श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
बहत्तरवाँ सर्ग
बहत्तरवाँ सर्ग
रावणकी चिन्ता तथा उसका राक्षसोंको पुरीकी रक्षाके लिये सावधान रहनेका आदेश
महात्मा लक्ष्मणके द्वारा अतिकायको मारा गया सुनकर राजा रावण उद्विग्न हो उठा और इस प्रकार बोला—॥ १ ॥
‘अत्यन्त अमर्षशील धूम्राक्ष, सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ अकम्पन, प्रहस्त तथा कुम्भकर्ण—ये महाबली वीर राक्षस सदा युद्धकी अभिलाषा रखते थे। ये सब-के-सब शत्रुओंकी सेनाओंपर विजय पाते और स्वयं विपक्षियोंसे कभी पराजित नहीं होते थे॥ २-३ ॥
‘परंतु अनायास ही महान् कर्म करनेवाले रामने नाना प्रकारके शस्त्रोंके ज्ञानमें निपुण उन विशालकाय वीर राक्षसोंका सेनासहित संहार कर डाला॥ ४ ॥
‘और भी बहुत-से महामनस्वी शूरवीर राक्षस उनके द्वारा मार गिराये गये। जिसके बल और पराक्रम सर्वत्र विख्यात हैं, उस मेरे बेटे इन्द्रजित्ने उन दोनों भाइयोंको वरदानप्राप्त घोर नागस्वरूप बाणोंसे बाँध लिया था। वह घोर बन्धन समस्त देवता और महाबली असुर भी नहीं खोल सकते थे। यक्ष, गन्धर्व और नागोंके लिये भी उस बन्धनसे छुटकारा दिलाना असम्भव था, तो भी ये दोनों भाई राम और लक्ष्मण उस बाण-बन्धनसे मुक्त हो गये। न जाने कौन-सा प्रभाव था, कैसी माया थी अथवा किस तरहकी मोहिनी ओषधि आदिका प्रयोग किया गया था, जिससे वे उस बन्धनसे छूट गये॥ ५—७ १/२ ॥
‘मेरी आज्ञासे जो-जो शूरवीर योद्धा राक्षस युद्धके लिये निकले, उन सबको समराङ्गणमें महाबली वानरोंने मार डाला॥ ८ १/२ ॥
‘मैं आज ऐसे किसी वीरको नहीं देखता, जो युद्धमें लक्ष्मणसहित रामको और सेना तथा सुग्रीवसहित वीर विभीषणको नष्ट कर दे॥ ९ १/२ ॥
‘अहो! राम बड़े बलवान् हैं, निश्चय ही उनका अस्त्र-बल महान् है; जिनके बल-विक्रमका सामना करके असंख्य राक्षस कालके गालमें चले गये॥ १० १/२ ॥
‘मैं उन वीर रघुनाथको रोग-शोकसे रहित साक्षात् नारायणरूप मानता हूँ; क्योंकि उन्हींके भयसे लङ्कापुरीके सभी दरवाजे और सदर फाटक सदा बंद रहते हैं॥ ११ १/२ ॥
‘राक्षसो! तुमलोग हर समय सावधान रहकर सैनिकोंसहित इस पुरीकी और जहाँ सीता रखी गयी हैं, उस अशोक-शिविर वाटिकाकी भी विशेषरूपसे रक्षा करो॥ १२ १/२ ॥
‘अशोक-वाटिकामें कब कौन प्रवेश करता है और कब वहाँसे बाहर निकलता है, इसकी हमें सदा ही जानकारी रखनी चाहिये। जहाँ-जहाँ सैनिकोंके शिविर हों, वहाँ बारम्बार देखभाल करना, सब ओर अपने-अपने सैनिकोंके साथ पहरेपर रहना॥ १३-१४ ॥
‘निशाचरो! प्रदोषकाल, आधी रात तथा प्रातःकालमें भी सर्वथा वानरोंके आने-जानेपर दृष्टि रखना॥ १५ ॥
‘वानरोंकी ओरसे कभी उपेक्षाभाव नहीं रखना चाहिये और सदा इस बातपर दृष्टि रखनी चाहिये कि शत्रुओंकी सेना युद्धके लिये उद्यमशील तो नहीं है? आक्रमण तो नहीं कर रही है अथवा पूर्ववत् जहाँ-कीतहाँ खड़ी है न?’॥ १६ ॥
लङ्कापतिका यह आदेश सुनकर समस्त महाबली राक्षस उन सारी बातोंका यथावत् रूपसे पालन करने लगे॥ १७ ॥
उन सबको पूर्वोक्त आदेश देकर राक्षसराज रावण अपने हृदयमें चुभे हुए दुःख और क्रोधरूपी काँटेकी पीड़ाका भार वहन करता हुआ दीनभावसे अपने महलमें गया॥ १८ ॥
महाबली निशाचरराज रावणकी क्रोधाग्नि भड़क उठी थी। वह अपने पुत्रकी उस मृत्युको ही याद करके उस समय बारम्बार लंबी साँस खींच रहा था॥ १९ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें बहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७२ ॥