श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
तिरासीवाँ सर्ग
तिरासीवाँ सर्ग
भरतके कहनेसे श्रीरामका राजसूय-यज्ञ करनेके विचारसे निवृत्त होना
क्लेशरहित कर्म करनेवाले श्रीरामका यह कथन सुनकर द्वारपालने कुमार भरत और लक्ष्मणको बुलाकर श्रीरघुनाथजीकी सेवामें उपस्थित कर दिया॥ १ ॥
भरत और लक्ष्मणको आया देख रघुकुलतिलक श्रीरामने उन्हें हृदयसे लगा लिया और यह बात कही— ॥
‘रघुवंशी राजकुमारो! मैंने ब्राह्मणका वह परम उत्तम कार्य यथावत्रूपसे सिद्ध कर दिया। अब मैं पुनः राजधर्मकी चरम सीमारूप राजसूय-यज्ञका अनुष्ठान करना चाहता हूँ॥ ३ ॥
‘मेरी रायमें धर्मसेतु (राजसूय) अक्षय एवं अविनाशी फल देनेवाला है तथा वह धर्मका पोषक एवं समस्त पापोंका नाश करनेवाला है॥ ४ ॥
‘तुम दोनों मेरे आत्मा ही हो, अतः मेरी इच्छा तुम्हारे साथ इस उत्तम राजसूय-यज्ञका अनुष्ठान करनेकी है; क्योंकि उसमें राजाका शाश्वत धर्म प्रतिष्ठित है॥
‘शत्रुओंका संहार करनेवाले मित्रदेवताने उत्तम आहुतिसे युक्त राजसूय नामक श्रेष्ठ यज्ञद्वारा परमात्माका यजन करके वरुणका पद प्राप्त किया था॥ ६ ॥
‘धर्मज्ञ सोम देवताने धर्मपूर्वक राजसूय-यज्ञका अनुष्ठान करके सम्पूर्ण लोकोंमें कीर्ति तथा शाश्वत स्थानको प्राप्त कर लिया॥ ७ ॥
‘इसलिये आजके दिन मेरे साथ बैठकर तुमलोग यह विचार करो कि हमारे लिये कौन-सा कर्म लोक और परलोकमें कल्याणकारी होगा तथा संयतचित्त होकर तुम दोनों इस विषयमें मुझे सलाह दो’॥ ८ ॥
श्रीरघुनाथजीके ये वचन सुनकर वाक्यविशारद भरतजीने हाथ जोड़कर यह बात कही— ॥ ९ ॥
‘साधो! अमित पराक्रमी महाबाहो! आपमें उत्तम धर्म प्रतिष्ठित है। यह सारी पृथ्वी भी आपपर ही आधारित है तथा आपमें ही यशकी प्रतिष्ठा है॥ १० ॥
‘देवतालोग जैसे प्रजापति ब्रह्माको ही महात्मा एवं लोकनाथ समझते हैं, उसी प्रकार हमलोग और समस्त भूपाल आपको ही महापुरुष तथा समस्त लोकोंका स्वामी मानते हैं—उसी
दृष्टिसे आपको देखते हैं॥ १२ ॥
‘राजन्! महाबली रघुनन्दन! पुत्र जैसे पिताको देखते हैं, उसी प्रकार आपके प्रति सब राजाओंका भाव है। आप ही समस्त पृथ्वी और सम्पूर्ण प्राणियोंके भी आश्रय हैं॥
‘नरेश्वर! फिर आप ऐसा यज्ञ कैसे कर सकते हैं, जिसमें भूमण्डलके समस्त राजवंशोंका विनाश दिखायी देता है॥ १३ ॥
‘राजन्! पृथ्वीपर जो पुरुषार्थी पुरुष हैं, उन सबका सभीके कोपसे उस यज्ञमें संहार हो जायगा॥ १४ ॥
‘पुरुषसिंह! अतुल पराक्रमी वीर! आपके सद्गुणोंके कारण सारा जगत् आपके वशमें है। आपके लिये इस भूतलके निवासियोंका विनाश करना उचित न होगा'॥ १५ ॥
भरतका यह अमृतमय वचन सुनकर सत्यपराक्रमी श्रीरामको अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ॥ १६ ॥
उन्होंने कैकेयीनन्दन भरतसे यह शुभ बात कही— ‘निष्पाप भरत! आज तुम्हारी बात सुनकर मैं बहुत प्रसन्न एवं संतुष्ट हुआ हूँ॥ १७ ॥
‘पुरुषसिंह! तुम्हारे मुखसे निकला हुआ यह उदार एवं धर्मसंगत वचन सारी पृथ्वीकी रक्षा करनेवाला है॥
‘धर्मज्ञ! मेरे हृदयमें राजसूय-यज्ञका संकल्प उठ रहा था; किंतु आज तुम्हारे इस सुन्दर भाषणको सुनकर मैं उस उत्तम यज्ञकी ओरसे अपने मनको हटाये लेता हूँ॥ १९ ॥
‘लक्ष्मणके बड़े भाई! बुद्धिमान् पुरुषोंको ऐसा कर्म नहीं करना चाहिये जो सम्पूर्ण जगत्को पीड़ा देनेवाला हो। बालकोंकी कही हुई बात भी यदि अच्छी हो तो उसे ग्रहण करना ही उचित है; अतः महाबली वीर! मैंने तुम्हारे उत्तम एवं युक्तिसंगत बातको बड़े ध्यानसे सुना है’॥ २० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें तिरासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८३ ॥