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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

सैंतालीसवाँ सर्ग

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सैंतालीसवाँ सर्ग

सीताका रावणको अपना और पतिका परिचय देकर वनमें आनेका कारण बताना, रावणका उन्हें अपनी पटरानी बनानेकी इच्छा प्रकट करना और सीताका उसे फटकारना

सीताको हरनेकी इच्छासे परिव्राजक (संन्यासी) का रूप धारण करके आये हुए रावणने उस समय जब विदेहराजकुमारीसे इस प्रकार पूछा, तब उन्होंने स्वयं ही अपना परिचय दिया॥ १ ॥

वे दो घड़ीतक इस विचारमें पड़ी रहीं कि ये ब्राह्मण और अतिथि हैं, यदि इनकी बातका उत्तर न दिया जाय तो ये मुझे शाप दे देंगे। यह सोचकर सीताने इस प्रकार कहना आरम्भ किया—॥ २ ॥

‘ब्रह्मन्! आपका भला हो। मैं मिथिलानरेश महात्मा जनककी पुत्री और अवधनरेश श्रीरामचन्द्रजीकी प्यारी रानी हूँ। मेरा नाम सीता है॥ ३ ॥

‘विवाहके बाद बारह वर्षोंतक इक्ष्वाकुवंशी महाराज दशरथके महलमें रहकर मैंने अपने पतिके साथ सभी मानवोचित भोग भोगे हैं। मैं वहाँ सदा मनोवाञ्छित सुख-सुविधाओंसे सम्पन्न रही हूँ॥ ४ ॥

‘तेरहवें वर्षके प्रारम्भमें सामर्थ्यशाली महाराज दशरथने राजमन्त्रियोंसे मिलकर सलाह की और श्रीरामचन्द्रजीका युवराजपदपर अभिषेक करनेका निश्चय किया॥ ५ ॥

‘जब श्रीरघुनाथजीके राज्याभिषेककी सामग्री जुटायी जाने लगी, उस समय मेरी सास कैकेयीने अपने पतिसे वर माँगा॥ ६ ॥

‘कैकेयीने मेरे श्वशुरको पुण्यकी शपथ दिलाकर वचनबद्ध कर लिया, फिर अपने सत्यप्रतिज्ञ पति उन राजशिरोमणिसे दो वर माँगे—मेरे पतिके लिये वनवास और भरतके लिये राज्याभिषेक॥ ७ १/२ ॥

‘कैकेयी हठपूर्वक कहने लगीं—यदि आज श्रीरामका अभिषेक किया गया तो मैं न तो खाऊँगी, न पीऊँगी और न कभी सोऊँगी ही। यही मेरे जीवनका अन्त होगा॥ ८ १/२ ॥

‘ऐसी बात कहती हुई कैकेयीसे मेरे श्वशुर महाराज दशरथने यह याचना की कि ‘तुम सब प्रकारकी उत्तम वस्तुएँ ले लो; किंतु श्रीरामके अभिषेकमें विघ्न न डालो।’ किंतु कैकेयीने उनकी वह याचना सफल नहीं की॥

‘उस समय मेरे महातेजस्वी पतिकी अवस्था पचीस सालसे ऊपरकी थी और मेरे जन्मकालसे लेकर वनगमनकालतक मेरी अवस्था वर्षगणनाके अनुसार अठारह सालकी हो गयी थी॥ १० १/२ ॥

‘श्रीराम जगत्‌में सत्यवादी, सुशील और पवित्र रूपसे विख्यात हैं। उनके नेत्र बड़े-बड़े और भुजाएँ विशाल हैं। वे समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहते हैं॥

‘उनके पिता महाराज दशरथने स्वयं कामपीड़ित होनेके कारण कैकेयीका प्रिय करनेकी इच्छासे श्रीरामका अभिषेक नहीं किया॥ १२ १/२ ॥

‘श्रीरामचन्द्रजी जब अभिषेकके लिये पिताके समीप आये, तब कैकेयीने मेरे उन पतिदेवसे तुरंत यह बात कही॥ १३ १/२ ॥

‘रघुनन्दन! तुम्हारे पिताने जो आज्ञा दी है, इसे मेरे मुँहसे सुनो। यह निष्कण्टक राज्य भरतको दिया जायगा, तुम्हें तो चौदह वर्षोंतक वनमें ही निवास करना होगा। काकुत्स्थ! तुम वनको जाओ और पिताको असत्यके बन्धनसे छुड़ाओ॥ १४-१५ १/२ ॥

‘किसीसे भी भय न माननेवाले श्रीरामने कैकेयीकी वह बात सुनकर कहा—‘बहुत अच्छा’। उन्होंने उसे स्वीकार कर लिया। मेरे स्वामी दृढ़तापूर्वक अपनी प्रतिज्ञाका पालन करनेवाले हैं॥ १६ १/२ ॥

‘श्रीराम केवल देते हैं, किसीसे कुछ लेते नहीं। वे सदा सत्य बोलते हैं, झूठ नहीं। ब्राह्मण! यह श्रीरामचन्द्रजीका सर्वोत्तम व्रत है, जिसे उन्होंने धारण कर रखा है॥ १७ १/२ ॥

‘श्रीरामके सौतेले भाई लक्ष्मण बड़े पराक्रमी हैं। समरभूमिमें शत्रुओंका संहार करनेवाले पुरुषसिंह लक्ष्मण श्रीरामके सहायक हैं, बन्धु हैं, ब्रह्मचारी और उत्तम व्रतका दृढ़तापूर्वक पालन करनेवाले हैं॥ १८-१९ ॥

‘श्रीरघुनाथजी मेरे साथ जब वनमें आने लगे, तब लक्ष्मण भी हाथमें धनुष लेकर उनके पीछे हो लिये। इस प्रकार मेरे और अपने छोटे भाईके साथ श्रीराम इस दण्डकारण्यमें आये हैं। वे दृढ़प्रतिज्ञ तथा नित्य-निरन्तर धर्ममें तत्पर रहनेवाले हैं और सिरपर जटा धारण किये तपस्वीके वेशमें यहाँ रहते हैं॥ २० १/२ ॥

‘द्विजश्रेष्ठ! इस प्रकार हम तीनों कैकेयीके कारण राज्यसे वञ्चित हो इस गम्भीर वनमें अपने ही बलके भरोसे विचरते हैं। आप यहाँ ठहर सकें तो दो घड़ी विश्राम करें। अभी मेरे स्वामी

प्रचुरमात्रामें जंगली फल-मूल लेकर आते होंगे॥ २१-२२ १/२ ॥

‘रुरु, गोह और जंगली सूअर आदि हिंसक पशुओंका वध करके तपस्वी जनोंके उपभोगमें आने योग्य बहुत-सा फल-मूल लेकर वे अभी आयेंगे (उस समय आपका विशेष सत्कार होगा)। ब्रह्मन्! अब आप भी अपने नाम-गोत्र और कुलका ठीक-ठीक परिचय दीजिये। आप अकेले इस दण्डकारण्यमें किसलिये विचरते हैं!’॥ २३-२४ ॥

श्रीरामपत्नी सीताके इस प्रकार पूछनेपर महाबली राक्षसराज रावणने अत्यन्त कठोर शब्दोंमें उत्तर दिया— ‘सीते! जिसके नामसे देवता, असुर और मनुष्योंसहित तीनों लोक थर्रा उठते हैं, मैं वही राक्षसोंका राजा रावण हूँ॥ २६ ॥

‘अनिन्द्यसुन्दरि! तुम्हारे अङ्गोंकी कान्ति सुवर्णके समान है, जिनपर रेशमी साड़ी शोभा पा रही है। तुम्हें देखकर अब मेरा मन अपनी स्त्रियोंकी ओर नहीं जाता है॥ २७ ॥

‘मैं इधर-उधरसे बहुत-सी सुन्दरी स्त्रियोंको हर लाया हूँ। उन सबमें तुम मेरी पटरानी बनो। तुम्हारा भला हो॥ २८ ॥

‘मेरी राजधानीका नाम लङ्का है। वह महापुरी समुद्रके बीचमें एक पर्वतके शिखरपर बसी हुई है। समुद्रने उसे चारों ओरसे घेर रखा है॥ २९ ॥

‘सीते! वहाँ रहकर तुम मेरे साथ नाना प्रकारके वनोंमें विचरण करोगी। भामिनि! फिर तुम्हारे मनमें इस वनवासकी इच्छा कभी नहीं होगी॥ ३० ॥

‘सीते! यदि तुम मेरी भार्या हो जाओगी तो सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित पाँच हजार दासियाँ सदा तुम्हारी सेवा किया करेंगी’॥ ३१ ॥

रावणके ऐसा कहनेपर निर्दोष अङ्गोंवाली जनकनन्दिनी सीता कुपित हो उठीं और राक्षसका तिरस्कार करके उसे यों उत्तर देने लगीं—॥ ३२ ॥

‘मेरे पतिदेव भगवान् श्रीराम महान् पर्वतके समान अविचल हैं, इन्द्रके तुल्य पराक्रमी हैं और महासागरके समान प्रशान्त हैं, उन्हें कोई क्षुब्ध नहीं कर सकता। मैं तन-मन-प्राणसे उन्हींका अनुसरण करनेवाली तथा उन्हींकी अनुरागिणी हूँ॥ ३३ ॥

‘श्रीरामचन्द्रजी समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, वटवृक्षकी भाँति सबको अपनी छायामें आश्रय देनेवाले, सत्यप्रतिज्ञ और महान् सौभाग्यशाली हैं। मैं उन्हींकी अनन्य अनुरागिणी हूँ॥ ३४ ॥

‘उनकी भुजाएँ बड़ी-बड़ी और छाती चौड़ी है। वे सिंहके समान पाँव बढ़ाते हुए बड़े गर्वके साथ चलते हैं और सिंहके ही समान पराक्रमी हैं। मैं उन पुरुषसिंह श्रीराममें ही अनन्य भक्ति रखनेवाली हूँ॥ ३५॥

‘राजकुमार श्रीरामका मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर है। वे जितेन्द्रिय हैं और उनका यश महान् है। उन महाबाहु श्रीराममें ही दृढ़तापूर्वक मेरा मन लगा हुआ है॥ ३६॥

‘पापी निशाचर! तू सियार है और मैं सिंहिनी हूँ। मैं तेरे लिये सर्वथा दुर्लभ हूँ। क्या तू यहाँ मुझे प्राप्त करनेकी इच्छा रखता है। अरे! जैसे सूर्यकी प्रभापर कोई हाथ नहीं लगा सकता, उसी प्रकार तू मुझे छू भी नहीं सकता॥ ३७॥

‘अभागे राक्षस! तेरा इतना साहस! तू श्रीरघुनाथजीकी प्यारी पत्नीका अपहरण करना चाहता है! निश्चय ही तुझे बहुत-से सोनेके वृक्ष दिखायी देने लगे हैं—अब तू मौतके निकट जा पहुँचा है॥ ३८॥

‘तू श्रीरामकी प्यारी पत्नीको हस्तगत करना चाहता है। जान पड़ता है, अत्यन्त वेगशाली मृगवैरी भूखे सिंह और विषधर सर्पके मुखसे उनके दाँत तोड़ लेना चाहता है, पर्वतश्रेष्ठ मन्दराचलको हाथसे उठाकर ले जानेकी इच्छा करता है, कालकूट विषको पीकर कुशलपूर्वक लौट जानेकी अभिलाषा रखता है तथा आँखको सूईसे पोंछता और छुरेको जीभसे चाटता है॥

‘क्या तू अपने गलेमें पत्थर बाँधकर समुद्रको पार करना चाहता है? सूर्य और चन्द्रमा दोनोंको अपने दोनों हाथोंसे हर लानेकी इच्छा करता है? जो श्रीरामचन्द्रजीकी प्यारी पत्नीपर बलात् करनेको उतारू हुआ है॥ ४२ १/२ ॥

‘यदि तू कल्याणमय आचारका पालन करनेवाली श्रीरामकी भार्याका अपहरण करना चाहता है तो अवश्य ही जलती हुई आगको देखकर भी तू उसे कपड़ेमें बाँधकर ले जानेकी इच्छा करता है॥ ४३ १/२ ॥

‘अरे तू श्रीरामकी भार्याको, जो सर्वथा उन्हींके योग्य है, हस्तगत करना चाहता है, तो निश्चय ही लोहमय मुखवाले शूलोंकी नोकपर चलनेकी अभिलाषा करता है॥ ४४॥

‘वनमें रहनेवाले सिंह और सियारमें, समुद्र और छोटी नदीमें तथा अमृत और काँजीमें जो अन्तर है, वही अन्तर दशरथनन्दन श्रीराममें और तुझमें है॥ ४५॥

‘सोने और सीसेमें, चन्दनमिश्रित जल और कीचड़में तथा वनमें रहनेवाले हाथी और बिलावमें जो अन्तर है, वही अन्तर दशरथनन्दन श्रीराम और तुझमें है॥ ४६ ॥

‘गरुड़ और कौएमें, मोर और जलकाकमें तथा वनवासी हंस और गीधमें जो अन्तर है, वही अन्तर दशरथनन्दन श्रीराम और तुझमें है॥ ४७ ॥

‘जिस समय सहस्र नेत्रधारी इन्द्रके समान प्रभावशाली श्रीरामचन्द्रजी हाथमें धनुष और बाण लेकर खड़े हो जायँगे, उस समय तू मेरा अपहरण करके भी मुझे पचा नहीं सकेगा, ठीक उसी तरह जैसे मक्खी घी पीकर उसे पचा नहीं सकती’॥ ४८ ॥

सीताके मनमें कोई दुर्भाव नहीं था तो भी उस राक्षससे यह अत्यन्त दुःखजनक बात कहकर सीता रोषसे काँपने लगीं। शरीरके कम्पनसे कृशाङ्गी सीता हवासे हिलायी गयी कदलीके समान व्यथित हो उठीं॥ ४९ ॥

सीताको काँपती देख मौतके समान प्रभाव रखनेवाला रावण उनके मनमें भय उत्पन्न करनेके लिये अपने कुल, बल, नाम और कर्मका परिचय देने लगा॥ ५० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें सैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४७॥