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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

बाईसवाँ सर्ग

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बाईसवाँ सर्ग

राजा दशरथका स्वस्तिवाचनपूर्वक राम-लक्ष्मणको मुनिके साथ भेजना, मार्गमें उन्हें विश्वामित्रसे बला और अतिबला नामक विद्याकी प्राप्ति

वसिष्ठके ऐसा कहनेपर राजा दशरथका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा। उन्होंने स्वयं ही लक्ष्मणसहित श्रीरामको अपने पास बुलाया। फिर माता कौसल्या, पिता दशरथ और पुरोहित वसिष्ठने स्वस्तिवाचन करनेके पश्चात् उनका यात्रासम्बन्धी मंगलकार्य सम्पन्न किया—श्रीरामको मंगलसूचक मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित किया गया॥ १-२ ॥

तदनन्तर राजा दशरथने पुत्रका मस्तक सूँघकर अत्यन्त प्रसन्नचित्तसे उसको विश्वामित्रको सौंप दिया॥ ३ ॥

उस समय धूलरहित सुखदायिनी वायु चलने लगी। कमलनयन श्रीरामको विश्वामित्रजीके साथ जाते देख देवताओंने आकाशसे वहाँ फूलोंकी बड़ी भारी वर्षा की। देवदुन्दुभियाँ बजने लगीं। महात्मा श्रीरामकी यात्राके समय शङ्खों और नगाड़ोंकी ध्वनि होने लगी॥

आगे-आगे विश्वामित्र, उनके पीछे काकपक्षधारी महायशस्वी श्रीराम तथा उनके पीछे सुमित्राकुमार लक्ष्मण जा रहे थे॥ ६ ॥

उन दोनों भाइयोंने पीठपर तरकस बाँध रखे थे। उनके हाथोंमें धनुष शोभा पा रहे थे तथा वे दोनों दसों दिशाओंको सुशोभित करते हुए महात्मा विश्वामित्रके पीछे तीन-तीन फनवाले दो सर्पोंके समान चल रहे थे। एक ओर कंधेपर धनुष, दूसरी ओर पीठपर तूणीर और बीचमें मस्तक—इन्हीं तीनोंकी तीन फनसे उपमा दी गयी है॥ ७ ॥

उनका स्वभाव उच्च एवं उदार था। अपनी अनुपम कान्तिसे प्रकाशित होनेवाले वे दोनों अनिन्द्य सुन्दर राजकुमार सब ओर शोभाका प्रसार करते हुए विश्वामित्रजीके पीछे उसी तरह जा रहे थे, जैसे ब्रह्माजीके पीछे दोनों अश्विनीकुमार चलते हैं॥ ८ ॥

वे दोनों भाई कुमार श्रीराम और लक्ष्मण वस्त्र और आभूषणोंसे अच्छी तरह अलंकृत थे। उनके हाथोंमें धनुष थे। उन्होंने अपने हाथोंकी अंगुलियोंमें गोहटीके चमड़ेके बने हुए दस्ताने पहन रखे थे। उनके कटिप्रदेशमें तलवारें लटक रही थीं। उनके श्रीअंग बड़े मनोहर थे। वे महातेजस्वी श्रेष्ठ वीर अद्भुत कान्तिसे उद्भासित हो सब ओर अपनी शोभा फैलाते हुए कुशिकपुत्र

विश्वामित्रका अनुसरण कर रहे थे। उस समय वे दोनों वीर अचिन्त्य शक्तिशाली स्थाणुदेव (महादेव) के पीछे चलनेवाले दो अग्निकुमार स्कन्द और विशाखकी भाँति शोभा पाते थे॥

अयोध्यासे डेढ़ योजन दूर जाकर सरयूके दक्षिण तटपर विश्वामित्रने मधुर वाणीमें रामको सम्बोधित किया और कहा— 'वत्स राम! अब सरयूके जलसे आचमन करो। इस आवश्यक कार्यमें विलम्ब न हो॥

‘बला और अतिबला नामसे प्रसिद्ध इस मन्त्र-समुदायको ग्रहण करो। इसके प्रभावसे तुम्हें कभी श्रम (थकावट) का अनुभव नहीं होगा। ज्वर (रोग या चिन्ताजनित कष्ट) नहीं होगा। तुम्हारे रूपमें किसी प्रकारका विकार या उलट-फेर नहीं होने पायेगा॥ १३ ॥

‘सोते समय अथवा असावधानीकी अवस्थामें भी राक्षस तुम्हारे ऊपर आक्रमण नहीं कर सकेंगे। इस भूतलपर बाहुबलमें तुम्हारी समानता करनेवाला कोई न होगा॥ १४ ॥

‘तात! रघुकुलनन्दन राम! बला और अतिबलाका अभ्यास करनेसे तीनों लोकोंमें तुम्हारे समान कोई नहीं रह जायगा॥ १५ ॥

‘अनघ! सौभाग्य, चातुर्य, ज्ञान और बुद्धिसम्बन्धी निश्चयमें तथा किसीके प्रश्नका उत्तर देनेमें भी कोई तुम्हारी तुलना नहीं कर सकेगा॥ १६ ॥

‘इन दोनों विद्याओंके प्राप्त हो जानेपर कोई तुम्हारी समानता नहीं कर सकेगा; क्योंकि ये बला और अतिबला नामक विद्याएँ सब प्रकारके ज्ञानकी जननी हैं॥ १७ ॥

‘नरश्रेष्ठ श्रीराम! तात रघुनन्दन! बला और अतिबलाका अभ्यास कर लेनेपर तुम्हें भूख-प्यासका भी कष्ट नहीं होगा; अतः रघुकुलको आनन्दित करनेवाले राम! तुम सम्पूर्ण जगत्की रक्षाके लिये इन दोनों विद्याओंको ग्रहण करो॥ १८ १/२ ॥

‘इन दोनों विद्याओंका अध्ययन कर लेनेपर इस भूतलपर तुम्हारे यशका विस्तार होगा। ये दोनों विद्याएँ ब्रह्माजीकी तेजस्विनी पुत्रियाँ हैं॥ १९ ॥

‘ककुत्स्थनन्दन! मैंने इन दोनोंको तुम्हें देनेका विचार किया है। राजकुमार! तुम्हीं इनके योग्य पात्र हो। यद्यपि तुममें इस विद्याको प्राप्त करने योग्य बहुत-से गुण हैं अथवा सभी उत्तम गुण विद्यमान हैं, इसमें संशय नहीं है तथापि मैंने तपोबलसे इनका अर्जन किया है। अतः मेरी तपस्यासे परिपूर्ण होकर ये तुम्हारे लिये बहुरूपिणी होंगी— अनेक प्रकारके फल प्रदान करेंगी'॥ २० १/२ ॥

तब श्रीराम आचमन करके पवित्र हो गये। उनका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा। उन्होंने उन शुद्ध अन्तःकरणवाले महर्षिसे वे दोनों विद्याएँ ग्रहण कीं॥ २१ १/२ ॥

विद्यासे सम्पन्न होकर भयङ्कर पराक्रमी श्रीराम सहस्रों किरणोंसे युक्त शरत्कालीन भगवान् सूर्यके समान शोभा पाने लगे॥ २२ १/२ ॥

तत्पश्चात् श्रीरामने विश्वामित्रजीकी सारी गुरुजनोचित सेवाएँ करके हर्षका अनुभव किया। फिर वे तीनों वहाँ सरयूके तटपर रातमें सुखपूर्वक रहे॥ २३ ॥

राजा दशरथके वे दोनों श्रेष्ठ राजकुमार उस समय वहाँ तृणकी शय्यापर, जो उनके योग्य नहीं थी, सोये थे। महर्षि विश्वामित्र अपनी वाणीद्वारा उन दोनोंके प्रति लाड़-प्यार प्रकट कर रहे थे। इससे उन्हें वह रात बड़ी सुखमयी-सी प्रतीत हुई॥ २४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें बाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २२॥