सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

तिरानबेवाँ सर्ग

⬅ विषय-सूची (TOC)

तिरानबेवाँ सर्ग

श्रीरामके यज्ञमें महर्षि वाल्मीकिका आगमन और उनका रामायणगानके लिये कुश और लवको आदेश

इस प्रकार वह अत्यन्त अद्भुत यज्ञ जब चालू हुआ, उस समय भगवान् वाल्मीकि मुनि अपने शिष्योंके साथ उसमें शीघ्रतापूर्वक पधारे॥ १ ॥

उन्होंने उस दिव्य एवं अद्भुत यज्ञका दर्शन किया और ऋषियोंके लिये जो बाड़े बने थे, उनके पास ही उन्होंने अपने लिये भी सुन्दर पर्णशालाएँ बनवायीं॥ २ ॥

वाल्मीकिजीके सुन्दर बाड़ेके समीप अन्न आदिसे भरे-पूरे बहुत-से छकड़े खड़े कर दिये गये थे। साथ ही अच्छे-अच्छे फल और मूल भी रख दिये गये थे॥ ३ ॥

राजा श्रीराम तथा बहुसंख्यक महात्मा मुनियोंद्वारा भलीभाँति पूजित एवं सम्मानित हो महातेजस्वी आत्मज्ञानी वाल्मीकि मुनिने बड़े सुखसे वहाँ निवास किया॥ ४ ॥

उन्होंने अपने हृष्ट-पुष्ट दो शिष्योंसे कहा—‘तुम दोनों भांऽइ एकाग्रचित्त हो सब ओर घूम-फिरकर बड़े आनन्दके साथ सम्पूर्ण रामायण-काव्यका गान करो॥ ५ ॥

‘ऋषियों और ब्राह्मणोंके पवित्र स्थानोंपर, गलियोंमें, राजमार्गोंपर तथा राजाओंके वासस्थानोंमें भी इस काव्यका गान करना॥ ६ ॥

‘श्रीरामचन्द्रजीका जो गृह बना है, उसके दरवाजेपर, जहाँ ब्राह्मणलोग यज्ञकार्य कर रहे हैं, वहाँ तथा ऋत्विजोंके आगे भी इस काव्यका विशेषरूपसे गान करना चाहिये॥ ७ ॥

‘यहाँ पर्वतके शिखरोंपर नाना प्रकारके स्वादिष्ट एवं मीठे फल लगे हैं, (भूख लगनेपर) उनका स्वाद ले-लेकर इस काव्यका गान करते रहना॥ ८ ॥

‘बच्चो! यहाँके सुमधुर फल-मूलोंका भक्षण करनेसे न तो तुम्हें कभी थकावट होगी और न तुम्हारे गलेकी मधुरता ही नष्ट होने पायेगी॥ ९ ॥

‘यदि महाराज श्रीराम तुम दोनोंको गान सुननेके लिये बुलावें तो तुम उनसे तथा वहाँ बैठे हुए ऋषि-मुनियोंसे यथायोग्य विनयपूर्ण बर्ताव करना॥ १० ॥

‘मैंने पहले भिन्न-भिन्न संख्यावाले श्लोकोंसे युक्त रामायण काव्यके सर्गोंका जिस तरह तुम्हें उपदेश दिया है, उसीके अनुसार प्रतिदिन बीस-बीस सर्गोंका मधुर स्वरसे गान करना॥ ११

॥

‘धनकी इच्छासे थोड़ा-सा भी लोभ न करना, आश्रममें रहकर फल-मूल भोजन करनेवाले वनवासियोंको धनसे क्या काम?॥ १२ ॥

‘यदि श्रीरघुनाथजी पूछें—‘बच्चो! तुम दोनों किसके पुत्र हो?’ तो तुम दोनों महाराजसे इतना ही कह देना कि हम दोनों भांऽइ महर्षि वाल्मीकिके शिष्य हैं॥ १३ ॥

‘ये वीणाके सात तार हैं। इनसे बड़ी मधुर आवाज निकलती है। इसमें अपूर्व स्वरोंका प्रदर्शन करनेवाले ये स्थान बने हैं। इनके स्वरोंको झंकृत करके— मिलाकर सुमधुर स्वरमें तुम दोनों भांऽइ काव्यका गान करो और सर्वथा निश्चिन्त रहो॥ १४ ॥

‘आरम्भसे ही इस काव्यका गान करना चाहिये। तुमलोग ऐसा कोऽइ बर्ताव न करना, जिससे राजाका अपमान हो; क्योंकि राजा धर्मकी दृष्टिसे सम्पूर्ण प्राणियोंका पिता होता है॥ १५ ॥

‘अतएव तुम दोनों भांऽइ प्रसन्न और एकाग्रचित्त होकर कल सबेरेसे ही वीणाके लयपर मधुर स्वरसे रामायण-गान आरम्भ कर दो’॥ १६ ॥

इस तरह बहुत कुछ आदेश देकर वरुणके पुत्र परम उदार महामुनि वाल्मीकि चुप हो गये॥ १७ ॥

मुनिके इस प्रकार आदेश देनेपर मिथिलेशकुमारी सीताके वे दोनों शत्रुदमन पुत्र ‘बहुत अच्छा, हम ऐसा ही करेंगे’ यह कहकर वहाँसे चल दिये॥ १८ ॥

शुक्राचार्यकी बनायी हुंऽइ नीतिसंहिताको धारण करनेवाले अश्विनीकुमारोंकी भाँति ऋषिकी कही हुंऽइ उस अद्भुत वाणीको हृदयमें धारण करके वे दोनों कुमार मन-ही-मन उत्कण्ठित हो वहाँ रातभर सुखसे रहे॥ १९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें तिरानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९३ ॥