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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

छप्पनवाँ सर्ग

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छप्पनवाँ सर्ग

वनकी शोभा देखते-दिखाते हुए श्रीराम आदिका चित्रकूटमें पहुँचना, वाल्मीकिजीका दर्शन करके श्रीरामकी आज्ञासे लक्ष्मणद्वारा पर्णशालाका निर्माण तथा उसकी वास्तुशान्ति करके उन सबका कुटीमें प्रवेश

तदनन्तर रात्रि व्यतीत होनेपर रघुकुलशिरोमणि श्रीरामने अपने जागनेके बाद वहाँ सोये हुए लक्ष्मणको धीरेसे जगाया (और इस प्रकार कहा—)॥ १ ॥

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले सुमित्राकुमार! मीठी बोली बोलनेवाले शुक-पिक आदि जंगली पक्षियोंका कलरव सुनो। अब हमलोग यहाँसे प्रस्थान करें; क्योंकि प्रस्थानके योग्य समय आ गया है’॥ २ ॥

सोये हुए लक्ष्मणने अपने बड़े भाईद्वारा ठीक समयपर जगा दिये जानेपर निद्रा, आलस्य तथा राह चलनेकी थकावटको दूर कर दिया॥ ३ ॥

फिर सब लोग उठे और यमुना नदीके शीतल जलमें स्नान आदि करके ऋषि-मुनियोंद्वारा सेवित चित्रकूटके उस मार्गपर चल दिये॥ ४ ॥

उस समय लक्ष्मणके साथ वहाँसे प्रस्थित हुए श्रीरामने कमलनयनी सीतासे इस प्रकार कहा—॥ ५ ॥

‘विदेहराजनन्दिनी! इस वसन्त-ऋतुमें सब ओरसे खिले हुए इन पलाश-वृक्षोंको तो देखो। ये अपने ही पुष्पोंसे पुष्पमालाधारी-से प्रतीत होते हैं और उन फूलोंकी अरुण प्रभाके कारण प्रज्वलित होते-से दिखायी देते हैं॥ ६ ॥

‘देखो, ये भिलावे और बेलके पेड़ अपने फूलों और फलोंके भारसे झुके हुए हैं। दूसरे मनुष्योंका यहाँतक आना सम्भव न होनेसे ये उनके द्वारा उपयोगमें नहीं लाये गये हैं; अतः निश्चय ही इन फलोंसे हम जीवननिर्वाह कर सकेंगे’॥ ७ ॥

(फिर लक्ष्मणसे कहा—) ‘लक्ष्मण! देखो, यहाँके एक-एक वृक्षमें मधुमक्खियोंद्वारा लगाये और पुष्ट किये गये मधुके छत्ते कैसे लटक रहे हैं। इन सबमें एक-एक द्रोण (लगभग सोलह सेर) मधु भरा हुआ है॥ ८ ॥

‘वनका यह भाग बड़ा ही रमणीय है, यहाँ फूलोंकी वर्षा-सी हो रही है और सारी भूमि पुष्पोंसे आच्छादित दिखायी देती है। इस वनप्रान्तमें यह चातक ‘पी कहाँ’ ‘पी कहाँ’ की रट लगा रहा है। उधर वह मोर बोल रहा है, मानो पपीहेकी बातका उत्तर दे रहा हो॥ ९॥

‘यह रहा चित्रकूट पर्वत—इसका शिखर बहुत ऊँचा है। झुंड-के-झुंड हाथी उसी ओर जा रहे हैं और वहाँ बहुत-से पक्षी चहक रहे हैं॥ १०॥

‘तात! जहाँकी भूमि समतल है और जो बहुत-से वृक्षोंसे भरा हुआ है, चित्रकूटके उस पवित्र काननमें हमलोग बड़े आनन्दसे विचरेंगे’॥ ११॥

सीताके साथ दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण पैदल ही यात्रा करते हुए यथासमय रमणीय एवं मनोरम पर्वत चित्रकूटपर जा पहुँचे॥ १२॥

वह पर्वत नाना प्रकारके पक्षियोंसे परिपूर्ण था। वहाँ फल-मूलोंकी बहुतायत थी और स्वादिष्ट जल पर्याप्त मात्रामें उपलब्ध होता था। उस रमणीय शैलके समीप जाकर श्रीरामने कहा—॥ १३॥

‘सौम्य! यह पर्वत बड़ा मनोहर है। नाना प्रकारके वृक्ष और लताएँ इसकी शोभा बढ़ाती हैं। यहाँ फल-मूल भी बहुत हैं; यह रमणीय तो है ही। मुझे जान पड़ता है कि यहाँ बड़े सुखसे जीवन-निर्वाह हो सकता है॥ १४॥

‘इस पर्वतपर बहुत-से महात्मा मुनि निवास करते हैं। तात! यही हमारा वासस्थान होनेयोग्य है। हम यहीं निवास करेंगे’॥ १५॥

ऐसा निश्चय करके सीता, श्रीराम और लक्ष्मणने हाथ जोड़कर महर्षि वाल्मीकिके आश्रममें प्रवेश किया और सबने उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया॥ १६॥

धर्मको जाननेवाले महर्षि उनके आगमनसे बहुत प्रसन्न हुए और ‘आपलोगोंका स्वागत है। आइये, बैठिये।’ ऐसा कहते हुए उन्होंने उनका आदर-सत्कार किया॥ १७॥

तदनन्तर महाबाहु भगवान् श्रीरामने महर्षिको अपना यथोचित परिचय दिया और लक्ष्मणसे कहा—॥ १८॥

‘सौम्य लक्ष्मण! तुम जंगलसे अच्छी-अच्छी मजबूत लकड़ियाँ ले आओ और रहनेके लिये एक कुटी तैयार करो। यहीं निवास करनेको मेरा जी चाहता है’॥ १९॥

श्रीरामकी यह बात सुनकर शत्रुदमन लक्ष्मण अनेक प्रकारके वृक्षोंकी डालियाँ काट लाये और उनके द्वारा एक पर्णशाला तैयार की॥ २० ॥

वह कुटी बाहर-भीतरसे लकड़ीकी ही दीवारसे सुस्थिर बनायी गयी थी और उसे ऊपरसे छा दिया गया था, जिससे वर्षा आदिका निवारण हो। वह देखनेमें बड़ी सुन्दर लगती थी। उसे तैयार हुई देखकर एकाग्रचित्त होकर अपनी बात सुननेवाले लक्ष्मणसे श्रीरामने इस प्रकार कहा— ॥ २१ ॥

‘सुमित्राकुमार! हम गजकन्दका गूदा लेकर उसीसे पर्णशालाके अधिष्ठाता देवताओंका पूजन करेंगे;१ क्योंकि दीर्घ जीवनकी इच्छा करनेवाले पुरुषोंको वास्तुशान्ति अवश्य करनी चाहिये॥ २२ ॥

‘कल्याणदर्शी लक्ष्मण! तुम ‘गजकन्द’ नामक कन्दको२ उखाड़कर या खोदकर शीघ्र यहाँ ले आओ; क्योंकि शास्त्रोक्त विधिक अनुष्ठान हमारे लिये अवश्य-कर्तव्य है। तुम धर्मका ही सदा चिन्तन किया करो’॥ २३ ॥

भाईकी इस बातको समझकर शत्रुवीरोंका वध करनेवाले लक्ष्मणने उनके कथनानुसार कार्य किया। तब श्रीरामने पुनः उनसे कहा—॥ २४ ॥

‘लक्ष्मण! इस गजकन्दको पकाओ। हम पर्णशालाके अधिष्ठाता देवताओंका पूजन करेंगे। जल्दी करो। यह सौम्यमुहूर्त है और यह दिन भी ‘ध्रुव’३ संज्ञक है (अतः इसीमें यह शुभ कार्य होना चाहिये)’॥ २५ ॥

प्रतापी सुमित्राकुमार लक्ष्मणने पवित्र और काले छिलकेवाले गजकन्दको उखाड़कर प्रज्वलित आगमें डाल दिया॥ २६ ॥

रक्तविकारका नाश करनेवाले४ उस गजकंदको भलीभाँति पका हुआ जानकर लक्ष्मणने पुरुषसिंह श्रीरघुनाथजीसे कहा—॥ २७ ॥

‘देवोपम तेजस्वी श्रीरघुनाथजी! यह काले छिलकेवाला गजकन्द, जो बिगड़े हुए सभी अङ्गोंको ठीक करनेवाला है,५ मेरे द्वारा सम्पूर्णतः पका दिया गया है। अब आप वास्तुदेवताओंका यजन कीजिये; क्योंकि आप इस कर्ममें कुशल हैं’॥ २८ ॥

सद्गुणसम्पन्न तथा जपकर्मके ज्ञाता श्रीरामचन्द्रजीने स्नान करके शौच-संतोषादि नियमोंके पालनपूर्वक संक्षेपसे उन सभी मन्त्रोंका पाठ एवं जप किया, जिनसे वास्तुयज्ञकी पूर्ति हो जाती है॥ २९ ॥

समस्त देवताओंका पूजन करके पवित्र भावसे श्रीरामने पर्णकुटीमें प्रवेश किया। उस समय अमिततेजस्वी श्रीरामके मनमें बड़ा आह्लाद हुआ॥ ३० ॥

तत्पश्चात् बलिवैश्वदेव कर्म, रुद्रयाग तथा वैष्णवयाग करके श्रीरामने वास्तुदोषकी शान्तिके लिये मङ्गलपाठ किया॥ ३१ ॥

नदीमें विधिपूर्वक स्नान करके न्यायतः गायत्री आदि मन्त्रोंका जप करनेके अनन्तर श्रीरामने पञ्चसूना आदि दोषोंकी शान्तिके लिये उत्तम बलिकर्म सम्पन्न किया॥ ३२ ॥

रघुनाथजीने अपनी छोटी-सी कुटीके अनुरूप ही वेदिस्थलों (आठ दिक्पालोंके लिये बलि-समर्पणके स्थानों), चैत्यों (गणेश आदिके स्थानों) तथा आयतनों (विष्णु आदि देवोंके स्थानों) का निर्माण एवं स्थापना की॥ ३३ ॥

वह मनोहर कुटी उपयुक्त स्थानपर बनी थी। उसे वृक्षोंके पत्तोंसे छाया गया था और उसके भीतर प्रचण्ड वायुसे बचनेका पूरा प्रबन्ध था। सीता, लक्ष्मण और श्रीराम सबने एक साथ उसमें निवासके लिये प्रवेश किया। ठीक वैसे ही, जैसे देवतालोग सुधर्मा सभामें प्रवेश करते हैं॥ ३४ ॥

चित्रकूट पर्वत बड़ा ही रमणीय था। वहाँ उत्तम तीर्थों

(तीर्थस्थान, सीढ़ी और घाटों) से सुशोभित माल्यवती (मन्दाकिनी) नदी बह रही थी, जिसका बहुत-से पशु-पक्षी सेवन करते थे। उस पर्वत और नदीका सांनिध्य पाकर श्रीरामचन्द्रजीको बड़ा हर्ष और आनन्द हुआ। वे नगरसे दूर वनमें आनेके कारण होनेवाले कष्टको भूल गये॥ ३५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें छप्पनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५६॥


१. यहाँ ‘ऐणेयं मांसम्’ का अर्थ है—गजकन्द नामक कन्द विशेषका गूदा। इस प्रसंगमें मांसपरक अर्थ नहीं लेना चाहिये; क्योंकि ऐसा अर्थ लेनेपर ‘हित्वा मुनिवदामिषम्’ (२। २०। २९), ‘फलानि मूलानि च भक्षयन् वने’ (२। ३४। ५९) तथा ‘धर्ममेवाचरिष्यामस्तत्र मूलफलाशनाः’ (२। ५४। १६) इत्यादि रूपसे की हुई श्रीरामकी प्रतिज्ञाओंसे विरोध पड़ेगा। इन वचनोंमें निरामिष रहने और फल-मूल खाकर धर्माचरण करनेकी ही बात कही गयी है। ‘रामो द्विर्नाभिभाषते’ (श्रीराम दो तरहकी बात नहीं कहते हैं, एक बार जो कह दिया, वह अटल है) इस कथनके अनुसार श्रीरामकी प्रतिज्ञा टलनेवाली नहीं है।
२. मदनपाल-निघण्टुके अनुसार ‘मृग’ का अर्थ गजकन्द है।
३. ‘उत्तरात्रयरोहिण्यो भास्करश्च ध्रुवं स्थिरम्।’ (मुहूर्तचिन्तामणि)
अर्थात् तीनों उत्तरा और रोहिणी नक्षत्र तथा रविवार—ये ‘ध्रुव’ एवं ‘स्थिर’ संज्ञक हैं। इसमें गृहशान्ति या वास्तुशान्ति आदि कार्य अच्छे माने गये हैं।

४. ‘छिन्नशोणितम्’ की व्युत्पत्ति इस प्रकार है—‘छिन्नं शोणितं रक्तविकाररूपं रोगजातं येन सः तम्।’ ‘गजकन्द’ रोगविकारका नाशक है’ यह वैद्यकमें प्रसिद्ध है। मदनपाल-निघण्टुके ‘षड्दोषादिकुष्ठहन्ता’ आदि वचनसे भी यह चर्मदोष तथा कुष्ठ आदि रक्तविकारका नाशक सिद्ध होता है।

५. ‘समस्ताङ्गः’ की व्युत्पत्ति यों समझनी चाहिये—‘सम्यग् भवन्ति अस्तानि अङ्गानि येन सः।’