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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

इकतीसवाँ सर्ग

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इकतीसवाँ सर्ग

रावणका माहिष्मतीपुरीमें जाना और वहाँके राजा अर्जुनको न पाकर मन्त्रियोंसहित उसका विन्ध्यगिरिके समीप नर्मदामें नहाकर भगवान् शिवकी आराधना करना

तदनन्तर महातेजस्वी श्रीरामने मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यको प्रणाम करके पुनः विस्मयपूर्वक पूछा—॥ १ ॥

‘भगवन्! द्विजश्रेष्ठ! जब क्रूर निशाचर रावण पृथ्वीपर विजय करता घूम रहा था, उस समय क्या यहाँके सभी लोग शौर्यसम्बन्धी गुणोंसे शून्य ही थे?॥

‘क्या उन दिनों यहाँ कोऽइ भी क्षत्रिय-नरेश अथवा क्षत्रियेतर राजा अधिक बलवान् नहीं था, जिससे इस भूतलपर पहुँचकर राक्षसराज रावणको पराजित या अपमानित होना नहीं पड़ा॥ ३ ॥

‘अथवा उस समयके सभी राजा पराक्रमशून्य तथा शस्त्रज्ञानसे हीन थे, जिसके कारण उन बहुसंख्यक श्रेष्ठ नरपालोंको रावणसे परास्त होना पड़ा’॥ ४ ॥

श्रीरामचन्द्रजीकी यह बात सुनकर भगवान् अगस्त्य-मुनि ठठाकर हँस पड़े और जैसे ब्रह्माजी महादेवजीसे कोऽइ बात कहते हों, इसी तरह वे श्रीरामचन्द्रजीसे बोले—॥

‘पृथ्वीनाथ! भूपालशिरोमणे! श्रीराम! इसी प्रकार सब राजाओंको सताता और पराजित करता हुआ रावण इस पृथ्वीपर विचरने लगा॥ ६ ॥

‘घूमते-घूमते वह स्वर्गपुरी अमरावतीके समान सुशोभित होनेवाली माहिष्मती नामक नगरीमें जा पहुँचा, जहाँ अग्निदेव सदा विद्यमान रहते थे॥ ७ ॥

‘उन अग्निदेवके प्रभावसे वहाँ अग्निके ही समान तेजस्वी अर्जुन नामक राजा राज्य करता था, जिसके राज्यकालमें कुशास्तरणसे युक्त अग्निकुण्डमें सदा अग्निदेवता निवास करते थे॥ ८ ॥

‘जिस दिन रावण वहाँ पहुँचा, उसी दिन बलवान् हैहयराज राजा अर्जुन अपनी स्त्रियोंके साथ नर्मदा नदीमें जल-क्रीड़ा करनेके लिये चला गया था॥ ९ ॥

‘उसी दिन रावण माहिष्मतीपुरीमें आया। वहाँ आकर राक्षसराज रावणने राजाके मन्त्रियोंसे पूछा—॥ १० ॥

‘मन्त्रियो! जल्दी और ठीक-ठीक बताओ, राजा अर्जुन कहाँ हैं? मैं रावण हूँ और तुम्हारे महाराजसे युद्ध करनेके लिये आया हूँ॥ ११ ॥

‘तुमलोग पहले ही जाकर उन्हें मेरे आगमनकी सूचना दे दो।’ रावणके ऐसा कहनेपर राजाके विद्वान् मन्त्रियोंने राक्षसराजको बताया कि हमारे महाराज इस समय राजधानीमें नहीं हैं॥ १२ १/२ ॥

‘पुरवासियोंके मुखसे राजा अर्जुनके बाहर जानेकी बात सुनकर विश्रवाका पुत्र रावण वहाँसे हटकर हिमालयके समान विशाल विन्ध्यगिरिपर आया॥ १३ १/२ ॥

‘वह इतना ऊँचा था कि उसका शिखर बादलोंमें समाया हुआ-सा जान पड़ता था तथा वह पर्वत पृथ्वी फोड़कर ऊपरको उठा हुआ-सा प्रतीत होता था। विन्ध्यके गगनचुम्बी शिखर आकाशमें रेखा खींचते-से जान पड़ते थे। रावणने उस महान् शैलको देखा। वह अपने सहस्रों शृङ्गोंसे सुशोभित हो रहा था और उसकी कन्दराओंमें सिंह निवास करते थे॥ १४-१५ ॥

‘उसके सर्वोच्च शिखरके तटसे जो शीतल जलकी धाराएँ गिर रही थीं, उनके द्वारा वह पर्वत अट्टहास करता-सा प्रतीत होता था। देवता, दानव, गन्धर्व और किन्नर अपनी-अपनी स्त्रियों और अप्सराओंके साथ वहाँ क्रीड़ा कर रहे थे। वह अत्यन्त ऊँचा पर्वत अपनी सुरम्य सुषमासे स्वर्गके समान सुशोभित हो रहा था॥ १६ १/२ ॥

‘स्फटिकके समान निर्मल जलका स्रोत बहानेवाली नदियोंके कारण वह विन्ध्यगिरि चञ्चल जिह्वावाले फनोंसे उपलक्षित शेषनागके समान स्थित था। अधिक ऊँचाईके कारण वह ऊर्ध्वलोकको जाता-सा जान पड़ता था। हिमालयके समान विशाल एवं विस्तृत विन्ध्यगिरि बहुत-सी गुफाओंसे युक्त दिखायी देता था॥ १७-१८ ॥

‘विन्ध्याचलकी शोभाको देखता हुआ रावण पुण्यसलिला नर्मदा नदीके तटपर गया, जिसमें शिलाखण्डोंसे युक्त चञ्चल जल प्रवाहित हो रहा था। वह नदी पश्चिम समुद्रकी ओर चली जा रही थी। धूपसे तपे हुए प्यासे भैंसे, हिरन, सिंह, व्याघ्र, रीछ और गजराज उसके जलाशयको विक्षुब्ध कर रहे थे॥ १९-२० ॥

‘सदा मतवाले होकर कलरव करनेवाले चक्रवाक, कारण्डव, हंस, जलकुक्कुट और सारस आदि जलपक्षी नर्मदाकी जल राशिपर छा रहे थे॥ २१ ॥

‘सरिताओंमें श्रेष्ठ नर्मदा परम सुन्दरी प्रियतमा नारीके समान प्रतीत होती थी। खिले हुए तटवर्ती वृक्ष मानो उसके आभूषण थे। चक्रवाकके जोड़े उसके दोनों स्तनोंका स्थान ले रहे थे। ऊँचे और विस्तृत पुलिन नितम्बके समान जान पड़ते थे। हंसोंकी पंक्ति मोतियोंकी बनी हुई मेखला (करधनी)-के समान शोभा दे रही थी। पुष्पोंके पराग ही अङ्गराग बनकर उसके अङ्ग-अङ्गमें अनुलिप्त हो रहे थे। जलका उज्ज्वल फेन ही उसकी स्वच्छ, श्वेत साड़ीका काम दे रहा था। जलमें गोता लगाना ही उसका सुखद संस्पर्श था और खिले हुए कमल ही उसके सुन्दर नेत्र जान पड़ते थे। राक्षसशिरोमणि दशमुख रावणने शीघ्र ही पुष्पकविमानसे उतरकर नर्मदाके जलमें डुबकी लगायी और बाहर निकलकर वह नाना मुनियोंसे सेवित उसके रमणीय तटपर अपने मन्त्रियोंके साथ बैठा॥ २२—२५ ॥

‘ये साक्षात् गङ्गा हैं’ ऐसा कहकर दशानन रावणने नर्मदाकी प्रशंसा की और उसके दर्शनसे हर्षका अनुभव किया॥ २६ ॥

‘फिर वहाँ उसने शुक, सारण तथा अन्य मन्त्रियोंसे लीलापूर्वक कहा—‘ये सूर्यदेव अपनी सहस्रों किरणोंसे सम्पूर्ण जगत्‌को मानो काञ्चनमय बनाकर प्रचण्ड ताप देते हुए इस समय आकाशके मध्यभागमें विराज रहे हैं॥

‘किंतु मुझे यहाँ बैठा जानकर ही चन्द्रमाके समान शीतल हो गये हैं। मेरे ही भयसे वायु भी नर्मदाके जलसे शीतल, सुगन्धित और श्रमनाशक होकर बड़ी सावधानीके साथ मन्दगतिसे बह रही है॥ २८-२९ ॥

‘सरिताओंमें श्रेष्ठ यह नर्मदा भी क्रीड़ारस एवं प्रीतिको बढ़ा रही है। इसकी लहरोंमें मगर, मत्स्य और जलपक्षी खेल रहे हैं और यह भयभीत नारीके समान स्थित है॥ ३० ॥

‘तुमलोग युद्धस्थलमें इन्द्रतुल्य पराक्रमी नरेशोंद्वारा अस्त्र-शस्त्रोंसे घायल कर दिये गये हो और रक्तसे इस प्रकार नहा उठे हो कि तुम्हारे अङ्गोंमें लालचन्दन रसका लेप-सा लगा हुआ जान पड़ता है॥ ३१ ॥

‘अतः तुम सब-के-सब सुख देनेवाली इस मङ्गलकारिणी नर्मदा नदीमें स्नान करो। ठीक उसी तरह, जैसे सार्वभौम आदि महान् दिग्गज मतवाले होकर गङ्गामें अवगाहन करते हैं॥ ३२ ॥

‘इस महानदीमें स्नान करके तुम पाप-तापसे मुक्त हो जाओगे। मैं भी आज शरद्-ऋतुके चन्द्रमाकी भाँति उज्ज्वल नर्मदा-तटपर धीरे-धीरे जटाजूटधारी महादेवजीको फूलोंका उपहार समर्पित करूँगा’॥ ३३ १/२ ॥

‘रावणके ऐसा कहनेपर प्रहस्त, शुक, सारण, महोदर और धूम्राक्षने नर्मदामें स्नान किया॥ ३४ १/२ ॥

‘राक्षसराजकी सेनाके हाथियोंने नर्मदा नदीमें उतरकर उसके जलको मथ डाला, मानो वामन, अञ्जन, पद्म आदि बड़े-बड़े दिग्गजोंने गङ्गाजीके जलको विक्षुब्ध कर डाला हो॥ ३५ १/२ ॥

‘तदनन्तर वे महाबली राक्षस गङ्गामें स्नान करके बाहर आये और रावणके शिवपूजनके लिये फूल जुटाने लगे॥ ३६ १/२ ॥

‘श्वेत बादलोंके समान शुभ्र एवं मनोरम नर्मदा-पुलिनपर उन राक्षसोंने दो ही घड़ीमें फूलोंका पहाड़-जैसा ढेर लगा दिया॥ ३७ १/२ ॥

‘इस प्रकार पुष्पोंका संचय हो जानेपर राक्षसराज रावण स्वयं स्नान करनेके लिये नर्मदा नदीमें उतरा, मानो कोई महान् गजराज गङ्गामें अवगाहन करनेके लिये घुसा हो॥ ३८ १/२ ॥

‘वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके रावणने परम उत्तम जपनीय मन्त्रका जप किया। इसके बाद वह नर्मदाके जलसे बाहर निकला॥ ३९ १/२ ॥

‘फिर भीगे कपड़ेको उतारकर उसने श्वेत वस्त्र धारण किया। इसके बाद वह हाथ जोड़े महादेवजीकी पूजाके लिये चला। उस समय और सब राक्षस भी उसके पीछे हो लिये, मानो मूर्तिमान् पर्वत उसकी गतिके अधीन हो खिंचे चले जा रहे हों॥ ४०-४१ ॥

‘राक्षसराज रावण जहाँ-जहाँ भी जाता था, वहाँ-वहाँ एक सुवर्णमय शिवलिङ्ग अपने साथ लिये जाता था॥ ४२ ॥

‘रावणने बालूकी वेदीपर उस शिवलिङ्गको स्थापित कर दिया और चन्दन तथा अमृतके समान सुगन्धवाले पुष्पोंसे उसका पूजन किया॥ ४३ ॥

‘जो अपने ललाटमें चन्द्रकिरणोंको आभूषणरूपसे धारण करते हैं, सत्पुरुषोंकी पीड़ा हर लेते हैं तथा भक्तोंको मनोवाञ्छित वर प्रदान करते हैं, उन श्रेष्ठ एवं उत्कृष्ट देवता भगवान् शङ्करका भलीभाँति पूजन करके वह निशाचर उनके सामने गाने और हाथ फैलाकर नाचने लगा॥ ४४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें इकतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३१ ॥