श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
तिहत्तरवाँ सर्ग
तिहत्तरवाँ सर्ग
इन्द्रजित्के ब्रह्मास्त्रसे वानरसेनासहित श्रीराम और लक्ष्मणका मूर्च्छित होना
संग्रामभूमिमें जो निशाचर मरनेसे बच गये थे, उन्होंने तुरंत रावणके पास जाकर उसे देवान्तक, त्रिशिरा और अतिकाय आदि राक्षसपुङ्गवोंके मारे जानेका समाचार सुनाया॥ १ ॥
उनके वधकी बात सुनकर राजा रावणके नेत्रोंमें सहसा आँसुओंकी बाढ़ आ गयी। पुत्रों और भाइयोंके भयानक वधकी बात सोचकर उसको बड़ी चिन्ता हुई॥
राजा रावणको शोकके समुद्रमें निमग्न एवं दीन हुआ देख रथियोंमें श्रेष्ठ राक्षसराजकुमार इन्द्रजित्ने यह बात कही—॥ ३ ॥
‘तात! राक्षसराज! जबतक इन्द्रजित् जीवित है तबतक आप चिन्ता और मोहमें न पड़िये। इस इन्द्रशत्रुके बाणोंसे घायल होकर कोई भी समराङ्गणमें अपने प्राणोंकी रक्षा नहीं कर सकता॥ ४ ॥
‘देखिये, आज मैं राम और लक्ष्मणके शरीरको बाणोंसे छिन्न-भिन्न करके उनके सारे अङ्गोंको तीखे सायकोंसे भर देता हूँ, और वे दोनों भाई गतायु होकर सदाके लिये धरतीपर सो जाते हैं॥ ५ ॥
‘आप मुझ इन्द्रशत्रुकी इस सुनिश्चित प्रतिज्ञाको, जो मेरे पुरुषार्थसे और दैवबल (ब्रह्माजीकी कृपा)-से भी सिद्ध होनेवाली है, सुन लीजिये—मैं आज ही लक्ष्मणसहित रामको अपने अमोघ बाणोंसे पूर्णतः तृप्त करूँगा—उनकी युद्धविषयक पिपासाको बुझा दूँगा॥ ६ ॥
‘आज इन्द्र, यम, विष्णु, रुद्र, साध्य, अग्नि, सूर्य और चन्द्रमा बलिके यज्ञमण्डपमें भगवान् विष्णुके भयंकर विक्रमकी भाँति मेरे अपार पराक्रमको देखेंगे’॥ ७ ॥
ऐसा कहकर उदारचेता इन्द्रशत्रु इन्द्रजित्ने राजा रावणसे आज्ञा ली और अच्छे गदहोंसे जुते हुए, युद्धसामग्रीसे सम्पन्न एवं वायुके समान वेगशाली रथपर वह सवार हुआ॥ ८ ॥
उसका रथ इन्द्रके रथके समान जान पड़ता था। उसपर आरूढ़ हो शत्रुओंका दमन करनेवाला वह महातेजस्वी निशाचर सहसा उस स्थानपर जा पहुँचा, जहाँ युद्ध हो रहा था॥ ९ ॥
उस महामनस्वी वीरको प्रस्थान करते देख बहुत-से महाबली राक्षस हाथोंमें श्रेष्ठ धनुष लिये हर्ष और उत्साहके साथ उसके पीछे-पीछे चले॥ १० ॥
कोर्इ हाथीपर बैठकर चले तो कोर्इ उत्तम घोड़ोंपर। इनके सिवा बाघ, बिच्छू, बिलाव, गदहे, ऊँट, सर्प, सूअर, अन्य हिंसक जन्तु, सिंह, पर्वताकार गीदड़, कौआ, हंस और मोर आदिकी सवारियोंपर चढ़े हुए भयानक पराक्रमी राक्षस वहाँ युद्धके लिये आये॥
उन सबने प्रास, पट्टिश, खड्ग, फरसे, गदा, भुशुण्डि, मुद्गर, डंडे, शतघ्नी और परिघ आदि आयुध धारण कर रखे थे॥ १३ ॥
शङ्खोंकी ध्वनिके साथ मिली हुर्इ भेरियोंकी भयानक आवाज सब ओर गूँज उठी। उस तुमुलनादके साथ इन्द्रद्रोही पराक्रमी इन्द्रजितने बड़े वेगसे रणभूमिकी ओर प्रस्थान किया॥ १४ ॥
जैसे पूर्ण चन्द्रमासे उपलक्षित आकाशकी शोभा होती है, उसी प्रकार ऊपर तने हुए शङ्ख और शशिके समान वर्णवाले श्वेत छत्रसे वह शत्रुसूदन इन्द्रजित् सुशोभित हो रहा था॥ १५ ॥
सोनेके आभूषणोंसे विभूषित और समस्त धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ उस वीर निशाचरको दोनों ओरसे सुवर्णनिर्मित उत्तम एवं मनोहर चँवर डुलाये जा रहे थे॥ १६ ॥
विशाल सेनासे घिरे हुए अपने पुत्र इन्द्रजित्को प्रस्थान करते देख राक्षसोंके राजा श्रीमान् रावणने उससे कहा— ॥ १७ ॥
‘बेटा! कोर्इ भी ऐसा प्रतिद्वन्द्वी रथी नहीं है, जो तुम्हारा सामना कर सके। तुमने देवराज इन्द्रको भी पराजित किया है। फिर आसानीसे जीत लेने योग्य एक मनुष्यको परास्त करना तुम्हारे लिये कौन बड़ी बात है? तुम अवश्य ही रघुवंशी रामका वध करोगे’॥ १८ ॥
राक्षसराजके ऐसा कहनेपर इन्द्रजित्ने उसके उस महान् आशीर्वादको सिर झुकाकर ग्रहण किया। फिर तो जैसे अनुपम तेजस्वी सूर्यसे आकाशकी शोभा होती है, उसी प्रकार अप्रतिम शक्तिशाली और सूर्यतुल्य तेजस्वी इन्द्रजित्से लङ्कापुरी सुशोभित होने लगी॥ १९ १/२ ॥
महातेजस्वी शत्रुदमन इन्द्रजित्ने रणभूमिमें पहुँचकर अपने रथके चारों ओर राक्षसोंको खड़ा कर दिया॥ २० १/२ ॥
फिर बीचमें रथसे उतरकर पृथ्वीपर अग्निकी स्थापना करके अग्नितुल्य तेजस्वी उस राक्षसशिरोमणि वीरने चन्दन, फूल तथा लावा आदिके द्वारा अग्निदेवका पूजन किया। उसके बाद उस प्रतापी राक्षसराजने विधिपूर्वक श्रेष्ठ मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए उस अग्निमें हविष्यकी आहुति दी॥ २१-२२ १/२ ॥
उस समय शस्त्र ही अग्निवेदीके चारों ओर बिछानेके लिये कुश या कासके पत्ते थे। बहेड़ेकी लकड़ीसे ही समिधाका काम लिया गया था। लाल रंगके वस्त्र उपयोगमें लाये गये और उस आभिचारिक यज्ञमें जो स्रुवा था, वह लोहेका बना हुआ था॥ २३ १/२ ॥
उसने वहाँ तोमरसहित शस्त्ररूपी कासके पत्तोंको अग्निके चारों ओर फैलाकर होमके लिये काले रंगके जीवित बकरेका गला पकड़ा॥ २४ १/२ ॥
एक ही बार दी हुई उस आहुतिसे अग्नि प्रज्वलित हो उठी। उसमें धूम नहीं दिखायी देता था और आगकी बड़ी-बड़ी लपटें उठ रही थीं। उस समय उस अग्निसे वे सभी चिह्न प्रकट हुए, जो पूर्वकालमें उसे अपनी विजय दिखा चुके थे—युद्धस्थलमें उसको विजयकी प्राप्ति करा चुके थे॥ २५ १/२ ॥
अग्निदेवकी शिखा दक्षिणावर्त दिखायी देने लगी। उनका वर्ण तपाये हुए सुवर्णके समान सुन्दर था। इस रूपमें वे स्वयं प्रकट होकर उसके दिये हुए हविष्यको ग्रहण कर रहे थे॥ २६ १/२ ॥
तदनन्तर अस्त्रविद्याविशारद इन्द्रजित्ने ब्रह्मास्त्रका आवाहन किया और अपने धनुष तथा रथ आदि सब वस्तुओंको वहाँ सिद्ध ब्रह्मास्त्रमन्त्रसे अभिमन्त्रित किया॥ २७ १/२ ॥
जब अग्निमें आहुति देकर उसने ब्रह्मास्त्रका आवाहन किया, तब सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह तथा नक्षत्रोंके साथ अन्तरिक्षलोकके सभी प्राणी भयभीत हो गये॥
जिसका तेज अग्निके समान उद्दीप्त हो रहा था तथा जो देवराज इन्द्रके समान अनुपम प्रभावसे युक्त था; उस अचिन्त्य पराक्रमी इन्द्रजित्ने अग्निमें आहुति देनेके पश्चात् धनुष, बाण, रथ, खड्ग, घोड़े और सारथिसहित अपने-आपको आकाशमें अदृश्य कर लिया॥ २९ ॥
इसके बाद वह घोड़े और रथोंसे व्याप्त तथा ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित राक्षससेनामें गया, जो युद्धकी इच्छासे गर्जना कर रही थी॥ ३० ॥
वे राक्षस दुःसह वेगवाले, सुवर्णभूषित, विचित्र एवं बहुसंख्यक बाणों, तोमरों और अंकुशोंद्वारा रणभूमिमें वानरोंपर प्रहार कर रहे थे॥ ३१ ॥
रावणपुत्र इन्द्रजित् शत्रुओंके प्रति अत्यन्त क्रोधसे भरा हुआ था। उसने निशाचरोंकी ओर देखकर कहा— 'तुमलोग वानरोंको मार डालनेकी इच्छासे हर्ष और उत्साहपूर्वक युद्ध करो'॥ ३२ ॥
उसके इस प्रकार प्रेरणा देनेपर विजयकी अभिलाषा रखनेवाले वे समस्त राक्षस जोर-जोरसे गर्जना करते हुए वहाँ वानरोंपर बाणोंकी भयंकर वर्षा करने लगे॥ ३३ ॥
उस युद्धस्थलमें राक्षसोंसे घिरे रहकर इन्द्रजित्ने भी नालीक, नाराच, गदा और मुसल आदि अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा वानरोंका संहार आरम्भ किया॥ ३४ ॥
समराङ्गणमें उसके अस्त्र-शस्त्रोंसे घायल होनेवाले वानर भी जो वृक्षोंसे ही हथियारका काम लेते थे, सहसा रावणकुमारपर शैल-शिखरों और वृक्षोंकी वर्षा करने लगे॥
उस समय कुपित हुए महातेजस्वी महाबली रावणपुत्र इन्द्रजित्ने वानरोंके शरीरोंको छिन्न-भिन्न कर डाला॥ ३६ ॥
रणभूमिमें राक्षसोंका हर्ष बढ़ाता हुआ इन्द्रजित् रोषसे भरकर एक-एक बाणसे पाँच-पाँच, सात-सात तथा नौ-नौ वानरोंको विदीर्ण कर डालता था॥ ३७ ॥
उस अत्यन्त दुर्जय वीरने सुवर्णभूषित सूर्यतुल्य तेजस्वी सायकोंद्वारा समरभूमिमें वानरोंको मथ डाला॥
रणक्षेत्रमें देवताओंद्वारा पीड़ित हुए बड़े-बड़े असुरोंकी भाँति इन्द्रजित्के बाणोंसे व्यथित हुए वानरोंके शरीर छिन्न-भिन्न हो गये। उनकी विजयकी आशापर तुषारपात हो गया और वे अचेत-से होकर पृथ्वीपर गिर पड़े॥ ३९ ॥
उस समय युद्धस्थलमें बाणरूपी भयंकर किरणोंद्वारा सूर्यके समान तपते हुए इन्द्रजित्पर प्रधान-प्रधान वानरोंने बड़े रोषके साथ धावा किया॥ ४० ॥
परंतु उसके बाणोंसे शरीरके क्षत-विक्षत हो जानेसे वे सब वानर अचेत-से हो गये और खूनसे लथपथ हो व्यथित होकर इधर-उधर भागने लगे॥ ४१ ॥
वानरोंने भगवान् श्रीरामके लिये अपने जीवनका मोह छोड़ दिया था। वे पराक्रमपूर्वक गर्जना करते हुए हाथमें शिलाएँ लिये समरभूमिमें डटे रहे—युद्धभूमिसे पीछे न हटे॥ ४२ ॥
समराङ्गणमें खड़े हुए वे वानर रावणकुमारपर वृक्षों, पर्वतशिखरों और शिलाओंकी वर्षा करने लगे॥
वृक्षों और शिलाओंकी वह भारी वृष्टि राक्षसोंके प्राण हर लेनेवाली थी; परंतु समरविजयी महातेजस्वी रावणपुत्रने अपने बाणोंद्वारा उसे दूर हटा दिया॥ ४४ ॥
तत्पश्चात् विषधर सर्पोंके समान भयंकर और अग्नितुल्य तेजस्वी बाणोंद्वारा उस शक्तिशाली वीरने समराङ्गणमें वानर-सैनिकोंको विदीर्ण करना आरम्भ किया॥
उसने अठारह तीखे बाणोंसे गन्धमादनको घायल करके दूर खड़े हुए नलपर भी नौ बाणोंका प्रहार किया॥
इसके बाद महापराक्रमी इन्द्रजित्ने सात मर्मभेदी सायकोंद्वारा मैन्दको और पाँच बाणोंसे गजको भी युद्धस्थलमें बींध डाला॥ ४७ ॥
फिर दस बाणोंसे जाम्बवान्को और तीस सायकोंसे नीलको घायल कर दिया। तदनन्तर वरदानमें प्राप्त हुए बहुसंख्यक तीखे और भयानक सायकोंका प्रहार करके उस समय उसने सुग्रीव, ऋषभ, अङ्गद और द्विविदको भी निष्प्राण-सा कर दिया॥ ४८ १/२ ॥
सब ओर फैली हुई प्रलयाग्निके समान अत्यन्त रोषसे भरे हुए इन्द्रजित्ने दूसरे-दूसरे श्रेष्ठ वानरोंको भी बहुसंख्यक बाणोंकी मारसे व्यथित कर दिया॥ ४९ १/२ ॥
उस महासमरमें रावणकुमारने अच्छी तरह छोड़े हुए सूर्यतुल्य तेजस्वी शीघ्रगामी सायकोंद्वारा वानरोंकी सेनाओंको मथ डाला॥ ५० १/२ ॥
उसके बाणजालसे पीड़ित हो वानरी-सेना व्याकुल हो उठी और रक्तसे नहा गयी। उसने बड़े हर्ष और प्रसन्नताके साथ शत्रुसेनाकी इस दुरवस्थाको देखा॥
वह राक्षसराजकुमार इन्द्रजित् बड़ा तेजस्वी, प्रभावशाली एवं बलवान् था। उसने सब ओरसे बाणों तथा अन्यान्य अस्त्र-शस्त्रोंकी भयंकर वर्षा करके पुनः वानर-सेनाको रौंद डाला॥ ५२-५३ ॥
तत्पश्चात् वह अपनी सेनाके ऊपरी भागको छोड़कर उस महासमरमें तुरंत वानर-सेनाके ऊपर जा पहुँचा और स्वयं आकाशमें अदृश्य रहकर भयानक बाणसमूहकी उसी तरह वर्षा करने लगा, जैसे काला मेघ जलकी वृष्टि करता है॥ ५४ ॥
जैसे इन्द्रके वज्रसे आहत हो बड़े-बड़े पर्वत धराशायी हो जाते हैं, उसी प्रकार वे पर्वताकार वानर रणभूमिमें इन्द्रजित्के बाणोंद्वारा छलसे मारे जाकर शरीरके क्षत-विक्षत हो जानेसे विकृत स्वरमें चीखते-चिल्लाते हुए पृथ्वीपर गिर पड़े॥ ५५ ॥
रणभूमिमें वानर-सेनाओंपर जो पैनी धारवाले बाण गिर रहे थे, केवल उन्हींको वे वानर देख रहे थे। मायासे छिपे हुए उस इन्द्रद्रोही राक्षसको कहीं नहीं देख पाते थे॥ ५६ ॥
उस समय उस महाकाय राक्षसराजने तीखी धारवाले सूर्यतुल्य तेजस्वी बाण-समूहोंद्वारा सम्पूर्ण दिशाओंको ढक दिया और वानर-सेनापतियोंको घायल कर दिया॥ ५७ ॥
वह वानरराजकी सेनामें बढ़े हुए प्रज्वलित पावकके समान दीप्तिमान् तथा चिनगारियोंसहित उज्ज्वल आग प्रकट करनेवाले शूल, खड्ग और फरसोंकी दुःसह वृष्टि करने लगा॥ ५८ ॥
इन्द्रजित्के चलाये हुए अग्नितुल्य तेजस्वी बाणोंसे घायल हो रक्तसे नहाकर सारे वानर-यूथपति खिले हुए पलाश वृक्षके समान जान पड़ते थे॥ ५९ ॥
राक्षसराज इन्द्रजित्के बाणोंसे विदीर्ण हो वे श्रेष्ठ वानर एक-दूसरेके सामने जाकर विकृत स्वरमें चीत्कार करते हुए धराशायी हो जाते थे॥ ६० ॥
कितने ही वानर आकाशकी ओर देख रहे थे। उसी समय उनके नेत्रोंमें बाणोंकी चोट लगी, अतः वे एक-दूसरेके शरीरसे सट गये और पृथ्वीपर गिर पड़े॥
राक्षसप्रवर इन्द्रजित्ने दिव्य मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित प्रासों, शूलों और पैने बाणोंद्वारा हनुमान्, सुग्रीव, अङ्गद, गन्धमादन, जाम्बवान्, सुषेण, वेगदर्शी, मैन्द, द्विविद, नील, गवाक्ष, गवय, केसरी, हरिलोमा, विद्युद्दंष्ट्र, सूर्यानन, ज्योतिर्मुख, दधिमुख, पावकाक्ष, नल और कुमुद आदि सभी श्रेष्ठ वानरोंको घायल कर दिया॥
गदाओं और सुवर्णके समान कान्तिमान् बाणोंद्वारा वानर-यूथपतियोंको क्षत-विक्षत करके वह लक्ष्मणसहित श्रीरामपर सूर्यकी किरणोंके समान चमकीले बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगा॥ ६६ ॥
उस बाणवर्षाके लक्ष्य बने हुए परम अद्भुत शोभासे सम्पन्न श्रीराम पानीकी धाराके समान गिरनेवाले उन बाणोंकी कोऽइ परवा न करके लक्ष्मणकी ओर देखते हुए बोले—॥ ६७ ॥
‘लक्ष्मण! वह इन्द्रद्रोही राक्षसराज इन्द्रजित् प्राप्त हुए ब्रह्मास्त्रका सहारा लेकर वानर-सेनाको धराशायी करनेके पश्चात् अब तीखे बाणोंद्वारा हम दोनोंको भी पीड़ित कर रहा है॥ ६८ ॥
‘ब्रह्माजीसे वरदान पाकर सदा सावधान रहनेवाले इस महामनस्वी वीरने अपने भीषण शरीरको अदृश्य कर लिया है। युद्धमें इस इन्द्रजित्का शरीर तो दिखायी ही नहीं देता, पर यह अस्त्रोंका प्रयोग करता जा रहा है। ऐसी दशामें इसे हमलोग किस तरह मार सकते हैं ?॥
‘स्वयम्भू भगवान् ब्रह्माका स्वरूप अचिन्त्य है। वे ही इस जगत्के आदि कारण हैं। मैं समझता हूँ, उन्हींका यह अस्त्र है, अतः बुद्धिमान् सुमित्राकुमार! तुम मनमें किसी प्रकारकी घबराहट न लाकर मेरे साथ यहाँ चुपचाप खड़े हो इन बाणोंकी मार सहो॥ ७० ॥
‘यह राक्षसराज इन्द्रजित् इस समय बाण-समूहोंकी वर्षा करके सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित किये देता है। वानरराज सुग्रीवकी यह सारी सेना, जिसके प्रधान-प्रधान शूरवीर धराशायी हो गये हैं, अब शोभा नहीं पा रही है॥ ७१ ॥
‘जब हम दोनों हर्ष एवं रोषसे रहित तथा युद्धसे निवृत्त हो अचेत-से होकर गिर जायँगे, तब हमें उस अवस्थामें देख युद्धके मुहानेपर विजय-लक्ष्मीको पाकर अवश्य ही यह राक्षसपुरी लङ्कामें लौट जायगा’॥ ७२ ॥
तदनन्तर वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण वहाँ इन्द्रजित्के बाण-समूहोंसे बहुत घायल हो गये। उस समय उन दोनोंको युद्धमें पीड़ित करके उस राक्षसराजने बड़े हर्षके साथ गर्जना की॥ ७३ ॥
इस प्रकार संग्राममें वानरोंकी सेना तथा लक्ष्मणसहित श्रीरामको मूर्च्छित करके इन्द्रजित् सहसा दशमुख रावणकी भुजाओंद्वारा पालित लङ्कापुरीमें चला गया। उस समय समस्त निशाचर उसकी स्तुति कर रहे थे। वहाँ जाकर उसने पितासे प्रसन्नतापूर्वक अपनी विजयका सारा समाचार बताया॥ ७४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें तिहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७३ ॥