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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

बारहवाँ सर्ग

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बारहवाँ सर्ग

नगरकी रक्षाके लिये सैनिकोंकी नियुक्ति, रावणका सीताके प्रति अपनी आसक्ति बताकर उनके हरणका प्रसंग बताना और भावी कर्तव्यके लिये सभासदोंकी सम्मति माँगना, कुम्भकर्णका पहले तो उसे फटकारना, फिर समस्त शत्रुओंके वधका स्वयं ही भार उठाना

शत्रुविजयी रावणने उस सम्पूर्ण सभाकी ओर दृष्टिपात करके सेनापति प्रहस्तको उस समय इस प्रकार आदेश दिया— ॥ १ ॥

‘सेनापते! तुम सैनिकोंको ऐसी आज्ञा दो, जिससे तुम्हारे अस्त्रविद्यामें पारंगत रथी, घुड़सवार, हाथीसवार और पैदल योद्धा नगरकी रक्षामें तत्पर रहें’ ॥ २ ॥

अपने मनको वशमें रखनेवाले प्रहस्तने राजाके आदेशका पालन करनेकी इच्छासे सारी सेनाको नगरके बाहर और भीतर यथायोग्य स्थानोंपर नियुक्त कर दिया ॥

नगरकी रक्षाके लिये सारी सेनाको तैनात करके प्रहस्त राजा रावणके सामने आ बैठा और इस प्रकार बोला— ॥ ४ ॥

‘राक्षसराज! आप महाबली महाराजकी सेनाको मैंने नगरके बाहर और भीतर यथास्थान नियुक्त कर दिया है। अब आप स्वस्थचित्त होकर शीघ्र ही अपने अभीष्ट कार्यका सम्पादन कीजिये’ ॥ ५ ॥

राज्यका हित चाहनेवाले प्रहस्तकी यह बात सुनकर अपने सुखकी इच्छा रखनेवाले रावणने सुहृदोंके बीचमें यह बात कही— ॥ ६ ॥

‘सभासदो! धर्म, अर्थ और कामविषयक संकट उपस्थित होनेपर आपलोग प्रिय-अप्रिय, सुख-दुःख, लाभ-हानि और हिताहितका विचार करनेमें समर्थ हैं॥

‘आपलोगोंने सदा परस्पर विचार करके जिनजि न कार्योंका आरम्भ किया है, वे सब-के-सब मेरे लिये कभी निष्फल नहीं हुए हैं॥ ८ ॥

‘जैसे चन्द्रमा, ग्रह और नक्षत्रोंसहित मरुद्गणोंसे घिरे हुए इन्द्र स्वर्गकी सम्पत्तिका उपभोग करते हैं, उसी भाँति आपलोगोंसे घिरा रहकर मैं भी लङ्काकी प्रचुर राजलक्ष्मीका सुख भोगता रहूँ—यही मेरी अभिलाषा है॥ ९ ॥

‘मैंने जो काम किया है, उसे मैं पहले ही आप सबके सामने रखकर आपके द्वारा उसका समर्थन चाहता था, परंतु उस समय कुम्भकर्ण सोये हुए थे, इसलिये मैंने इसकी चर्चा नहीं चलायी॥ १० ॥

‘समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ महाबली कुम्भकर्ण छः महीनेसे सो रहे थे। अभी इनकी नींद खुली है॥ ११ ॥

‘मैं दण्डकारण्यसे, जो राक्षसोंके विचरनेका स्थान है, रामकी प्यारी रानी जनकदुलारी सीताको हर लाया हूँ॥ १२ ॥

‘किंतु वह मन्दगामिनी सीता मेरी शय्यापर आरूढ़ होना नहीं चाहती है। मेरी दृष्टिमें तीनों लोकोंके भीतर सीताके समान सुन्दरी दूसरी कोई स्त्री नहीं है॥ १३ ॥

‘उसके शरीरका मध्यभाग अत्यन्त सूक्ष्म है, कटिके पीछेका भाग स्थूल है, मुख शरत्कालके चन्द्रमाको लज्जित करता है, वह सौम्य रूप और स्वभाववाली सीता सोनेकी बनी हुई प्रतिमा-सी जान पड़ती है। ऐसा लगता है, जैसे वह मयासुरकी रची हुई कोई माया हो॥ १४ ॥

‘उसके चरणोंके तलवे लाल रंगके हैं। दोनों पैर सुन्दर, चिकने और सुडौल हैं तथा उनके नख ताँबे-जैसे लाल हैं। सीताके उन चरणोंको देखकर मेरी कामाग्नि प्रज्वलित हो उठती है॥ १५ ॥

‘जिसमें घीकी आहुति डाली गयी हो, उस अग्निकी लपट और सूर्यकी प्रभाके समान इस तेजस्विनी सीताको देखकर तथा ऊँची नाक और विशाल नेत्रोंसे सुशोभित उसके निर्मल एवं मनोहर मुखका अवलोकन करके मैं अपने वशमें नहीं रह गया हूँ। कामने मुझे अपने अधीन कर लिया है॥ १६ १/२ ॥

‘जो क्रोध और हर्ष दोनों अवस्थाओंमें समानरूपसे बना रहता है, शरीरकी कान्तिको फीकी कर देता है और शोक तथा संतापके समय भी कभी मनसे दूर नहीं होता, उस कामने मेरे हृदयको कलुषित (व्याकुल) कर दिया है॥ १७ १/२ ॥

‘विशाल नेत्रोंवाली माननीय सीताने मुझसे एक वर्षका समय माँगा है। इस बीचमें वह अपने पति श्रीरामकी प्रतीक्षा करेगी। मैंने मनोहर नेत्रोंवाली सीताके उस सुन्दर वचनको सुनकर उसे पूर्ण करनेकी प्रतिज्ञा कर ली है*॥ १८-१९ ॥

‘जैसे बड़े मार्गमें चलते-चलते घोड़ा थक जाता है, उसी प्रकार मैं भी कामपीड़ासे थकावटका अनुभव कर रहा हूँ। वैसे तो मुझे शत्रुओंकी ओरसे कोई डर नहीं है; क्योंकि वे वनवासी वानर अथवा वे दोनों दशरथकुमार श्रीराम और लक्ष्मण असंख्य जल-जन्तुओं तथा मत्स्योंसे भरे हुए अलङ्घ्य महासागरको कैसे पार कर सकेंगे?॥ २० १/२ ॥

‘अथवा एक ही वानरने आकर हमारे यहाँ महान् संहार मचा दिया था। इसलिये कार्यसिद्धिके उपायोंको समझ लेना अत्यन्त कठिन है। अतः जिसको अपनी बुद्धिके अनुसार जैसा उचित जान पड़े, वह वैसा ही बतावे। तुम सब लोग अपने विचार अवश्य व्यक्त करो। यद्यपि हमें मनुष्यसे कोई भय नहीं है, तथापि तुम्हें विजयके उपायपर विचार तो करना ही चाहिये॥ २१-२२ ॥

‘उन दिनों जब देवताओं और असुरोंका युद्ध चल रहा था, उसमें आप सब लोगोंकी सहायतासे ही मैंने विजय प्राप्त की थी। आज भी आप मेरे उसी प्रकार सहायक हैं। वे दोनों राजकुमार सीताका पता पाकर सुग्रीव आदि वानरोंको साथ लिये समुद्रके उस तटतक पहुँच चुके हैं॥ २३-२४ ॥

‘अब आपलोग आपसमें सलाह कीजिये और कोई ऐसी सुन्दर नीति बताइये, जिससे सीताको लौटाना न पड़े तथा वे दोनों दशरथकुमार मारे जायँ॥ २५ ॥

‘वानरोंके साथ समुद्रको पार करके यहाँतक आनेकी शक्ति जगत्में रामके सिवा और किसीमें नहीं देखता हूँ (किंतु राम और वानर यहाँ आकर भी मेरा कुछ बिगाड़ नहीं सकते), अतः यह निश्चय है कि जीत मेरी ही होगी’॥ २६ ॥

कामातुर रावणका यह खेदपूर्ण प्रलाप सुनकर कुम्भकर्णको क्रोध आ गया और उसने इस प्रकार कहा—॥ २७ ॥

‘जब तुम लक्ष्मणसहित श्रीरामके आश्रमसे एक बार स्वयं ही मनमाना विचार करके सीताको यहाँ बलपूर्वक हर लाये थे, उसी समय तुम्हारे चित्तको हमलोगोंके साथ इस विषयमें सुनिश्चित विचार कर लेना चाहिये था। ठीक उसी तरह जैसे यमुना जब पृथ्वीपर उतरनेको उद्यत हुईं, तभी उन्होंने यमुनोत्री पर्वतके कुण्डविशेषको अपने जलसे पूर्ण किया था (पृथ्वीपर उतर जानेके बाद उनका वेग जब समुद्रमें जाकर शान्त हो गया, तब वे पुनः उस कुण्डको नहीं भर सकतीं, उसी प्रकार तुमने भी जब विचार करनेका अवसर था, तब तो हमारे साथ बैठकर विचार

किया नहीं। अब अवसर बिताकर सारा काम बिगड़ जानेके बाद तुम विचार करने चले हो)॥ २८ ॥

‘महाराज! तुमने जो यह छलपूर्वक छिपकर परस्त्री-हरण आदि कार्य किया है, यह सब तुम्हारे लिये बहुत अनुचित है। इस पापकर्मको करनेसे पहले ही आपको हमारे साथ परामर्श कर लेना चाहिये था॥ २९ ॥

‘दशानन! जो राजा सब राजकार्य न्यायपूर्वक करता है, उसकी बुद्धि निश्चयपूर्ण होनेके कारण उसे पीछे पछताना नहीं पड़ता है॥ ३० ॥

‘जो कर्म उचित उपायका अवलम्बन किये बिना ही किये जाते हैं तथा जो लोक और शास्त्रके विपरीत होते हैं, वे पापकर्म उसी तरह दोषकी प्राप्ति कराते हैं, जैसे अपवित्र आभिचारिक यज्ञोंमें होमे गये हविष्य॥ ३१ ॥

‘जो पहले करनेयोग्य कार्योंको पीछे करना चाहता है और पीछे करनेयोग्य काम पहले ही कर डालता है, वह नीति और अनीतिको नहीं जानता॥ ३२ ॥

‘शत्रुलोग अपने विपक्षीके बलको अपनेसे अधिक देखकर भी यदि वह हर काममें चपल (जल्दबाज) है तो उसका दमन करनेके लिये उसी तरह उसके छिद्र ढूँढ़ते रहते हैं, जैसे पक्षी दुर्लङ्घ्य क्रौञ्च पर्वतको लाँघकर आगे बढ़नेके लिये उसके (उस) छिद्रका२ आश्रय लेते हैं (जिसे कुमार कार्तिकेयने अपनी शक्तिका प्रहार करके बनाया था)॥ ३३ ॥

‘महाराज! तुमने भावी परिणामका विचार किये बिना ही यह बहुत बड़ा दुष्कर्म आरम्भ किया है। जैसे विषमिश्रित भोजन खानेवालेके प्राण हर लेता है, उसी प्रकार श्रीरामचन्द्रजी तुम्हारा वध कर डालेंगे। उन्होंने अभीतक तुम्हें मार नहीं डाला, इसे अपने लिये सौभाग्यकी बात समझो॥ ३४ ॥

‘अनघ! यद्यपि तुमने शत्रुओंके साथ अनुचित कर्म आरम्भ किया है, तथापि मैं तुम्हारे शत्रुओंका संहार करके सबको ठीक कर दूँगा॥ ३५ ॥

‘निशाचर! तुम्हारे शत्रु यदि इन्द्र, सूर्य, अग्नि, वायु, कुबेर और वरुण भी हों तो मैं उनके साथ युद्ध करूँगा और तुम्हारे सभी शत्रुओंको उखाड़ फेंकूँगा॥ ३६ ॥

‘मैं पर्वतके समान विशाल एवं तीखी दाढ़ोंसे युक्त शरीर धारण करके महान् परिघ हाथमें ले समरभूमिमें जूझता हुआ जब गर्जना करूँगा, उस समय देवराज इन्द्र भी भयभीत हो जायँगे॥ ३७ ॥

‘राम मुझे एक बाणसे मारकर दूसरे बाणसे मारने लगेंगे, उसी बीचमें मैं उनका खून पी लूँगा। इसलिये तुम पूर्णतः निश्चिन्त हो जाओ॥ ३८॥

‘मैं दशरथनन्दन श्रीरामका वध करके तुम्हारे लिये सुखदायिनी विजय सुलभ करानेका प्रयत्न करूँगा। लक्ष्मणसहित रामको मारकर समस्त वानरयूथपतियोंको खा जाऊँगा॥ ३९॥

‘तुम मौजसे विहार करो। उत्तम वारुणीका पान करो और निश्चिन्त होकर अपने लिये हितकर कार्य करते रहो। मेरे द्वारा रामके यमलोक भेज दिये जानेपर सीता चिरकालके लिये तुम्हारे अधीन हो जायगी’॥ ४०॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें बारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १२॥


१. यहाँ रावणने सभासदोंके सामने अपनी झूठी उदारता दिखानेके लिये सर्वथा असत्य कहा है। सीताजीने कभी अपने मुँहसे यह नहीं कहा था कि ‘मुझे एक वर्षका समय दो। यदि उतने दिनोंतक श्रीराम नहीं आये तो मैं तुम्हारी हो जाऊँगी।’ सीताने तो सदा तिरस्कारपूर्वक उसके जघन्य प्रस्तावको ठुकराया ही था। इसने स्वयं ही अपनी ओरसे उन्हें एक वर्षका अवसर दिया था। (देखिये अरण्यकाण्ड सर्ग ५६ श्लोक २४-२५)
२. कुमार कार्तिकेयने अपनी शक्तिके द्वारा क्रौञ्चपर्वतको विदीर्ण करके उसमें छेद कर दिया था—यह प्रसंग महाभारतमें आया है। (देखिये शल्य प० ४६। ८४)