सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

इकतालीसवाँ सर्ग

⬅ विषय-सूची (TOC)

इकतालीसवाँ सर्ग

श्रीरामका सुग्रीवको दुःसाहससे रोकना, लङ्काके चारों द्वारोंपर वानरसैनिकोंकी नियुक्ति,
रामदूत अङ्गदका रावणके महलमें पराक्रम तथा वानरोंके आक्रमणसे राक्षसोंको भय

सुग्रीवके शरीरमें युद्धके चिह्न देखकर लक्ष्मणके बड़े भाऽइ श्रीरामने उन्हें हृदयसे लगा लिया और इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥

‘सुग्रीव! तुमने मुझसे सलाह लिये बिना ही यह बड़े साहसका काम कर डाला। राजालोग ऐसे दुःसाहसपूर्ण कार्य नहीं किया करते हैं॥ २ ॥

‘साहसप्रिय वीर! तुमने मुझको, इस वानरसेनाको और विभीषणको भी संशयमें डालकर जो यह साहसपूर्ण कार्य किया है, इससे हमें बड़ा कष्ट हुआ॥ ३ ॥

‘शत्रुओंका दमन करनेवाले वीर! अब फिर तुम ऐसा दुःसाहस न करना। शत्रुसूदन महाबाहो! यदि तुम्हें कुछ हो गया तो मैं, सीता, भरत, लक्ष्मण, छोटे भाऽइ शत्रुघ्न तथा अपने इस शरीरको भी लेकर क्या करूँगा?॥

‘महेन्द्र और वरुणके समान महाबली! यद्यपि मैं तुम्हारे बल-पराक्रमको जानता था, तथापि जबतक तुम यहाँ लौटकर नहीं आये थे, उससे पहले मैंने यह निश्चित विचार कर लिया था कि युद्धमें पुत्र, सेना और वाहनों-सहित रावणका वध करके लङ्काके राज्यपर विभीषणका अभिषेक कर दूँगा और अयोध्याका राज्य भरतको देकर अपने इस शरीरको त्याग दूँगा’॥ ६-७ १/२ ॥

ऐसी बातें कहते हुए श्रीरामको सुग्रीवने यों उत्तर दिया— ‘वीर रघुनन्दन! अपने पराक्रमका ज्ञान रखते हुए मैं आपकी भार्याका अपहरण करनेवाले रावणको देखकर कैसे क्षमा कर सकता था?’॥ ८-९ ॥

वीर सुग्रीवने जब ऐसी बात कही, तब उनका अभिनन्दन करके श्रीरामचन्द्रजीने शोभासम्पन्न लक्ष्मणसे कहा— ॥ १० ॥

‘लक्ष्मण! शीतल जलसे भरे हुए जलाशय और फलोंसे सम्पन्न वनका आश्रय ले हमलोग इस विशाल वानरसेनाका विभाग करके व्यूहरचना कर लें और युद्धके लिये उद्यत हो जायें॥ ११ ॥

‘इस समय मैं लोकसंहारकी सूचना देनेवाला भयानक अपशकुन उपस्थित देखता हूँ, जिससे सिद्ध होता है रीछों, वानरों और राक्षसोंके मुख्य-मुख्य वीरोंका संहार होगा॥ १२ ॥

‘प्रचण्ड आँधी चल रही है, पृथ्वी काँपने लगी है, पर्वतोंके शिखर हिलने लगे हैं और दिग्गज चीत्कार करते हैं॥ १३ ॥

‘मेघ हिंसक जीवोंके समान क्रूर हो गये हैं। वे कठोर स्वरमें विकट गर्जना करते हैं तथा रक्तविन्दुओंसे मिले हुए जलकी क्रूरतापूर्ण वर्षा कर रहे हैं॥ १४ ॥

‘अत्यन्त दारुण संध्या रक्त-चन्दनके समान लाल दिखायी देती है। सूर्यसे यह जलती आगका पुञ्ज गिर रहा है॥ १५ ॥

‘निषिद्ध पशु और पक्षी दीन हो दीनतासूचक स्वरमें सूर्यकी ओर देखते हुए चीत्कार करते हैं, इससे वे बड़े भयंकर लगते और महान् भय उत्पन्न करते हैं॥

‘रातमें चन्द्रमाका प्रकाश क्षीण हो जाता है। वे शीतलताकी जगह संताप देते हैं। उनके किनारेका भाग काला और लाल दिखायी देता है। समस्त लोकोंके संहारकालमें चन्द्रमाका जैसा रूप रहता है, वैसा ही इस समय भी देखा जाता है॥ १७ ॥

‘लक्ष्मण! सूर्यमण्डलमें छोटा, रूखा, अमङ्गलकारी और अत्यन्त लाल घेरा दिखायी देता है। साथ ही वहाँ काला चिह्न भी दृष्टिगोचर होता है॥ १८ ॥

‘लक्ष्मण! ये नक्षत्र अच्छी तरह प्रकाशित नहीं हो रहे हैं—मलिन दिखायी देते हैं। यह अशुभ लक्षण संसारका प्रलय-सा सूचित करता हुआ मेरे सामने प्रकट हो रहा है॥ १९ ॥

‘कौए, बाज और गीध नीचे गिरते हैं—भूतलपर आ-आ बैठते हैं और गीदड़ियाँ बड़े जोर-जोरसे अमङ्गलसूचक बोली बोलती हैं॥ २० ॥

‘इससे सूचित होता है कि वानरों और राक्षसोंद्वारा चलाये गये शिलाखण्डों, शूलों और खड्गोंसे यह धरती पट जायगी और यहाँ रक्त-मांसकी कीच जम जायगी॥

‘रावणके द्वारा पालित यह लङ्कापुरी शत्रुओंके लिये दुर्जय है, तथापि अब हम शीघ्र ही वानरोंके साथ इसपर सब ओरसे वेगपूर्वक आक्रमण करें’॥ २२ ॥

लक्ष्मणसे ऐसा कहते हुए वीर महाबली श्रीरामचन्द्रजी उस पर्वत-शिखरसे तत्काल नीचे उतर आये॥ २३ ॥

उस पर्वतसे उतरकर धर्मात्मा श्रीरघुनाथजीने अपनी सेनाका निरीक्षण किया, जो शत्रुओंके लिये अत्यन्त दुर्जय थी॥ २४ ॥

फिर सुग्रीवकी सहायतासे कपिराजकी उस विशाल सेनाको सुसज्जित करके समयका ज्ञान रखनेवाले श्रीरामने ज्योतिषशास्त्रोक्त शुभ समयमें उसे युद्धके लिये कूच करनेकी आज्ञा दी॥ २५ ॥

तदनन्तर महाबाहु धनुर्धर श्रीरघुनाथजी उस विशाल सेनाके साथ शुभ मुहूर्तमें आगे-आगे लङ्कापुरीकी ओर प्रस्थित हुए॥ २६ ॥

उस समय विभीषण, सुग्रीव, हनुमान्, ऋक्षराज जाम्बवान्, नल, नील तथा लक्ष्मण उनके पीछे-पीछे चले॥ २७ ॥

तत्पश्चात् रीछों और वानरोंकी वह विशाल सेना बहुत बड़ी भूमिको आच्छादित करके श्रीरघुनाथजीके पीछे-पीछे चली॥ २८ ॥

शत्रुओंको आगे बढ़नेसे रोकनेवाले हाथीके समान विशालकाय वानरोंने सैकड़ों शैलशिखरों और बड़े-बड़े वृक्षोंको हाथमें ले रखा था॥ २९ ॥

शत्रुओंका दमन करनेवाले वे दोनों भार्‍इ श्रीराम और लक्ष्मण थोड़ी ही देरमें लङ्कापुरीके पास पहुँच गये॥

वह रमणीय ध्वजा-पताकाओंसे अलंकृत थी। अनेकानेक उद्यान और वन उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। उसके चारों ओर बड़ा ही अद्भुत और ऊँचा परकोटा था। उस परकोटेसे मिला हुआ ही नगरका सदर फाटक था। उन परकोटोंके कारण लङ्कापुरीमें पहुँचना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन था॥ ३१ ॥

यद्यपि देवताओंके लिये भी लङ्कापर आक्रमण करना कठिन काम था तो भी श्रीरामकी आज्ञासे प्रेरित हो वानर यथास्थान रहकर उस पुरीपर घेरा डालकर उसके भीतर प्रवेश करने लगे॥ ३२ ॥

लङ्काका उत्तर द्वार पर्वतशिखरके समान ऊँचा था। श्रीराम और लक्ष्मणने धनुष हाथमें लेकर उसका मार्ग रोक लिया और वहीं रहकर वे अपनी सेनाकी रक्षा करने लगे॥ ३३ ॥

दशरथनन्दन वीर श्रीराम लक्ष्मणको साथ ले रावणपालित लङ्कापुरीके पास जा उत्तर द्वारपर पहुँचकर जहाँ स्वयं रावण खड़ा था, वहीं डट गये। श्रीरामके सिवा दूसरा कोर्‍इ उस

द्वारपर अपने सैनिकोंकी रक्षा करनेमें समर्थ नहीं हो सकता था॥ ३४-३५ ॥

अस्त्र-शस्त्रधारी भयंकर राक्षसोंद्वारा सब ओरसे सुरक्षित उस भयानक द्वारपर रावण उसी तरह खड़ा था, जैसे वरुण देवता समुद्रमें अधिष्ठित होते हैं॥ ३६ ॥

वह उत्तर द्वार अल्प बलशाली पुरुषोंके मनमें उसी प्रकार भय उत्पन्न करता था, जैसे दानवोंद्वारा सुरक्षित पाताल भयदायक जान पड़ता है। उस द्वारके भीतर योद्धाओंके बहुत-से भाँति-भाँतिके अस्त्र-शस्त्र और कवच रखे गये थे, जिन्हें भगवान् श्रीरामने देखा॥

वानरसेनापति पराक्रमी नील मैन्द और द्विविदके साथ लङ्काके पूर्वद्वारपर जाकर डट गये॥ ३८ १/२ ॥

महाबली अङ्गदने ऋषभ, गवाक्ष, गज और गवयके साथ दक्षिण द्वारपर अधिकार जमा लिया॥ ३९ १/२ ॥

प्रमाथी, प्रघस तथा अन्य वानरवीरोंके साथ बलवान् कपिश्रेष्ठ हनुमान्ने पश्चिम द्वारका मार्ग रोक लिया॥ ४० १/२ ॥

उत्तर और पश्चिमके मध्यभागमें (वायव्यकोणमें) जो राक्षससेनाकी छावनी थी, उसपर गरुड़ और वायुके समान वेगशाली श्रेष्ठ वानरवीरोंके साथ सुग्रीवने आक्रमण किया॥ ४१ १/२ ॥

जहाँ वानरराज सुग्रीव थे, वहाँ वानरोंके छत्तीस करोड़ विख्यात यूथपति राक्षसोंको पीड़ा देते हुए उपस्थित रहते थे॥ ४२ १/२ ॥

श्रीरामकी आज्ञासे विभीषणसहित लक्ष्मणने लङ्काके प्रत्येक द्वारपर एक-एक करोड़ वानरोंको नियुक्त कर दिया॥ ४३ १/२ ॥

सुषेण और जाम्बवान् बहुत-सी सेनाके साथ श्रीरामचन्द्रजीके पीछे थोड़ी ही दूरपर रहकर बीचके मोर्चेकी रक्षा करते रहे॥ ४४ १/२ ॥

वे वानरसिंह बाघोंके समान बड़े-बड़े दाढ़ोंसे युक्त थे। वे हर्ष और उत्साहमें भरकर हाथोंमें वृक्ष और पर्वत-शिखर लिये युद्धके लिये डट गये॥ ४५ ॥

सभी वानरोंकी पूँछें क्रोधके कारण अस्वाभाविक रूपसे हिल रही थीं। दाढ़ें और नख ही उन सबके आयुध थे। उन सबके मुख आदि अङ्गोंपर क्रोधरूप विकारके विचित्र चिह्न परिलक्षित होते थे तथा सबके मुख विकट एवं विकराल दिखायी देते थे॥ ४६ ॥

इनमेंसे किन्हीं वानरोंमें दस हाथियोंका बल था, कोई उनसे भी दस गुने अधिक बलवान् थे तथा किन्हींमें एक हजार हाथियोंके समान बल था॥ ४७ ॥

किन्हींमें दस हजार हाथियोंकी शक्ति थी, कोई इनसे भी सौ गुने बलवान् थे तथा अन्य बहुतेरे वानर-यूथपतियोंमें तो बलका परिमाण ही नहीं था। वे असीम बलशाली थे॥ ४८ ॥

वहाँ उन वानरसेनाओंका टिड्डीदलके उद्गमके समान अद्भुत एवं विचित्र समागम हुआ था॥ ४९ ॥

लङ्कामें उछल-उछलकर आते हुए वानरोंसे आकाश भर गया था और पुरीमें प्रवेश करके खड़े हुए कपिसमूहोंसे वहाँकी सारी पृथ्वी आच्छादित हो गयी थी॥ ५० ॥

रीछों और वानरोंकी एक करोड़ सेना तो लङ्काके चारों द्वारोंपर आकर डटी थी और अन्य सैनिक सब ओर युद्धके लिये चले गये थे॥ ५१ ॥

समस्त वानरोंने चारों ओरसे उस त्रिकूट पर्वतको (जिसपर लङ्का बसी थी) घेर लिया था। सहस्र अयुत (एक करोड़) वानर तो उस पुरीमें सभी द्वारोंपर लड़ती हुई सेनाका समाचार लेनेके लिये नगरमें सब ओर घूमते रहते थे॥ ५२ ॥

हाथोंमें वृक्ष लिये बलवान् वानरोंद्वारा सब ओरसे घिरी हुई लङ्कामें वायुके लिये भी प्रवेश पाना कठिन हो गया था॥ ५३ ॥

मेघके समान काले एवं भयंकर तथा इन्द्रतुल्य पराक्रमी वानरोंद्वारा सहसा पीड़ित होनेके कारण राक्षसोंको बड़ा विस्मय हुआ॥ ५४ ॥

जैसे सेतुको विदीर्ण कर अथवा मर्यादाको तोड़कर बहनेवाले समुद्रके जलका महान् शब्द होता है, उसी प्रकार वहाँ आक्रमण करती हुई विशाल वानरसेनाका महान् कोलाहल हो रहा था॥ ५५ ॥

उस महान् कोलाहलसे परकोटों, फाटकों, पर्वतों, वनों तथा काननोंसहित समूची लङ्कापुरीमें हलचल मच गयी॥ ५६ ॥

श्रीराम, लक्ष्मण और सुग्रीवसे सुरक्षित वह विशाल वानरवाहिनी समस्त देवताओं और असुरोंके लिये भी अत्यन्त दुर्जय हो गयी थी॥ ५७ ॥

इस प्रकार राक्षसोंके वधके लिये अपनी सेनाको यथास्थान खड़ी करके उसके बादके कर्तव्यको जाननेकी इच्छासे श्रीरघुनाथजीने मन्त्रियोंके साथ बारंबार सलाह की और एक

निश्चयपर पहुँचकर साम, दान आदि उपायोंके क्रमशः प्रयोगसे सुलभ होनेवाले अर्थतत्त्वके ज्ञाता श्रीराम विभीषणकी अनुमति ले राजधर्मका विचार करते हुए वालिपुत्र अङ्गदको बुलाकर उनसे इस प्रकार बोले— ॥ ५८-५९ १/२ ॥

‘सौम्य! कपिप्रवर! दशमुख रावण राज्यलक्ष्मीसे भ्रष्ट हो गया, अब उसका ऐश्वर्य समाप्त हो चला, वह मरना ही चाहता है, इसलिये उसकी चेतना (विचार-शक्ति) नष्ट हो गयी है। तुम परकोटा लाँघकर लङ्कापुरीमें भय छोड़कर जाओ और व्यथारहित हो उससे मेरी ओरसे ये बातें कहो— ॥ ६०-६१ ॥

“निशाचर! राक्षसराज! तुमने मोहवश घमंडमें आकर ऋषि, देवता, गन्धर्व, अप्सरा, नाग, यक्ष और राजाओंका बड़ा अपराध किया है। ब्रह्माजीका वरदान पाकर तुम्हें जो अभिमान हो गया था, निश्चय ही उसके नष्ट होनेका अब समय आ गया है। तुम्हारे उस पापका दुःसह फल आज उपस्थित है॥ ६२-६३ ॥

“मैं अपराधियोंको दण्ड देनेवाला शासक हूँ। तुमने जो मेरी भार्याका अपहरण किया है, इससे मुझे बड़ा कष्ट पहुँचा है; अतः तुम्हें उसका दण्ड देनेके लिये मैं लङ्काके द्वारपर आकर खड़ा हूँ॥ ६४ ॥

“राक्षस! यदि तुम युद्धमें स्थिरतापूर्वक खड़े रहे तो उन समस्त देवताओं, महर्षियों और राजर्षियोंकी पदवीको पहुँच जाओगे—उन्हींकी भाँति तुम्हें परलोकवासी होना पड़ेगा॥ ६५ ॥

“नीच निशाचर! जिस बलके भरोसे तुमने मुझे धोखा देकर मायासे सीताका हरण किया है, उसे आज युद्धके मैदानमें दिखाओ॥ ६६ ॥

“यदि तुम मिथिलेशकुमारीको लेकर मेरी शरणमें नहीं आये तो मैं अपने तीखे बाणोंद्वारा इस संसारको राक्षसोंसे सूना कर दूँगा॥ ६७ ॥

“राक्षसोंमें श्रेष्ठ ये श्रीमान् धर्मात्मा विभीषण भी मेरे साथ यहाँ आये हैं, निश्चय ही लङ्काका निष्कण्टक राज्य इन्हें ही प्राप्त होगा॥ ६८ ॥

“तुम पापी हो। तुम्हें अपने स्वरूपका ज्ञान नहीं है और तुम्हारे संगी-साथी भी मूर्ख हैं; अतः इस प्रकार अधर्मपूर्वक अब तुम एक क्षण भी इस राज्यको नहीं भोग सकोगे॥ ६९ ॥

“राक्षस! शूरताका आश्रय ले धैर्य धारण करके मेरे साथ युद्ध करो। रणभूमिमें मेरे बाणोंसे शान्त (प्राणशून्य) होकर तुम पूत (शुद्ध एवं निष्पाप) हो जाओगे॥ ७० ॥

“निशाचर! मेरे दृष्टिपथमें आनेके पश्चात् यदि तुम पक्षी होकर तीनों लोकोंमें उड़ते और छिपते फिरो तो भी अपने घरको जीवित नहीं लौट सकोगे॥ ७१ ॥

“अब मैं तुम्हें हितकी बात बताता हूँ। तुम अपना श्राद्ध कर डालो—परलोकमें सुख देनेवाले दान-पुण्य कर लो और लङ्काको जी भरकर देख लो; क्योंकि तुम्हारा जीवन मेरे अधीन हो चुका है”॥ ७२ ॥

अनायास ही महान् कर्म करनेवाले भगवान् श्रीरामके ऐसा कहनेपर ताराकुमार अङ्गद मूर्तिमान् अग्निकी भाँति आकाशमार्गसे चल दिये॥ ७३ ॥

श्रीमान् अङ्गद एक ही मुहूर्तमें परकोटा लाँघकर रावणके राजभवनमें जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने मन्त्रियोंके साथ शान्तभावसे बैठे हुए रावणको देखा॥ ७४ ॥

वानरश्रेष्ठ अङ्गद सोनेके बाजूबंद पहने हुए थे और प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे, वे रावणके निकट पहुँचकर खड़े हो गये॥ ७५ ॥

उन्होंने पहले अपना परिचय दिया और मन्त्रियों-सहित रावणको श्रीरामचन्द्रजीकी कही हुई सारी उत्तम बातें ज्यों-की-त्यों सुना दीं। न तो एक भी शब्द कम किया और न बढ़ाया॥ ७६ ॥

वे बोले—‘मैं अनायास ही बड़े-बड़े उत्तम कर्म करनेवाले कोसलनरेश महाराज श्रीरामका दूत और वालीका पुत्र अङ्गद हूँ। सम्भव है कभी मेरा नाम भी तुम्हारे कानोंमें पड़ा हो॥ ७७ ॥

‘माता कौसल्याका आनन्द बढ़ानेवाले रघुकुल-तिलक श्रीरामने तुम्हारे लिये यह संदेश दिया है— ‘नृशंस रावण! जरा मर्द बनो और घरसे बाहर निकलकर युद्धमें मेरा सामना करो॥ ७८ ॥

“मैं मन्त्री, पुत्र और बन्धु-बान्धवोंसहित तुम्हारा वध करूँगा; क्योंकि तुम्हारे मारे जानेसे तीनों लोकोंके प्राणी निर्भय हो जायँगे॥ ७९ ॥

“तुम देवता, दानव, यक्ष, गन्धर्व, नाग और राक्षस—सभीके शत्रु हो। ऋषियोंके लिये तो कंटकरूप ही हो; अतः आज मैं तुम्हें उखाड़ फेंकूँगा॥ ८० ॥

“अतः यदि तुम मेरे चरणोंमें गिरकर आदरपूर्वक सीताको नहीं लौटाओगे तो मेरे हाथसे मारे जाओगे और तुम्हारे मारे जानेपर लङ्काका सारा ऐश्वर्य विभीषणको प्राप्त होगा”॥ ८१ ॥

वानरशिरोमणि अङ्गदके ऐसे कठोर वचन कहनेपर निशाचरगणोंका राजा रावण अत्यन्त अमर्षसे भर गया॥

रोषसे भरे हुए रावणने उस समय अपने मन्त्रियोंसे बार-बार कहा— 'पकड़ लो इस दुर्बुद्धि वानरको और मार डालो'॥ ८३ ॥

रावणकी यह बात सुनकर चार भयंकर निशाचरोंने प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी अङ्गदको पकड़ लिया॥

आत्मबलसे सम्पन्न ताराकुमार अङ्गदने उस समय राक्षसोंको अपना बल दिखानेके लिये स्वयं ही अपने-आपको पकड़ा दिया॥ ८५ ॥

फिर वे पक्षियोंकी तरह अपनी दोनों भुजाओंसे जकड़े हुए उन चारों राक्षसोंको लिये-दिये ही उछले और उस महलकी छतपर, जो पर्वतशिखरके समान ऊँची थी, चढ़ गये॥ ८६ ॥

उनके उछलनेके वेगसे झटका खाकर वे सब राक्षस राक्षसराज रावणके देखते-देखते पृथ्वीपर गिर पड़े॥ ८७ ॥

तदनन्तर प्रतापी वालिकुमार अङ्गद राक्षसराजके उस महलकी चोटीपर, जो पर्वतशिखरके समान ऊँची थी, पैर पटकते हुए घूमने लगे॥ ८८ ॥

उनके पैरोंसे आक्रान्त होकर वह छत रावणके देखते-देखते फट गयी। ठीक उसी तरह, जैसे पूर्वकालमें वज्रके आघातसे हिमालयका शिखर विदीर्ण हो गया था॥

इस प्रकार महलकी छत तोड़कर उन्होंने अपना नाम सुनाते हुए बड़े जोरसे सिंहनाद किया और वे आकाशमार्गसे उड़ चले॥ ९० ॥

राक्षसोंको पीड़ा देते और समस्त वानरोंका हर्ष बढ़ाते हुए वे वानरसेनाके बीच श्रीरामचन्द्रजीके पास लौट आये॥ ९१ ॥

अपने महलके टूटनेसे रावणको बड़ा क्रोध हुआ, परंतु विनाशकी घड़ी आयी देख वह लंबी साँस छोड़ने लगा॥ ९२ ॥

इधर श्रीरामचन्द्रजी हर्षसे भरकर गर्जना करते हुए बहुसंख्यक वानरोंसे घिरे रहकर युद्धके लिये ही डटे रहे। वे अपने शत्रुको वध करना चाहते थे॥ ९३ ॥

इसी समय पर्वतशिखरके समान विशालकाय महापराक्रमी दुर्जय वानर वीर सुषेणने इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले बहुसंख्यक वानरोंके साथ लङ्काके सभी दरवाजोंको काबूमें कर

लिया और सुग्रीवकी आज्ञाके अनुसार वे (अपने सैनिकोंकी रक्षा करने एवं सभी द्वारोंका समाचार जाननेके लिये) बारी-बारीसे उन सबपर विचरने लगे, जैसे चन्द्रमा क्रमशः सब नक्षत्रोंपर गमन करते हैं॥ १४-१५ ॥

लङ्कापर घेरा डालकर समुद्रतक फैले हुए उन वनवासी वानरोंकी सौ अक्षौहिणी सेनाओंको देख राक्षसोंको बड़ा विस्मय हुआ। बहुत-से निशाचर भयभीत हो गये तथा अन्य कितने ही राक्षस समराङ्गणमें हर्ष और उत्साहसे भर गये॥ १६-१७ ॥

उस समय लङ्काकी चहारदीवारी और खाईं सारी-की-सारी वानरोंसे व्याप्त हो रही थी। इस तरह राक्षसोंने चहारदीवारीको जब वानराकार हुई देखा, तब वे दीन-दुःखी और भयभीत हो हाहाकार करने लगे॥ १८ ॥

वह महाभीषण कोलाहल आरम्भ होनेपर राक्षसराज रावणके योद्धा निशाचर बड़े-बड़े आयुध हाथोंमें लेकर प्रलयकालकी प्रचण्ड वायुके समान सब ओर विचरने लगे॥ १९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें इकतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४१ ॥