सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

आठवाँ सर्ग

⬅ विषय-सूची (TOC)

आठवाँ सर्ग

प्रहस्त, दुर्मुख, वज्रदंष्ट्र, निकुम्भ और वज्रहनुका रावणके सामने शत्रु-सेनाको मार गिरानेका उत्साह दिखाना

इसके बाद नील मेघके समान श्यामवर्णवाले शूर सेनापति प्रहस्त नामक राक्षसने हाथ जोड़कर कहा— ॥

‘महाराज! हमलोग देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, पक्षी और सर्प सभीको पराजित कर सकते हैं; फिर उन दो मनुष्योंको रणभूमिमें हराना कौन बड़ी बात है॥ २ ॥

‘पहले हमलोग असावधान थे। हमारे मनमें शत्रुओंकी ओरसे कोई खटका नहीं था। इसीलिये हम निश्चिन्त बैठे थे। यही कारण है कि हनुमान् हमें धोखा दे गया। नहीं तो मेरे जीते-जी वह वानर यहाँसे जीता-जागता नहीं जा सकता था॥ ३ ॥

‘यदि आपकी आज्ञा हो तो पर्वत, वन और काननोंसहित समुद्रतककी सारी भूमिको मैं वानरोंसे सूनी कर दूँ॥ ४ ॥

‘राक्षसराज! मैं वानरमात्रसे आपकी रक्षा करूँगा, अतः अपने द्वारा किये गये सीता-हरणरूपी अपराधके कारण कोई दुःख आपपर नहीं आने पायेगा’॥ ५ ॥

तत्पश्चात् दुर्मुख नामक राक्षसने अत्यन्त कुपित होकर कहा— ‘यह क्षमा करनेयोग्य अपराध नहीं है, क्योंकि इसके द्वारा हम सब लोगोंका तिरस्कार हुआ है॥ ६ ॥

‘वानरके द्वारा हमलोगोंपर जो आक्रमण हुआ है, यह समस्त लङ्कापुरीका, महाराजके अन्तःपुरका और श्रीमान् राक्षसराज रावणका भी भारी पराभव है॥ ७ ॥

‘मैं अभी इसी मुहूर्त्तमें अकेला ही जाकर सारे वानरोंको मार भगाऊँगा। भले ही वे भयंकर समुद्रमें, आकाशमें अथवा रसातलमें ही क्यों न घुस गये हों’॥

इतनेहीमें महाबली वज्रदंष्ट्र अत्यन्त क्रोधसे भरकर रक्त, मांससे सने हुए भयानक परिघको हाथमें लिये हुए बोला— ॥ ९ ॥

‘दुर्जय वीर राम, सुग्रीव और लक्ष्मणके रहते हुए हमें उस बेचारे तपस्वी हनुमान्से क्या काम है?॥ १० ॥

‘आज मैं अकेला ही वानर-सेनामें तहलका मचा दूँगा और इस परिघसे सुग्रीव तथा लक्ष्मणसहित रामका भी काम तमाम करके लौट आऊँगा॥ ११ ॥

‘राजन्! यदि आपकी इच्छा हो तो आप यह मेरी दूसरी बात सुनें। उपायकुशल पुरुष ही यदि आलस्य छोड़कर प्रयत्न करे तो वह शत्रुओंपर विजय पा सकता है॥ १२ ॥

‘अतः राक्षसराज! मेरी दूसरी राय यह है कि इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, अत्यन्त भयानक तथा भयंकर दृष्टिवाले सहस्रों शूरवीर राक्षस एक निश्चित विचार करके मनुष्यका रूप धारण कर श्रीरामके पास जायँ और सब लोग बिना किसी घबराहटके उन रघुवंशशिरोमणिसे कहें कि हम आपके सैनिक हैं। हमें आपके छोटे भांऽइ भरतने भेजा है। इतना सुनते ही वे वानर-सेनाको उठाकर तुरंत लङ्कापर आक्रमण करनेके लिये वहाँसे चल देंगे॥ १३—१५ ॥

‘तत्पश्चात् हमलोग यहाँसे शूल, शक्ति, गदा, धनुष, बाण और खड्ग धारण किये शीघ्र ही मार्गमें उनके पास जा पहुँचें॥ १६ ॥

‘फिर आकाशमें अनेक यूथ बनाकर खड़े हो जायँ और पत्थरों तथा शस्त्र-समूहोंकी बड़ी भारी वर्षा करके उस वानर-सेनाको यमलोक पहुँचा दें॥ १७ ॥

‘यदि इस प्रकार हमारी बातें सुनकर वे दोनों भांऽइ श्रीराम और लक्ष्मण सेनाको कूच करनेकी आज्ञा दे देंगे और वहाँसे चल देंगे तो उन्हें हमारी अनीतिका शिकार होना पड़ेगा; उन्हें हमारे छलपूर्ण प्रहारसे पीड़ित होकर अपने प्राणोंका परित्याग करना पड़ेगा॥ १८ ॥

तदनन्तर पराक्रमी वीर कुम्भकर्णकुमार निकुम्भने अत्यन्त कुपित होकर समस्त लोकोंको रुलानेवाले रावणसे कहा— ॥ १९ ॥

‘आप सब लोग यहाँ महाराजके साथ चुपचाप बैठे रहें। मैं अकेला ही राम, लक्ष्मण, सुग्रीव, हनुमान् तथा अन्य सब वानरोंको भी यहाँ मौतके घाट उतार दूँगा’॥ २० १/२ ॥

तब पर्वतके समान विशालकाय वज्रहनु नामक राक्षस कुपित हो जीभसे अपने जबड़ेको चाटता हुआ बोला— ॥ २१ १/२ ॥

‘आप सब लोग निश्चिन्त होकर इच्छानुसार अपना-अपना काम करें। मैं अकेला ही सारी वानर-सेनाको खा जाऊँगा॥ २२ १/२ ॥

‘आपलोग स्वस्थ रहकर क्रीड़ा करें और निश्चिन्त हो वारुणी मदिराको पियें। मैं अकेला ही सुग्रीव, लक्ष्मण, अंगद, हनुमान् और अन्य सब वानरोंका भी यहाँ वध कर डालूँगा’॥ २३-२४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें आठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥

८ ॥