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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

सत्तावनवाँ सर्ग

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सत्तावनवाँ सर्ग

वसिष्ठका नूतन शरीर-धारण और निमिका प्राणियोंके नयनोंमें निवास

उस दिव्य एवं अद्भुत कथाको सुनकर लक्ष्मणको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे श्रीरघुनाथजीसे बोले—॥ १ ॥

‘काकुत्स्थ! वे ब्रह्मर्षि वसिष्ठ तथा राजर्षि निमि जो देवताओंद्वारा भी सम्मानित थे, अपने-अपने शरीरको छोड़कर फिर नूतन शरीरसे किस प्रकार संयुक्त हुए?’॥ २ ॥

उनका यह प्रश्न सुनकर सत्यपराक्रमी श्रीरामने महात्मा वसिष्ठके शरीर-ग्रहणसे सम्बन्ध रखनेवाली उस कथाको पुनः कहना आरम्भ किया—॥ ३ ॥

‘रघुश्रेष्ठ! महामना मित्र और वरुणदेवताके तेज (वीर्य) से युक्त जो वह प्रसिद्ध कुम्भ था, उससे दो तेजस्वी ब्राह्मण प्रकट हुए। वे दोनों ही ऋषियोंमें श्रेष्ठ थे॥ ४ ॥

‘पहले उस घटसे महर्षि भगवान् अगस्त्य उत्पन्न हुए और मित्रसे यह कहकर कि ‘मैं आपका पुत्र नहीं हूँ’ वहाँसे अन्यत्र चले गये॥ ५ ॥

‘वह मित्रका तेज था, जो उर्वशीके निमित्तसे पहले ही उस कुम्भमें स्थापित किया गया था। तत्पश्चात् उस कुम्भमें वरुणदेवताका तेज भी सम्मिलित हो गया था॥ ६ ॥

‘तत्पश्चात् कुछ कालके बाद मित्रावरुणके उस वीर्यसे तेजस्वी वसिष्ठ मुनिका प्रादुर्भाव हुआ। जो इक्ष्वाकुकुलके देवता (गुरु या पुरोहित) हुए॥ ७ ॥

‘सौम्य लक्ष्मण! महातेजस्वी राजा इक्ष्वाकुने उनके वहाँ जन्म ग्रहण करते ही उन अनिन्द्य मुनि वसिष्ठका हमारे इस कुलके हितके लिये पुरोहितके पदपर वरण कर लिया॥ ८ ॥

सौम्य! इस प्रकार नूतन शरीरसे युक्त वसिष्ठ मुनिकी उत्पत्तिका प्रकार बताया गया। अब निमिका जैसा वृत्तान्त है, वह सुनो॥ ९ ॥

‘राजा निमिको देहसे पृथक् हुआ देख उन सभी मनीषी ऋषियोंने स्वयं ही यज्ञकी दीक्षा ग्रहण करके उस यज्ञको पूरा किया॥ १० ॥

‘उन श्रेष्ठ ब्रह्मर्षियोंने पुरवासियों और सेवकोंके साथ रहकर गन्ध, पुष्प और वस्त्रोंसहित राजा निमिके उस शरीरको तेलके कड़ाह आदिमें सुरक्षित रखा॥ ११ ॥

‘तदनन्तर जब यज्ञ समाप्त हुआ, तब वहाँ भृगुने कहा—‘राजन्! (राजाके शरीरके अभिमानी जीवात्मन्!) मैं तुमपर बहुत संतुष्ट हूँ, अतः यदि तुम चाहो तो तुम्हारे जीव-चैतन्यको मैं पुनः इस शरीरमें ला दूँगा’॥ १२ ॥

भृगुके साथ ही अन्य सब देवताओंने भी अत्यन्त प्रसन्न होकर निमिके जीवात्मासे कहा—‘राजर्षे! वर माँगो। तुम्हारे जीव-चैतन्यको कहाँ स्थापित किया जाय’॥

‘समस्त देवताओंके ऐसा कहनेपर निमिके जीवात्माने उस समय उनसे कहा—‘सुरश्रेष्ठ! मैं समस्त प्राणियोंके नेत्रोंमें निवास करना चाहता हूँ’॥ १४ ॥

तब देवताओंने निमिके जीवात्मासे कहा—‘बहुत अच्छा, तुम वायुरूप होकर समस्त प्राणियोंके नेत्रोंमें विचरते रहोगे॥ १५ ॥

‘पृथ्वीनाथ! वायुरूपसे विचरते हुए आपके सम्बन्धसे जो थकावट होगी, उसका निवारण करके विश्राम पानेके लिये प्राणियोंके नेत्र बारंबार बंद हो जाया करेंगे’॥ १६ ॥

‘ऐसा कहकर सब देवता जैसे आये थे, वैसे चले गये; फिर महात्मा ऋषियोंने निमिके शरीरको पकड़ा और उसपर अरणि रखकर उसे बलपूर्वक मथना आरम्भ किया॥ १७ १/२ ॥

‘पूर्ववत् मन्त्रोच्चारणपूर्वक होम करते हुए उन महात्माओंने जब निमिके पुत्रकी उत्पत्तिके लिये अरणि-मन्थन आरम्भ किया, तब उस मन्थनसे महातपस्वी मिथि उत्पन्न हुए। इस अद्भुत जन्मका हेतु होनेके कारण वे जनक कहलाये तथा विदेह (जीव रहित शरीर)-से प्रकट होनेके कारण उन्हें वैदेह भी कहा गया। इस प्रकार पहले विदेहराज जनकका नाम महातेजस्वी मिथि हुआ, जिससे यह जनकवंश मैथिल कहलाया॥ १८—२० ॥

‘सौम्य लक्ष्मण! राजाओंमें श्रेष्ठ निमिके शापसे ब्राह्मण वसिष्ठका और ब्राह्मण वसिष्ठके शापसे राजा निमिका जो अद्भुत जन्म घटित हुआ, उसका सारा कारण मैंने तुम्हें कह सुनाया’॥ २१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें सत्तावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५७॥