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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

अट्ठावनवाँ सर्ग

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अट्ठावनवाँ सर्ग

नीलके द्वारा प्रहस्तका वध

(इसके पूर्व) प्रहस्तको युद्धकी तैयारी करके लङ्कासे बाहर निकलते देख शत्रुसूदन श्रीरामचन्द्रजीने विभीषणसे मुसकराकर कहा— ॥ १ ॥

‘महाबाहो! यह बड़े शरीर और महान् वेगवाला तथा बड़ी भारी सेनासे घिरा हुआ कौन योद्धा आ रहा है? इसका रूप, बल और पौरुष कैसा है? इस पराक्रमी निशाचरका मुझे परिचय दो’॥ २ १/२ ॥

श्रीरघुनाथजीका वचन सुनकर विभीषणने इस प्रकार उत्तर दिया— ‘प्रभो! इस राक्षसका नाम प्रहस्त है। यह राक्षसराज रावणका सेनापति है और लङ्काकी एक तिहाई सेनासे घिरा हुआ है। इसका पराक्रम भलीभाँति विख्यात है। यह नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंका ज्ञाता, बल-विक्रमसे सम्पन्न और शूरवीर है’॥ ३-४ ॥

इसी समय महाबलवान् वानरोंकी विशाल सेनाने भी भयानक पराक्रमी, भीषण रूपधारी तथा महाकाय प्रहस्तको बड़े गर्जन-तर्जनके साथ लङ्कासे बाहर निकलते देखा। वह बहुसंख्यक राक्षसोंसे घिरा हुआ था। उसे देखते ही वानरोंके दलमें भी महान् कोलाहल होने लगा और वे प्रहस्तकी ओर देख-देखकर गर्जने लगे॥

विजयकी इच्छावाले राक्षस वानरोंकी ओर दौड़े। उनके हाथोंमें खड्ग, शक्ति, ऋष्टि, शूल, बाण, मूसल, गदा, परिघ, प्रास, नाना प्रकारके फरसे और विचित्रविचित्र धनुष शोभा पा रहे थे॥ ७-८ ॥

तब वानरोंने भी युद्धकी इच्छासे खिले हुए वृक्ष, पर्वत तथा बड़े-बड़े पत्थर उठा लिये॥ ९ ॥

फिर दोनों पक्षोंके बहुसंख्यक वीरोंमें पत्थरों और बाणोंकी वर्षाके साथ-साथ आपसमें बड़ा भारी संग्राम छिड़ गया॥ १० ॥

उस युद्धस्थलमें बहुत-से राक्षसोंने बहुतेरे वानरोंका और बहुसंख्यक वानरोंने बहुत-से राक्षसोंका संहार कर डाला॥ ११ ॥

वानरोंमेंसे कोई शूलोंसे और कोई चक्रोंसे मथ डाले गये। कितने ही परिघोंकी मारसे आहत हो गये और कितनोंके फरसोंसे टुकड़े-टुकड़े कर डाले गये॥

कितने ही योद्धा साँसरहित हो पृथ्वीपर गिर पड़े और कितने ही बाणोंके लक्ष्य बन गये, जिससे उनके हृदय विदीर्ण हो गये॥ १३ ॥

कितने ही वानर तलवारोंकी मारसे दो टूक होकर पृथ्वीपर गिर पड़े और तड़फड़ाने लगे। कितने ही शूरवीर राक्षसोंने वानरोंकी पसलियाँ फाड़ डालीं॥ १४ ॥

इसी तरह वानरोंने भी अत्यन्त कुपित हो वृक्षों और पर्वत-शिखरोंद्वारा सब ओर भूतलपर झुंड-के-झुंड राक्षसोंको पीस डाला॥ १५ ॥

वानरोंके वज्रतुल्य कठोर थप्पड़ों और मुक्कोंसे भलीभाँति पीटे गये राक्षस मुँहसे रक्त वमन करने लगे। उनके दाँत और नेत्र छिन्न-भिन्न होकर बिखर गये॥ १६ ॥

कोई आर्तनाद करते तो कोई सिंहोंके समान दहाड़ते थे। इस प्रकार वानरों और राक्षसोंका भयंकर कोलाहल वहाँ सब ओर गूँज उठा॥ १७ ॥

क्रोधसे भरे हुए वानर और राक्षस वीरोचित मार्गका अनुसरण करके युद्धमें पीठ नहीं दिखाते थे। वे मुँह बा-बाकर निर्भयके समान क्रूरतापूर्ण कर्म करते थे॥ १८ ॥

नरान्तक, कुम्भहनु, महानाद और समुन्नत—ये प्रहस्तके सारे सचिव वानरोंका वध करने लगे॥ १९ ॥

शीघ्रतापूर्वक आक्रमण करते और वानरोंको मारते हुए प्रहस्तके सचिवोंमेंसे एकको, जिसका नाम नरान्तक था, द्विविदने एक पर्वतके शिखरसे मार डाला॥ २० ॥

फिर दुर्मुखने एक विशाल वृक्ष लिये उठकर शीघ्रता-पूर्वक हाथ चलानेवाले राक्षस समुन्नतको कुचल डाला॥ २१ ॥

तत्पश्चात् अत्यन्त कुपित हुए तेजस्वी जाम्बवान्ने एक बड़ी भारी शिला उठा ली और उसे महानादकी छातीपर दे मारा॥ २२ ॥

बाकी रहा पराक्रमी कुम्भहनु। वह तार नामक वानरसे भिड़ा और अन्तमें एक विशाल वृक्षकी चपेटमें आकर उसे भी रणभूमिमें अपने प्राणोंसे हाथ धोने पड़े॥

रथपर बैठे हुए प्रहस्तसे वानरोंका यह अद्भुत पराक्रम नहीं सहा गया। उसने हाथमें धनुष लेकर वानरोंका घोर संहार आरम्भ किया॥ २४ ॥

उस समय दोनों सेनाएँ जलके भँवरकी भाँति चक्कर काट रही थीं। विक्षुब्ध अपार महासागरकी गर्जनाके समान उनकी गर्जना सुनायी दे रही थी॥ २५ ॥

अत्यन्त क्रोधसे भरे हुए रणदुर्मद राक्षस प्रहस्तने अपने बाण-समूहोंद्वारा उस महासमरमें वानरोंको पीड़ित करना आरम्भ किया॥ २६ ॥

पृथ्वीपर वानरों और राक्षसोंकी लाशोंके ढेर लग गये। उनसे आच्छादित हुई रणभूमि भयानक पर्वतोंसे ढकी हुई-सी जान पड़ती थी॥ २७ ॥

रक्तके प्रवाहसे आच्छादित हुई वह युद्धभूमि वैशाख-मासमें खिले हुए पलाश-वृक्षोंसे ढकी हुई वन्य भूमि-सी सुशोभित होती थी॥ २८ ॥

मारे गये वीरोंकी लाशें ही जिसके दोनों तट थे। रक्तका प्रवाह ही जिसकी महान् जलराशि थी। टूटे-फूटे अस्त्र-शस्त्र ही जिसके तटवर्ती विशाल वृक्षोंके समान जान पड़ते थे। जो यमलोकरूपी समुद्रसे मिली हुई थी। सैनिकोंके यकृत् और प्लीहा (हृदयके दाहिने और बायें भाग) जिसके महान् पंक थे। निकली हुई आँतें जहाँ सेवारका काम देती थीं। कटे हुए सिर और धड़ जहाँ मत्स्य-से प्रतीत होते थे। शरीरके छोटे-छोटे अवयव एवं केश जिसमें घासका भ्रम उत्पन्न करते थे। जहाँ गीध ही हंस बनकर बैठे थे। कङ्करूपी सारस जिसका सेवन करते थे। मेदे ही फेन बनकर जहाँ सब ओर फैले थे। पीड़ितोंकी कराह जिसकी कलकल ध्वनि थी और कायरोंके लिये जिसे पार करना अत्यन्त कठिन था, उस युद्धभूमिरूपिणी नदीको प्रवाहित करके राक्षस और श्रेष्ठ वानर वर्षाके अन्तमें हंसों और सारसोंसे सेवित सरिताकी भाँति उस दुस्तर नदीको उसी तरह पार कर रहे थे, जैसे गजयूथपति कमलोंके परागसे आच्छादित किसी पुष्करिणीको पार करते हैं॥ २९—३३ ॥

तदनन्तर नीलने देखा, रथपर बैठा हुआ प्रहस्त बाणसमूहोंकी वर्षा करके वेगपूर्वक वानरोंका संहार कर रहा है॥ ३४ ॥

तब जैसे उठी हुई प्रचण्ड वायु आकाशमें महान् मेघोंकी घटाको छिन्न-भिन्न करके उड़ा देती है, उसी प्रकार नील भी बलपूर्वक राक्षस-सेनाका संहार करने लगे। इससे उस युद्धस्थलमें राक्षसी-सेना भाग खड़ी हुई। सेनापति प्रहस्तने जब अपनी सेनाकी ऐसी दुरवस्था देखी, तब उसने सूर्यतुल्य तेजस्वी रथके द्वारा नीलपर ही धावा किया॥ ३५ १/२ ॥

धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ और निशाचरोंकी सेनाके नायक प्रहस्तने उस महासमरमें अपने धनुषको खींचकर नीलपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी॥ ३६ १/२ ॥

रोषसे भरे हुए सर्पोंके समान वे महान् वेगशाली बाण नीलतक पहुँचकर उन्हें विदीर्ण करके बड़ी सावधानीके साथ धरतीमें समा गये॥ ३७ १/२ ॥

प्रहस्तके पैने बाण प्रज्वलित अग्निके समान जान पड़ते थे। उनकी चोटसे नील बहुत घायल हो गये। इस तरह उस परम दुर्जय राक्षस प्रहस्तको अपने ऊपर आक्रमण करते देख बल-विक्रमशाली महाकपि नीलने एक वृक्ष उखाड़कर उसीके द्वारा उसपर आघात किया॥

नीलकी चोट खाकर कुपित हुआ राक्षसशिरोमणि प्रहस्त बड़े जोरसे गर्जता हुआ उन वानर-सेनापतिपर बाणोंकी वर्षा करने लगा॥ ४० ॥

उस दुरात्मा राक्षसके बाण-समूहोंका निवारण करनेमें समर्थ न हो सकनेपर नील आँख बंद करके उन सब बाणोंको अपने अंगोंपर ही ग्रहण करने लगे। जैसे साँड़ सहसा आयी हुई शरद्-ऋतुकी वर्षाको चुपचाप अपने शरीरपर ही सह लेता है, उसी प्रकार प्रहस्तकी उस दुःसह बाणवर्षाको नील चुपचाप नेत्र बंद करके सहन करते रहे॥ ४१-४२ ॥

प्रहस्तकी बाणवर्षासे कुपित हो महाबली महाकपि नीलने एक विशाल सालवृक्षके द्वारा उसके घोड़ोंको मार डाला॥ ४३ ॥

तत्पश्चात् रोषसे भरे हुए नीलने उस दुरात्माके धनुषको भी वेगपूर्वक तोड़ दिया और बारंबार वे गर्जना करने लगे॥ ४४ ॥

नीलके द्वारा धनुषरहित किया गया सेनापति प्रहस्त एक भयानक मूसल हाथमें लेकर अपने रथसे कूद पड़ा॥ ४५ ॥

वे दोनों वीर अपनी-अपनी सेनाके प्रधान थे। दोनों ही एक-दूसरेके वैरी और वेगशाली थे। वे मदकी धारा बहानेवाले दो गजराजोंके समान खूनसे नहा उठे थे॥ ४६ ॥

दोनों ही अपनी तीखी दाढ़ोंसे काट-काटकर एक-दूसरेके अंगोंको घायल किये देते थे। वे दोनों सिंह और बाघके समान शक्तिशाली और उन्हींके समान विजयके लिये सचेष्ट थे॥ ४७ ॥

दोनों वीर पराक्रमी, विजयी और युद्धमें कभी पीठ न दिखानेवाले थे तथा वृत्रासुर और इन्द्रके समान युद्धमें यश पानेकी अभिलाषा रखते थे॥ ४८ ॥

उस समय परम उद्योगी प्रहस्तने नीलके ललाटमें मूसलसे आघात किया। इससे उनके ललाटसे रक्तकी धारा बह चली॥ ४९ ॥

उनके सारे अंग रक्तसे भीग गये। तब क्रोधसे भरे हुए महाकपि नीलने एक विशाल वृक्ष उठाकर प्रहस्तकी छातीपर दे मारा॥ ५० ॥

उस प्रहारकी कोई परवा न करके प्रहस्त महान् मूसल हाथमें लिये बलवान् वानर नीलकी ओर बड़े वेगसे दौड़ा॥ ५१ ॥

उस भयंकर वेगशाली राक्षसको रोषसे भरकर आक्रमण करते देख महान् वेगशाली महाकपि नीलने एक बड़ी भारी शिला हाथमें ले ली॥ ५२ ॥

उस शिलाको नीलने रणभूमिमें संग्रामकी इच्छावाले मूसलयोधी निशाचर प्रहस्तके मस्तकपर तत्काल दे मारा॥ ५३ ॥

कपिप्रवर नीलके द्वारा चलायी गयी उस भयंकर एवं विशाल शिलाने प्रहस्तके मस्तकको कुचलकर उसके कई टुकड़े कर डाले॥ ५४ ॥

उसके प्राण-पखेरु उड़ गये। उसकी कान्ति, उसका बल और उसकी सारी इन्द्रियाँ भी चली गयीं। वह राक्षस जड़से कटे हुए वृक्षकी भाँति सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ५५ ॥

उसके छिन्न-भिन्न हुए मस्तकसे और शरीरसे भी बहुत खून गिरने लगा, मानो पर्वतसे पानीका झरना झर रहा हो॥ ५६ ॥

नीलके द्वारा प्रहस्तके मारे जानेपर दुःखी हुए राक्षसोंकी वह अकम्पनीय विशाल सेना लंकाको लौट गयी॥ ५७ ॥

सेनापतिके मारे जानेपर वह सेना ठहर न सकी। जैसे बाँध टूट जानेपर नदीका पानी रुक नहीं पाता॥

सेनानायकके मारे जानेसे वे सारे राक्षस अपना युद्धविषयक उत्साह खो बैठे और राक्षसराज रावणके भवनमें जाकर चिन्ताके कारण चुपचाप खड़े हो गये। तीव्र शोक-समुद्रमें डूब जानेके कारण वे सब-के-सब अचेत-से हो गये थे॥ ५९-६० ॥

तदनन्तर विजयी सेनापति महाबली नील अपने इस महान् कर्मके कारण प्रशंसित होते हुए श्रीराम और लक्ष्मणसे आकर मिले और बड़े हर्षका अनुभव करने लगे॥ ६१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें अट्ठावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५८ ॥