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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

प्रक्षिप्त सर्ग १\

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प्रक्षिप्त सर्ग १*

श्रीरामके द्वारपर कार्यार्थी कुत्तेका आगमन और श्रीरामका उसे दरबारमें लानेका आदेश

तदनन्तर निर्मल प्रभातकालमें पूर्वाह्नकालोचित संध्या-वन्दन आदि नित्यकर्म करके कमलनयन राजा श्रीराम राजधर्मोंका पालन (प्रजाजनोंके विवादका निपटारा) करनेके लिये वेदवेत्ता ब्राह्मणों, पुरोहित वसिष्ठ तथा कश्यप मुनिके साथ राजसभामें उपस्थित हो धर्म (न्याय)-के आसनपर विराजमान हुए॥ १-२ ॥

वह सभा व्यवहारका ज्ञान रखनेवाले मन्त्रियों, धर्मशास्त्रोंका पाठ करनेवाले विद्वानों, नीतिज्ञों, राजाओं तथा अन्य सभासदोंसे भरी हुई थी॥ ३ ॥

अनायास ही महान् कर्म करनेवाले राजसिंह श्रीरामकी वह सभा इन्द्र, यम और वरुणकी सभाके समान शोभा पाती थी॥ ४ ॥

वहाँ बैठे हुए भगवान् श्रीरामने शुभलक्षणसम्पन्न लक्ष्मणसे कहा— 'माता सुमित्राका आनन्द बढ़ानेवाले महाबाहु वीर! तुम बाहर निकलो और देखो कि कौन-कौन-से कार्यार्थी उपस्थित हैं। सुमित्राकुमार! तुम उन कार्यार्थियोंको बारी-बारीसे बुलाना आरम्भ करो'॥ ५ १/२ ॥

श्रीरामचन्द्रजीका यह आदेश सुनकर शुभलक्षण लक्ष्मणने द्वारदेशपर आकर स्वयं ही कार्यार्थियोंको पुकारा, परंतु कोई भी वहाँ यह न कह सका कि मुझे यहाँ कोई कार्य है॥ ६-७ ॥

श्रीरामके राज्य-शासन करते समय न तो कहीं किसीको शारीरिक रोग होते थे और न मानसिक चिन्ताएँ ही सताती थीं। पृथ्वीपर सब प्रकारकी ओषधियाँ (अन्न-फल आदि) उत्पन्न होती थीं और पकी हुई खेती शोभा पाती थी॥ ८ ॥

श्रीरामके राज्यमें न तो बालककी मृत्यु होती थी न युवककी और न मध्यम अवस्थाके पुरुषकी ही। सबका धर्मपूर्वक शासन होता था। किसीके सामने कभी कोई बाधा नहीं आती थी॥ ९ ॥

श्रीरामके राज्य-शासनकालमें कभी कोई कार्यार्थी (अभियोग लेकर आनेवाला पुरुष) दिखायी नहीं देता था। लक्ष्मणने हाथ जोड़कर श्रीरामचन्द्रजीको राज्यकी ऐसी स्थिति बतायी॥

१० ॥

तदनन्तर प्रसन्नचित्त हुए श्रीरामने सुमित्राकुमारसे पुनः इस प्रकार कहा— ‘लक्ष्मण! तुम फिर जाओ और कार्यार्थी पुरुषोंका पता लगाओ॥ ११ ॥

‘भलीभाँति उत्तम नीतिका प्रयोग करनेसे राज्यमें कहीं अधर्म नहीं रह जाता है। अतः सभी लोग राजाके भयसे यहाँ एक-दूसरेकी रक्षा करते हैं॥ १२ ॥

‘यद्यपि राजकर्मचारी मेरे छोड़े हुए बाणोंके समान यहाँ प्रजाकी रक्षा करते हैं, तथापि महाबाहो! तुम स्वयं भी तत्पर रहकर प्रजाका पालन किया करो’॥ १३ ॥

श्रीरामके ऐसा कहनेपर सुमित्राकुमार लक्ष्मण राजभवनसे बाहर निकले। बाहर आकर उन्होंने देखा, द्वारपर एक कुत्ता खड़ा है, जो उन्हींकी ओर देखता हुआ बारंबार भूँक रहा है। उसे इस प्रकार देखकर पराक्रमी लक्ष्मणने उससे पूछा— ॥ १४-१५ ॥

‘महाभाग! तुम निर्भय होकर बताओ, तुम्हारा क्या काम है?’ लक्ष्मणका यह वचन सुनकर कुत्तेने कहा— ॥ १६ ॥

‘जो समस्त भूतोंको शरण देनेवाले और क्लेशरहित कर्म करनेवाले हैं, जो भयके अवसरोंपर भी अभय देते हैं, उन भगवान् श्रीरामके समक्ष ही मैं अपना काम बता सकता हूँ’॥ १७ ॥

कुत्तेका यह कथन सुनकर लक्ष्मणने श्रीरघुनाथजीको इसकी सूचना देनेके लिये सुन्दर राजभवनमें प्रवेश किया॥

श्रीरामको उसकी बात बताकर लक्ष्मण पुनः राजभवनसे बाहर निकल आये और उससे बोले— ‘यदि तुम्हें कुछ कहना है तो चलकर राजासे ही कहो’॥ १९ ॥

लक्ष्मणकी वह बात सुनकर कुत्ता बोला— ‘सुमित्रानन्दन! देवालयमें, राजभवनमें तथा ब्राह्मणके घरोंमें अग्नि, इन्द्र, सूर्य और वायुदेवता सदा स्थित रहते हैं; अतः हम अधमयोनिके जीव स्वेच्छासे वहाँ जानेके योग्य नहीं हैं॥ २०-२१ ॥

‘मैं इस राजभवनमें प्रवेश नहीं कर सकूँगा; क्योंकि राजा श्रीराम धर्मके मूर्तिमान् स्वरूप हैं। वे सत्यवादी, संग्रामकुशल और समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले हैं॥ २२ ॥

‘वे संधि-विग्रह आदि छहों गुणोंके प्रयोगके अवसरोंको जानते हैं। श्रीरघुनाथजी न्याय करनेवाले हैं। वे सर्वज्ञ और सर्वदर्शी हैं। श्रीराम दूसरोंके मनको रमानेवाले पुरुषोंमें श्रेष्ठ हैं॥ २३

॥

‘वे ही चन्द्रमा हैं, वे ही मृत्यु हैं, वे ही यम, कुबेर, अग्नि, इन्द्र, सूर्य और वरुण हैं॥ २४ ॥

‘सुमित्रानन्दन! श्रीरघुनाथजी प्रजापालक हैं। आप उनसे कहिये। मैं उनकी आज्ञा प्राप्त किये बिना इस भवनमें प्रवेश करना नहीं चाहता’॥ २५ ॥

यह सुनकर महातेजस्वी महाभाग लक्ष्मणने दयावश राजभवनमें प्रवेश करके कहा— ॥ २६ ॥

‘कौसल्याका आनन्द बढ़ानेवाले महाबाहु श्रीरघुनाथजी! मेरा यह निवेदन सुनिये। आपने जो आदेश दिया था, उसके अनुसार मैंने बाहर जाकर कार्यार्थीको पुकारा॥ २७ ॥

‘इस समय आपके द्वारपर एक कुत्ता खड़ा है, जो कार्यार्थी होकर आया है।’ लक्ष्मणकी यह बात सुनकर श्रीरामने कहा—‘यहाँ जो भी कार्यार्थी होकर खड़ा है, उसे शीघ्र इस सभाके भीतर ले आओ’॥ २८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें प्रक्षिप्त सर्ग पूरा हुआ॥
१॥


* कुछ प्रतियोंमें यहाँ तीन सर्ग और मिलते हैं, जिनपर संस्कृत-टीकाकारोंकी व्याख्या न मिलनेसे इन्हें प्रक्षिप्त बताया गया है। इनमेंसे दो सर्ग उपयोगी होनेके कारण यहाँ अनुवादसहित दिये जा रहे हैं।