श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
अड़तालीसवाँ सर्ग
अड़तालीसवाँ सर्ग
सीताका दुःखपूर्ण वचन, श्रीरामके लिये उनका संदेश, लक्ष्मणका जाना और सीताका रोना
लक्ष्मणजीका यह कठोर वचन सुनकर जनक-किशोरी सीताको बड़ा दुःख हुआ। वे मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ीं॥ १ ॥
दो घड़ीतक उन्हें होश नहीं हुआ। उनके नेत्रोंसे आँसुओंकी अजस्र धारा बहती रही। फिर होशमें आनेपर जनककिशोरी दीन वाणीमें लक्ष्मणसे बोलीं— ॥ २ ॥
‘लक्ष्मण! निश्चय ही विधाताने मेरे शरीरको केवल दुःख भोगनेके लिये ही रचा है। इसीलिये आज सारे दुःखोंका समूह मूर्तिमान् होकर मुझे दर्शन दे रहा है॥ ३ ॥
‘मैंने पूर्वजन्ममें कौन-सा ऐसा पाप किया था अथवा किसका स्त्रीसे विछोह कराया था, जो शुद्ध आचरणवाली होनेपर भी महाराजने मुझे त्याग दिया है॥ ४ ॥
‘सुमित्रानन्दन! पहले मैंने वनवासके दुःखमें पड़कर भी उसे सहकर श्रीरामके चरणोंका अनुसरण करते हुए आश्रममें रहना पसंद किया था॥ ५ ॥
‘किंतु सौम्य! अब मैं अकेली प्रियजनोंसे रहित हो किस तरह आश्रममें निवास करूँगी? और दुःखमें पड़नेपर किससे अपना दुःख कहूँगी॥ ६ ॥
‘प्रभो! यदि मुनिजन मुझसे पूछेंगे कि महात्मा श्रीरघुनाथजीने किस अपराधपर तुम्हें त्याग दिया है तो मैं उन्हें अपना कौन-सा अपराध बताऊँगी॥ ७ ॥
‘सुमित्राकुमार! मैं अपने जीवनको अभी गङ्गाजीके जलमें विसर्जन कर देती; किंतु इस समय ऐसा अभी नहीं कर सकूँरुगी; क्योंकि ऐसा करनेसे मेरे पतिदेवका राजवंश नष्ट हो जायगा॥ ८
‘किंतु सुमित्रानन्दन! तुम तो वही करो, जैसी महाराजने तुम्हें आज्ञा दी है। तुम मुझ दुखियाको यहाँ छोड़कर महाराजकी आज्ञाके पालनमें ही स्थिर रहो और मेरी यह बात सुनो—॥ ९ ॥
‘मेरी सब सासुओंको समानरूपसे हाथ जोड़कर मेरी ओरसे उनके चरणोंमें प्रणाम करना। साथ ही महाराजके भी चरणोंमें मस्तक नवाकर मेरी ओरसे उनकी कुशल पूछना॥ १० ॥
‘लक्ष्मण! तुम अन्तःपुरकी सभी वन्दनीया स्त्रियोंको मेरी ओरसे प्रणाम करके मेरा समाचार उन्हें सुना देना तथा जो सदा धर्म-पालनके लिये सावधान रहते हैं, उन महाराजको भी मेरा यह संदेश सुना देना॥ ११ ॥
‘रघुनन्दन। वास्तवमें तो आप जानते ही हैं कि सीता शुद्धचरित्रा है। सर्वदा ही आपके हितमें तत्पर रहती है और आपके प्रति परम प्रेमभक्ति रखनेवाली है॥ १२ ॥
‘वीर! आपने अपयशसे डरकर ही मुझे त्यागा है; अतः लोगोंमें आपकी जो निन्दा हो रही है अथवा मेरे कारण जो अपवाद फैल रहा है, उसे दूर करना मेरा भी कर्तव्य है; क्योंकि मेरे परम आश्रय आप ही हैं॥ १३½ ॥
‘लक्ष्मण! तुम महाराजसे कहना कि आप धर्मपूर्वक बड़ी सावधानीसे रहकर पुरवासियोंके साथ वैसा ही बर्ताव करें, जैसा अपने भाइयोंके साथ करते हैं। यही आपका परम धर्म है और इसीसे आपको परम उत्तम यशकी प्राप्ति हो सकती है॥ १४-१५ ॥
‘राजन्! पुरवासियोंके प्रति धर्मानुकूल आचरण करनेसे जो पुण्य प्राप्त होगा, वही आपके लिये उत्तम धर्म और कीर्ति है। पुरुषोत्तम! मुझे अपने शरीरके लिये कुछ भी चिन्ता नहीं है॥ १६ ॥
‘रघुनन्दन! जिस तरह पुरवासियोंके अपवादसे बचकर रहा जा सके, उसी तरह आप रहें। स्त्रीके लिये तो पति ही देवता है, पति ही बन्धु है, पति ही गुरु है। इसलिये उसे प्राणोंकी बाजी लगाकर भी विशेषरूपसे पतिका प्रिय करना चाहिये॥ १७½ ॥
‘मेरी ओरसे सारी बातें तुम श्रीरघुनाथजीसे कहना और आज तुम भी मुझे देख जाओ। मैं इस समय ऋतुकालका उल्लङ्घन करके गर्भवती हो चुकी हूँ’॥ १८½ ॥
सीताके इस प्रकार कहनेपर लक्ष्मणका मन बहुत दुःखी हो गया। उन्होंने धरतीपर माथा टेककर प्रणाम किया। उस समय उनके मुखसे कोई भी बात नहीं निकल सकी॥ १९½ ॥
उन्होंने जोर-जोरसे रोते हुए ही सीता माताकी परिक्रमा की और दो घड़ीतक सोच-विचारकर उनसे कहा—‘शोभने! आप यह मुझसे क्या कह रही हैं?॥
‘निष्पाप पतिव्रते! मैंने पहले भी आपका सम्पूर्ण रूप कभी नहीं देखा है। केवल आपके चरणोंके ही दर्शन किये हैं। फिर आज यहाँ वनके भीतर श्रीरामचन्द्रजीकी अनुपस्थितिमें मैं आपकी ओर कैसे देख सकता हूँ’॥ २१½ ॥
यह कहकर उन्होंने सीताजीको पुनः प्रणाम किया और फिर वे नावपर चढ़ गये। नावपर चढ़कर उन्होंने मल्लाहको उसे चलानेकी आज्ञा दी॥ २२½ ॥
शोकके भारसे दबे हुए लक्ष्मण गङ्गाजीके उत्तरी तटपर पहुँचकर दुःखके कारण अचेत-से हो गये और उसी अवस्थामें जल्दीसे रथपर चढ़ गये॥ २३½ ॥
सीता गङ्गाजीके दूसरे तटपर अनाथकी तरह रोती हुईं धरतीपर लोट रही थीं। लक्ष्मण बार-बार मुँह घुमाकर उनकी ओर देखते हुए चल दिये॥ २४½ ॥
रथ और लक्ष्मण क्रमशः दूर होते गये। सीता उनकी ओर बारम्बार देखकर उद्विग्न हो उठीं। उनके अदृश्य होते ही उनपर गहरा शोक छा गया॥ २५ ॥
अब उन्हें कोई भी अपना रक्षक नहीं दिखायी दिया। अतः यशको धारण करनेवाली वे यशस्विनी सती सीता दुःखके भारी भारसे दबकर चिन्तामग्न हो मयूरोंके कलनादसे गूँजते हुए उस वनमें जोर-जोरसे रोने लगीं॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें अड़तालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४८॥