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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

तीसवाँ सर्ग

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तीसवाँ सर्ग

श्रीरामद्वारा विश्वामित्रके यज्ञकी रक्षा तथा राक्षसोंका संहार

तदनन्तर देश और कालको जाननेवाले शत्रुदमन राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण जो देश और कालके अनुसार बोलने योग्य वचनके मर्मज्ञ थे, कौशिक मुनिसे इस प्रकार बोले— ॥ १ ॥

‘भगवन्! अब हम दोनों यह सुनना चाहते हैं कि किस समय उन दोनों निशाचरोंका आक्रमण होता है? जब कि हमें उन दोनोंको यज्ञभूमिमें आनेसे रोकना है। कहीं ऐसा न हो, असावधानीमें ही वह समय हाथसे निकल जाय; अतः उसे बता दीजिये’॥ २ ॥

ऐसी बात कहकर युद्धकी इच्छासे उतावले हुए उन दोनों ककुत्स्थवंशी राजकुमारोंकी ओर देखकर वे सब मुनि बड़े प्रसन्न हुए और उन दोनों बन्धुओंकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे॥ ३ ॥

वे बोले—‘ये मुनिवर विश्वामित्रजी यज्ञकी दीक्षा ले चुके हैं; अतः अब मौन रहेंगे। आप दोनों रघुवंशी वीर सावधान होकर आजसे छः रातोंतक इनके यज्ञकी रक्षा करते रहें’॥ ४ ॥

मुनियोंका यह वचन सुनकर वे दोनों यशस्वी राजकुमार लगातार छः दिन और छः राततक उस तपोवनकी रक्षा करते रहे; इस बीचमें उन्होंने नींद भी नहीं ली॥ ५ ॥

शत्रुओंका दमन करनेवाले वे परम धनुर्धर वीर सतत सावधान रहकर मुनिवर विश्वामित्रके पास खड़े हो उनकी (और उनके यज्ञकी) रक्षामें लगे रहे॥ ६ ॥

इस प्रकार कुछ काल बीत जानेपर जब छठा दिन आया, तब श्रीरामने सुमित्राकुमार लक्ष्मणसे कहा—‘सुमित्रानन्दन! तुम अपने चित्तको एकाग्र करके सावधान हो जाओ’॥ ७ ॥

युद्धकी इच्छासे शीघ्रता करते हुए श्रीराम इस प्रकार कह ही रहे थे कि उपाध्याय (ब्रह्मा), पुरोहित (उपद्रष्टा) तथा अन्यान्य ऋत्विजोंसे घिरी हुई यज्ञकी वेदी सहसा प्रज्वलित हो उठी (वेदीका यह जलना राक्षसोंके आगमनका सूचक उत्पात था)॥ ८ ॥

इसके बाद कुश, चमस, स्रुक्, समिधा और फूलोंके ढेरसे सुशोभित होनेवाली विश्वामित्र तथा ऋत्विजोंसहित जो यज्ञकी वेदी थी, उसपर आहवनीय अग्नि प्रज्वलित हुई (अग्निका यह प्रज्वलन यज्ञके उद्देश्यसे हुआ था)॥ ९ ॥

फिर तो शास्त्रीय विधिके अनुसार वेद-मन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक उस यज्ञका कार्य आरम्भ हुआ। इसी समय आकाशमें बड़े जोरका शब्द हुआ, जो बड़ा ही भयानक था॥ १० ॥

जैसे वर्षाकालमें मेघोंकी घटा सारे आकाशको घेरकर छायी हुई दिखायी देती है, उसी प्रकार मारीच और सुबाहु नामक राक्षस सब ओर अपनी माया फैलाते हुए यज्ञमण्डपकी ओर दौड़े आ रहे थे। उनके अनुचर भी साथ थे। उन भयंकर राक्षसोंने वहाँ आकर रक्तकी धाराएँ बरसाना आरम्भ कर दिया॥ ११-१२ ॥

रक्तके उस प्रवाहसे यज्ञ-वेदीके आस-पासकी भूमिको भीगी हुई देख श्रीरामचन्द्रजी सहसा दौड़े और इधर-उधर दृष्टि डालनेपर उन्होंने उन राक्षसोंको आकाशमें स्थित देखा। मारीच और सुबाहुको सहसा आते देख कमलनयन श्रीरामने लक्ष्मणकी ओर देखकर कहा— ॥ १३-१४ ॥

‘लक्ष्मण! वह देखो, मांसभक्षण करनेवाले दुराचारी राक्षस आ पहुँचे। मैं मानवास्त्रसे इन सबको उसी प्रकार मार भगाऊँगा, जैसे वायुके वेगसे बादल छिन्न-भिन्न हो जाते हैं। मेरे इस कथनमें तनिक भी संदेह नहीं है। ऐसे कायरोंको मैं मारना नहीं चाहता’॥ १५ १/२ ॥

ऐसा कहकर वेगशाली श्रीरामने अपने धनुषपर परम उदार मानवास्त्रका संधान किया। वह अस्त्र अत्यन्त तेजस्वी था। श्रीरामने बड़े रोषमें भरकर मारीचकी छातीमें उस बाणका प्रहार किया॥ १६-१७ ॥

उस उत्तम मानवास्त्रका गहरा आघात लगनेसे मारीच पूरे सौ योजनकी दूरीपर समुद्रके जलमें जा गिरा॥ १८ ॥

शीतेषु नामक मानवास्त्रसे पीड़ित हो मारीच अचेत-सा होकर चक्कर काटता हुआ दूर चला जा रहा है। यह देख श्रीरामने लक्ष्मणसे कहा— ॥ १९ ॥

‘लक्ष्मण! देखो, मनुके द्वारा प्रयुक्त शीतेषु नामक मानवास्त्र इस राक्षसको मूर्छित करके दूर लिये जा रहा है, किंतु उसके प्राण नहीं ले रहा है॥ २० ॥

‘अब यज्ञमें विघ्न डालनेवाले इन दूसरे निर्दय, दुराचारी, पापकर्मों एवं रक्तभोजी राक्षसोंको भी मार गिराता हूँ’॥ २१ ॥

लक्ष्मणसे ऐसा कहकर रघुनन्दन श्रीरामने अपने हाथकी फुर्ती दिखाते हुए-से शीघ्र ही महान् आग्नेयास्त्रका संधान करके उसे सुबाहुकी छातीपर चलाया। उसकी चोट लगते ही वह मरकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। फिर महायशस्वी परम उदार रघुवीरने वायव्यास्त्र लेकर शेष निशाचरोंका भी संहार कर डाला और मुनियोंको परम आनन्द प्रदान किया॥ २२-२३ ॥

इस प्रकार रघुकुलनन्दन श्रीराम यज्ञमें विघ्न डालनेवाले समस्त राक्षसोंका वध करके वहाँ ऋषियोंद्वारा उसी प्रकार सम्मानित हुए जैसे पूर्वकालमें देवराज इन्द्र असुरोंपर विजय पाकर महर्षियोंद्वारा पूजित हुए थे॥ २४ ॥

यज्ञ समाप्त होनेपर महामुनि विश्वामित्रने सम्पूर्ण दिशाओंको विघ्न-बाधाओंसे रहित देख श्रीरामचन्द्रजीसे कहा— ॥ २५ ॥

‘महाबाहो! मैं तुम्हें पाकर कृतार्थ हो गया। तुमने गुरुकी आज्ञाका पूर्णरूपसे पालन किया। महायशस्वी वीर! तुमने इस सिद्धाश्रमका नाम सार्थक कर दिया।’ इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजीकी प्रशंसा करके मुनिने उन दोनों भाइयोंके साथ संध्योपासना की॥ २६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥

३०॥