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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

सैंतीसवाँ सर्ग

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सैंतीसवाँ सर्ग

विभीषणका श्रीरामसे रावणद्वारा किये गये लङ्काकी रक्षाके प्रबन्धका वर्णन तथा श्रीरामद्वारा लङ्काके विभिन्न द्वारोंपर आक्रमण करनेके लिये अपने सेनापतियोंकी नियुक्ति

शत्रुके देशमें पहुँचे हुए नरराज श्रीराम, सुमित्राकुमार लक्ष्मण, वानरराज सुग्रीव, वायुपुत्र हनुमान्, ऋक्षराज जाम्बवान्, राक्षस विभीषण, वालिपुत्र अङ्गद, शरभ, बन्धु-बान्धवोंसहित सुषेण, मैन्द, द्विविद, गज, गवाक्ष, कुमुद, नल और पनस—ये सब आपसमें मिलकर विचार करने लगे—॥ १—३ ॥

‘यही वह लङ्कापुरी दिखायी देती है, जिसका पालन रावण करता है। असुर, नाग और गन्धर्वोंसहित सम्पूर्ण देवताओंके लिये भी इसपर विजय पाना अत्यन्त कठिन है॥ ४ ॥

‘राक्षसराज रावण इस पुरीमें सदा निवास करता है। अब आपलोग इसपर विजय पानेके उपायोंका निर्णय करनेके लिये परस्पर विचार करें’॥ ५ ॥

उन सबके इस प्रकार कहनेपर रावणके छोटे भाई विभीषणने संस्कारयुक्त पद और प्रचुर अर्थसे भरी हुई वाणीमें कहा—॥ ६ ॥

‘मेरे मन्त्री अनल, पनस, सम्पाति और प्रमति— ये चारों लङ्कापुरीमें जाकर फिर यहाँ लौट आये हैं॥ ७ ॥

‘ये सब लोग पक्षीका रूप धारण करके शत्रुकी सेनामें गये थे और वहाँ जो व्यवस्था की गयी है, उसे अपनी आँखों देखकर फिर यहाँ उपस्थित हुए हैं॥ ८ ॥

‘श्रीराम! इन्होंने दुरात्मा रावणके द्वारा किये गये नगर-रक्षाके प्रबन्धका जैसा वर्णन किया है, उसे मैं ठीक-ठीक बताता हूँ। आप वह सब मुझसे सुनिये॥ ९ ॥

‘सेनासहित प्रहस्त नगरके पूर्व द्वारका आश्रय लेकर खड़ा है। महापराक्रमी महापार्श्व और महोदर दक्षिण द्वारपर खड़े हैं॥ १० ॥

‘बहुसंख्यक राक्षसोंसे घिरा हुआ इन्द्रजित् नगरके पश्चिम द्वारपर खड़ा है। उसके साथी राक्षस पट्टिश, खड्ग, धनुष, शूल और मुद्गर आदि अस्त्र-शस्त्र हाथोंमें लिये हुए हैं। नाना प्रकारके आयुध धारण करनेवाले शूरवीरोंसे घिरा हुआ वह रावणकुमार पश्चिमद्वारकी रक्षाके लिये डटा है॥

‘स्वयं मन्त्रवेत्ता रावण शुक, सारण आदि कई सहस्र शस्त्रधारी राक्षसोंके साथ नगरके उत्तर द्वारपर सावधानीके साथ खड़ा है। वह मन-ही-मन अत्यन्त उद्विग्न जान पड़ता है॥ १२-१३ ॥

‘विरूपाक्ष शूल, खड्ग और धनुष धारण करनेवाली विशाल राक्षससेनाके साथ नगरके बीचकी छावनीपर खड़ा है॥ १४ ॥

‘इस प्रकार मेरे सारे मन्त्री लङ्कामें विभिन्न स्थानोंपर नियुक्त हुई इन सेनाओंका निरीक्षण करके फिर शीघ्र यहाँ लौटे हैं॥ १५ ॥

‘रावणकी सेनामें दस हजार हाथी, दस हजार रथ, बीस हजार घोड़े और एक करोड़से भी ऊपर पैदल राक्षस हैं॥ १६ ॥

‘वे सभी बड़े वीर, बल-पराक्रमसे सम्पन्न और युद्धमें आततायी हैं। ये सभी निशाचर राक्षसराज रावणको सदा ही प्रिय हैं॥ १७ ॥

‘प्रजानाथ! इनमेंसे एक-एक राक्षसके पास युद्धके लिये दस-दस लाखका परिवार उपस्थित है’॥ १८ ॥

महाबाहु विभीषणने मन्त्रियोंद्वारा बताये गये लङ्काविषयक समाचारको इस प्रकार बताकर उन मन्त्रीस्वरूप राक्षसोंको भी श्रीरामसे मिलाया और उनके द्वारा लङ्काका सारा वृत्तान्त पुनः उनसे कहलाया॥ १९ १/२ ॥

तदनन्तर रावणके छोटे भाई श्रीमान् विभीषणने कमलनयन श्रीरामसे उनका प्रिय करनेके लिये स्वयं भी यह उत्तम बात कही— ॥ २० १/२ ॥

‘श्रीराम! जब रावणने कुबेरके साथ युद्ध किया था, उस समय साठ लाख राक्षस उसके साथ गये थे। वे सब-के-सब बल, पराक्रम, तेज, धैर्यकी अधिकता और दर्पकी दृष्टिसे दुरात्मा रावणके ही समान थे॥ २१-२२ ॥

‘मैंने जो रावणकी शक्तिका वर्णन किया है, इसको लेकर न तो आपको अपने मनमें दीनता लानी चाहिये और न मुझपर रोष ही करना चाहिये। मैं आपको डराता नहीं, शत्रुके प्रति आपके क्रोधको उभाड़ रहा हूँ; क्योंकि आप अपने बलपराक्रमद्वारा देवताओंका भी दमन करनेमें समर्थ हैं॥ २३ ॥

‘इसलिये आप इस वानरसेनाका व्यूह बनाकर ही विशाल चतुरङ्गिणी सेनासे घिरे हुए रावणका विनाश कर सकेंगे’॥ २४ ॥

विभीषणके ऐसी बात कहनेपर भगवान् श्रीरामने शत्रुओंको परास्त करनेके लिये इस प्रकार कहा—॥

‘बहुसंख्यक वानरोंसे घिरे हुए कपिश्रेष्ठ नील पूर्व द्वारपर जाकर प्रहस्तका सामना करें॥ २६ ॥

‘विशाल वाहिनीसे युक्त वालिकुमार अङ्गद दक्षिण द्वारपर स्थित हो महापार्श्व और महोदरके कार्यमें बाधा दें॥ २७ ॥

‘पवनकुमार हनुमान् अप्रमेय आत्मबलसे सम्पन्न हैं। ये बहुत-से वानरोंके साथ लङ्काके पश्चिम फाटकमें प्रवेश करें॥ २८ ॥

‘दैत्यों, दानवसमूहों तथा महात्मा ऋषियोंका अपकार करना ही जिसे प्रिय लगता है, जिसका स्वभाव क्षुद्र है, जो वरदानकी शक्तिसे सम्पन्न है और प्रजाजनोंको संताप देता हुआ सम्पूर्ण लोकोंमें घूमता रहता है, उस राक्षसराज रावणके वधका दृढ़ निश्चय लेकर मैं स्वयं ही सुमित्राकुमार लक्ष्मणके साथ नगरके उत्तर फाटकपर आक्रमण करके उसके भीतर प्रवेश करूँगा, जहाँ सेनासहित रावण विद्यमान है॥ २९—३१ ॥

‘बलवान् वानरराज सुग्रीव, रीछोंके पराक्रमी राजा जाम्बवान् तथा राक्षसराज रावणके छोटे भाऽइ विभीषण—ये लोग नगरके बीचके मोर्चेपर आक्रमण करें॥ ३२ ॥

‘वानरोंको युद्धमें मनुष्यका रूप नहीं धारण करना चाहिये। इस युद्धमें वानरोंकी सेनाका हमारे लिये यही संकेत या चिह्न होगा॥ ३३ ॥

‘इस स्वजनवर्गमें वानर ही हमारे चिह्न होंगे। केवल हम सात व्यक्ति ही मनुष्यरूपमें रहकर शत्रुओंके साथ युद्ध करेंगे॥ ३४ ॥

‘मैं अपने महातेजस्वी भाऽइ लक्ष्मणके साथ रहूँगा और ये मेरे मित्र विभीषण अपने चार मन्त्रियोंके साथ पाँचवें होंगे (इस प्रकार हम सात व्यक्ति मनुष्यरूपमें रहकर युद्ध करेंगे)’॥ ३५ ॥

अपने विजयरूपी प्रयोजनकी सिद्धिके लिये विभीषणसे ऐसा कहकर बुद्धिमान् भगवान् श्रीरामने सुवेल पर्वतपर चढ़नेका विचार किया। सुवेल पर्वतका तटप्रान्त बड़ा ही रमणीय था,

उसे देखकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई॥ ३६ ॥

तदनन्तर महामना महात्मा श्रीराम अपनी विशाल सेनाके द्वारा वहाँकी सारी पृथ्वीको आच्छादित करके शत्रुवधका निश्चय किये बड़े हर्ष और उत्साहसे लङ्काकी ओर चले॥ ३७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें सैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३७ ॥