फल भी एकही दर्शाया है । इसकारण और यहाँ पुस्तक बढ जानेके भयसे अधिक न लिख कर शाह इब्राहीम अद्दमके फकीर हो जाने पश्चात् की करामात औ प्रचार की बातों में से थोडी सी बातें यहाँ लिखकर यह ग्रंथ समाप्त किया जायगा ।

शाहइब्राहीम अद्दम का स्फुट वृत्तान्त

वार्ता १

कहते हैं अद्दम हुए जिस दम फकीर ।
छोड सुलतानीका सब तांजो शरीर ॥
मालोजर जितना खजाने बीच था ।
लेके दरियामें दिया सारा जुबा ॥
पूछा एकने क्या किया यह ऐ मालिक ।
क्यों न हर एकको दिया यह ऐ मालिक ॥
दरजबांब उसको कहा यह मालोजर ।
याँदये बोगर्जब हसदें नखवैत का घर ॥
यों सुना है मैं बुजुंगोंसे कलाम ।
जानते हैं इस मिसलको खास व आम ॥
आप पर जो चीज होवे ना पसन्द ।
गैरेंपर उसको मत रखना पसंद ॥

१ बादशाही, राज्य । २ राजमुकुट । ३ राजसिंहासन । ४ धनदोलत । ५ बादशाह । ६ उत्तर
में । ७ पूंजी । ८ कीना गुस्सा, क्रोध, आंटी । ९ ईर्षा । १० अभिमान । ११ बर्बोल । १२ हूसरा ।

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बोधसागर

( १०१ )

  • वार्ता २ ।

बादशाहत छोड़कर अद्दम चले ।
कोई व सिंहराँकी तरफको शहरस ॥
बेटेको अपने किया कायमंमुकाम ।
बादशाहत वह लगा करने तमाम ॥
आपली फिर राह सिंहरा की गरज ।
कुछ न रखी माल दुनियाकी गरज ॥
साथ एक प्याला लिया और बोरियाँ ।
एकमिसवाँक और एक सकिया लिया ॥
एक सोजन खलका सीनेके लिये ।
साथ यह असबाब जरूरी ले लिये ॥
शहरसे बाहर निकल जो की नजर ।
सोते देखा एकको वा खाकपर ॥
बोरिया फँका वहाँ औ यह कहा ।
खाकसारोंको जमीन है बोरिया ॥
आगे जा देखा तो एक बेचारः आँष ।
औकस पीता है बैठे वे हिजाब ॥
हाथसे प्यालेको भी फोडा वहीं ।
यानी पी लेवेंगे हम पानी योहीं ॥
आगे देखा एक सोता है गरीब ।
हाथको रखे सिन्हाने बेनसीब ॥
तकिया भी छोडा फजूली जानकर ।
यानी एक यह भी है मुझपर बौरसर ॥

  • इस वार्तामें जिन २ शब्दोंपर अंक दिये गये हैं उनका अर्थ वार्ताके अन्तकी टिप्पणी में देखो ।
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( १०२ )

मुसलमानबोध

आगे जाकर देखा तो एक नेक खो ।
उंगलियोंसे मांजता है दांतको ॥
हाथसे मिर्वांक भी तब फकदी ।
मिसल ईसों एक सोजनही रखी ॥
सैर करते करते आखिरं एक जाँ ।
एक पहाड पर गुजर उनका हुआ ॥
आदमी वाँ था न वाँ है वाँन था ।
यातो था वह कोहँ या मैदान था ॥
दूरसे एक झोपडी आयी नजर ।
देखा एक दुवैशों को उस कोह पर ॥
करके इश्क अल्लाह पर बैठे वहाँ ।
बैठना इनका हुआ उस पर गिराँ ॥
बोला वह दुवैशों ऐ दुवैश ? तू ।
रातको रहना न याँ दिलरेशें तू ॥
याँ न दाना है न पानी है कहीं ।
मसल्लैहत तेरा यहाँ रहना नहीं ॥
तब यह बोले उससे ऐ हौसिला ।
रिज्केंका हरैगिज न करियो तू गिलैं ॥
तेरा मैं महिमाँ नहीं ऐ तकियेद्वार ।
जिसका महिमा हूँ वही हैगमगुसाँर ॥
जिसने दी है जान वह देवेगा नानँ ।
गर नहीं बावँर तो करले इमतहौन ॥
जो किसीके पास आता है अंजीज ।
किस्मत अपनी साथ लाता है अंजीज ॥
है खुदा सबका नहीं करता शरीकँ ।

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बोधसागर

( १०३ )

रिजकमें बाहँम किसीको लाशरीकँ ॥
देख आते मत किसीको सहँम जा ।
उसकी किंसमतका है साथ उसके धरा ॥
कहके यह और हँट वहाँसे जा रहे ।
सामने तकियाँके जा सुस्ता रहे ॥
शामको एक लोटा और दो रोटियाँ ।
तकियाँवालेको वहाँ पर उतरियाँ ॥
और उनके वास्ते खँवाने तआम ।
यक पुलाओंकी रिकाबी एक जाम ॥
जर्फ चीनी और उनपर ख्वाँन पोश ।
यक तकल्लुँफसे उनमें नाय नोश ॥
खाके इब्राहीमने पानी पिया ।
शुक्नेने आमतकाफिरकसिजदा किया ॥
यह तो ने अमत लेकबस चलते रहे ।
वह जो तकियादार थे जलते रहे ॥
शाम जब आयी वही फिर उतरियाँ ।
साथ यक लोटाके वा दो रोटिया ॥
मारे गुस्साके उन्होंने यों कहा ।
मैं नहीं खानेका खाना आपका ॥
एकको तुम भजो कुलियाँ और पुलाँओं ।
मुझको जौकी रोटियाँ रुखी खिलाओ ॥
जैसा वह दुवैश मैं दुवैश हूँ ।
जैसा वह दिलरेश मैं दिलरेश हूँ ॥
क्यों बढ़ायी एककी यह इज्वैशाँ ।
है फकीर आपसमें सब एकसा ॥

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( १०४ )

मुलतानबोध

जब किया यह शिकंवः उसने आशकार ।
तब हुआ उसपर खताँबे किर्दगाँ ॥
कि ऐ फकीर ! इतना न भूल अपने तई ।
तुझको शरैम इस बात पर आती नहीं ॥
उसकी गर पछे तो वह तो बादशाह ।
मेरी खाँतिर तज दिया ताजो कुलाह ॥
छोड़ कर लज्जात दुनियाकी तमाम ।
वह शर बऔवहकबाब औवहत आँम ॥
वह हुकूमत साहिबी सब अपनी छोड़ ।
बन्दगीमें मेरी आया हाथ जोड़ ॥
साहिबी जो छोड़ कर होवे गुलाम ।
क्यों न दूँ मैं उसको यकरुँवाने तआम ॥
तेरी इस रोटीसे यह खाना है कम ।
याद कर उसके वह नाँजो नअम ॥
और अपना वक्त भी तू याद कर ।
किस तरह औकात होती थी बसर् ॥
एक घसियारा था तू मदें गरीब ।
खोदता था घास तू ऐ बेनसीब ॥
जड़लोंमें खोदता फिरता था घास ।
एक टका आता था उसका तेरे पास ॥
तू हुआ था छोड़कर उसको फकीर ।
माँ न बेगम थी न बाबा था अमीर ॥
उस मुशकूँत से बसर् करता था तू ।
सर पर गट्टे लेके नित मरता था तू ॥
तुझको मैं पक्की पकायी रोटियाँ ।

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बोधसागर

( १०५ )

भेजता हूँ साथ पानीके यहाँ ॥
गर राजा पर मेरी तू राजी नहीं ।
तो ठिकाना अपना कर याँसे कहीं ॥
दिल फकीरीसे अगर तेरा फिरा ।
जाली और खुरपा यह है तेरा धरा ॥
आशकीसे तू हमारे बाज आ ।
लेके खुरपा घास अपनी खोद खा ॥
जो खुदा किस्मतमें देवे बेश ओ कम ।
मत रजोंसे उसकी रख बाहर कदम ॥
तरफ से अपने कर बाहर तलब ।
खींच मतले फायदा रंजो तअब ॥
उसने जो समझा है सोई खूब है ।
तालिंबोंको नित रजा मतलूँब है ॥
अपने तई सबके बराबर तू न जान ।
फहँम कर यह मोलबीकी बात मान ॥
हम भी ऐसे हैं यह कहना है बुरा ।
इज्जमें वह आदमी गर है भला ॥
यां खुदीमें और खुदामें बैर है ।
किस तरफ भटका फिरे है खैर है ॥
वन्दैगान हक हैं मिसकीनों गरीब ।
कुब्रसे दूर और जिह्ण्त से करीब ॥
इज्जत ब गुरबत ही वहाँ मंजूर है ।
कुब्र है जिसम सो हकेस दूर है ॥

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( १०६ )

सुलतानबोध

पकके गिर पड़ता है मेवा खाकें पर ।
खौम है जब तक रहे इफलाकें पर ॥

साखी

दास गरीबी बन्दगी, सतगुरुका उपकार ।
मान बढ़ाई गर्बका, पचि पचि मरै गवौर ॥
मान बढ़ाई कूकरी, धरमराय दरबार ।
दीन लकुटिया बाहिरै, सब जग खाया फार ॥
मान बढ़ाई कूकरी, संतन पाई जान ।
पाण्डव जग पान न भई, सुपच विराजे आन ॥

१ राज्य । २ पहाड । ३ जंगल । ४ स्थानापन्न । ५ टाट । ६ सूर्य । ८ गुडडी । ९ जमीन मिट्टी ।
१० पानी । ११ अहली । १२ लज्जा, शरम । १३ बोल । १४ नेक = अच्छा । खो = स्वभाव । अर्थात्
अच्छे स्वभावको मलेमानस आदमी । १५ ईसा पंगम्बर इसाई धर्मके प्रवर्तक मूल पुरुष । १६ अन्तम ।
१७ जगह । १८ वहाँ, उस जगह । १९ फकीर दो प्रकार के होते हैं । एक तो गदा (भीख मांगनेवाले)
जिनको संसारी बंधवकी बहुत लालसा है मगर उनको मिलता नहीं । दूसरे दुर्बेस जिन्होंने संसारको अपने
विचार द्वारा त्याग दिया है । २० इस जगह । २१ विल = हृदय ; रेश = जखम घाव । जाशय हृदय पर
बोट खाये हुआ अर्थात् संसारसे उदास हुआ पुरुष । २२ विहतरी, भलाई, नसीहत, उपदेश, उत्तम उपाय ।
२३ हौसला = हिम्मत, उत्साह, कम हौसला = कमहिम्मत, अनउदार ॥ २४ रोजी, भोजन । २५ कदापि
नहीं ; कभी नहीं । २६ शिकायत, उलाहना । २७ अतिथि । २८ दुःख मिटाने वाला । २९ सहानुभूति दिखाने
वाला । ३० रोटी । ३१ विश्वास, यकीन । ३२ परीक्षा ३३ निकट । ३४ प्यास । ३५ भाग्य ।
३६ एकसाथ । ३७ साथ । ३८ उरता । ३९ हटकर । ४० मठ । ४१ बाल । ४२ गिलास । ४३ वर्तन ।
४४ थालीका ढकन । ४५ तैयारी, बनावट । ४६ खानेपीने के सामान । ४७ धन्यवाद । ४८ मुसलमानों
एक खाना । ४९ प्रतिष्ठा । ५० बराबर, समान ५१ निन्दा, शिकायत । ५२ जाहिर प्रकट । ५३ कोध,
कोप । खतावे किंदगार = ईश्वर का कोप । ५४ कर्ता ५५ लेना । ५७ खुशोके लिये । ५८ लज्जात =
स्वाद । लज्जात बहुवचन है लज्जातको अर्थात् बहुतसे स्वाद । लज्जात दुनिया ॥ संसारी विषय वासनाका
मुख । ५९ पीनेकी चीज । ६० भोजन, खाना । ६१ लाड । ६२ प्यार । ६३ समय । ६४ करना ; गुजरना ।
६५ परिश्रम । ६६ अधिक । ६७ मर्जी, इच्छा, आज्ञा । ६८ दुख । ६९ चाहने वाला । ७० चाह । ७१
समझ । ७२ यहाँ मौलवीसे मतलब है मौलाना रुम । ७३ अधीनता । ७४ अभिमान । ७५ ईश्वरके भक्त ।
७६ गरीब । ७७ अभिमान ७८ अपमान । ७९ निकट । ८० गरीबी, दीनता । ८१ सत्य । ८२ कच्चा ।
८३ आसमान ।

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बोधसागर

( १०७ )

माया तजे तो क्या भया, मानहिं तजा न जाय ।
मानहिं बड सुनिवर गले, मान सबन को खाय ॥
कविरा अपने जीवते, ये दो बातों धोय ।
मान बडाई कारने, अच्छता मूल न खोय ॥

वार्ता ३

शाह इब्राहीम अद्वम संसार त्याग देनेके पश्चात् मस्त फकीरों के वेषमें इधर उधर फिरा करते थे। न कोई उनका विशेष वेष था न चिह्न। इसलिये लोग उनको पहचान नहीं सकते थे। एकबार ऐसेही फिरते हुए किसी अमीर आदमीने उन्हें पकड़कर अपने बाग में माली के काम पर लगा दिया। सदगुरु की इच्छा जानकर वे अच्छी तरह बाग का काम करने लगे। एक वर्ष जब बागवानी करते उनको होगया तब एकदिन बाग का मालिक अपने कई मित्रोंको साथ लिये हुए बागमें आया। शाह इब्राहीम साहबने उस समय बागमें जितने फल फूल थे सबमें से थोडा थोडा लेकर एक डाली बनायी और मालिक बेगके पास ले गये। जब उस अमीर ने डाली में से अनारों को लेकर खाया तब सब अनार खट्टे निकले। उसने शाहसाहब को बुलाकर पूछा कि, मेरे लिये ये खट्टे अनार क्यों लाया ? उन्होंने जवाब दिया कि, मुझे खट्टे मीठे की कुछ खबर नहीं है। उस अमीरने कहा कि, तुम कितने दिनसे इस बाग में रहते हो ? उन्होंने कहा एक वर्षसे। अमीरने कहा एक वर्षसे बागवानी करके भी तुमने आजतक बागके खट्टे मीठे अनारों को नहीं पहचाना ? शाह इब्राहीमने उत्तर दिया तुमने मुझे बागकी रक्षा करने के लिये रखा था कि, फलों को खाने के लिये ? अमीरने

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( १०८ )

सुलतानबोध

कहा रक्षाके लिये ? उन्होंने कहा तब मैं फल कैसे खा सकता था ? अगर रक्षक भक्षक बन जाय तब तो रक्षाका नामही संसारसे उठ जाय । आपकी बातको सुनकर वह अमीर बड़े आश्चर्य में आया । फिर जाँच करने पर उस अमीरको मालूम हुआ कि, वह तो शाह इब्राहीम अह्मद हैं तब तो वह हाथ जोड़कर उनके पैर पर गिर पड़ा और अपना अपराध क्षमा कराने लगा । तब वे हँसकर उस अमीरको उपदेश देकर चल दिये ।

वार्ता ४

कहते हैं कि, बादशाहत त्याग देने के पश्चात् सुलतान इब्राहीम अह्मद शाह दस वर्ष तक नेशापुर जंगल की एक गुफा में रहकर भजन करते रहे । आठवें दिन गुफा से निकल कर जंगलकी लकड़ियाँ इकट्ठी करके वस्तीमें ले जाकर बेच आते और उससे जो कुछ मिलता उतनेही में आठ दिनके भोजन का सामान खरीद कर ले आते और आठ दिनतक बैठे भजन करते.

लिखा है कि, इस दस वर्षकी तपस्या और एकान्त बाससे उन्होंने अपने मन तथा इंद्रियोंको पूर्ण रीतिसे जीत लिया था । इसके प्रमाणमें लिखा है कि, जब नेशापुरसे शाह इब्राहीम अह्मद रवाना हुए तब एक जहाज पर चढ़ कर अरब को चले । संयोगसे उस जहाज पर एक अमीर भी जा रहा था । उस अमीरके साथ सब अमीराना सामान नाचराग वगैरह थे । ठट्ठा मसखरीसे अमीरों को खुश करने वाले भांड भी उसके साथ थे । एक रातको भाँड़ोंने कहा अगर कोई आदमी मिलता तो उसपर से हमलोग अपनी मसखरी उतारते । उस अमीरने हुक्म दिया कि, देखो

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बोधसागर

( १०९ )

जहाज में कोई गरीब भूखा मिल जाय तो उसे रुपया दो रुपया देकर अपना काम निकाल लो । आखिर कार हूँढते हूँढते उस अमीर के आदमियोंने शाह इब्राहीम अह्मको किसी कोने में बैठा हुआ पाया । इनका विचित्र वेष और बढी हुई दाढी वगैरह देखकर सबने पागल समझ कर उन्हें पकड़ लिया और अमीरके मजलिस में लाकर बैठा दिया । फिर तो भाँडों ने मनमानी की । जितने खेल खेलते अन्तमें सब उन्हीं पर उतारते अंतमें जब उन्हें बहुत तकलीफ हुई तब आकाश बानी हुई कि, अगर तुम कहो तो इस जहाजको डुबाकर इन सब मूर्ख बदमाशोंको इनके किये का दण्ड देदूँ । शाह इब्राहीमने बड़े धीरज के साथ कहा कि,

खींच कर सीनेमें अपने एक आह ।
बोला इब्राहीम ऐ मेरे अल्लाह ॥
कुछ नहीं हस अमरमें इनकी खता ।
करता अगरबसीरत इनको तू अता ॥
कजरवी क्यों करते ऐ दानायराज ।
फेल बदसे आप करते एहतराज ॥
राह में गर बेबसर के चाहहो ।
जो न रोके उसको वह गुमराह हो ॥
मर्द बीना को है लाजिम दे बता ।
वरन गया उसका खून उसने लिया ॥
वह है या रण्ब जूर्म असियासे बरी ।
कुछ नहीं उसमें खता उनकी जरी ॥
क्योंकि गफलतसे है मसल्लुबुल हवास ।
जेहल नादानी से मकल्लुबुल हवास ॥

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( ११० )

मुलतानबोध

फिर उनने कहा कि, हे प्रभु ! क्या मैं तेरा बन्दा इसका बिलहूँ और ऐसा नापाक हूँ कि, मेरे स्पर्श के पाप से इतने बड़े जहाज को डुबाकर इतने निष्पापोंका अन्त करेगा । प्रभु ! तू तो दयालु है अथम धारन है ऐसा क्यों नहीं करता कि यदि केवल मेरे ही लियेतुझे इतनी हत्या करनी पड़ती हो तो मुझको ही डुबादे अगर नहीं तो इन सबोंको वह ज्ञान दे कि ये तेरी बड़ाईको समझे और इनका हृदय दया और ज्ञानसे पूर्ण हो जावे । उनके इस प्रकार आशिर्वाद करने के पश्चात् तत्काल ही अमीर सहित समाज के सब आदमियों का हृदय शुद्ध और ज्ञान से पूर्ण हो गया । उस समय सबने उनको पहचाना । फिर तो सब उनके पगपर गिरकर क्षमा कराने लगे । उन्होंने सबको उपदेश देकर संतोष दिलाया ॥

वार्ता ५ ।

एक बार एक स्मशान में बैठे हुए शाह ईब्राहीम अख्मसे किसीने पूछा कि, बादशाही छोड़कर मरघटों में क्यों बैठते फिरते हो ? उन्होंने उत्तर दिया कि, संसार के मनुष्यों को मैं चार प्रकार का देखता हूँ ॥ १ ॥ कोई तो जीता है और संसार में मौजूद है ॥ २ ॥ कोई मांके पेटमें है ॥ ३ ॥ कोई अपना कर्म पूरा करके आनेही चाहता है ॥ ४ ॥ कोई मर गये हैं इनमें से मेरे हुए लोग पुकार रहे हैं कि ओ संसार के आदमियों ! जल्दी जल्दी मरो कि, क्यामत जल्दी हो और हमलोग कब्रकी कष्ट से छूटें । जो माताके पेट में आचुके हैं और जो आने वाले हैं वे पुकार रहे हैं कि, ओ संसार के मनुष्यों ! जल्दी संसारको छोड़ो कि, हमारे आनेको स्थान मिले । आशय यह है कि एक ओर से भागते हैं और

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बोधसागर

( १११ )

दूसरी ओरसे बुलाते हैं। इस दशा में संसारमें रहने की इच्छा किस प्रकार हो सकती है। इसलिये मैंने मौतको और मरघट को अन्तिम स्थान जानकर सेवन करना आरम्भ किया है।

वार्ता ७

एक बार फकीर हो जाने के बहुत दिन पीछे शाह इब्राहीम अद्दम बलखमें गये और शहरसे बाहर एक जलाशय के किनारे बैठे। आने जाने वालों ने उन्हें देख कर पहचाना और उनके बेटे को जो उस समय वहाँ के बादशाह थे उनके आने की खबर दी।

बादशाह बापके आने की खबरको सुनकर चट सवारी मँगाकर बहुतसे मुसाहेब और नौकर चाकरों को साथ लिये हुये वहाँ पहुँचा। शाह इब्राहीम के आनेका समाचार जैसे ही बलख के लोगों को पहुँचा वैसे ही जो जिस दशामें था अपना अपना काम छोडकर दौड पडा। थोडी ही देरमें शाह इब्राहीम के निकट बडा भारी मेला लग गया।

सुलतान इब्राहीम के पास में सिवाय एक गुदडी के दूसरा वस्त्र या पात्र आदि कुछ नहीं था। कठिन तपस्या के कारणसे उनका शरीर भी बहुत दुबला पतला और कमजोर देख पडता था। बापकी वह दशा देखकर बादशाह बने हुए आत्म दृष्टिसे शून्य बेटेने कहा पिताजी ! आपने बादशाहत छोडकर संसार भरका कष्ट अपने शिर उठाके क्या लाभ उठाया ?।

जो आपका शरीर मखमल और फूलोंकी शय्या पर सोने-वाला था अब उसके लिये टाट भी आपके पास नहीं है जिसके सम्मुख हजारों दास दासियाँ सेवा करनेके लिये हाथ जोड़े खड़े रहते थे आज वही इस प्रकार बेकस और लोचारक समान

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(११२)

सुलतानबोध

भूखे प्यासे जमीन पर सोता और दुःख उठाता फिर रहा है । पूज्य पिताजी ! एक चीज को छोड़कर मनुष्य दूसरी वस्तुको उन्नति की आशासे स्वीकार करता है । आपने तो उलटा प्राप्त सुख को भी खोकर अपनी ऐसी दशा बना ली है जिसे देखकर मुझे शरम आती है और आपकी यह प्यारी प्रजा आठ आठ आसूं रो रही है । इसी लिये मैं आपसे पूछता हूँ कि, आपको इस त्याग में क्या प्राप्त हुआ है ? ।

बेटेकी बातको सुनकर उसे कुछ उपदेश देने के विचारसे सुलतान ने कहा, बेटा ! मैंने जो कुछ कमाया है वह तो पीछे बतलाऊंगा पहले तू बतला कि, बादशाही पाकर तूने अपनी उन्नति कहाँ तक की है ? बापकी बात को सुनकर बेटा हँसकर बोला कि, देखिये आपके राज्य छोड़कर चले जानेके पश्चात् मैंने अमुक अमुक देश अपने बाहु बलसे जीतकर स्वाधीन कर लिया है और अमुक अमुक सुधार राज्य में फैलाया है । मेरे अधिकारमें क्या नहीं है ? जिसको चाहूँ आज गरीब बना हूँ जिसको चाहूँ आज कुबेर कहला हूँ । जिसको चाहूँ उसका जान बखशी कर हूँ जिसको चाहूँ मार डालूँ । मेरे नाम को सुनकर शत्रु डरते हैं । मेरी आज्ञा को कोई तोड़ नहीं सकता ।

इतना सुनकर सुलतानने कहा कि, बेटा ! अगर सच मुच तुममें ऐसी सत्ता आगयी है तो ले मेरी यह सुई इस तलाब मेंसे निकलवा दे । इतना कहकर गुदडी सीनेकी सूईको तालाबमें फेंक दिया ।

यह देखकर बेटा ( बादशाह ) ने हँसकर कहा यह कौन-बड़ी बात है । एक नहीं लाखों सुई आपको मँगवा देता हूँ । सुलतान ने कहा मुझे दूसरी सुई नहीं चाहिये मुझे तो मेरी ही सुई चाहिये ।