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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पैंतीसवाँ सर्ग

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पैंतीसवाँ सर्ग

हनुमान्जीकी उत्पत्ति, शैशवावस्थामें इनका सूर्य, राहु और ऐरावतपर आक्रमण, इन्द्रके वज्रसे इनकी मूर्च्छा, वायुके कोपसे संसारके प्राणियोंको कष्ट और उन्हें प्रसन्न करनेके लिये देवताओंसहित ब्रह्माजीका उनके पास जाना

तब भगवान् श्रीरामने हाथ जोड़कर दक्षिण दिशामें निवास करनेवाले अगस्त्य मुनिसे विनयपूर्वक यह अर्थयुक्त बात कही— ॥ १ ॥

‘महर्षे! इसमें संदेह नहीं कि वाली और रावणके इस बलकी कहीं तुलना नहीं थी; परंतु मेरा ऐसा विचार है कि इन दोनोंका बल भी हनुमान्जीके बलकी बराबरी नहीं कर सकता था॥ २ ॥

‘शूरता, दक्षता, बल, धैर्य, बुद्धिमत्ता, नीति, पराक्रम और प्रभाव—इन सभी सद्गुणोंने हनुमान्जीके भीतर घर कर रखा है॥ ३ ॥

‘समुद्रको देखते ही वानर-सेना घबरा उठी है— यह देख ये महाबाहु वीर उसे धैर्य बँधाकर एक ही छलाँगमें सौ योजन समुद्रको लाँघ गये॥ ४ ॥

‘फिर लङ्कापुरीके आधिदैविक रूपको परास्त कर रावणके अन्तःपुरमें गये, सीताजीसे मिले, उनसे बातचीत की और उन्हें धैर्य बँधाया॥ ५ ॥

‘वहाँ अशोकवनमें इन्होंने अकेले ही रावणके सेनापतियों, मन्त्रिपुत्रों, किंकरों तथा रावणपुत्र अक्षको मार गिराया॥ ६ ॥

‘फिर ये मेघनादके नागपाशसे बँधे और स्वयं ही मुक्त हो गये। तत्पश्चात् इन्होंने रावणसे वार्तालाप किया। जैसे प्रलयकालकी आगने यह सारी पृथ्वी जलायी थी, उसी प्रकार लङ्कापुरीको जलाकर भस्म कर दिया॥ ७ ॥

‘युद्धमें हनुमान्जीके जो पराक्रम देखे गये हैं, वैसे वीरतापूर्ण कर्म न तो कालके, न इन्द्रके, न भगवान् विष्णुके और न वरुणके ही सुने जाते हैं॥ ८ ॥

‘मुनीश्वर! मैंने तो इन्हींके बाहुबलसे विभीषणके लिये लङ्का, शत्रुओंपर विजय, अयोध्याका राज्य तथा सीता, लक्ष्मण, मित्र और बन्धुजनोंको प्राप्त किया है॥

‘यदि मुझे वानरराज सुग्रीवके सखा हनुमान् न मिलते तो जानकीका पता लगानेमें भी कौन समर्थ हो सकता था?॥ १० ॥

‘जिस समय वाली और सुग्रीवमें विरोध हुआ, उस समय सुग्रीवका प्रिय करनेके लिये इन्होंने जैसे दावानल वृक्षको जला देता है, उसी प्रकार वालीको क्यों नहीं भस्म कर डाला? यह समझमें नहीं आता॥ ११ ॥

‘मैं तो ऐसा मानता हूँ कि उस समय हनुमान्‌जीको अपने बलका पता ही नहीं था। इसीसे ये अपने प्राणोंसे भी प्रिय वानरराज सुग्रीवको कष्ट उठाते देखते रहे॥ १२ ॥

‘देववन्द्य महामुने! भगवन्! आप हनुमान्‌जीके विषयमें ये सब बातें यथार्थरूपसे विस्तारपूर्वक बताइये’॥

श्रीरामचन्द्रजीके ये युक्तियुक्त वचन सुनकर महर्षि अगस्त्यजी हनुमान्‌जीके सामने ही उनसे इस प्रकार बोले— ॥ १४ ॥

‘रघुकुलतिलक श्रीराम! हनुमान्‌जीके विषयमें आप जो कुछ कहते हैं, यह सब सत्य ही है। बल, बुद्धि और गतिमें इनकी बराबरी करनेवाला दूसरा कोऽइ नहीं है॥ १५ ॥

‘शत्रुसूदन रघुनन्दन! जिनका शाप कभी व्यर्थ नहीं जाता, ऐसे मुनियोंने पूर्वकालमें इन्हें यह शाप दे दिया था कि बल रहनेपर भी इनको अपने पूरे बलका पता नहीं रहेगा॥ १६ ॥

‘महाबली श्रीराम! इन्होंने बचपनमें भी जो महान् कर्म किया था, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। उन दिनों वे बालभावसे—अनजानकी तरह रहते थे॥ १७ ॥

‘रघुनन्दन! यदि हनुमान्‌जीका चरित्र सुननेके लिये आपकी हार्दिक इच्छा हो तो चित्तको एकाग्र करके सुनिये। मैं सारी बातें बता रहा हूँ॥ १८ ॥

‘भगवान् सूर्यके वरदानसे जिसका स्वरूप सुवर्णमय हो गया है, ऐसा एक सुमेरु नामसे प्रसिद्ध पर्वत है, जहाँ हनुमान्‌जीके पिता केसरी राज्य करते हैं॥ १९ ॥

‘उनकी अञ्जना नामसे विख्यात प्रियतमा पत्नी थीं। उनके गर्भसे वायुदेवने एक उत्तम पुत्रको जन्म दिया॥

‘अञ्जनाने जब इनको जन्म दिया, उस समय इनकी अङ्गकान्ति जाड़ेमें पैदा होनेवाले धानके अग्रभागकी भाँति पिंगल वर्णकी थी। एक दिन माता अञ्जना फल लानेके लिये आश्रमसे निकलीं और गहन वनमें चली गयीं॥ २१ ॥

‘उस समय मातासे बिछुड़ जाने और भूखसे अत्यन्त पीड़ित होनेके कारण शिशु हनुमान् उसी तरह जोर-जोरसे रोने लगे, जैसे पूर्वकालमें सरकंडोंके वनके भीतर कुमार कार्तिकेय रोये थे॥ २२ ॥

‘इतनेहीमें इन्हें जपाकुसुमके समान लाल रंगवाले सूर्यदेव उदित होते दिखायी दिये। हनुमान्‌जीने उन्हें कोई फल समझा और ये उस फलके लोभसे सूर्यकी ओर उछले॥ २३ ॥

‘बालसूर्यकी ओर मुँह किये मूर्तिमान् बालसूर्यके समान बालक हनुमान् बालसूर्यको पकड़नेकी इच्छासे आकाशमें उड़ते चले जा रहे थे॥ २४ ॥

‘शैशवावस्थामें हनुमान्‌जी जब इस तरह उड़ रहे थे, उस समय उन्हें देखकर देवताओं, दानवों तथा यक्षोंको बड़ा विस्मय हुआ॥ २५ ॥

‘वे सोचने लगे—‘यह वायुका पुत्र जिस प्रकार ऊँचे आकाशमें वेगपूर्वक उड़ रहा है, ऐसा वेग न तो वायुमें है, न गरुड़में है और न मनमें ही है॥ २६ ॥

‘यदि बाल्यावस्थामें ही इस शिशुका ऐसा वेग और पराक्रम है तो यौवनका बल पाकर इसका वेग कैसा होगा’॥ २७ ॥

‘अपने पुत्रको सूर्यकी ओर जाते देख उसे दाहके भयसे बचानेके लिये उस समय वायुदेव भी बर्फके ढेरकी भाँति शीतल होकर उसके पीछे-पीछे चलने लगे॥

‘इस प्रकार बालक हनुमान् अपने और पिताके बलसे कई सहस्र योजन आकाशको लाँघते चले गये और सूर्यदेवके समीप पहुँच गये॥ २९ ॥

‘सूर्यदेवने यह सोचकर कि अभी यह बालक है, इसे गुण-दोषका ज्ञान नहीं है और इसके अधीन देवताओंका भी बहुत-सा भावी कार्य है—इन्हें जलाया नहीं॥ ३० ॥

‘जिस दिन हनुमान्‌जी सूर्यदेवको पकड़नेके लिये उछले थे, उसी दिन राहु सूर्यदेवपर ग्रहण लगाना चाहता था॥ ३१ ॥

‘हनुमान्‌जीने सूर्यके रथके ऊपरी भागमें जब राहुका स्पर्श किया, तब चन्द्रमा और सूर्यका मर्दन करनेवाला राहु भयभीत हो वहाँसे भाग खड़ा हुआ॥ ३२ ॥

‘सिंहिकाका वह पुत्र रोषसे भरकर इन्द्रके भवनमें गया और देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रके सामने भौंहें टेढ़ी करके बोला—॥ ३३ ॥

‘बल और वृत्रासुरका वध करनेवाले वासव! आपने चन्द्रमा और सूर्यको मुझे अपनी भूख दूर करनेके साधनके रूपमें दिया था; किंतु अब आपने उन्हें दूसरेके हवाले कर दिया है। ऐसा क्यों हुआ?॥ ३४ ॥

‘आज पर्व (अमावास्या)-के समय मैं सूर्यदेवको ग्रस्त करनेकी इच्छासे गया था। इतनेहीमें दूसरे राहुने आकर सहसा सूर्यको पकड़ लिया’॥ ३५ ॥

‘राहुकी यह बात सुनकर देवराज इन्द्र घबरा गये और सोनेकी माला पहने अपना सिंहासन छोड़कर उठ खड़े हुए॥ ३६ ॥

‘फिर कैलास-शिखरके समान उज्ज्वल, चार दाँतोंसे विभूषित, मदकी धारा बहानेवाले, भाँति-भाँतिके शृङ्गारसे युक्त, बहुत ही ऊँचे और सुवर्णमयी घण्टाके नादरूप अट्टहास करनेवाले गजराज ऐरावतपर आरूढ़ हो देवराज इन्द्र राहुको आगे करके उस स्थानपर गये, जहाँ हनुमान्जीके साथ सूर्यदेव विराजमान थे॥ ३७-३८ ॥

‘इधर राहु इन्द्रको छोड़कर बड़े वेगसे आगे बढ़ गया। इसी समय पर्वत-शिखरके समान आकारवाले दौड़ते हुए राहुको हनुमान्जीने देखा॥ ३९ ॥

‘तब राहुको ही फलके रूपमें देखकर बालक हनुमान् सूर्यदेवको छोड़ उस सिंहिकापुत्रको ही पकड़नेके लिये पुनः आकाशमें उछले॥ ४० ॥

‘श्रीराम! सूर्यको छोड़कर अपनी ओर धावा करनेवाले इन वानर हनुमान्को देखते ही राहु जिसका मुखमात्र ही शेष था, पीछेकी ओर मुड़कर भागा॥ ४१ ॥

‘उस समय सिंहिकापुत्र राहु अपने रक्षक इन्द्रसे ही अपनी रक्षाके लिये कहता हुआ भयके मारे बारम्बार ‘इन्द्र! इन्द्र!’ की पुकार मचाने लगा॥ ४२ ॥

‘चीखते हुए राहुके स्वरको जो पहलेका पहचाना हुआ था, सुनकर इन्द्र बोले—‘डरो मत। मैं इस आक्रमणकारीको मार डालूँगा’॥ ४३ ॥

‘तत्पश्चात् ऐरावतको देखकर इन्होंने उसे भी एक विशाल फल समझा और उस गजराजको पकड़नेके लिये ये उसकी ओर दौड़े॥ ४४ ॥

‘ऐरावतको पकड़नेकी इच्छासे दौड़ते हुए हनुमान्जीका रूप दो घड़ीके लिये इन्द्र और अग्निके समान प्रकाशमान एवं भयंकर हो गया॥ ४५ ॥

‘बालक हनुमान्‌को देखकर शचीपति इन्द्रको अधिक क्रोध नहीं हुआ। फिर भी इस प्रकार धावा करते हुए इन्द्र बालक वानरपर उन्होंने अपने हाथसे छूटे हुए वज्रके द्वारा प्रहार किया॥ ४६ ॥

‘इन्द्रके वज्रकी चोट खाकर ये एक पहाड़पर गिरे। वहाँ गिरते समय इनकी बायीं ठुड्डी टूट गयी॥ ४७ ॥

‘वज्रके आघातसे व्याकुल होकर इनके गिरते ही वायुदेव इन्द्रपर कुपित हो उठे। उनका यह क्रोध प्रजाजनोंके लिये अहितकारक हुआ॥ ४८ ॥

‘सामर्थ्यशाली मारुतने समस्त प्रजाके भीतर रहकर भी वहाँ अपनी गति समेट ली—श्वास आदिके रूपमें संचार रोक दिया और अपने शिशुपुत्र हनुमान्‌को लेकर वे पर्वतकी गुफामें घुस गये॥ ४९ ॥

‘जैसे इन्द्र वर्षा रोक देते हैं, उसी प्रकार वे वायुदेव प्रजाजनोंके मलाशय और मूत्राशयको रोककर उन्हें बड़ी पीड़ा देने लगे। उन्होंने सम्पूर्ण भूतोंके प्राण-संचारका अवरोध कर दिया॥ ५० ॥

‘वायुके प्रकोपसे समस्त प्राणियोंकी साँस बंद होने लगी। उनके सभी अङ्गोंके जोड़ टूटने लगे और वे सब-के-सब काठके समान चेष्टाशून्य हो गये॥ ५१ ॥

‘तीनों लोकोंमें न कहीं वेदोंका स्वाध्याय होता था और न यज्ञ। सारे धर्म-कर्म बन्द हो गये। त्रिभुवनके प्राणी ऐसे कष्ट पाने लगे, मानो नरकमें गिर गये हों॥ ५२ ॥

‘तब गन्धर्व, देवता, असुर और मनुष्य आदि सभी प्रजा व्यथित हो सुख पानेकी इच्छासे प्रजापति ब्रह्माजीके पास दौड़ी गयी॥ ५३ ॥

‘उस समय देवताओंके पेट इस तरह फूल गये थे, मानो उन्हें महोदरका रोग हो गया हो। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा—‘भगवन्! स्वामिन्! आपने चार प्रकारकी प्रजाओंकी सृष्टि की है। आपने हम सबको हमारी आयुके अधिपतिके रूपमें वायुदेवको अर्पित किया है। साधुशिरोमणे! ये पवनदेव हमारे प्राणोंके ईश्वर हैं तो भी क्या कारण है कि आज इन्होंने अन्तःपुरमें स्त्रियोंकी भाँति हमारे शरीरके भीतर अपने संचारको रोक दिया है और इस प्रकार ये हमारे लिये दुःखजनक हो गये हैं॥ ५४-५५½ ॥

‘वायुसे पीड़ित होकर आज हमलोग आपकी शरणमें आये हैं। दुःखहारी प्रजापते! आप हमारे इस वायुरोधजनित दुःखको दूर कीजिये’॥ ५६½ ॥

‘प्रजाजनोंकी यह बात सुनकर उनके पालक और रक्षक ब्रह्माजीने कहा— ‘इसमें कुछ कारण है’ ऐसा कहकर वे प्रजाजनोंसे फिर बोले— ॥ ५७½ ॥

‘प्रजाओ! जिस कारणको लेकर वायुदेवताने क्रोध और अपनी गतिका अवरोध किया है, उसे बताता हूँ, सुनो। वह कारण तुम्हारे सुनने योग्य और उचित है॥

‘आज देवराज इन्द्रने राहुकी बात सुनकर वायुके पुत्रको मार गिराया है, इसीलिये वे कुपित हो उठे हैं॥

‘वायुदेव स्वयं शरीर धारण न करके समस्त शरीरोंमें उनकी रक्षा करते हुए विचरते हैं। वायुके बिना यह शरीर सूखे काठके समान हो जाता है॥ ६०½ ॥

‘वायु ही सबका प्राण है। वायु ही सुख है और वायु ही यह सम्पूर्ण जगत् है। वायुसे परित्यक्त होकर जगत् कभी सुख नहीं पा सकता॥ ६१½ ॥

‘वायु ही जगत्की आयु है। इस समय वायुने संसारके प्राणियोंको त्याग दिया है, इसलिये वे सब-के-सब निष्प्राण होकर काठ और दीवारके समान हो गये हैं॥ ६२½ ॥

‘अदिति-पुत्रो! अतः अब हमें उस स्थानपर चलना चाहिये, जहाँ हम सबको पीड़ा देनेवाले वायुदेव छिपे बैठे हैं। कहीं ऐसा न हो कि उन्हें प्रसन्न किये बिना हम सबका विनाश हो जाय’॥ ६३ ॥

‘तदनन्तर देवता, गन्धर्व, नाग और गुह्यक आदि प्रजाओंको साथ ले प्रजापति ब्रह्माजी उस स्थानपर गये, जहाँ वायुदेव इन्द्रद्वारा मारे गये अपने पुत्रको लेकर बैठे हुए थे॥ ६४ ॥

‘तत्पश्चात् चतुर्मुख ब्रह्माजीने देवताओं, गन्धर्वों, ऋषियों तथा यक्षोंके साथ वहाँ पहुँचकर वायुदेवताकी गोदमें सोये हुए उनके पुत्रको देखा, जिसकी अङ्गकान्ति सूर्य, अग्नि और सुवर्णके समान प्रकाशित हो रही थी। उसकी वैसी दशा देखकर ब्रह्माजीको उसपर बड़ी दया आयी’॥ ६५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें पैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३५॥