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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

बत्तीसवाँ सर्ग

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बत्तीसवाँ सर्ग

श्रीरामके मारे जानेका विश्वास करके सीताका विलाप तथा रावणका सभामें जाकर मन्त्रियोंके सलाहसे युद्धविषयक उद्योग करना

सीताजीने उस मस्तक और उस उत्तम धनुषको देखकर तथा हनुमान्जीकी कही हुई सुग्रीवके साथ मैत्री-सम्बन्ध होनेकी बात याद करके अपने पतिके-जैसे ही नेत्र, मुखका वर्ण, मुखाकृति, केश, ललाट और उस सुन्दर चूडामणिको लक्ष्य किया। इन सब चिह्नोंसे पतिको पहचानकर वे बहुत दुखी हुईं और कुररीकी भाँति रो-रोकर कैकेयीकी निन्दा करने लगीं— ॥ १ —३ ॥

‘कैकेयि! अब तुम सफलमनोरथ हो जाओ, रघुकुलको आनन्दित करनेवाले ये मेरे पतिदेव मारे गये। तुम स्वभावसे ही कलहकारिणी हो। तुमने समस्त रघुकुलका संहार कर डाला॥ ४ ॥

‘आर्य श्रीरामने कैकेयीका कौन-सा अपराध किया था, जिससे उसने इन्हें चीरवस्त्र देकर मेरे साथ वनमें भेज दिया था’॥ ५ ॥

ऐसा कहकर दुःखकी मारी तपस्विनी वैदेही बाला थर-थर काँपती हुई कटी कदलीके समान पृथ्वीपर गिर पड़ीं॥ ६ ॥

फिर दो घड़ीमें उनकी चेतना लौटी और वे विशाललोचना सीता कुछ धीरज धारणकर उस मस्तकको अपने निकट रखकर विलाप करने लगीं— ॥ ७ ॥

‘हाय! महाबाहो! मैं मारी गयी। आप वीरव्रतका पालन करनेवाले थे। आपकी इस अन्तिम अवस्थाको मुझे अपनी आँखोंसे देखना पड़ा। आपने मुझे विधवा बना दिया॥ ८ ॥

‘स्त्रीसे पहले पतिका मरना उसके लिये महान् अनर्थकारी दोष बताया जाता है। मुझ सती-साध्वीके रहते हुए मेरे सामने आप-जैसे सदाचारी पतिका निधन हुआ, यह मेरे लिये महान् दुःखकी बात है॥ ९ ॥

‘मैं महान् संकटमें पड़ी हूँ, शोकके समुद्रमें डूबी हूँ, जो मेरा उद्धार करनेके लिये उद्यत थे, उन आप-जैसे वीरको भी शत्रुओंने मार गिराया॥ १० ॥

‘रघुनन्दन! जैसे कोई बछड़ेके प्रति स्नेहसे भरी हुई गायको उस बछड़ेसे विलग कर दे, यही दशा मेरी सास कौसल्याकी हुई है। वे दयामयी जननी आप-जैसे पुत्रसे बिछुड़ गयीं॥ ११

॥

'रघुवीर! ज्योतिषियोंने तो आपकी आयु बहुत बड़ी बतायी थी, किंतु उनकी बात झूठी सिद्ध हुईं। रघुनन्दन! आप बड़े अल्पायु निकले॥ १२ ॥

'अथवा बुद्धिमान् होकर भी आपकी बुद्धि मारी गयी। तभी तो आप सोते हुए ही शत्रुके वशमें पड़ गये अथवा यह काल ही समस्त प्राणियोंके उद्भवमें हेतु है। अतः वही प्राणिमात्रको पकाता है—उन्हें शुभाशुभ कर्मोंके फलसे संयुक्त करता है॥ १३ ॥

'आप तो नीतिशास्त्रके विद्वान् थे। संकटसे बचनेके उपायोंको जानते थे और व्यसनोंके निवारणमें कुशल थे तो भी कैसे आपको ऐसी मृत्यु प्राप्त हुईं, जो दूसरे किसी वीर पुरुषको प्राप्त होती नहीं देखी गयी थी?॥

'कमलनयन! भीषण और अत्यन्त क्रूर कालरात्रि आपको हृदयसे लगाकर मुझसे हठात् छीन ले गयी॥

'पुरुषोत्तम! महाबाहो! आप मुझ तपस्विनीको त्यागकर अपनी प्रियतमा नारीकी भाँति इस पृथ्वीका आलिङ्गन करके यहाँ सो रहे हैं॥ १६ ॥

'वीर! जिसका मैं प्रयत्नपूर्वक गन्ध और पुष्पमाला आदिके द्वारा नित्यप्रति पूजन करती थी तथा जो मुझे बहुत प्रिय था, यह आपका वही स्वर्णभूषित धनुष है॥

'निष्पाप रघुनन्दन! निश्चय ही आप स्वर्गमें जाकर मेरे श्वशुर और अपने पिता महाराज दशरथसे तथा अन्य सब पितरोंसे भी मिले होंगे॥ १८ ॥

'आप पिताकी आज्ञाका पालनरूपी महान् कर्म करके अद्भुत पुण्यका उपार्जन कर यहाँसे अपने उस राजर्षिकुलकी उपेक्षा करके (उसे छोड़कर) जा रहे हैं, जो आकाशमें नक्षत्र* बनकर प्रकाशित होता है (आपको ऐसा नहीं करना चाहिये)॥ १९ ॥

'राजन्! आपने अपनी छोटी अवस्थामें ही जब कि मेरी भी छोटी ही अवस्था थी, मुझे पत्नीरूपमें प्राप्त किया। मैं सदा आपके साथ विचरनेवाली सहधर्मिणी हूँ। आप मेरी ओर क्यों नहीं देखते हैं अथवा मेरी बातका उत्तर क्यों नहीं देते हैं?॥ २० ॥

'काकुत्स्थ! मेरा पाणिग्रहण करते समय जो आपने प्रतिज्ञा की थी कि मैं तुम्हारे साथ धर्माचरण करूँगा, उसका स्मरण कीजिये और मुझ दुःखिनीको भी साथ ही ले चलिये॥ २१ ॥

‘गतिमानोंमें श्रेष्ठ रघुनन्दन! आप मुझे अपने साथ वनमें लाकर और यहाँ मुझ दुःखिनीको छोड़कर इस लोकसे परलोकको क्यों चले गये?॥ २२ ॥

‘मैंने ही अनेक मङ्गलमय उपचारोंसे सुन्दर आपके जिस श्रीविग्रहका आलिङ्गन किया था, आज उसीको मांस-भक्षी हिंसक जन्तु अवश्य इधर-उधर घसीट रहे होंगे॥

‘आपने तो पर्याप्त दक्षिणाओंसे युक्त अग्निष्टोम आदि यज्ञोंद्वारा भगवान् यज्ञपुरुषकी आराधना की है; फिर क्या कारण है कि अग्निहोत्रकी अग्निसे दाह-संस्कारका सुयोग आपको नहीं मिल रहा है॥ २४ ॥

‘हम तीन व्यक्ति एक साथ वनमें आये थे; परंतु अब शोकाकुल हुई माता कौसल्या केवल एक व्यक्ति लक्ष्मणको ही घर लौटा हुआ देख सकेंगी॥ २५ ॥

‘उनके पूछनेपर लक्ष्मण उन्हें रात्रिके समय राक्षसोंके हाथसे आपके मित्रकी सेनाके तथा सोते हुए आपके भी वधका समाचार अवश्य सुनायेंगे॥ २६ ॥

‘रघुनन्दन! जब उन्हें यह ज्ञात होगा कि आप सोते समय मारे गये और मैं राक्षसके घरमें हर लायी गयी हूँ तो उनका हृदय विदीर्ण हो जायगा और वे अपने प्राण त्याग देंगी॥ २७ ॥

‘हाय! मुझ अनार्याके लिये निष्पाप राजकुमार श्रीराम, जो महान् पराक्रमी थे, समुद्रलङ्घन-जैसा महान् कर्म करके भी गायकी खुरीके बराबर जलमें डूब गये—बिना युद्ध किये सोते समय मारे गये॥ २८ ॥

‘हाय! दशरथनन्दन श्रीराम मुझ-जैसी कुलकलङ्किनी नारीको मोहवश ब्याह लाये। पत्नी ही आर्यपुत्र श्रीरामके लिये मृत्युरूप बन गयी॥ २९ ॥

‘जिनके यहाँ सब लोग याचक बनकर आते थे एवं सभी अतिथि जिन्हें प्रिय थे, उन्हीं श्रीरामकी पत्नी होकर जो मैं आज शोक कर रही हूँ, इससे जान पड़ता है कि मैंने दूसरे जन्ममें निश्चय ही उत्तम दानधर्ममें बाधा डाली थी॥ ३० ॥

‘रावण! मुझे भी श्रीरामके शवके ऊपर रखकर मेरा वध करा डालो; इस प्रकार पतिको पत्नीसे मिला दो; यह उत्तम कल्याणकारी कार्य है, इसे अवश्य करो॥

‘रावण! मेरे सिरसे पतिके सिरका और मेरे शरीरसे उनके शरीरका संयोग करा दो। इस प्रकार मैं अपने महात्मा पतिकी गतिका ही अनुसरण करूँगी’॥

इस प्रकार दुःखसे संतप्त हुई विशाललोचना जनकनन्दिनी सीता पतिके मस्तक तथा धनुषको देखने और विलाप करने लगीं॥ ३३ ॥

जब सीता इस तरह विलाप कर रही थीं, उसी समय वहाँ रावणकी सेनाका एक राक्षस हाथ जोड़े हुए अपने स्वामीके पास आया॥ ३४ ॥

उसने ‘आर्यपुत्र महाराजकी जय हो’ कहकर रावणका अभिवादन किया और उसे प्रसन्न करके यह सूचना दी कि ‘सेनापति प्रहस्त पधारे हैं॥ ३५ ॥

‘प्रभो! सब मन्त्रियोंके साथ प्रहस्त महाराजकी सेवामें उपस्थित हुए हैं। वे आपका दर्शन करना चाहते हैं, इसीलिये उन्होंने मुझे यहाँ भेजा है॥ ३६ ॥

‘क्षमाशील महाराज! निश्चय ही कोई अत्यन्त आवश्यक राजकीय कार्य आ पड़ा है, अतः आप उन्हें दर्शन देनेका कष्ट करें?॥ ३७ ॥

राक्षसकी कही हुई यह बात सुनकर दशग्रीव रावण अशोकवाटिका छोड़कर मन्त्रियोंसे मिलनेके लिये चला गया॥ ३८ ॥

उसने मन्त्रियोंसे अपने सारे कृत्यका समर्थन कराया और श्रीरामचन्द्रजीके पराक्रमका पता लगाकर सभाभवनमें प्रवेश करके वह प्रस्तुत कार्यकी व्यवस्था करने लगा॥ ३९ ॥

रावणके वहाँसे निकलते ही वह सिर और उत्तम धनुष दोनों अदृश्य हो गये॥ ४० ॥

राक्षसराज रावणने अपने उन भयानक मन्त्रियोंके साथ बैठकर रामके प्रति किये जानेवाले तात्कालिक कर्तव्यका निश्चय किया॥ ४१ ॥

फिर राक्षसराज रावणने पास ही खड़े हुए अपने हितैषी सेनापतियोंसे इस प्रकार समयानुकूल बात कही— ॥

‘तुम सब लोग शीघ्र ही डंडेसे पीट-पीटकर धौंसा बजाते हुए समस्त सैनिकोंको एकत्र करो; परंतु उन्हें इसका कारण नहीं बताना चाहिये’॥ ४३ ॥

तब दूतोंने ‘तथास्तु’ कहकर रावणकी आज्ञा स्वीकार की और उसी समय सहसा विशाल सेनाको एकत्र कर दिया; फिर युद्धकी अभिलाषा रखनेवाले अपने स्वामीको यह सूचना दी कि ‘सारी सेना आ गयी’॥ ४४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें बत्तीसवाँ सर्ग पूरा
हुआ॥ ३२ ॥


* इक्ष्वाकुवंशके राजा त्रिशंकु आकाशमें नक्षत्र होकर प्रकाशित होते हैं, उन्हींके कारण क्षत्रिन्यायसे समस्त कुलको ही नक्षत्रकुल बताया है।