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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

इक्यावनवाँ सर्ग

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इक्यावनवाँ सर्ग

श्रीरामके बन्धनमुक्त होनेका पता पाकर चिन्तित हुए रावणका धूम्राक्षको युद्धके लिये भेजना और सेनासहित धूम्राक्षका नगरसे बाहर आना

उस समय भीषण गर्जना करते हुए महाबली वानरोंका वह तुमुलनाद राक्षसोंसहित रावणने सुना॥

मन्त्रियोंके बीचमें बैठे हुए रावणने जब वह स्निग्ध गम्भीर घोष, वह उच्चस्वरसे किया हुआ सिंहनाद सुना, तब वह इस प्रकार बोला— ॥ २ ॥

‘इस समय गर्जते हुए मेघोंके समान जो अधिक हर्षमें भरे हुए बहुसंख्यक वानरोंका यह महान् कोलाहल प्रकट हो रहा है, इससे स्पष्ट जान पड़ता है कि इन सबको बड़ा भारी हर्ष प्राप्त हुआ है; इसमें संशय नहीं है। तभी इस तरह बारम्बार की गयी गर्जनाओंसे यह खारे पानीका समुद्र विक्षुब्ध हो उठा है॥ ३-४ ॥

‘परंतु वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण तो तीखे बाणोंसे बँधे हुए हैं। इधर यह महान् हर्षनाद भी हो रहा है, जो मेरे मनमें शङ्का-सी उत्पन्न कर रहा है’॥ ५ ॥

मन्त्रियोंसे ऐसा कहकर राक्षसराज रावणने अपने पास ही खड़े हुए राक्षसोंसे कहा— ॥ ६ ॥

‘तुमलोग शीघ्र ही जाकर इस बातका पता लगाओ कि शोकका अवसर उपस्थित होनेपर भी इन सब वानरोंके हर्षका कौन-सा कारण प्रकट हो गया है’॥ ७ ॥

रावणके इस प्रकार आदेश देनेपर वे राक्षस घबराये हुए गये और परकोटेपर चढ़कर महात्मा सुग्रीवके द्वारा पालित वानरसेनाकी ओर देखने लगे॥ ८ ॥

जब उन्हें मालूम हुआ कि महाभाग श्रीराम और लक्ष्मण उस अत्यन्त भयंकर नागरूपी बाणोंके बन्धनसे मुक्त होकर उठ गये हैं, तब समस्त राक्षसोंको बड़ा दुःख हुआ॥ ९ ॥

उनका हृदय भयसे थर्रा उठा। वे सब भयानक राक्षस परकोटेसे उतरकर उदास हो राक्षसराज रावणकी सेवामें उपस्थित हुए॥ १० ॥

वे बातचीतकी कलामें कुशल थे। उनके मुखपर दीनता छा रही थी। उन निशाचरोंने वह सारा अप्रिय समाचार रावणको यथावत् रूपसे बताया॥ ११ ॥

(वे बोले—) 'महाराज! कुमार इन्द्रजित्ने जिन राम और लक्ष्मण दोनों भाइयोंको युद्धस्थलमें नागरूपी बाणोंके बन्धनसे बाँधकर हाथ हिलानेमें भी असमर्थ कर दिया था, वे गजराजके समान पराक्रमी दोनों वीर जैसे हाथी रस्सेको तोड़कर स्वतन्त्र हो जायँ, उसी तरह बाणबन्धनसे मुक्त हो समराङ्गणमें खड़े दिखायी देते हैं'॥ १२-१३ ॥

उनका वह वचन सुनकर महाबली राक्षसराज रावण चिन्ता तथा शोकके वशीभूत हो गया और उसका चेहरा उतर गया॥ १४ ॥

(वह मन-ही-मन सोचने लगा—) 'जो विषधर सर्पोंके समान भयंकर, वरदानमें प्राप्त हुए और अमोघ थे तथा जिनका तेज सूर्यके समान था, उन्हींके द्वारा युद्धस्थलमें इन्द्रजित्ने जिन्हें बाँध दिया था, वे मेरे दोनों शत्रु यदि उस अस्त्रबन्धनमें पड़कर भी उससे छूट गये, तब तो अब मैं अपनी सारी सेनाको संशयापन्न ही देखता हूँ॥ १५-१६ ॥

'जिन्होंने पहले युद्धस्थलमें मेरे शत्रुओंके प्राण ले लिये थे, वे अग्नितुल्य तेजस्वी बाण निश्चय ही आज निष्फल हो गये'॥ १७ ॥

ऐसा कहकर अत्यन्त कुपित हुआ रावण फुफकारते हुए सर्पके समान जोर-जोरसे साँस लेने लगा और राक्षसोंके बीचमें धूम्राक्ष नामक निशाचरसे बोला— ॥

'भयानक पराक्रमी वीर! तुम राक्षसोंकी बहुत बड़ी सेना साथ लेकर वानरोंसहित रामका वध करनेके लिये शीघ्र जाओ'॥ १९ ॥

बुद्धिमान् राक्षसराजके इस प्रकार आज्ञा देनेपर धूम्राक्षने उसकी परिक्रमा की तथा वह तुरंत राजभवनसे बाहर निकल गया॥ २० ॥

रावणके गृहद्वारपर पहुँचकर उसने सेनापतिसे कहा—'सेनाको उतावलीके साथ शीघ्र तैयार करो। युद्धकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको विलम्ब करनेसे क्या लाभ?'॥ २१ ॥

धूम्राक्षकी बात सुनकर रावणकी आज्ञाके अनुसार सेनापतिने जिनके पीछे बहुत बड़ी सेना थी, भारी संख्यामें सैनिकोंको तैयार कर दिया॥ २२ ॥

वे भयानक रूपधारी बलवान् निशाचर प्रास और शक्ति आदि अस्त्रोंमें घण्टे बाँधकर हर्ष और उत्साहसे युक्त हो जोर-जोरसे गर्जते हुए आये और धूम्राक्षको घेरकर खड़े हो गये॥ २३ ॥

उनके हाथोंमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र थे। कुछ लोगोंने अपने हाथोंमें शूल और मुद्गर ले रखे थे। गदा-पट्टिश, लोहदण्ड, मूसल, परिघ, भिन्दिपाल, भाले, पाश और फरसे लिये बहुतेरे

भयानक राक्षस युद्धके लिये निकले। वे सभी मेघोंके समान गम्भीर गर्जना करते थे॥

कितने ही निशाचर ध्वजोंसे अलंकृत तथा सोनेकी जालीसे आच्छादित रथोंद्वारा युद्धके लिये बाहर आये। वे सब-के-सब कवच धारण किये हुए थे। कितने ही श्रेष्ठ राक्षस नाना प्रकारके मुखवाले गधों, परम शीघ्रगामी घोड़ों तथा मदमत्त हाथियोंपर सवार हो दुर्जय व्याघ्रोंके समान युद्धके लिये नगरसे बाहर निकले॥ २६-२७ ॥

धूम्राक्षके रथमें सोनेके आभूषणोंसे विभूषित ऐसे गधे नधे हुए थे जिनके मुँह भेड़ियों और सिंहोंके समान थे। गधेकी भाँति रेंकनेवाला धूम्राक्ष उस दिव्य रथपर सवार हुआ॥ २८ ॥

इस प्रकार बहुत-से राक्षसोंके साथ महापराक्रमी धूम्राक्ष हँसता हुआ पश्चिम द्वारसे, जहाँ हनुमान्जी शत्रु्का सामना करनेके लिये खड़े थे, युद्धके लिये निकला॥ २९ ॥

गदहोंसे जुते और गदहोंकी-सी आवाज करनेवाले उस श्रेष्ठ रथपर बैठकर युद्धके लिये जाते हुए महाघोर राक्षस धूम्राक्षको, जो बड़ा भयानक दिखायी देता था, आकाशचारी क्रूर पक्षियोंने अशुभसूचक बोली बोलकर आगे बढ़नेसे मना किया॥ ३० १/२ ॥

उसके रथके ऊपरी भागपर एक महाभयानक गीध आ गिरा। ध्वजके अग्रभागपर बहुत-से मुर्दाखोर पक्षी परस्पर गुँथे हुए-से गिर पड़े। उसी समय एक बहुत बड़ा श्वेत कबन्ध (धड़) खूनसे लथपथ होकर पृथ्वीपर गिरा॥ ३१-३२ ॥

वह कबन्ध बड़े जोर-जोरसे चीत्कार करता हुआ धूम्राक्षके पास ही गिरा था। बादल रक्तकी वर्षा करने लगे और पृथ्वी डोलने लगी॥ ३३ ॥

वायु प्रतिकूल दिशाकी ओरसे बहने लगी। उसमें वज्रपातके समान गड़गड़ाहट पैदा होती थी। सम्पूर्ण दिशाएँ अन्धकारसे आच्छन्न हो जानेके कारण प्रकाशित नहीं होती थीं॥ ३४ ॥

राक्षसोंके लिये भय देनेवाले वहाँ प्रकट हुए उन भयंकर उत्पातोंको देखकर धूम्राक्ष व्यथित हो उठा और उसके आगे चलनेवाले सभी राक्षस अचेत-से हो गये॥

इस प्रकार बहुसंख्यक निशाचरोंसे घिरे हुए और युद्धके लिये उत्सुक रहनेवाले महाभयंकर बलवान् राक्षस धूम्राक्षने नगरसे बाहर निकलकर श्रीरामचन्द्रजीके बाहुबलसे सुरक्षित एवं प्रलयकालिक समुद्रके समान विशाल वानरी सेनाको देखा॥ ३६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें इक्यावनवाँ सर्ग पूरा
हुआ॥ ५१ ॥