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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

अट्ठानबेवाँ सर्ग

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अट्ठानबेवाँ सर्ग

सीताके लिये श्रीरामका खेद, ब्रह्माजीका उन्हें समझाना और उत्तरकाण्डका शेष अंश सुननेके लिये प्रेरित करना

विदेहकुमारी सीताके रसातलमें प्रवेश कर जानेपर श्रीरामके समीप बैठे हुए सम्पूर्ण वानर तथा ऋषि-मुनि कहने लगे—‘साध्वी सीते! तुम धन्य हो’॥ १ ॥

किंतु स्वयं भगवान् श्रीराम बहुत दुःखी हुए। उनका मन उदास हो गया और वे गूलरके दण्डका सहारा लिये खड़े हो सिर झुकाये नेत्रोंसे आँसू बहाने लगे॥ २ ॥

बहुत देरतक रोकर बारम्बार आँसू बहाते हुए क्रोध और शोकसे युक्त हो श्रीरामचन्द्रजी इस प्रकार बोले—॥ ३ ॥

‘आज मेरा मन अभूतपूर्व शोकमें डूबना चाहता है; क्योंकि इस समय मेरी आँखोंके सामनेसे मूर्तिमती लक्ष्मीके समान सीता अदृश्य हो गयीं॥ ४ ॥

‘पहली बार सीता समुद्रके उस पार लङ्कामें जाकर मेरी आँखोंसे ओझल हुईं थीं। किंतु जब मैं वहाँसे भी उन्हें लौटा लाया, तब पृथ्वीके भीतरसे ले आना कौन बड़ी बात है?’॥ ५ ॥

(यों कहकर वे पृथ्वीसे बोले—) ‘पूजनीये भगवति वसुन्धरे! मुझे सीताको लौटा दो; अन्यथा मैं अपना क्रोध दिखाऊँगा। मेरा प्रभाव कैसा है? यह तुम जानती हो॥ ६ ॥

‘देवि! वास्तवमें तुम्हीं मेरी सास हो। राजा जनक हाथमें फाल लिये तुम्हींको जोत रहे थे, जिससे तुम्हारे भीतरसे सीताका प्रादुर्भाव हुआ॥ ७ ॥

‘अतः या तो तुम सीताको लौटा दो अथवा मेरे लिये भी अपनी गोदमें जगह दो; क्योंकि पाताल हो या स्वर्ग, मैं सीताके साथ ही रहूँगा॥ ८ ॥

‘तुम मेरी सीताको लाओ! मैं मिथिलेशकुमारीके लिये मतवाला (बेसुध) हो गया हूँ। यदि इस पृथ्वीपर तुम उसी रूपमें सीताको मुझे लौटा नहीं दोगी तो मैं पर्वत और वनसहित तुम्हारी स्थितिको नष्ट कर दूँगा। सारी भूमिका विनाश कर डालूँगा। फिर भले ही सब कुछ जलमय ही हो जाय’॥ ९-१० ॥

श्रीरघुनाथजी जब क्रोध और शोकसे युक्त हो इस प्रकारकी बातें कहने लगे, तब देवताओंसहित ब्रह्माजीने उन रघुकुलनन्दन श्रीरामसे कहा—॥ ११ ॥

‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाले श्रीराम! आप मनमें संताप न करें। शत्रुसूदन! अपने पूर्व स्वरूपका स्मरण करें॥ १२ ॥

‘महाबाहो! मैं आपको आपके परम उत्तम स्वरूपका स्मरण नहीं दिला रहा हूँ। दुर्धर्ष वीर! केवल यह अनुरोध कर रहा हूँ कि इस समय आप ध्यानके द्वारा अपने वैष्णव स्वरूपका स्मरण करें॥ १३ ॥

‘साध्वी सीता सर्वथा शुद्ध हैं। वे पहलेसे ही आपके ही परायण रहती हैं। आपका आश्रय लेना ही उनका तपोबल है। उसके द्वारा वे सुखपूर्वक नागलोकके बहाने आपके परमधाममें चली गयी हैं॥ १४ ॥

‘अब पुनः साकेतधाममें आपकी उनसे भेंट होगी; इसमें संशय नहीं है। अब इस सभामें मैं आपसे जो कुछ कहता हूँ, उसपर ध्यान दीजिये॥ १५ ॥

‘आपके चरित्रसे सम्बन्ध रखनेवाला यह काव्य, जिसे आपने सुना है, सब काव्योंमें उत्तम है। श्रीराम! यह आपके सारे जीवन-वृत्तका विस्तारसे ज्ञान करायेगा, इसमें संदेह नहीं है॥ १६ ॥

‘वीर! आविर्भावकालसे ही जो आपके द्वारा सुख-दुःखोंका (स्वेच्छासे) सेवन हुआ है, उसका तथा सीताके अन्तर्धान होनेके बाद जो भविष्यमें होनेवाली बातें हैं, उनका भी महर्षि वाल्मीकिने इसमें पूर्णरूपसे वर्णन कर दिया है॥ १७ ॥

‘श्रीराम! यह आदिकाव्य है। इस सम्पूर्ण काव्यकी आधारशिला आप ही हैं—आपके ही जीवनवृत्तान्तको लेकर इस काव्यकी रचना हुई है। रघुकुलकी शोभा बढ़ानेवाले आपके सिवा दूसरा कोई ऐसा यशस्वी पुरुष नहीं है, जो काव्योंका नायक होनेका अधिकारी हो॥

‘देवताओंके साथ मैंने पहले आपसे सम्बन्धित इस सम्पूर्ण काव्यका श्रवण किया है। यह दिव्य और अद्भुत है। इसमें कोई भी बात छिपायी नहीं गयी है। इसमें कही गयी सारी बातें सत्य हैं॥ १९ ॥

‘पुरुषसिंह रघुनन्दन! आप धर्मपूर्वक एकाग्रचित्त हो भविष्यकी घटनाओंसे युक्त शेष रामायण काव्यको भी सुन लीजिये॥ २० ॥

‘महायशस्वी एवं महातेजस्वी श्रीराम! इस काव्यके अन्तिम भागका नाम उत्तरकाण्ड है। उस उत्तम भागको आप ऋषियोंके साथ सुनिये॥ २१ ॥

‘काकुत्स्थवीर रघुनन्दन! आप सर्वोत्कृष्ट राजर्षि हैं। अतः पहले आपको ही यह उत्तम काव्य सुनना चाहिये, दूसरेको नहीं’॥ २२ ॥

इतना कहकर तीनों लोकोंके स्वामी ब्रह्माजी देवताओं एवं उनके बन्धु-बान्धवोंके साथ अपने लोकको चले गये॥ २३ ॥

वहाँ जो ब्रह्मलोकमें रहनेवाले महातेजस्वी महात्मा ऋषि विद्यमान थे, वे ब्रह्माजीकी आज्ञा पाकर भावी वृत्तान्तोंसे युक्त उत्तरकाण्डको सुननेकी इच्छासे लौट आये (उनके साथ ब्रह्मलोकमें नहीं गये)॥ २४ १/२ ॥

तत्पश्चात् देवाधिदेव ब्रह्माजीकी कही हुई उस शुभ वाणीको याद करके परम तेजस्वी श्रीरामजीने महर्षि वाल्मीकिसे इस प्रकार कहा— ॥ २५ १/२ ॥

‘भगवन्! ये ब्रह्मलोकके निवासी महर्षि मेरे भावी चरित्रोंसे युक्त उत्तरकाण्डका शेष अंश सुनना चाहते हैं। अतः कल सबेरेसे ही उसका गान आरम्भ हो जाना चाहिये’॥ २६ ॥

ऐसा निश्चय करके श्रीरघुनाथजीने जनसमुदायको बिदा कर दिया और कुश तथा लवको साथ लेकर वे अपनी पर्णशालामें आये। वहाँ सीताका ही चिन्तन करते-करते उन्होंने रात व्यतीत की॥ २७-२८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें अट्ठानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९८ ॥