कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
by कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास
Source: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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दरवारियों सहित बादशाहकी सवारी रवाना हुई। जब अह्म-शाहकी कुटीके निकट सवारी पहुँची तब बादशाह नीचे उतर पड़ा और बेगम को साथ लेकर पाय प्यादे झोपडी की ओर चला। बादशाहने देखा कि, एक टूटी फूटी झोपडीमें सैकड़ों जगह से फटे हुए कपडे पहनी हुई यास की टूटी चटाईपर बैठी हुई शाहजादी निमाज पढ़ रही है। जब वह निमाज पढ़ चुकी तब लौडियों ने हाथ जोडकर कहा कि, आपके पिता और माता आपसे मिलने को आये हैं। दासीकी बात सुनतेही शाहजादी दौडकर माता पिताके पग पर गिर पडी। फिर दोनों ने उसे उठाकर गले लगाया और शकुन के आंसू बहाकर उसे शाही महल में अपने साथ ले जाने की इच्छा प्रकट की। शाहजादीने कहा आपकी आज्ञा मेरे शिर पर है किन्तु पतिकी आज्ञा विना मैं यहाँ से एक पग भी आगे नहीं बढ़ सकती। बादशाहने अह्मशाह से आज्ञा दिला दी। फिर तो उसके वह फकीरी वेष को उतार कर शाहाना कपडोंसे उसे सजाया और बेगम ने अपनी पालकीमें साथ ही बैठाया। वैसे ही अह्मशाह और बादशाह एक ही सवारीमें बैठ कर शाहीमहल को रवाना हुए। बादशाहने महलमें पहुँच कर उत्सव करने की आज्ञा दी।
राह हकमें माल व जर विलकुल दिया।
इस कदर खैरात की बेइन्तहा ॥
इस प्रकार खूब धूम धामके साथ आनन्द मनाया गया। चौथे दिन अह्मशाहने बादशाहसे कहा कि, फकीरों का एकान्तमें रहना ही अच्छा है इसलिये मुझे तो जंगलमें ही जाने दीजिये। अगर आप चाहें तो मेरी स्त्री और मेरा लडका आपकी सेवामें रहेगा। बादशाह ने बहुत प्रकारसे समझा-
नं. ६ कबीरसागर - ४