श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
एक सौ तेईसवाँ सर्ग
एक सौ तेईसवाँ सर्ग
अयोध्याकी यात्रा करते समय श्रीरामका सीताजीको मार्गके स्थान दिखाना
श्रीरामकी आज्ञा पाकर वह हंसयुक्त उत्तम विमान महान् शब्द करता हुआ आकाशमें उड़ने लगा॥ १ ॥
उस समय रघुकुलनन्दन श्रीरामने सब ओर दृष्टि डालकर चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाली मिथिलेश-कुमारी सीतासे कहा— ॥ २ ॥
‘विदेहराजनन्दिनि! कैलास-शिखरके समान सुन्दर त्रिकूट पर्वतके विशाल शृङ्गपर बसी हुई विश्वकर्माकी बनायी लङ्कापुरीको देखो, कैसी सुन्दर दिखायी देती है!॥
‘इधर इस युद्धभूमिको देखो। यहाँ रक्त और मांसकी कीच जमी हुई है। सीते! इस युद्धक्षेत्रमें वानरों और राक्षसोंका महान् संहार हुआ है॥ ४ ॥
‘विशाललोचने! यह राक्षसराज रावण राखका ढेर बनकर सो रहा है। यह बड़ा भारी हिंसक था और इसे ब्रह्माजीने वरदान दे रखा था; किंतु तुम्हारे लिये मैंने इसका वध कर डाला है॥ ५ ॥
‘यहींपर मैंने कुम्भकर्णको मारा था, यहीं निशाचर प्रहस्त मारा गया है और इसी समराङ्गणमें वानरवीर हनुमान्ने धूम्राक्षका वध किया है॥ ६ ॥
‘यहीं महामना सुषेणने विद्युन्मालीको मारा था और इसी रणभूमिमें लक्ष्मणने रावणपुत्र इन्द्रजित्का संहार किया था॥ ७ ॥
‘यहीं अङ्गदने विकट नामक राक्षसका वध किया था। जिसकी ओर देखना भी कठिन था, वह विरूपाक्ष तथा महापार्श्व और महोदर भी यहीं मारे गये हैं॥ ८ ॥
‘अकम्पन तथा दूसरे बलवान् राक्षस यहीं मौतके घाट उतारे गये थे। त्रिशिरा, अतिकाय, देवान्तक और नरान्तक भी यहीं मार डाले गये थे॥ ९ ॥
‘युद्धोन्मत्त और मत्त—ये दोनों श्रेष्ठ राक्षस तथा बलवान् कुम्भ और निकुम्भ—ये कुम्भकर्णके दोनों पुत्र भी यहीं मृत्युको प्राप्त हुए॥ १० ॥
‘वज्रदंष्ट्र और दंष्ट्र आदि बहुत-से राक्षस यहीं कालके ग्रास बन गये। दुर्धर्ष वीर मकराक्षको इसी युद्धस्थलमें मैंने मार गिराया था॥ ११ ॥
‘अकम्पन और पराक्रमी शोणिताक्षका भी यहीं काम तमाम हुआ था। यूपाक्ष और प्रजङ्घ भी इसी महासमरमें मारे गये थे॥ १२ ॥
‘जिसकी ओर देखनेसे भी भय होता था, वह राक्षस विद्युज्जिह्व यहीं मौतका ग्रास बन गया। यज्ञशत्रु और महाबली सुप्तघ्नको भी यहीं मारा गया था॥ १३ ॥
‘सूर्यशत्रु और ब्रह्मशत्रु नामक निशाचरोंका भी यहीं वध किया गया था। यहीं रावणकी भार्या मन्दोदरीने उसके लिये विलाप किया था। उस समय वह अपनी हजारोंसे भी अधिक सौतोंसे घिरी हुई थी॥ १४ १/२ ॥
‘सुमुखि! यह समुद्रका तीर्थ दिखायी देता है, जहाँ समुद्रको पार करके हमलोगोंने वह रात बितायी थी॥ १५ १/२ ॥
‘विशाललोचने! खारे पानीके समुद्रमें यह मेरा बँधवाया हुआ पुल है, जो नलसेतुके नामसे विख्यात है। देवि! तुम्हारे लिये ही यह अत्यन्त दुष्कर सेतु बाँधा गया था॥ १६ १/२ ॥
‘विदेहनन्दिनि! इस अक्षोभ्य वरुणालय समुद्रको तो देखो, जो अपार-सा दिखायी देता है। शङ्ख और सीपियोंसे भरा हुआ यह सागर कैसी गर्जना कर रहा है॥ १७ १/२ ॥
‘मिथिलेशकुमारी! इस सुवर्णमय पर्वतराज हिरण्यनाभको तो देखो, जो हनुमान्जीको विश्राम देनेके लिये समुद्रकी जलराशिको चीरकर ऊपरको उठ गया था॥ १८ १/२ ॥
‘यह समुद्रके उदरमें ही विशाल टापू है, जहाँ मैंने सेनाका पड़ाव डाला था। यहीं पूर्वकालमें भगवान् महादेवने मुझपर कृपा की थी—सेतु बाँधनेसे पहले मेरे द्वारा स्थापित होकर वे यहाँ विराजमान हुए थे॥ १९ १/२ ॥
‘इस पुण्यस्थलमें विशालकाय समुद्रका तीर्थ दिखायी देता है, जो सेतुनिर्माणका मूलप्रदेश होनेके कारण सेतुबन्ध नामसे विख्यात तथा तीनों लोकोंद्वारा पूजित होगा॥ २० १/२ ॥
‘यह तीर्थ परम पवित्र और महान् पातकोंका नाश करनेवाला होगा। यहीं ये राक्षसराज विभीषण आकर मुझसे मिले थे॥ २१ १/२ ॥
‘सीते! यह विचित्र वनप्रान्तसे सुशोभित किष्किन्धा दिखायी देती है, जो वानरराज सुग्रीवकी सुरम्य नगरी है। यहीं मैंने वालीका वध किया था’॥ २२ १/२ ॥
तदनन्तर वालिपालित किष्किन्धापुरीका दर्शन करके सीताने प्रेमसे विह्वल हो श्रीरामसे विनयपूर्वक कहा— ॥ २३ १/२ ॥
‘महाराज! मैं सुग्रीवकी तारा आदि प्रिय भार्याओं तथा अन्य वानरेश्वरोंकी स्त्रियोंको साथ लेकर आपके साथ अपनी राजधानी अयोध्यामें चलना चाहती हूँ,’*॥
विदेहनन्दिनी सीताके ऐसा कहनेपर श्रीरघुनाथजीने कहा— ‘ऐसा ही हो।’ फिर किष्किन्धामें पहुँचनेपर उन्होंने विमान ठहराया और सुग्रीवकी ओर देखकर कहा— ॥ २६ १/२ ॥
‘वानरश्रेष्ठ! तुम समस्त वानरयूथपतियोंसे कहो कि वे सब लोग अपनी-अपनी स्त्रियोंको साथ लेकर सीताके साथ अयोध्या चलें तथा महाबली वानरराज सुग्रीव! तुम भी अपनी सब स्त्रियोंके साथ शीघ्र चलनेकी तैयारी करो, जिससे हम सब लोग जल्दी वहाँ पहुँचें’॥ २७-२८ १/२ ॥
अमित तेजस्वी श्रीरघुनाथजीके ऐसा कहनेपर उन सब वानरोंसे घिरे हुए श्रीमान् वानरराज सुग्रीवने शीघ्र ही अन्तःपुरमें प्रवेश करके तारासे भेंट की और इस प्रकार कहा— ॥ २९-३० ॥
‘प्रिये! तुम मिथिलेशकुमारी सीताका प्रिय करनेकी इच्छासे श्रीरघुनाथजीकी आज्ञाके अनुसार सभी प्रधान-प्रधान महात्मा वानरोंकी स्त्रियोंके साथ शीघ्र चलनेकी तैयारी करो। हमलोग इन वानर-पत्नियोंको साथ लेकर चलेंगे और उन्हें अयोध्यापुरी तथा महाराज दशरथकी सब रानियोंका दर्शन करायेंगे’॥ ३१-३२ ॥
सुग्रीवकी यह बात सुनकर सर्वाङ्गसुन्दरी ताराने समस्त वानर-पत्नियोंको बुलाकर कहा— ॥ ३३ ॥
‘सखियो! सुग्रीवकी आज्ञाके अनुसार तुम सब लोग अपने पतियों— समस्त वानरोंके साथ अयोध्या चलनेके लिये शीघ्र तैयार हो जाओ। अयोध्याका दर्शन करके तुमलोग मेरा भी प्रिय कार्य करोगी। वहाँ पुरवासियों तथा जनपदके लोगोंके साथ श्रीरामका जो अपने नगरमें प्रवेश होगा, वह उत्सव हमें देखनेको मिलेगा। हम वहाँ महाराज दशरथकी समस्त रानियोंके वैभवका भी दर्शन करेंगी’॥ ३४-३५ ॥
ताराकी यह आज्ञा पाकर सारी वानर-पत्नियोंने शृङ्गार करके उस विमानकी परिक्रमा की और सीताजीके दर्शनकी इच्छासे वे उसपर चढ़ गयीं॥ ३६ १/२ ॥
उन सबके साथ विमानको शीघ्र ही ऊपर उठा देख श्रीरघुनाथजीने ऋष्यमूकके निकट आनेपर पुनः विदेहनन्दिनीसे कहा— ॥ ३७ १/२ ॥
‘सीते! वह जो बिजलीसहित मेघके समान सुवर्णमय धातुओंसे युक्त श्रेष्ठ एवं महान् पर्वत दिखायी देता है, उसका नाम ऋष्यमूक है॥ ३८ १/२ ॥
‘सीते! यहीं मैं वानरराज सुग्रीवसे मिला था और मित्रता करनेके पश्चात् वालीका वध करनेके लिये प्रतिज्ञा की थी॥ ३९ १/२ ॥
‘यही वह पम्पा नामक पुष्करिणी है, जो तटवर्ती विचित्र काननोंसे सुशोभित हो रही है। यहाँ तुम्हारे वियोगसे अत्यन्त दुःखी होकर मैंने विलाप किया था॥
‘इसी पम्पाके तटपर मुझे धर्मपरायणा शबरीका दर्शन हुआ था। इधर वह स्थान है, जहाँ एक योजन लम्बी भुजावाले कबन्ध नामक असुरका मैंने वध किया था॥
‘विलासशालिनी सीते! जनस्थानमें वह शोभाशाली विशाल वृक्ष दिखायी दे रहा है, जहाँ बलवान् एवं महातेजस्वी पक्षिप्रवर जटायु तुम्हारी रक्षा करनेके कारण रावणके हाथसे मारे गये थे॥ ४२-४३ ॥
‘यह वह स्थान है, जहाँ मेरे सीधे जानेवाले बाणोंद्वारा खर मारा गया, दूषण धराशायी किया गया और महापराक्रमी त्रिशिराको भी मौतके घाट उतार दिया गया॥ ४४ ॥
‘वरवर्णिनि! शुभदर्शने! यह हमलोगोंका आश्रम है तथा वह विचित्र पर्णशाला दिखायी देती है, जहाँ आकर राक्षसराज रावणने बलपूर्वक तुम्हारा अपहरण किया था॥
‘यह स्वच्छ जलराशिसे सुशोभित मङ्गलमयी रमणीय गोदावरी नदी है तथा वह केलेके कुञ्जोंसे घिरा हुआ महर्षि अगस्त्यका आश्रम दिखायी देता है॥ ४६ १/२ ॥
‘यह महात्मा सुतीक्ष्णका दीप्तिमान् आश्रम है और विदेहनन्दिनि! वह शरभङ्ग मुनिका महान् आश्रम दिखायी देता है, जहाँ सहस्रनेत्रधारी पुरंदर इन्द्र पधारे थे॥
‘यह वह स्थान है, जहाँ मैंने विशालकाय विराधका वध किया था। देवि! तनुमध्यमे! ये वे तापस दिखायी देते हैं, जिनका दर्शन हमलोगोंने पहले किया था॥ ४९ ॥
‘सीते! इस तापसाश्रमपर ही सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी कुलपति अत्रि मुनि निवास करते हैं। यहीं तुमने धर्मपरायणा तपस्विनी अनसूयादेवीका दर्शन किया था॥
‘सुतनु! वह गिरिराज चित्रकूट प्रकाशित हो रहा है। वहीं कैकेयीकुमार भरत मुझे प्रसन्न करके लौटा लेनेके लिये आये थे॥ ५१ ॥
‘मिथिलेशकुमारी! यह विचित्र काननोंसे सुशोभित रमणीय यमुना नदी दिखायी देती है और यह शोभाशाली भरद्वाजाश्रम दृष्टिगोचर हो रहा है॥ ५२ ॥
‘ये पुण्यसलिला त्रिपथगा गङ्गा नदी दीख रही हैं, जिनके तटपर नाना प्रकारके पक्षी कलरव करते हैं और द्विजवृन्द पुण्यकर्मोंमें रत हैं। इनके तटवर्ती वनके वृक्ष सुन्दर फूलोंसे भरे हुए हैं॥ ५३ ॥
‘यह शृङ्गवेरपुर है, जहाँ मेरा मित्र गुह रहता है। सीते! यह यूपमालाओंसे अलंकृत सरयू दिखायी देती है, जिसके तटपर मेरे पिताजीकी राजधानी है। विदेहनन्दिनि! तुम वनवासके बाद फिर लौटकर अयोध्याको आयी हो। इसलिये इस पुरीको प्रणाम करो’॥ ५४-५५ ॥
तब विभीषणसहित वे सब राक्षस और वानर अत्यन्त हर्षसे उल्लसित हो उछल-उछलकर उस पुरीका दर्शन करने लगे॥ ५६ ॥
तत्पश्चात् वे वानर और राक्षस श्वेत अट्टालिकाओंसे अलंकृत और विशाल भवनोंसे विभूषित अयोध्यापुरीको, जो हाथी-घोड़ोंसे भरी थी और देवराज इन्द्रकी अमरावतीपुरीके समान शोभित होती थी, देखने लगे॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ तेईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १२३ ॥
* सीताजीने जो यहाँ वानरोंकी स्त्रियोंको साथ ले चलनेकी इच्छा प्रकट की है, इसके लिये किष्किन्धामें विमानको रोककर सबको एक दिन रुकना पड़ा। ऐसा रामायण-तिलककारका मत है। उनके कथनानुसार आश्विन शुक्ला चतुर्थीको किष्किन्धामें रहकर पञ्चमीको वहाँसे प्रस्थान किया गया था। भगवान् रामने वहाँ रुककर उसी दिन अङ्गदका किष्किन्धाके युवराजपदपर अभिषेक करवाया था, जैसा कि महाभारत, वनपर्व अध्याय २९१ श्लोक ५८-५९ से सूचित होता है।