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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

छिहत्तरवाँ सर्ग

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छिहत्तरवाँ सर्ग

श्रीरामके द्वारा शम्बूकका वध, देवताओंद्वारा उनकी प्रशंसा, अगस्त्‍याश्रमपर महर्षि अगस्‍त्‍यके द्वारा उनका सत्कार और उनके लिये आभूषण-दान

क्लेशरहित कर्म करनेवाले भगवान् रामका यह वचन सुनकर नीचे मस्तक किये लटका हुआ वह तथाकथित तपस्वी इस प्रकार बोला— ॥ १ ॥

‘महायशस्वी श्रीराम! मैं शूद्रयोनिमें उत्पन्न हुआ हूँ और सदेह स्वर्गलोकमें जाकर देवत्व प्राप्त करना चाहता हूँ। इसीलिये ऐसा उग्र तप कर रहा हूँ॥ २ ॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम! मैं झूठ नहीं बोलता। देवलोकपर विजय पानेकी इच्छासे ही तपस्यामें लगा हूँ। आप मुझे शूद्र समझिये। मेरा नाम शम्बूक है’॥ ३ ॥

वह इस प्रकार कह ही रहा था कि श्रीरामचन्द्रजीने म्यानसे चमचमाती हुई तलवार खींच ली और उसीसे उसका सिर काट लिया॥ ४ ॥

उस शूद्रका वध होते ही इन्द्र और अग्निसहित सम्पूर्ण देवता ‘बहुत ठीक, बहुत ठीक’ कहकर भगवान् श्रीरामकी बारम्बार प्रशंसा करने लगे॥ ५ ॥

उस समय उनके ऊपर सब ओरसे वायुदेवताद्वारा बिखेरे गये दिव्य एवं परम सुगन्धित पुष्पोंकी बड़ी भारी वर्षा होने लगी॥ ६ ॥

वे सब देवता अत्यन्त प्रसन्न होकर सत्यपराक्रमी श्रीरामसे बोले—‘देव! महामते! आपने यह देवताओंका ही कार्य सम्पन्न किया है॥ ७ ॥

‘शत्रुओंका दमन करनेवाले रघुकुलनन्दन सौम्य श्रीराम! आपके इस सत्कर्मसे ही यह शूद्र सशरीर स्वर्गलोकमें नहीं जा सका है। अतः आप जो वर चाहें माँग लें’॥ ८ ॥

देवताओंका यह वचन सुनकर सत्यपराक्रमी श्रीरामने दोनों हाथ जोड़ सहस्रनेत्रधारी देवराज इन्द्रसे कहा—॥

‘यदि देवता मुझपर प्रसन्न हैं तो वह ब्राह्मणपुत्र जीवित हो जाय। यही मेरे लिये सबसे उत्तम और अभीष्ट वर है। देवतालोग मुझे यही वर दें॥ १० ॥

‘मेरे ही किसी अपराधसे ब्राह्मणका वह इकलौता बालक असमयमें ही कालके गालमें चला गया है॥

'मैंने ब्राह्मणके सामने यह प्रतिज्ञा की है कि 'मैं आपके पुत्रको जीवित कर दूँगा।' अतः आपलोगोंका कल्याण हो। आप उस ब्राह्मण-बालकको जीवित कर दें। मेरी बातको झूठी न करें'॥ १२ ॥

श्रीरघुनाथजीकी यह बात सुनकर वे विबुधशिरोमणि देवता उनसे प्रसन्नतापूर्वक बोले —॥ १३ ॥

'ककुत्स्थकुलभूषण! आप संतुष्ट हों। वह बालक आज फिर जीवित हो गया और अपने भार्इ-बन्धुओंसे जा मिला॥ १४ ॥

'काकुत्स्थ! आपने जिस मुहूर्तमें इस शूद्रको धराशायी किया है, उसी मुहूर्तमें वह बालक जी उठा है॥ १५ ॥

'नरश्रेष्ठ! आपका कल्याण हो। भला हो। अब हम अगस्त्याश्रमको जा रहे हैं। रघुनन्दन! हम महर्षि अगस्त्यका दर्शन करना चाहते हैं। उन्हें जलशय्या लिये पूरे बारह वर्ष बीत चुके हैं। अब उन महातेजस्वी ब्रह्मर्षिकी वह जलशयन-सम्बन्धी व्रतकी दीक्षा समाप्त हुर्इ है॥ १६-१७ ॥

'रघुनन्दन! इसीलिये हमलोग उन महर्षिका अभिनन्दन करनेके लिये जायँगे। आपका कल्याण हो। आप भी उन मुनिश्रेष्ठका दर्शन करनेके लिये चलिये'॥ १८ ॥

तब 'बहुत अच्छा' कहकर रघुकुलनन्दन श्रीराम देवताओंके सामने वहाँ जानेकी प्रतिज्ञा करके उस सुवर्णभूषित पुष्पकविमानपर चढ़े॥ १९ ॥

तत्पश्चात् देवता बहुसंख्यक विमानोंपर आरूढ़ हो वहाँसे प्रस्थित हुए। फिर श्रीराम भी उन्हींके साथ शीघ्रतापूर्वक कुम्भज ऋषिके तपोवनको चल दिये॥ २० ॥

देवताओंको आया देख तपस्याकी निधि धर्मात्मा अगस्त्यने उन सबकी समानरूपसे पूजा की॥ २१ ॥

उनकी पूजा ग्रहण करके उन महामुनिका अभिनन्दन कर वे सब देवता अनुचरोंसहित बड़े हर्षके साथ स्वर्गको चले गये॥ २२ ॥

उनके चले जानेपर श्रीरघुनाथजीने पुष्पकविमानसे उतरकर मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यको प्रणाम किया॥ २३ ॥

अपने तेजसे प्रज्वलित-से होनेवाले महात्मा अगस्त्यका अभिवादन करके उनसे उत्तम आतिथ्य पाकर नरेश्वर श्रीराम आसनपर बैठे॥ २४ ॥

उस समय महातेजस्वी महातपस्वी कुम्भज मुनिने कहा—‘नरश्रेष्ठ रघुनन्दन! आपका स्वागत है। आप यहाँ पधारे, यह मेरे लिये बड़े सौभाग्यकी बात है॥ २५ ॥

‘महाराज श्रीराम! बहुत-से उत्तम गुणोंके कारण आपके लिये मेरे हृदयमें बड़ा सम्मान है। आप मेरे आदरणीय अतिथि हैं और सदा मेरे मनमें बसे रहते हैं॥ २६ ॥

‘देवतालोग कहते थे कि ‘आप अधर्मपरायण शूद्रका वध करके आ रहे हैं तथा धर्मके बलसे आपने ब्राह्मणके उस मरे हुए पुत्रको जीवित कर दिया है’॥ २७ ॥

‘रघुनन्दन! आज रातको आप मेरे ही पास इस आश्रममें निवास कीजिये। कल सबेरे पुष्पकविमानद्वारा अपने नगरको जाइयेगा। आप साक्षात् श्रीमान् नारायण हैं। सारा जगत् आपमें ही प्रतिष्ठित है और आप ही समस्त देवताओंके स्वामी तथा सनातन पुरुष हैं॥ २८-२९ ॥

‘सौम्य! यह विश्वकर्माका बनाया हुआ दिव्य आभूषण है, जो अपने दिव्य रूप और तेजसे प्रकाशित हो रहा है॥ ३० ॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण रघुनन्दन! आप इसे लीजिये और मेरा प्रिय कीजिये; क्योंकि किसीकी दी हुई वस्तुका पुनः दान कर देनेसे महान् फलकी प्राप्ति बतायी जाती है॥ ३१ ॥

‘इस आभूषणको धारण करनेमें केवल आप ही समर्थ हैं तथा बड़े-से-बड़े फलोंकी प्राप्ति करानेकी शक्ति भी आपमें ही है। आप इन्द्र आदि देवताओंको भी तारनेमें समर्थ हैं, इसलिये नरेश्वर! यह भूषण भी मैं आपको ही दूँगा। आप इसे विधिपूर्वक ग्रहण करें’॥ ३२ १/२ ॥

तब बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ और इक्ष्वाकुकुलके महारथी वीर श्रीरामने क्षत्रियधर्मका विचार करते हुए वहाँ महात्मा अगस्त्यजीसे कहा—‘भगवन्! दान लेनेका काम तो केवल ब्राह्मणके लिये ही निन्दित नहीं है॥ ३३-३४ ॥

‘विप्रवर! क्षत्रियोंके लिये तो प्रतिग्रह स्वीकार करना अत्यन्त निन्दित बताया गया है। फिर क्षत्रिय प्रतिग्रह—विशेषतः ब्राह्मणका दिया हुआ दान कैसे ले सकता है? यह बतानेकी कृपा करें’॥ ३५ १/२ ॥

श्रीरामके इस प्रकार पूछनेपर महर्षि अगस्त्यने उत्तर दिया—‘रघुनन्दन! पहले ब्रह्मस्वरूप सत्ययुगमें सारी प्रजा बिना राजाके ही थी, आगे चलकर इन्द्र देवताओंके राजा बनाये गये॥ ३६-३७॥

‘तब सारी प्रजाएँ देवदेवेश्वर ब्रह्माजीके पास राजाके लिये गयीं और बोलीं—‘देव! आपने इन्द्रको देवताओंके राजाके पदपर स्थापित किया है। इसी तरह हमारे लिये भी किसी श्रेष्ठ पुरुषको राजा बना दीजिये, जिसकी पूजा करके हम पापरहित हो इस भूतलपर विचरें॥ ३८-३९॥

‘हम बिना राजाके नहीं रहेंगी। यह हमारा उत्तम निश्चय है।' तब सुरश्रेष्ठ ब्रह्माने इन्द्रसहित समस्त लोकपालोंको बुलाकर कहा—‘तुम सब लोग अपने तेजका एक-एक भाग दो।' तब समस्त लोकपालोंने अपने-अपने तेजका भाग अर्पित किया॥ ४०-४१॥

‘उसी समय ब्रह्माजीको छींक आयी, जिससे क्षुप नामक राजा उत्पन्न हुआ। ब्रह्माजीने उस राजाको लोकपालोंके दिये हुए तेजके उन सभी भागोंसे संयुक्त कर दिया॥ ४२॥

‘तत्पश्चात् उन्होंने क्षुपको ही उन प्रजाजनोंके लिये उनके शासक नरेशके रूपमें समर्पित किया। क्षुपने वहाँ राजा होकर इन्द्रके दिये हुए तेजोभागसे पृथ्वीका शासन किया॥ ४३॥

‘वरुणके तेजोभागसे वे भूपाल प्रजाके शरीरका पोषण करने लगे। कुबेरके तेजोभागसे उन्होंने उन्हें धनपतिकी आभा प्रदान की तथा उनमें जो यमराजका तेजोभाग था, उससे वे प्रजाजनोंको अपराध करनेपर दण्ड देते थे॥ ४४ १/२॥

‘नरश्रेष्ठ रघुनन्दन! आप भी राजा होनेके कारण सभी लोकपालोंके तेजसे सम्पन्न हैं। अतः प्रभो! इन्द्र-सम्बन्धी तेजोभागके द्वारा आप मेरे उद्धारके लिये यह आभूषण ग्रहण कीजिये। आपका भला हो'॥ ४५ १/२॥

तब भगवान् श्रीराम उन महात्मा मुनिके दिये हुए उस सूर्यके समान दीप्तिमान्, दिव्य, विचित्र एवं उत्तम आभूषणको ग्रहण करके उसकी उपलब्धिके विषयमें पूछने लगे—॥ ४६-४७ १/२॥

‘महायशस्वी मुने! यह अत्यन्त अद्भुत तथा दिव्य आकारसे युक्त आभूषण आपको कैसे प्राप्त हुआ, अथवा इसे कौन कहाँसे ले आया? ब्रह्मन्! मैं कौतूहलवश ये बातें आपसे पूछ रहा हूँ; क्योंकि आप बहुत-से आश्चर्योंकी उत्तम निधि हैं'॥ ४८-४९ १/२॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामके इस प्रकार पूछनेपर मुनिवर अगस्त्यने कहा—‘श्रीराम! पूर्व चतुर्युगीके त्रेतायुगमें जैसा वृत्तान्त घटित हुआ था, उसे बताता हूँ सुनिये’॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें छिहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७६॥