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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पचपनवाँ सर्ग

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पचपनवाँ सर्ग

रावणकी आज्ञासे अकम्पन आदि राक्षसोंका युद्धमें आना और वानरोंके साथ उनका घोर युद्ध

वालिपुत्र अङ्गदके हाथसे वज्रदंष्ट्रके मारे जानेका समाचार सुनकर रावणने हाथ जोड़कर अपने पास खड़े हुए सेनापति प्रहस्तसे कहा— ॥ १ ॥

‘अकम्पन सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता हैं, अतः उन्हींको आगे करके भयंकर पराक्रमी दुर्धर्ष राक्षस शीघ्र यहाँसे युद्धके लिये जायँ॥ २ ॥

‘अकम्पनको युद्ध सदा ही प्रिय है। ये सर्वदा मेरी उन्नति चाहते हैं। इन्हें युद्धमें एक श्रेष्ठ योद्धा माना गया है। ये शत्रुओंको दण्ड देने, अपने सैनिकोंकी रक्षा करने तथा रणभूमिमें सेनाका संचालन करनेमें समर्थ हैं॥ ३ ॥

‘अकम्पन दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणको तथा महाबली सुग्रीवको भी परास्त कर देंगे और दूसरे-दूसरे भयानक वानरोंका भी संहार कर डालेंगे, इसमें संशय नहीं है’॥ ४ ॥

रावणकी उस आज्ञाको शिरोधार्य करके शीघ्र-पराक्रमी महाबली सेनाध्यक्षने उस समय युद्धके लिये सेना भेजी॥ ५ ॥

सेनापतिसे प्रेरित हो भयानक नेत्रोंवाले मुख्य-मुख्य भयंकर राक्षस नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये नगरसे बाहर निकले॥ ६ ॥

उसी समय तपे हुए सोनेसे विभूषित विशाल रथपर आरूढ़ हो घोर राक्षसोंसे घिरा हुआ अकम्पन भी निकला। वह मेघके समान विशाल था, मेघके समान ही उसका रंग था और मेघके ही तुल्य उसकी गर्जना थी॥ ७ १/२ ॥

महासमरमें देवता भी उसे कम्पित नहीं कर सकते थे, इसीलिये वह अकम्पन नामसे विख्यात था और राक्षसोंमें सूर्यके समान तेजस्वी था॥ ८ १/२ ॥

रोषावेशसे भरकर युद्धकी इच्छासे धावा करनेवाले अकम्पनके रथमें जुते हुए घोड़ोंका मन अकस्मात् दीनभावको प्राप्त हो गया॥ ९ १/२ ॥

यद्यपि अकम्पन युद्धका अभिनन्दन करनेवाला था, तथापि उस समय उसकी बायीं आँख फड़कने लगी। मुखकी कान्ति फीकी पड़ गयी और वाणी गद्गद हो गयी॥

यद्यपि वह समय सुदिनका था, तथापि सहसा रूखी हवासे युक्त दुर्दिन छा गया। सभी पशु और पक्षी क्रूर एवं भयदायक बोली बोलने लगे॥ ११ १/२ ॥

अकम्पनके कन्धे सिंहके समान पुष्ट थे। उसका पराक्रम व्याघ्रके समान था। वह पूर्वोक्त उत्पातोंकी कोऽइ परवा न करके रणभूमिकी ओर चला॥ १२ १/२ ॥

जिस समय वह राक्षस दूसरे राक्षसोंके साथ लङ्कासे निकला, उस समय ऐसा महान् कोलाहल हुआ कि समुद्रमें भी हलचल-सी मच गयी॥ १३ १/२ ॥

उस महान् कोलाहलसे वानरोंकी वह विशाल सेना भयभीत हो गयी। युद्धके लिये उपस्थित हो वृक्षों और शैल-शिखरोंका प्रहार करनेवाले उन वानरों और राक्षसोंमें महाभयंकर युद्ध होने लगा॥ १४-१५ ॥

श्रीराम और रावणके निमित्त आत्मत्यागके लिये उद्यत हुए वे समस्त शूरवीर अत्यन्त बलशाली और पर्वतके समान विशालकाय थे॥ १६ ॥

वानर तथा राक्षस एक-दूसरेके वधकी इच्छासे वहाँ एकत्र हुए थे। वे युद्धस्थलमें अत्यन्त वेगशाली थे। कोलाहल करते और एक-दूसरेको लक्ष्य करके क्रोधपूर्वक गर्जते थे। उनका महान् शब्द सुदूरतक सुनायी देता था॥ १७ १/२ ॥

वानरों और राक्षसोंद्वारा उड़ायी गयी लाल रंगकी धूल बड़ी भयंकर जान पड़ती थी। उसने दसों दिशाओंको आच्छादित कर लिया था॥ १८ १/२ ॥

परस्पर उड़ायी हुऽइ वह धूल हिलते हुए रेशमी वस्त्रके समान पाण्डुवर्णकी दिखायी देती थी। उसके द्वारा समराङ्गणमें समस्त प्राणी ढक गये थे। अतः वानर और राक्षस उन्हें देख नहीं पाते थे॥ १९ १/२ ॥

उस धूलसे आच्छादित होनेके कारण ध्वज, पताका, ढाल, घोड़ा, अस्त्र-शस्त्र अथवा रथ कोऽइ भी वस्तु दिखायी नहीं देती थी॥ २० १/२ ॥

उन गर्जते और दौड़ते हुए प्राणियोंका महाभयंकर शब्द युद्धस्थलमें सबको सुनायी पड़ता था, परंतु उनके रूप नहीं दिखायी देते थे॥ २१ १/२ ॥

अन्धकारसे आच्छादित युद्धस्थलमें अत्यन्त कुपित हुए वानर वानरोंपर ही प्रहार कर बैठते थे तथा राक्षस राक्षसोंको ही मारने लगते थे॥ २२ १/२ ॥

अपने तथा शत्रुपक्षके योद्धाओंको मारते हुए वानरों तथा राक्षसोंने उस रणभूमिको रक्तकी धारासे भिगो दिया और वहाँ कीच मचा दी॥ २३ १/२ ॥

तदनन्तर रक्तके प्रवाहसे सिंच जानेके कारण वहाँकी धूल बैठ गयी और सारी युद्धभूमि लाशोंसे भर गयी॥ २४ १/२ ॥

वानर और राक्षस एक-दूसरेपर वृक्ष, शक्ति, गदा, प्रास, शिला, परिघ और तोमर आदिसे बलपूर्वक जल्दी-जल्दी प्रहार करने लगे॥ २५ १/२ ॥

भयंकर कर्म करनेवाले वानर अपनी परिघके समान भुजाओंद्वारा पर्वताकार राक्षसोंके साथ युद्ध करते हुए रणभूमिमें उन्हें मारने लगे॥ २६ १/२ ॥

उधर राक्षसलोग भी अत्यन्त कुपित हो हाथोंमें प्रास और तोमर लिये अत्यन्त भयंकर शस्त्रोंद्वारा वानरोंका वध करने लगे॥ २७ १/२ ॥

इस समय अधिक रोषसे भरा हुआ राक्षस-सेनापति अकम्पन भी भयानक पराक्रम प्रकट करनेवाले उन सभी राक्षसोंका हर्ष बढ़ाने लगा॥ २८ १/२ ॥

वानर भी बलपूर्वक आक्रमण करके राक्षसोंके अस्त्र-शस्त्र छीनकर बड़े-बड़े वृक्षों और शिलाओंद्वारा उन्हें विदीर्ण करने लगे॥ २९ १/२ ॥

इसी समय वीर वानर कुमुद, नल, मैन्द और द्विविदने कुपित हो अपना परम उत्तम वेग प्रकट किया॥ ३० १/२ ॥

उन महावीर वानरशिरोमणियोंने युद्धके मुहानेपर वृक्षोंद्वारा खेल-खेलमें ही राक्षसोंका बड़ा भारी संहार किया। उन सबने नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा राक्षसोंको भलीभाँति मथ डाला॥ ३१-३२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें पचपनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५५ ॥