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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

सत्तानबेवाँ सर्ग

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सत्तानबेवाँ सर्ग

सुग्रीवके साथ महोदरका घोर युद्ध तथा वध

उस महासमरमें वे दोनों ओरकी सेनाएँ परस्परकी मारकाटसे प्रचण्ड ग्रीष्मऋतुमें सूखते हुए दो तालाबोंकी तरह शीघ्र ही क्षीण हो चलीं॥ १ ॥

अपनी सेनाके विनाश और विरूपाक्षके वधसे राक्षसराज रावणका क्रोध दूना बढ़ गया॥ २ ॥

वानरोंकी मारसे अपनी सेनाको क्षीण हुँऽइ देख दैवके उलट-फेरपर दृष्टिपात करके युद्धस्थलमें उसे बड़ी व्यथा हुँऽइ॥ ३ ॥

उसने पास ही खड़े हुए महोदरसे कहा— ‘महाबाहो! इस समय मेरी विजयकी आशा तुम्हारे ऊपर ही अवलम्बित है॥ ४ ॥

‘वीर! आज अपना पराक्रम दिखाओ और शत्रुसेनाका वध करो। यही स्वामीके अन्नका बदला चुकानेका समय है। अतः अच्छी तरह युद्ध करो’॥ ५ ॥

रावणके ऐसा कहनेपर राक्षसराज महोदरने ‘बहुत अच्छा’ कहकर उसकी आज्ञा शिरोधार्य की और जैसे पतङ्ग आगमें कूदता है, उसी प्रकार उसने शत्रुसेनामें प्रवेश किया॥ ६ ॥

सेनामें प्रवेश करके तेजस्वी और महाबली महोदरने स्वामीकी आज्ञासे प्रेरित हो अपने पराक्रमद्वारा वानरोंका संहार आरम्भ किया॥ ७ ॥

वानर भी बड़े शक्तिशाली थे। वे बड़ी-बड़ी शिलाएँ लेकर शत्रु की भयंकर सेनामें घुस गये और समस्त राक्षसोंका संहार करने लगे॥ ८ ॥

महोदरने अत्यन्त कुपित होकर अपने सुवर्णभूषित बाणोंद्वारा उस महायुद्धमें वानरोंके हाथ-पैर और जाँघें काट डालीं॥ ९ ॥

राक्षसोंद्वारा अत्यन्त पीड़ित हुए वे सब वानर दसों दिशाओंमें भागने लगे। कितने ही सुग्रीवकी शरणमें गये॥ १० ॥

वानरोंकी विशाल सेनाको समरभूमिसे भागती देख सुग्रीवने पास ही खड़े हुए महोदरपर आक्रमण किया॥ ११ ॥

वानरराज बड़े तेजस्वी थे। उन्होंने पर्वतके समान विशाल एवं भयंकर शिला उठाकर महोदरके वधके लिये उसपर चलायी॥ १२ ॥

उस दुर्जय शिलाको सहसा अपने ऊपर आती देखकर भी महोदरके मनमें घबराहट नहीं हुई। उसने बाणोंद्वारा उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले॥ १३ ॥

उस राक्षसके बाणसमूहोंसे कटकर सहस्रों टुकड़ोंमें विभक्त हुई वह शिला उस समय आकुल हुए गृध्रसमुदायकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ी॥ १४ ॥

उस शिलाको विदीर्ण हुई देख सुग्रीवका क्रोध बहुत बढ़ गया। उन्होंने एक शालका वृक्ष उखाड़कर उस राक्षसके ऊपर फेंका, किंतु राक्षसने उसके भी कई टुकड़े कर डाले॥ १५ ॥

साथ ही शत्रुसेनाका दमन करनेवाले उस शूरवीरने इन्हें अपने बाणोंसे घायल कर दिया। इसी समय क्रोधसे भरे हुए सुग्रीवको वहाँ पृथ्वीपर पड़ा हुआ एक परिघ दिखायी दिया॥ १६ ॥

उस तेजस्वी परिघको घुमाकर सुग्रीवने महोदरको अपनी फुर्ती दिखाते हुए उस भयानक वेगशाली परिघके द्वारा उस राक्षसके उत्तम घोड़ोंको मार डाला॥ १७ ॥

घोड़ोंके मारे जानेपर वीर राक्षस महोदर अपने विशाल रथसे कूद पड़ा और अत्यन्त रोषसे भरकर उसने गदा उठा ली॥ १८ ॥

एकके हाथमें गदा थी और दूसरेके हाथमें परिघ। वे दोनों वीर युद्धस्थलमें दो साँड़ों और बिजलीसहित दो मेघोंके समान गर्जना करते हुए एक-दूसरेसे भिड़ गये॥

तदनन्तर कुपित हुए राक्षस महोदरने सुग्रीवपर सूर्यतुल्य तेजसे चमकती हुई एक गदा चलायी॥ २० ॥

उस महाभयंकर गदाको अपनी ओर आती देख महासमरमें महाबली वानरराज सुग्रीवके नेत्र रोषसे लाल हो गये और उन्होंने परिघ उठाकर उसके द्वारा राक्षसकी गदापर आघात किया। वह गदा गिर पड़ी; किंतु उसके वेगसे टकराकर सुग्रीवका परिघ भी टूटकर पृथ्वीपर जा गिरा॥ २१-२२ ॥

तब तेजस्वी सुग्रीवने भूमिपरसे एक लोहेका भयंकर मूसल उठाया; जिसमें सब ओरसे सोना जड़ा हुआ था॥ २३ ॥

उसे उठाकर उन्होंने राक्षसपर दे मारा। साथ ही उस राक्षसने भी इनके ऊपर गदा फेंकी। गदा और मूसल दोनों आपसमें टकराकर टूट गये और जमीनपर जा गिरे॥ २४ ॥

वे दोनों वीर तेज और बलसे सम्पन्न थे और जलती हुई अग्नियोंके समान उद्दीप्त हो रहे थे। अपने-अपने आयुधोंके टूट जानेपर वे घूंसोंसे एक-दूसरेको मारने लगे॥ २५ ॥

उस समय बारम्बार गर्जते हुए वे दोनों योद्धा परस्पर मुक्कोंसे प्रहार करने लगे। फिर थप्पड़ोंसे एक-दूसरेको मारकर दोनों ही पृथ्वीपर गिर पड़े॥ २६ ॥

फिर तत्काल ही दोनों उछले और शीघ्र ही एक-दूसरेपर चोट करने लगे। वे दोनों वीर हार नहीं मानते थे। दोनों ही दोनोंपर भुजाओंद्धारा प्रहार करते रहे॥ २७ ॥

शत्रुओंको तपानेवाले वे दोनों वीर बाहुयुद्ध करते-करते थक गये। तब महान् वेगशाली राक्षस महोदरने थोड़ी ही दूरपर पड़ी हुई ढालसहित तलवार उठा ली। उसी तरह अत्यन्त वेगशाली कपिश्रेष्ठ सुग्रीवने भी वहाँ गिरे हुए विशाल खड्गको ढालसहित उठा लिया॥ २८ ॥

महोदर और सुग्रीव दोनों युद्धके मैदानमें शस्त्र चलानेकी कलामें चतुर थे तथा दोनोंके शरीर रोषसे प्रभावित थे; अतः रणभूमिमें हर्ष और उत्साहसे युक्त हो वे तलवार उठाये गर्जते हुए एक-दूसरेपर टूट पड़े॥

वे दोनों बड़ी तेजीसे दायें-बायें पैंतरे बदल रहे थे, दोनोंका दोनोंपर क्रोध बढ़ा हुआ था तथा दोनों ही अपनी-अपनी विजयकी आशा लगाये हुए थे॥ ३१ ॥

अपने बलपर घमंड करनेवाले महान् वेगशाली तथा शौर्य-सम्पन्न दुर्बुद्धि महोदरने अपनी वह तलवार सुग्रीवके विशाल कवचपर दे मारी॥ ३२ ॥

सुग्रीवके कवचमें लगी हुई तलवारको जब वह राक्षस खींचने लगा, उसी समय कपिकुञ्जर सुग्रीवने महोदरके शिरस्त्राणसहित कुण्डलमण्डित मस्तकको अपने खड्गसे काट लिया॥ ३३ ॥

मस्तक कट जानेपर राक्षसराज महोदर पृथ्वीपर गिर पड़ा। यह देखकर उसकी सेना फिर वहाँ नहीं दिखायी दी॥ ३४ ॥

महोदरको मारकर प्रसन्न हुए वानरराज सुग्रीव अन्य वानरोंके साथ गर्जना करने लगे। उस समय दशमुख रावणको बड़ा क्रोध हुआ और श्रीरघुनाथजी हर्षसे खिल उठे॥ ३५ ॥

उस समय समस्त राक्षसोंका मन दुःखी हो गया। उन सबके मुखपर विषाद छा गया और वे सभी भयभीतचित्त होकर वहाँसे भाग चले॥ ३६ ॥

महोदरका शरीर किसी महान् पर्वतके एक टूटे हुए शिखर-सा जान पड़ता था। उसे पृथ्वीपर गिराकर सूर्यपुत्र सुग्रीव वहाँ विजय-लक्ष्मीसे सुशोभित होने लगे, मानो प्रचण्ड सूर्यदेव अपने तेजसे प्रकाशित हो रहे हों॥

इस प्रकार वानरराज सुग्रीव युद्धके मुहानेपर विजय पाकर बड़ी शोभा पाने लगे। उस समय देवता, सिद्ध और यक्षोंके समुदाय तथा भूतलनिवासी प्राणियोंके समूह भी बड़े हर्षसे उनकी ओर देखने लगे॥ ३८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें सत्तानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९७ ॥