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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

साठवाँ सर्ग

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साठवाँ सर्ग

विश्वामित्रका ऋषियोंसे त्रिशंकुका यज्ञ करानेके लिये अनुरोध, ऋषियोंद्वारा यज्ञका आरम्भ, त्रिशंकुका सशरीर स्वर्गगमन, इन्द्रद्वारा स्वर्गसे उनके गिराये जानेपर क्षुब्ध हुए विश्वामित्रका नूतन देवसर्गके लिये उद्योग, फिर देवताओंके अनुरोधसे उनका इस कार्यसे विरत होना

[शतानन्दजी कहते हैं—श्रीराम!] महोदयसहित वसिष्ठके पुत्रोंको अपने तपोबलसे नष्ट हुआ जान महातेजस्वी विश्वामित्रने ऋषियोंके बीचमें इस प्रकार कहा—॥ १ ॥

‘मुनिवरो! ये इक्ष्वाकुवंशमें उत्पन्न राजा त्रिशंकु हैं। ये विख्यात नरेश बड़े ही धर्मात्मा और दानी रहे हैं तथा इस समय मेरी शरणमें आये हैं॥ २ ॥

‘इनकी इच्छा है कि मैं अपने इसी शरीरसे देवलोकपर अधिकार प्राप्त करूँ। अतः आपलोग मेरे साथ रहकर ऐसे यज्ञका अनुष्ठान करें, जिससे इन्हें इस शरीरसे ही देवलोककी प्राप्ति हो सके’॥ ३ १/२ ॥

विश्वामित्रजीकी यह बात सुनकर धर्मको जाननेवाले सभी महर्षियोंने सहसा एकत्र होकर आपसमें धर्मयुक्त परामर्श किया—‘ब्राह्मणो! कुशिकके पुत्र विश्वामित्र मुनि बड़े क्रोधी हैं। ये जो बात कह रहे हैं, उसका ठीक तरहसे पालन करना चाहिये। इसमें संशय नहीं है॥ ४-५ १/२ ॥

‘ये भगवान् विश्वामित्र अग्निके समान तेजस्वी हैं। यदि इनकी बात नहीं मानी गयी तो ये रोषपूर्वक शाप दे देंगे। इसलिये ऐसे यज्ञका आरम्भ करना चाहिये, जिससे विश्वामित्रके तेजसे ये इक्ष्वाकुनन्दन त्रिशंकु सशरीर स्वर्गलोकमें जा सकें’॥ ६-७ ॥

इस तरह विचार करके उन्होंने सर्वसम्मतिसे यह निश्चय किया कि ‘यज्ञ आरम्भ किया जाय।’ ऐसा निश्चय करके महर्षियोंने उस समय अपना-अपना कार्य आरम्भ किया॥ ८ ॥

महातेजस्वी विश्वामित्र स्वयं ही उस यज्ञमें याजक (अध्वर्यु) हुए। फिर क्रमशः अनेक मन्त्रवेत्ता ब्राह्मण ऋत्विज् हुए; जिन्होंने कल्पशास्त्रके अनुसार विधि एवं मन्त्रोच्चारणपूर्वक सारे कार्य सम्पन्न किये॥ ९ १/२ ॥

तदनन्तर बहुत समयतक यत्नपूर्वक मन्त्रपाठ करके महातपस्वी विश्वामित्रने अपना-अपना भाग ग्रहण करनेके लिये सम्पूर्ण देवताओंका आवाहन किया; परंतु उस समय वहाँ भाग लेनेके लिये वे सब देवता नहीं आये॥ १०-११ ॥

इससे महामुनि विश्वामित्रको बड़ा क्रोध आया और उन्होंने स्रुवा उठाकर रोषके साथ राजा त्रिशंकुसे इस प्रकार कहा— ॥ १२ ॥

‘नरेश्वर! अब तुम मेरे द्वारा उपार्जित तपस्याका बल देखो। मैं अभी तुम्हें अपनी शक्तिसे सशरीर स्वर्गलोकमें पहुँचाता हूँ॥ १३ ॥

‘राजन्! आज तुम अपने इस शरीरके साथ ही दुर्लभ स्वर्गलोकको जाओ। नरेश्वर! यदि मैंने तपस्याका कुछ भी फल प्राप्त किया है तो उसके प्रभावसे तुम सशरीर स्वर्गलोकको जाओ’॥ १४ १/२ ॥

श्रीराम! विश्वामित्र मुनिके इतना कहते ही राजा त्रिशंकु सब मुनियोंके देखते-देखते उस समय अपने शरीरके साथ ही स्वर्गलोकको चले गये॥ १५ १/२ ॥

त्रिशंकुको स्वर्गलोकमें पहुँचा हुआ देख समस्त देवताओंके साथ पाकशासन इन्द्रने उनसे इस प्रकार कहा— ॥ १६ १/२ ॥

‘मूर्ख त्रिशंकु! तू फिर यहाँसे लौट जा, तेरे लिये स्वर्गमें स्थान नहीं है। तू गुरुके शापसे नष्ट हो चुका है, अतः नीचे मुँह किये पुनः पृथ्वीपर गिर जा’॥ १७ १/२ ॥

इन्द्रके इतना कहते ही राजा त्रिशंकु तपोधन विश्वामित्रको पुकारकर ‘त्राहि-त्राहि’ की रट लगाते हुए पुनः स्वर्गसे नीचे गिरे॥ १८ १/२ ॥

चीखते-चिल्लाते हुए त्रिशंकुकी वह करुण पुकार सुनकर कौशिक मुनिको बड़ा क्रोध हुआ। वे त्रिशंकुसे बोले— ‘राजन्! वहीं ठहर जा, वहीं ठहर जा’ (उनके ऐसा कहनेपर त्रिशंकु बीचमें ही लटके रह गये)॥ १९ १/२ ॥

तत्पश्चात् तेजस्वी विश्वामित्रने ऋषिमण्डलीके बीच दूसरे प्रजापतिके समान दक्षिणमार्गके लिये नये सप्तर्षियोंकी सृष्टि की तथा क्रोधसे भरकर उन्होंने नवीन नक्षत्रोंका भी निर्माण कर डाला॥ २०-२१ ॥

वे महायशस्वी मुनि क्रोधसे कलुषित हो दक्षिण दिशामें ऋषिमण्डलीके बीच नूतन नक्षत्रमालाओंकी सृष्टि करके यह विचार करने लगे कि ‘मैं दूसरे इन्द्रकी सृष्टि करूँगा अथवा मेरे द्वारा रचित स्वर्गलोक बिना इन्द्रके ही रहेगा।’ ऐसा निश्चय करके उन्होंने क्रोधपूर्वक नूतन देवताओंकी सृष्टि प्रारम्भ की॥ २२-२३ ॥

इससे समस्त देवता, असुर और ऋषि-समुदाय बहुत घबराये और सभी वहाँ आकर महात्मा विश्वामित्रसे विनयपूर्वक बोले— ॥ २४ ॥

‘महाभाग! ये राजा त्रिशंकु गुरुके शापसे अपना पुण्य नष्ट करके चाण्डाल हो गये हैं; अतः तपोधन! ये सशरीर स्वर्गमें जानेके कदापि अधिकारी नहीं हैं’॥

उन देवताओंकी यह बात सुनकर मुनिवर कौशिकने सम्पूर्ण देवताओंसे परमोत्कृष्ट वचन कहा— ॥ २६ ॥

‘देवगण! आपका कल्याण हो। मैंने राजा त्रिशंकुको सदेह स्वर्ग भेजनेकी प्रतिज्ञा कर ली है; अतः उसे मैं झूठी नहीं कर सकता॥ २७ ॥

‘इन महाराज त्रिशंकुको सदा स्वर्गलोकका सुख प्राप्त होता रहे। मैंने जिन नक्षत्रोंका निर्माण किया है, वे सब सदा मौजूद रहें। जबतक संसार रहे, तबतक ये सभी वस्तुएँ, जिनकी मेरे द्वारा सृष्टि हुई है, सदा बनी रहें। देवताओ! आप सब लोग इन बातोंका अनुमोदन करें’॥

उनके ऐसा कहनेपर सब देवता मुनिवर विश्वामित्रसे बोले— ‘महर्षे! ऐसा ही हो। ये सभी वस्तुएँ बनी रहें और आपका कल्याण हो। मुनिश्रेष्ठ! आपके रचे हुए अनेक नक्षत्र आकाशमें वैश्वानरपथसे बाहर प्रकाशित होंगे और उन्हीं ज्योतिर्मय नक्षत्रोंके बीचमें सिर नीचा किये त्रिशंकु भी प्रकाशमान रहेंगे। वहाँ इनकी स्थिति देवताओंके समान होगी और ये सभी नक्षत्र इन कृतार्थ एवं यशस्वी नृपश्रेष्ठका स्वर्गीय पुरुषकी भाँति अनुसरण करते रहेंगे’॥

इसके बाद सम्पूर्ण देवताओंने ऋषियोंके बीचमें ही महातेजस्वी धर्मात्मा विश्वामित्र मुनिकी स्तुति की। इससे प्रसन्न होकर उन्होंने ‘बहुत अच्छा’ कहकर देवताओंका अनुरोध स्वीकार कर लिया॥ ३३ १/२ ॥

नरश्रेष्ठ श्रीराम! तदनन्तर यज्ञ समाप्त होनेपर सब देवता और तपोधन महर्षि जैसे आये थे, उसी प्रकार अपने-अपने स्थानको लौट गये॥ ३४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें साठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥

६०॥