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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

सरसठवाँ सर्ग

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सरसठवाँ सर्ग

हनुमान्‌जीका समुद्र लाँघनेके लिये उत्साह प्रकट करना, जाम्बवान्‌के द्वारा उनकी प्रशंसा तथा वेगपूर्वक छलाँग मारनेके लिये हनुमान्‌जीका महेन्द्र पर्वतपर चढ़ना

सौ योजनके समुद्रको लाँघनेके लिये वानरश्रेष्ठ हनुमान्‌जीको सहसा बढ़ते और वेगसे परिपूर्ण होते देख सब वानर तुरंत शोक छोड़कर अत्यन्त हर्षसे भर गये और महाबली हनुमान्‌जीकी स्तुति करते हुए जोर-जोरसे गर्जना करने लगे॥ १-२ ॥

वे उनके चारों ओर खड़े हो प्रसन्न एवं चकित होकर उन्हें इस प्रकार देखने लगे, जैसे उत्साहयुक्त नारायणावतार वामनजीको समस्त प्रजाने देखा था॥ ३ ॥

अपनी प्रशंसा सुनकर महाबली हनुमान्‌ने शरीरको और भी बढ़ाना आरम्भ किया। साथ ही हर्षके साथ अपनी पूँछको बारम्बार घुमाकर अपने महान् बलका स्मरण किया॥ ४ ॥

बड़े-बूढ़े वानरशिरोमणियोंके मुखसे अपनी प्रशंसा सुनते और तेजसे परिपूर्ण होते हुए हनुमान्‌जीका रूप उस समय बड़ा ही उत्तम प्रतीत होता था॥ ५ ॥

जैसे पर्वतकी विस्तृत कन्दरामें सिंह अँगड़ाई लेता है, उसी प्रकार वायुदेवताके औरस पुत्रने उस समय अपने शरीरको अँगड़ाई ले-लेकर बढ़ाया॥ ६ ॥

जँभाई लेते समय बुद्धिमान् हनुमान्‌जीका दीप्तिमान् मुख जलते हुए भाड़ तथा धूमरहित अग्निके समान शोभा पा रहा था॥ ७ ॥

वे वानरोंके बीचसे उठकर खड़े हो गये। उनके सम्पूर्ण शरीरमें रोमाञ्च हो आया। उस अवस्थामें हनुमान्‌जीने बड़े-बूढ़े वानरोंको प्रणाम करके इस प्रकार कहा— ॥ ८ ॥

‘आकाशमें विचरनेवाले वायुदेवता बड़े बलवान् हैं। उनकी शक्तिकी कोई सीमा नहीं है। वे अग्निदेवके सखा हैं और अपने वेगसे बड़े-बड़े पर्वत-शिखरोंको भी तोड़ डालते हैं॥ ९ ॥

‘अत्यन्त शीघ्र वेगसे चलनेवाले उन शीघ्रगामी महात्मा वायुका मैं औरस पुत्र हूँ और छलाँग मारनेमें उन्हींके समान हूँ॥ १० ॥

‘कई सहस्र योजनोंतक फैले हुए मेरुगिरिकी, जो आकाशके बहुत बड़े भागको ढके हुए है और उसमें रेखा खींचता-सा जान पड़ता है, मैं बिना विश्राम लिये सहस्रों बार परिक्रमा कर सकता हूँ॥ ११ ॥

‘अपनी भुजाओंके वेगसे समुद्रको विक्षुब्ध करके उसके जलसे मैं पर्वत, नदी और जलाशयोंसहित सम्पूर्ण जगत्को आप्लावित कर सकता हूँ॥ १२ ॥

‘वरुणका निवासस्थान यह महासागर मेरी जाँघों और पिंडलियोंके वेगसे विक्षुब्ध हो उठेगा और इसके भीतर रहनेवाले बड़े-बड़े ग्राह ऊपर आ जायँगे॥ १३ ॥

‘समस्त पक्षी जिनकी सेवा करते हैं, वे सर्पभोजी विनतानन्दन गरुड़ आकाशमें उड़ते हों तो भी मैं हजारों बार उनके चारों ओर घूम सकता हूँ॥ १४ ॥

‘श्रेष्ठ वानरो! उदयाचलसे चलकर अपने तेजसे प्रज्वलित होते हुए सूर्यदेवको मैं अस्त होनेसे पहले ही छू सकता हूँ और वहाँसे पृथ्वीतक आकर यहाँ पैर रखे बिना ही पुनः उनके पासतक बड़े भयंकर वेगसे जा सकता हूँ॥ १५-१६ ॥

‘आकाशचारी समस्त ग्रह-नक्षत्र आदिको लाँघकर आगे बढ़ जानेका उत्साह रखता हूँ। मैं चाहूँ तो समुद्रोंको सोख लूँगा, पृथ्वीको विदीर्ण कर दूँगा और कूद-कूदकर पर्वतोंको चूर-चूर कर डालूँगा; क्योंकि मैं दूरतककी छलाँगें मारनेवाला वानर हूँ। महान् वेगसे महासागरको फाँदता हुआ मैं अवश्य उसके पार पहुँच जाऊँगा॥

‘आज आकाशमें वेगपूर्वक जाते समय लताओं और वृक्षोंके नाना प्रकारके फूल मेरे साथ-साथ उड़ते जायँगे॥ १९ ॥

‘बहुत-से फूल बिखरे होनेके कारण मेरा मार्ग आकाशमें अनेक नक्षत्रपुञ्जोंसे सुशोभित स्वातिमार्ग (छायापथ) के समान प्रतीत होगा। वानरो! आज समस्त प्राणी मुझे भयंकर आकाशमें सीधे जाते हुए, ऊपर उछलते हुए और नीचे उतरते हुए देखेंगे॥ २० १/२ ॥

‘कपिवरो! तुम देखोगे, मैं महागिरि मेरुके समान विशाल शरीर धारण करके स्वर्गको ढकता और आकाशको निगलता हुआ-सा आगे बढूँगा, बादलोंको छिन्न-भिन्न कर डालूँगा, पर्वतोंको हिला दूँगा और एकचित्त हो छलाँग मारकर आगे बढ़नेपर समुद्रको भी सुखा दूँगा॥ २१-२२ ॥

‘विनतानन्दन गरुड़में, मुझमें अथवा वायुदेवतामें ही समुद्रको लाँघ जानेकी शक्ति है। पक्षिराज गरुड अथवा महाबली वायुदेवताके सिवा और किसी प्राणीको मैं ऐसा नहीं देखता, जो यहाँसे छलाँग मारनेपर मेरे साथ जा सके॥ २३ ॥

‘मेघसे उत्पन्न हुई विद्युत्की भाँति मैं पलक मारते-मारते सहसा निराधार आकाशमें उड़ जाऊँगा॥ २४॥

‘समुद्रको लाँघते समय मेरा वही रूप प्रकट होगा, जो तीनों पगोंको बढ़ाते समय वामनरूपधारी भगवान् विष्णुका हुआ था॥ २५॥

‘वानरो! मैं बुद्धिसे जैसा देखता या सोचता हूँ, मेरे मनकी चेष्टा भी उसके अनुरूप ही होती है। मुझे निश्चय जान पड़ता है कि मैं विदेहकुमारीका दर्शन करूँगा, अतः अब तुमलोग खुशियाँ मनाओ॥ २६॥

‘मैं वेगमें वायुदेवता तथा गरुड़के समान हूँ। मेरा तो ऐसा विश्वास है कि इस समय मैं दस हजार योजनतक जा सकता हूँ॥ २७॥

‘वज्रधारी इन्द्र अथवा स्वयम्भू ब्रह्माजीके हाथसे भी मैं बलपूर्वक अमृत छीनकर सहसा यहाँ ला सकता हूँ। समूची लङ्काको भी भूमिसे उखाड़कर हाथपर उठाये चल सकता हूँ। ऐसा मेरा विश्वास है’॥ २८१/२॥

अमिततेजस्वी वानरश्रेष्ठ हनुमान्जी जब इस प्रकार गर्जना कर रहे थे, उस समय सम्पूर्ण वानर अत्यन्त हर्षमें भरकर चकितभावसे उनकी ओर देख रहे थे॥ २९१/२॥

हनुमान्जीकी बातें भाई-बन्धुओंके शोकको नष्ट करनेवाली थीं। उन्हें सुनकर वानर-सेनापति जाम्बवान्को बड़ी प्रसन्नता हुई। वे बोले—॥ ३०१/२॥

‘वीर! केसरीके सुपुत्र! वेगशाली पवनकुमार! तात! तुमने अपने बन्धुओंका महान् शोक नष्ट कर दिया॥ ३११/२॥

‘यहाँ आये हुए सभी श्रेष्ठ वानर तुम्हारे कल्याणकी कामना करते हैं। अब ये कार्यकी सिद्धिके उद्देश्यसे एकाग्रचित्त हो तुम्हारे लिये मङ्गलकृत्य—स्वस्तिवाचन आदिका अनुष्ठान करेंगे॥ ३२१/२॥

‘ऋषियोंके प्रसाद, वृद्ध वानरोंकी अनुमति तथा गुरुजनोंकी कृपासे तुम इस महासागरके पार हो जाओ॥ ३३१/२॥

‘जबतक तुम लौटकर यहाँ आओगे, तबतक हम तुम्हारी प्रतीक्षामें एक पैरसे खड़े रहेंगे; क्योंकि हम सब वानरोंका जीवन तुम्हारे ही अधीन है’॥ ३४१/२॥

तदनन्तर कपिश्रेष्ठ हनुमान्ने उन वनवासी वानरोंसे कहा— 'जब मैं यहाँसे छलाँग मारूँगा, उस समय संसारमें कोऽइ भी मेरे वेगको धारण नहीं कर सकेगा॥ ३५१/२ ॥

'शिलाओंके समूहसे शोभा पानेवाले केवल इस महेन्द्र पर्वतके ये शिखर ही ऊँचे-ऊँचे और स्थिर हैं, जिनपर नाना प्रकारके वृक्ष फैले हुए हैं तथा गैरिक ६१९

आदि धातुओंके समुदाय शोभा दे रहे हैं। इन महेन्द्र-शिखरोंपर ही वेगपूर्वक पैर रखकर मैं यहाँसे छलाँग मारूँगा॥ ३६-३७१/२ ॥

'यहाँसे सौ योजनके लिये छलाँग मारते समय महेन्द्र पर्वतके ये महान् शिखर ही मेरे वेगको धारण कर सकेंगे'॥ ३८१/२ ॥

यों कहकर वायुके समान महापराक्रमी शत्रुमर्दन पवनकुमार हनुमान्जी पर्वतोंमें श्रेष्ठ महेन्द्रपर चढ़ गये॥ ३९॥

वह पर्वत नाना प्रकारके पुष्पयुक्त वृक्षोंसे भरा हुआ था, वन्य पशु वहाँकी हरी-हरी घास चर रहे थे, लताओं और फूलोंसे वह सघन जान पड़ता था और वहाँके वृक्षोंमें सदा ही फल-फूल लगे रहते थे॥ ४० ॥

महेन्द्र पर्वतके वनोंमें सिंह और बाघ भी निवास करते थे, मतवाले गजराज विचरते थे, मदमत्त पक्षियोंके समूह सदा कलरव किया करते थे तथा जलके स्रोतों और झरनोंसे वह पर्वत व्याप्त दिखायी देता था॥ ४१ ॥

बड़े-बड़े शिखरोंसे ऊँचे प्रतीत होनेवाले महेन्द्र पर्वतपर आरूढ़ हो इन्द्रतुल्य पराक्रमी महाबली कपिश्रेष्ठ हनुमान् वहाँ इधर-उधर टहलने लगे॥ ४२ ॥

महाकाय हनुमान्जीके दोनों पैरोंसे दबा हुआ वह महान् पर्वत सिंहसे आक्रान्त हुए महान् मदमत्त गजराजकी भाँति चीत्कार-सा करने लगा (वहाँ रहनेवाले प्राणियोंका शब्द ही मानो उसका आर्त चीत्कार था)॥ ४३ ॥

उसके शिलासमूह इधर-उधर बिखर गये। उससे नये-नये झरने फूट निकले। वहाँ रहनेवाले मृग और हाथी भयसे थर्रा उठे और बड़े-बड़े वृक्ष झोंके खाकर झूमने लगे॥ ४४ ॥

मधुपानके संसर्गसे उद्धत चित्तवाले अनेकानेक गन्धर्वोंके जोड़े, विद्याधरोंके समुदाय और उड़ते हुए पक्षी भी उस पर्वतके विशाल शिखरोंको छोड़कर जाने लगे। बड़े-बड़े सर्प बिलोंमें

छिप गये तथा उस पर्वतके शिखरोंसे बड़ी-बड़ी शिलाएँ टूट-टूटकर गिरने लगीं। इस प्रकार वह महान् पर्वत बड़ी दुरवस्थामें पड़ गया॥ ४५-४६॥

बिलोंसे अपने आधे शरीरको बाहर निकालकर लम्बी साँस खींचते हुए सर्पोंसे उपलक्षित होनेवाला वह महान् पर्वत उस समय अनेकानेक पताकाओंसे अलंकृत-सा प्रतीत होता था॥ ४७ ॥

भयसे घबराये हुए ऋषि-मुनि भी उस पर्वतको छोड़ने लगे। जैसे विशाल दुर्गम वनमें अपने साथियोंसे बिछुड़ा हुआ एक राही भारी विपत्तिमें फँस जाता है, यही दशा उस महान् पर्वत महेन्द्रकी हो रही थी॥ ४८ ॥

शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले वानरसेनाके श्रेष्ठ वीर वेगशाली महामनस्वी महानुभाव हनुमान्जीका मन वेगपूर्वक छलाँग मारनेकी योजनामें लगा हुआ था। उन्होंने चित्तको एकाग्र करके मन-ही-मन लङ्काका स्मरण किया॥ ४९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें सरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६७ ॥

॥ किष्किन्धाकाण्ड समाप्त ॥

(इस पृष्ठ पर केवल चित्र है, कोई पाठ या श्लोक उपलब्ध नहीं है।)