श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
सत्तरवाँ सर्ग
सत्तरवाँ सर्ग
देवताओंसे वरदान पा शत्रुघ्नका मधुरापुरीको बसाकर बारहवें वर्षमें वहाँसे श्रीरामके पास जानेका विचार करना
लवणासुरके मारे जानेपर इन्द्र और अग्नि आदि देवता आकर शत्रुओंको संताप देनेवाले शत्रुघ्नसे अत्यन्त मधुर वाणीमें बोले—॥ १ ॥
‘वत्स! सौभाग्यकी बात है कि तुम्हें विजय प्राप्त हुई और लवणासुर मारा गया। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले पुरुषसिंह! तुम वर माँगो॥ २ ॥
‘महाबाहो! हम सब लोग तुम्हें वर देनेके लिये यहाँ आये हैं। हम तुम्हारी विजय चाहते थे। हमारा दर्शन अमोघ है (अतएव तुम कोई वर माँगो)’॥ ३ ॥
देवताओंका यह वचन सुनकर मनको वशमें रखनेवाले शूरवीर महाबाहु शत्रुघ्न मस्तकपर अञ्जलि बाँध इस प्रकार बोले—॥ ४ ॥
‘देवताओ! यह देवनिर्मित रमणीय मधुपुरी शीघ्र ही मनोहर राजधानीके रूपमें बस जाय। यही मेरे लिये श्रेष्ठ वर है’॥ ५ ॥
तब देवताओंने उन रघुकुलनन्दन शत्रुघ्नसे प्रसन्न होकर कहा—‘बहुत अच्छा ऐसा ही हो। यह रमणीय पुरी निःसंदेह शूर-वीरोंकी सेनासे सम्पन्न हो जायगी’॥ ६ ॥
ऐसा कहकर महामनस्वी देवता उस समय स्वर्गको चले गये। महातेजस्वी शत्रुघ्नने भी गङ्गातटसे अपनी उस सेनाको बुलवाया॥ ७ ॥
शत्रुघ्नजीका आदेश पाकर वह सेना शीघ्र चली आयी। शत्रुघ्नने श्रावणमाससे उस पुरीको बसाना आरम्भ किया॥ ८ ॥
तबसे बारहवें वर्षतक वह पुरी तथा वह शूरसेन जनपद पूर्णरूपसे बस गया। वहाँ कहीं किसीसे भय नहीं था। वह देश दिव्य सुख-सुविधाओंसे सम्पन्न था॥ ९ ॥
वहाँके खेत खेतीसे हरे-भरे हो गये। इन्द्र वहाँ समयपर वर्षा करने लगे। शत्रुघ्नजीके बाहुबलसे सुरक्षित मधुपुरी नीरोग तथा वीर पुरुषोंसे भरी थी॥ १० ॥
वह पुरी यमुनाके तटपर अर्धचन्द्राकार बसी थी और अनेकानेक सुन्दर गृहों, चौराहों, बाजारों तथा गलियोंसे सुशोभित होती थी। उसमें चारों वर्णोंके लोग निवास करते थे तथा नाना
प्रकारके वाणिज्य-व्यवसाय उसकी शोभा बढ़ाते थे॥ ११ ॥
पूर्वकालमें लवणासुरने जिन विशाल गृहोंका निर्माण कराया था, उनमें सफेदी कराकर उन्हें नाना प्रकारके चित्रोंसे सुसज्जित करके शत्रुघ्नजी उनकी शोभा बढ़ाने लगे॥ १२ ॥
अनेकानेक उद्यान और विहारस्थल सब ओरसे उस पुरीको सुशोभित करते थे। देवताओं और मनुष्योंसे सम्बन्ध रखनेवाले अन्य शोभनीय पदार्थ भी उस नगरीकी शोभावृद्धि करते थे॥ १३ ॥
नाना प्रकारकी क्रय-विक्रय-योग्य वस्तुओंसे सुशोभित वह दिव्य पुरी अनेकानेक देशोंसे आये हुए वणिग्जनोंसे शोभा पा रही थी॥ १४ ॥
उसे पूर्णतः समृद्धिशालिनी देख सफलमनोरथ हुए भरतानुज शत्रुघ्न अत्यन्त प्रसन्न हो बड़े हर्षका अनुभव करने लगे॥ १५ ॥
मधुरापुरीको बसाकर उनके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि अयोध्यासे आये बारहवाँ वर्ष हो गया, अब मुझे वहाँ चलकर श्रीरामचन्द्रजीके चरणारविन्दोंका दर्शन करना चाहिये॥ १६ ॥
इस प्रकार नाना प्रकारके मनुष्योंसे भरी हुई उस देवपुरीके समान मनोहर मधुरापुरीको बसाकर रघुवंशकी वृद्धि करनेवाले राजा शत्रुघ्नने श्रीरघुनाथजीके चरणोंके दर्शनका विचार किया॥ १७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें सत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥
७०॥