श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
एक सौ इक्कीसवाँ सर्ग
एक सौ इक्कीसवाँ सर्ग
श्रीरामका अयोध्या जानेके लिये उद्यत होना और उनकी आज्ञासे विभीषणका पुष्पकविमानको मँगाना
उस रात्रिको विश्राम करके जब शत्रुसूदन श्रीराम दूसरे दिन प्रातःकाल सुखपूर्वक उठे, तब कुशल-प्रश्नके पश्चात् विभीषणने हाथ जोड़कर कहा—॥ १ ॥
‘रघुनन्दन! स्नानके लिये जल, अङ्गराग, वस्त्र, आभूषण, चन्दन और भाँति-भाँतिकी दिव्य मालाएँ आपकी सेवामें उपस्थित हैं॥ २ ॥
‘रघुवीर! शृङ्गारकलाको जाननेवाली ये कमलनयनी नारियाँ भी सेवाके लिये प्रस्तुत हैं, जो आपको विधिपूर्वक स्नान करायेंगी’॥ ३ ॥
विभीषणके ऐसा कहनेपर श्रीरामचन्द्रजीने उनसे कहा—‘मित्र! तुम सुग्रीव आदि वानरवीरोंसे स्नानके लिये अनुरोध करो॥ ४ ॥
‘मेरे लिये तो इस समय सत्यका आश्रय लेनेवाले धर्मात्मा महाबाहु भरत बहुत कष्ट सह रहे हैं। वे सुकुमार हैं और सुख पानेके योग्य हैं॥ ५ ॥
‘उन धर्मपरायण कैकेयीकुमार भरतसे मिले बिना न तो मुझे स्नान अच्छा लगता है, न वस्त्र और आभूषणोंको धारण करना ही॥ ६ ॥
‘अब तो तुम इस बातकी ओर ध्यान दो कि हम किस तरह जल्दी-से-जल्दी अयोध्यापुरीको लौट सकेंगे; क्योंकि वहाँतक पैदल यात्रा करनेवालेके लिये यह मार्ग बहुत ही दुर्गम है’॥ ७ ॥
उनके ऐसा कहनेपर विभीषणने श्रीरामचन्द्रजीको इस प्रकार उत्तर दिया—‘राजकुमार! आप इसके लिये चिन्तित न हों। मैं एक ही दिनमें आपको उस पुरीमें पहुँचा दूँगा॥ ८ ॥
‘आपका कल्याण हो। मेरे यहाँ मेरे बड़े भार्ऽइ कुबेरका सूर्यतुल्य तेजस्वी पुष्पकविमान मौजूद है, जिसे महाबली रावणने संग्राममें कुबेरको हराकर छीन लिया था। अतुल पराक्रमी श्रीराम! वह इच्छानुसार चलनेवाला, दिव्य एवं उत्तम विमान मैंने यहाँ आपहीके लिये रख छोड़ा है॥ ९-१० ॥
‘मेघ-जैसा दिखायी देनेवाला वह दिव्य विमान यहाँ विद्यमान है, जिसके द्वारा निश्चिन्त होकर आप अयोध्यापुरीको जा सकेंगे॥ ११ ॥
‘श्रीराम! यदि मुझे आप अपना कृपापात्र समझते हैं, मुझमें कुछ गुण देखते या मानते हैं और मेरे प्रति आपका सौहार्द है तो अभी भाई लक्ष्मण तथा पत्नी सीताजीके साथ कुछ दिन यहीं विराजिये। मैं सम्पूर्ण मनोवाञ्छित वस्तुओंद्वारा आपका सत्कार करूँगा। मेरे उस सत्कारको ग्रहण कर लेनेके पश्चात् अयोध्याको पधारियेगा॥ १२-१३ ॥
‘रघुनन्दन! मैं प्रसन्नतापूर्वक आपका सत्कार करना चाहता हूँ। मेरे द्वारा प्रस्तुत किये गये उस सत्कारको आप सुहृदों तथा सेनाओंके साथ ग्रहण करें॥ १४ ॥
‘रघुवीर! मैं केवल प्रेम, सम्मान और सौहार्दके कारण ही आपसे यह प्रार्थना कर रहा हूँ। आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ। मैं आपका सेवक हूँ। इसलिये आपसे विनय करता हूँ, आपको आज्ञा नहीं देता हूँ’॥ १५ ॥
जब विभीषणने ऐसी बात कही, तब श्रीराम समस्त राक्षसों और वानरोंके सुनते हुए ही उनसे बोले— ॥ १६ ॥
‘वीर! मेरे परम सुहृद् और उत्तम सचिव बनकर तुमने सब प्रकारकी चेष्टाओंद्वारा मेरा सम्मान और पूजन किया है॥ १७ ॥
‘राक्षसेश्वर! तुम्हारी इस बातको मैं निश्चय ही अस्वीकार नहीं कर सकता हूँ; परंतु इस समय मेरा मन अपने उन भाई भरतको देखनेके लिये उतावला हो उठा है, जो मुझे लौटा ले जानेके लिये चित्रकूटतक आये थे और मेरे चरणोंमें सिर झुकाकर याचना करनेपर भी जिनकी बात मैंने नहीं मानी थी॥ १८-१९ ॥
‘उनके सिवा माता कौसल्या, सुमित्रा, यशस्विनी कैकेयी, मित्रवर गुह और नगर एवं जनपदके लोगोंको देखनेके लिये भी मुझे बड़ी उत्कण्ठा हो रही है॥ २० ॥
‘सौम्य विभीषण! अब तो तुम मुझे जानेकी ही अनुमति दो। मैं तुम्हारे द्वारा बहुत सम्मानित हो चुका हूँ। सखे! मेरे इस हठके कारण मुझपर क्रोध न करना। इसके लिये मैं तुमसे बार-बार प्रार्थना करता हूँ॥ २१ ॥
‘राक्षसराज! अब शीघ्र मेरे लिये पुष्पकविमानको यहाँ मँगाओ। जब मेरा यहाँ कार्य समाप्त हो गया, तब यहाँ ठहरना मेरे लिये कैसे ठीक हो सकता है?’॥ २२ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर राक्षसराज विभीषणने बड़ी उतावलीके साथ उस सूर्यतुल्य तेजस्वी विमानका आवाहन किया॥ २३ ॥
उस विमानका एक-एक अङ्ग सोनेसे जड़ा हुआ था, जिससे उसकी विचित्र शोभा होती थी। उसके भीतर वैदूर्य मणि (नीलम)-की वेदियाँ थीं, जहाँ-तहाँ गुप्त गृह बने हुए थे और वह सब ओर चाँदीके समान चमकीला था॥ २४ ॥
वह श्वेत-पीत वर्णवाली पताकाओं तथा ध्वजोंसे अलंकृत था। उसमें सोनेके कमलोंसे सुसज्जित स्वर्णमयी अट्टालिकाएँ थीं, जो उस विमानकी शोभा बढ़ाती थीं॥
सारा विमान छोटी-छोटी घंटियोंसे युक्त झालरोंसे व्याप्त था। उसमें मोती और मणियोंकी खिड़कियाँ लगी थीं। सब ओर घंटे बँधे थे, जिससे मधुर ध्वनि होती रहती थी॥ २६ ॥
वह विश्वकर्माका बनाया हुआ विमान सुमेरु-शिखरके समान ऊँचा तथा मोती और चाँदीसे सुसज्जित बड़े-बड़े कमरोंसे विभूषित था॥ २७ ॥
उसकी फर्श विचित्र स्फटिकमणिसे जड़ी हुई थी। उसमें नीलमके बहुमूल्य सिंहासन थे, जिनपर महामूल्यवान् बिस्तर बिछे हुए थे॥ २८ ॥
उसका मनके समान वेग था और उसकी गति कहीं रुकती नहीं थी। वह विमान सेवामें उपस्थित हुआ। विभीषण श्रीरामको उसके आनेकी सूचना देकर वहाँ खड़े हो गये॥ २९ ॥
पर्वतके समान ऊँचे और इच्छानुसार चलनेवाले उस पुष्पकविमानको तत्काल उपस्थित देख लक्ष्मणसहित उदारचेता भगवान् श्रीरामको बड़ा विस्मय हुआ॥ ३० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ इक्कीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १२१ ॥