सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

सैंतालीसवाँ सर्ग

⬅ विषय-सूची (TOC)

सैंतालीसवाँ सर्ग

लक्ष्मणका सीताजीको नावसे गङ्गाजीके उस पार पहुँचाकर बड़े दुःखसे उन्हें उनके त्यागे जानेकी बात बताना

मल्लाहोंकी वह नाव विस्तृत और सुसज्जित थी। लक्ष्मणने उसपर पहले सीताजीको चढ़ाया, फिर स्वयं चढ़े॥ १ ॥

उन्होंने रथसहित सुमन्त्रको वहीं ठहरनेके लिये कह दिया और शोकसे संतप्त होकर नाविकसे कहा— ‘चलो’॥ २ ॥

‘लक्ष्मण! निश्चय ही विधाताने मेरे शरीरको केवल दुःख भोगनेके लिये ही रचा है। इसीलिये आज सारे दुःखोंका समूह मूर्तिमान् होकर मुझे दर्शन दे रहा है॥ ३ ॥

‘मैंने पूर्वजन्ममें कौन-सा ऐसा पाप किया था अथवा किसका स्त्रीसे विछोह कराया था, जो शुद्ध आचरणवाली होनेपर भी महाराजने मुझे त्याग दिया है॥ ४ ॥

‘सुमित्रानन्दन! पहले मैंने वनवासके दुःखमें पड़कर भी उसे सहकर श्रीरामके चरणोंका अनुसरण करते हुए आश्रममें रहना पसंद किया था॥ ५ ॥

‘किंतु सौम्य! अब मैं अकेली प्रियजनोंसे रहित हो किस तरह आश्रममें निवास करूँगी? और दुःखमें पड़नेपर किससे अपना दुःख कहूँगी॥ ६ ॥

‘प्रभो! यदि मुनिजन मुझसे पूछेंगे कि महात्मा श्रीरघुनाथजीने किस अपराधपर तुम्हें त्याग दिया है तो मैं उन्हें अपना कौन-सा अपराध बताऊँगी॥ ७ ॥

‘सुमित्राकुमार! मैं अपने जीवनको अभी गङ्गाजीके जलमें विसर्जन कर देती; किंतु इस समय ऐसा अभी नहीं कर सकूँगी; क्योंकि ऐसा करनेसे मेरे पतिदेवका राजवंश नष्ट हो जायगा॥ ८ ॥

‘किंतु सुमित्रानन्दन! तुम तो वही करो, जैसी महाराजने तुम्हें आज्ञा दी है। तुम मुझ दुखियाको यहाँ छोड़कर महाराजकी आज्ञाके पालनमें ही स्थिर रहो और मेरी यह बात सुनो—॥ ९ ॥

‘मेरी सब सासुओंको समानरूपसे हाथ जोड़कर मेरी ओरसे उनके चरणोंमें प्रणाम करना। साथ ही महाराजके भी चरणोंमें मस्तक नवाकर मेरी ओरसे उनकी कुशल पूछना॥ १० ॥

‘लक्ष्मण! तुम अन्तःपुरकी सभी वन्दनीया स्त्रियोंको मेरी ओरसे प्रणाम करके मेरा समाचार उन्हें सुना देना तथा जो सदा धर्म-पालनके लिये सावधान रहते हैं, उन महाराजको भी मेरा यह संदेश सुना देना॥ ११ ॥

तदनन्तर भागीरथीके उस तटपर पहुँचकर लक्ष्मणके नेत्रोंमें आँसू भर आये और उन्होंने मिथिलेशकुमारी सीतासे हाथ जोड़कर कहा— ॥ ३ ॥

‘विदेहनन्दिनि! मेरे हृदयमें सबसे बड़ा काँटा यही खटक रहा है कि आज रघुनाथजीने बुद्धिमान् होकर भी मुझे वह काम सौंपा है, जिसके कारण लोकमें मेरी बड़ी निन्दा होगी॥ ४ ॥

‘इस दशामें यदि मुझे मृत्युके समान यन्त्रणा प्राप्त होती अथवा मेरी साक्षात् मृत्यु ही हो जाती तो वह मेरे लिये परम कल्याणकारक होती। परंतु इस लोकनिन्दित कार्यमें मुझे लगाना उचित नहीं था॥ ५ ॥

‘शोभने! आप प्रसन्न हों। मुझे कोऽइ दोष न दें’ ऐसा कहकर हाथ जोड़े हुए लक्ष्मण पृथ्वीपर गिर पड़े॥ ६ ॥

लक्ष्मण हाथ जोड़कर रो रहे हैं और अपनी मृत्यु चाह रहे हैं, यह देखकर मिथिलेशकुमारी सीता अत्यन्त उद्विग्न हो उठीं और लक्ष्मणसे बोलीं— ॥ ७ ॥

‘लक्ष्मण! यह क्या बात है? मैं कुछ समझ नहीं पाती हूँ। ठीक-ठीक बताओ। महाराज कुशलसे तो हैं न। मैं देखती हूँ तुम्हारा मन स्वस्थ नहीं है॥ ८ ॥

‘मैं महाराजकी शपथ दिलाकर पूछती हूँ, जिस बातसे तुम्हें इतना संताप हो रहा है, वह मेरे निकट सच-सच बताओ। मैं इसके लिये तुम्हें आज्ञा देती हूँ’॥ ९ ॥

विदेहनन्दिनीके इस प्रकार प्रेरित करनेपर लक्ष्मण दुःखी मनसे नीचे मुँह किये अश्रुगद्गद कण्ठद्वारा इस प्रकार बोले— ॥ १० ॥

‘जनकनन्दिनि! नगर और जनपदमें आपके विषयमें जो अत्यन्त भयंकर अपवाद फैला हुआ है, उसे राजसभामें सुनकर श्रीरघुनाथजीका हृदय संतप्त हो उठा और वे मुझसे सब बातें बताकर महलमें चले गये॥ ११½ ॥

‘देवि! राजा श्रीरामने जिन अपवादवचनोंको दुःख न सह सकनेके कारण अपने हृदयमें रख लिया है, उन्हें मैं आपके सामने बता नहीं सकता। इसीलिये मैंने उनकी चर्चा छोड़ दी है॥ १२½ ॥

‘आप मेरे सामने निर्दोष सिद्ध हो चुकी हैं तो भी महाराजने लोकापवादसे डरकर आपको त्याग दिया है। देवि! आप कोई और बात न समझें। अब महाराजकी आज्ञा मानकर तथा आपकी भी ऐसी ही इच्छा समझकर मैं आश्रमोंके पास ले जाकर आपको वहीं छोड़ दूँगा॥ १३-१४½ ॥

‘शुभे! यह रहा गङ्गाजीके तटपर ब्रह्मर्षियोंका पवित्र एवं रमणीय तपोवन। आप विषाद न करें॥ १५½ ॥

‘यहाँ मेरे पिता राजा दशरथके घनिष्ठ मित्र महायशस्वी ब्रह्मर्षि मुनिवर वाल्मीकि रहते हैं, आप उन्हीं महात्माके चरणोंकी छायाका आश्रय ले यहाँ सुखपूर्वक रहें। जनकात्मजे! आप यहाँ उपवासपरायण और एकाग्र हो निवास करें॥ १६-१७ ॥

‘देवि! आप सदा श्रीरघुनाथजीको हृदयमें रखकर पातिव्रत्यका अवलम्बन करें। ऐसा करनेसे आपका परम कल्याण होगा’॥ १८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें सैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४७॥