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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

छाछठवाँ सर्ग

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छाछठवाँ सर्ग

लक्ष्मणका श्रीरामको समझाना

श्रीरामचन्द्रजी शोकसे संतप्त हो अनाथकी तरह विलाप करने लगे। वे महान् मोहसे युक्त और अत्यन्त दुर्बल हो गये। उनका चित्त स्वस्थ नहीं था। उन्हें इस अवस्थामें देखकर सुमित्राकुमार लक्ष्मणने दो घड़ीतक आश्वासन दिया; फिर वे उनका पैर दबाते हुए उन्हें समझाने लगे— ॥ १-२ ॥

‘भैया! हमारे पिता महाराज दशरथने बड़ी तपस्या और महान् कर्मका अनुष्ठान करके आपको पुत्ररूपमें प्राप्त किया, जैसे देवताओंने महान् प्रयाससे अमृत पा लिया था॥ ३ ॥

‘आपने भरतके मुँहसे जैसा सुना था, उसके अनुसार भूपाल महाराज दशरथ आपके ही गुणोंसे बँधे हुए थे और आपका ही वियोग होनेसे देवलोकको प्राप्त हुए॥ ४ ॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण! यदि अपने ऊपर आये हुए इस दुःखको आप ही धैर्यपूर्वक नहीं सहेंगे तो दूसरा कौन साधारण पुरुष, जिसकी शक्ति बहुत थोड़ी है, सह सकेगा?॥ ५ ॥

‘नरश्रेष्ठ! आप धैर्य धारण करें। संसारमें किस प्राणीपर आपत्तियाँ नहीं आतीं। राजन्! आपत्तियाँ अग्निकी भाँति एक क्षणमें स्पर्श करतीं और दूसरे ही क्षणमें दूर हो जाती हैं॥ ६ ॥

‘पुरुषसिंह! यदि आप दुःखी होकर अपने तेजसे समस्त लोकोंको दग्ध कर डालेंगे तो पीड़ित हुँइ प्रजा किसकी शरणमें जाकर सुख और शान्ति पायेगी॥ ७ ॥

‘यह लोकका स्वभाव ही है कि यहाँ सबपर दुःख-शोक आता-जाता रहता है। नहुषपुत्र ययाति इन्द्रके समान लोक (देवेन्द्रपद) को प्राप्त हुए थे; किंतु वहाँ भी अन्यायमूलक दुःख उनका स्पर्श किये बिना न रहा॥ ८ ॥

‘हमारे पिताके पुरोहित जो महर्षि वसिष्ठजी हैं, उन्हें एक ही दिनमें सौ पुत्र प्राप्त हुए और फिर एक ही दिन वे सब-के-सब विश्वामित्रके हाथसे मारे गये॥ ९ ॥

‘कोसलेश्वर! यह जो विश्ववन्दिता जगन्माता पृथ्वी है, इसका भी हिलना-डुलना देखा जाता है॥ १० ॥

‘जो धर्मके प्रवर्तक और संसारके नेत्र हैं, जिनके आधारपर ही सारा जगत् टिका हुआ है, वे महाबली सूर्य और चन्द्रमा भी राहुके द्वारा ग्रहणको प्राप्त होते हैं॥ ११ ॥

‘पुरुषप्रवर! बड़े-बड़े भूत और देवता भी दैव (प्रारब्ध-कर्म) की अधीनतासे मुक्त नहीं हो पाते हैं; फिर समस्त देहधारी प्राणियोंके लिये तो कहना ही क्या है॥ १२ ॥

‘नरश्रेष्ठ! इन्द्र आदि देवताओंको भी नीति और अनीतिके कारण सुख और दुःखकी प्राप्ति होती सुनी जाती है; इसलिये आपको शोक नहीं करना चाहिये॥ १३ ॥

‘वीर रघुनन्दन! विदेहराजकुमारी सीता यदि मर जायँ या नष्ट हो जायँ तो भी आपको दूसरे गँवार मनुष्योंकी तरह शोक-चिन्ता नहीं करनी चाहिये॥ १४ ॥

‘श्रीराम! आप-जैसे सर्वज्ञ पुरुष बड़ी-से-बड़ी विपत्ति आनेपर भी कभी शोक नहीं करते हैं। वे निर्वेद (खेद) रहित हो अपनी विचारशक्तिको नष्ट नहीं होने देते॥ १५ ॥

‘नरश्रेष्ठ! आप बुद्धिके द्वारा तात्त्विक विचार कीजिये—क्या करना चाहिये और क्या नहीं; क्या उचित है और क्या अनुचित—इसका निश्चय कीजिये; क्योंकि बुद्धियुक्त महाज्ञानी पुरुष ही शुभ और अशुभ (कर्तव्य-अकर्तव्य एवं उचित-अनुचित) को अच्छी तरह जानते हैं॥ १६ ॥

‘जिनके गुण-दोष देखे या जाने नहीं गये हैं तथा जो अध्रुव हैं—फल देकर नष्ट हो जानेवाले हैं, ऐसे कर्मोंका शुभाशुभ फल उन्हें आचरणमें लाये बिना नहीं प्राप्त होता है॥ १७ ॥

‘वीर! पहले आप ही अनेक बार इस तरहकी बातें कहकर मुझे समझा चुके हैं, आपको कौन सिखा सकता है। साक्षात् बृहस्पति भी आपको उपदेश देनेकी शक्ति नहीं रखते हैं॥ १८ ॥

‘महाप्राज्ञ! देवताओंके लिये भी आपकी बुद्धिका पता पाना कठिन है। इस समय शोकके कारण आपका ज्ञान सोया—खोया-सा जान पड़ता है। इसलिये मैं उसे जगा रहा हूँ॥ १९ ॥

‘इक्ष्वाकुकुलशिरोमणे! अपने देवोचित तथा मानवोचित पराक्रमको देखकर उसका अवसरके अनुरूप उपयोग करते हुए आप शत्रुओंके वधका प्रयत्न कीजिये॥ २० ॥

‘पुरुषप्रवर! समस्त संसारका विनाश करनेसे आपको क्या लाभ होगा? उस पापी शत्रुका पता लगाकर उसीको उखाड़ फेंकनेका प्रयत्न करना चाहिये’॥ २१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें छाछठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६६॥