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संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

५४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १३

५४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १३
[संस्कृत श्लोक]
तयैवमुक्तः सावित्र्या भिक्षामदाय सोऽग्रतः।
चिन्तयन् मनसा तस्याः शक्तिं दूरार्थवेदिनीम्॥ ३१
एत्याश्रमे मठे स्थाप्य भिक्षापात्रं प्रयत्नतः।
पतिव्रतायां भुक्तायां गृहस्थे निर्गते पतौ॥ ३२
पुनरागम्य तद्गेहं तामुवाच पतिव्रताम्।
ब्रह्मचार्युवाच
प्रब्रूह्येतन्महाभागे पृच्छतो मे यथार्थतः॥ ३३
विप्रकृष्टार्थविज्ञानं कथमाशु तवाभवत्।
इत्युक्ता तेन सा साध्वी सावित्री तु पतिव्रता॥ ३४
तं ब्रह्मचारिणं प्राह पृच्छन्तं गृहमेत्य वै।
शृणुष्वावहितो ब्रह्मन् यन्मां त्वं परिपृच्छसि॥ ३५
तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि स्वधर्मपरिबृंहितम्।
स्त्रीणां तु पतिशुश्रूषा धर्म एषः परःस्थितः॥ ३६
तमेवाहं सदा कुर्यां नान्यमस्मि महामते।
दिवारात्रमसंदिग्धं श्रद्धया परितोषणम्॥ ३७
कुर्वन्त्या मम सम्भूतं विप्रकृष्टार्थदर्शनम्।
अन्यच्च ते प्रवक्ष्यामि निबोध त्वं यदीच्छसि॥ ३८
पिता यायावरः शुद्धस्तस्माद्वेदमधीत्य वै।
मृते पितरि कृत्वा तु प्रेतकार्यमिहागतः॥ ३९
उत्सृज्य मातरं द्रष्टुं वृद्धां दीनां तपस्विनीम्।
अनाथां विधवामत्र नित्यं स्वोदरपोषकः॥ ४०
यया गर्भे धृतः पूर्वं पालितो लालितस्तथा।
तां त्यक्त्वा विपिने धर्मं चरन् विप्र न लज्जसे॥ ४१
यया तव कृतं ब्रह्मन् बाल्ये मलनिकृन्तनम्।
दुःखितां तां गृहे त्यक्त्वा किं भवेद्विपिनेऽटतः॥ ४२
मातृदुःखेन ते वक्त्रं पूतिगन्धमिदं भवेत्।
पित्रैव संस्कृतो यस्मात् तस्माच्छक्तिरभूदियम्॥ ४३
[हिन्दी अनुवाद]
सावित्रीके यों कहनेपर उससे भिक्षा लेकर वह आगे चला और उसकी दूरवर्ती घटनाको जान लेनेवाली शक्तिका मन-ही-मन चिन्तन करता हुआ अपने आश्रमपर पहुँचा। वहाँ भिक्षापात्रको यत्नपूर्वक मठमें रखकर जब पतिव्रता भोजनसे निवृत्त हो गयी और जब उसका गृहस्थ पति घरसे बाहर चला गया, तब वह पुनः उसके घर आया और उस पतिव्रतासे बोला॥ ३१-३२१/२॥
ब्रह्मचारीने कहा— महाभागे! मैं तुमसे एक बात पूछता हूँ, तुम मुझे यथार्थरूपसे बताओ, तुम्हें दूरकी घटनाका ज्ञान इतना शीघ्र कैसे हो गया?॥ ३३१/२॥
उसके यों कहनेपर वह साध्वी पतिव्रता सावित्री घर आकर प्रश्न करनेवाले उस ब्रह्मचारीसे यों बोली—'ब्रह्मन्! तुम मुझसे जो कुछ पूछते हो, उसे सावधान होकर सुनो—स्वधर्म-पालनसे बढ़े हुए अपने परोक्षज्ञानके विषयमें मैं तुमसे भलीभाँति बताऊँगी। पतिकी सेवा करना ही स्त्रियोंका सुनिश्चित परम धर्म है। महामते! मैं सदा उसी धर्मका पालन करती हूँ, किसी अन्य धर्मका नहीं। निस्संदेह मैं दिन-रात श्रद्धापूर्वक पतिको संतुष्ट करती रहती हूँ, इसीलिये मुझे दूर होनेवाली घटनाका भी ज्ञान हो जाता है। मैं तुम्हें कुछ और भी बताऊँगी; तुम्हारी इच्छा हो, तो सुनो—'तुम्हारे पिता यज्ञशर्मा यायावर-वृत्तिके शुद्ध ब्राह्मण थे। उनसे ही तुमने वेदाध्ययन किया था। पिताके मर जानेपर उनका प्रेतकार्य करके तुम यहाँ चले आये। दीन-अवस्थामें पड़कर कष्ट भोगती हुई उस अनाथ विधवा वृद्धा माताकी देख-भाल करना छोड़कर तुम यहाँ रोज अपना ही पेट भरनेमें लगे हुए हो। ब्राह्मण! जिसने पहले तुम्हें गर्भमें धारण किया और जन्मके बाद तुम्हारा लालन-पालन किया, उसे असहायावस्थामें छोड़कर वनमें धर्माचरण करते हुए तुम्हें लज्जा नहीं आती? ब्रह्मन्! जिसने बाल्यावस्थामें तुम्हारा मल-मूत्र साफ किया था, उस दुखिया माताको घरमें अकेली छोड़कर वनमें घूमनेसे तुम्हें क्या लाभ होगा? माताके कष्टसे तुम्हारा मुँह दुर्गन्धयुक्त हो जायगा। तुम्हारे पिताने ही तुम्हारा उत्तम संस्कार कर दिया था, जिससे तुम्हें यह
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अध्याय १३ ] पतिव्रताकी शक्ति; उसके साथ एक ब्रह्मचारीका संवाद ५५
पक्षी दग्धः सुदुर्बुद्धे पापात्मन् साम्प्रतं वृथा। शक्ति प्राप्त हुई है। दुर्बुद्धि पापात्मन् ! तुमने व्यर्थ ही
वृथा स्नानं वृथा तीर्थं वृथा जप्तं वृथा हुतम् ॥ ४४ पक्षियोंको जलाया। इस समय तुम्हारा किया हुआ स्नान,
तीर्थसेवन, जप और होम—सब व्यर्थ है। ब्रह्मन् ! जिसकी
स जीवति वृथा ब्रह्मन् यस्य माता सुदुःखिता। माता अत्यन्त दुःखमें पड़ी हो, वह व्यर्थ ही जीवन धारण
यो रक्षेत् सततं भक्त्या मातरं मातृवत्सलः ॥ ४५ करता है। जो पुत्र मातापर दया करके भक्तिपूर्वक निरन्तर
उसकी रक्षा करता है, उसका किया हुआ सब कर्म यहाँ
तस्येहानुष्ठितं सर्वं फलं चामुत्र चेह हि। और परलोकमें भी फलप्रद होता है। ब्रह्मन् ! जिन उत्तम
मातृश्च वचनं ब्रह्मन् पालितं यैर्नरोत्तमैः ॥ ४६ पुरुषोंने माताके वचनका पालन किया है, वे इस लोक
ते मान्यास्ते नमस्कार्या इह लोके परत्र च। और परलोकमें भी माननीय तथा नमस्कारके योग्य हैं।
अतस्त्वं तत्र गत्वाद्य यत्र माता व्यवस्थिता ॥ ४७ अतः जहाँ तुम्हारी माता है, वहाँ जाकर उसके जीते-जी
उसीकी रक्षा करो। उसकी रक्षा करना ही तुम्हारे लिये
तां त्वं रक्षय जीवन्तीं तद्रक्षा ते परं तपः। परम तपस्या है। इस क्रोधको त्याग दो; क्योंकि यह
क्रोधं परित्यजैनं त्वं दृष्टादृष्टविघातकम् ॥ ४८ तुम्हारे दृष्ट और अदृष्ट—सभी कर्मोंको नष्ट करनेवाला
है। उन पक्षियोंकी हत्याके पापसे अपनी शुद्धिके लिये
तयोः कुरु वधे शुद्धिं पक्षिणोरात्मशुद्धये। तुम प्रायश्चित्त करो। यह सब मैंने तुमसे यथार्थ बातें कही
याथातथ्येन कथितमेतत्सर्वं मया तव ॥ ४९ हैं। ब्रह्मचारिन् ! यदि तुम सत्पुरुषोंकी गतिको प्राप्त करना
चाहते हो तो मेरे कहे अनुसार करो' ॥ ३४-४९१/२ ॥
ब्रह्मचारिन् कुरुष्व त्वं यदीच्छसि सतां गतिम्।
इत्युक्त्वा विररामाथ द्विजपुत्रं पतिव्रता ॥ ५० ब्राह्मणकुमारसे यों कहकर वह पतिव्रता चुप हो
गयी। तब ब्रह्मचारी भी पुनः अपने अपराधके लिये
सोऽपि तामाह भूयोऽपि सावित्रीं तु क्षमापयन्। क्षमा माँगता हुआ सावित्रीसे बोला—'वरवर्णिनि ! अनजानमें
अज्ञानात्कृतपापस्य क्षमस्व वरवर्णिनि ॥ ५१ किये हुए मेरे इस पापको क्षमा करो। महाभागे! पतिव्रते !
तुमने मेरे हितकी ही बात कही है। मैंने जो क्रोधपूर्वक
मया तवाहितं यच्च कृतं क्रोधनिरीक्षणम्। तुम्हारी ओर देखकर तुम्हारा अपराध किया था, उसे
तत् क्षमस्व महाभागे हितमुक्तं पतिव्रते ॥ ५२ क्षमा कर दो। शुभव्रते ! अब मुझे माताके पास जाकर
जिन कर्तव्योंका पालन करना चाहिये, उन्हें बताओ,
तत्र गत्वा मया यानि कर्माणि तु शुभव्रते। जिनके करनेसे मेरी शुभगति हो' ॥ ५०-५३ ॥
कार्याणि तानि मे ब्रूहि यथा मे सुगतिर्भवेत् ॥ ५३
उसके इस प्रकार कहनेपर उस पूछनेवाले ब्राह्मणसे
तेनैवमुक्ता साप्याह तं पृच्छन्तं पतिव्रता। पतिव्रता सावित्री पुनः बोली— 'ब्रह्मन् ! वहाँ तुमको
यानि कार्याणि वक्ष्यामि त्वया कर्माणि मे शृणु ॥ ५४ जो कर्म करने चाहिये, उन्हें बतलाती हूँ; सुनो—
'तुम्हें भिक्षावृत्तिसे जीवननिर्वाह करते हुए वहाँ माताका
पोष्या माता त्वया तत्र निश्चयं भैक्षवृत्तिना। निश्चय ही पोषण करना चाहिये और पक्षियोंकी हत्याका
अत्र वा तत्र वा ब्रह्मन् प्रायश्चित्तं च पक्षिणोः ॥ ५५ प्रायश्चित्त यहाँ अथवा वहाँ अवश्य करना चाहिये।
यज्ञशर्माकी* पुत्री तुम्हारी पत्नी होगी। उसे ही तुम
यज्ञशर्मसुता कन्या भार्या तव भविष्यति। धर्मपूर्वक ग्रहण करो। तुम्हारे जानेपर यज्ञशर्मा अपनी
तां गृह्णीष्व च धर्मेण गते त्वयि स दास्यति ॥ ५६ कन्या तुम्हें दे देंगे। उसके गर्भसे तुम्हारी वंश-परम्पराको
बढ़ानेवाला एक पुत्र होगा। पिताकी भाँति यायावर-
पुत्रस्ते भविता तस्यामेकः संततिवर्धनः ।
यायावरधनाद्वृत्तिः पितृवत्ते भविष्यति ॥ ५७ वृत्तिसे प्राप्त हुए धनसे ही तुम अपनी जीविका चलाओगे।

  • ये यज्ञशर्मा देवशर्माके पितासे भिन्न थे।

५६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १४
पुनर्मृतायां भार्यायां भविता त्वं त्रिदण्डकः। फिर तुम अपनी पत्नीकी मृत्युके बाद त्रिदण्डी (संन्यासी)
स यत्याश्रमधर्मेण यथोक्त्यानुष्ठितेन च। हो जाओगे। वहाँ संन्यासाश्रमके लिये शास्त्रविहित
नरसिंहप्रसादेन वैष्णवं पदमाप्स्यसि॥ ५८ धर्मका यथावत् रूपसे पालन करनेपर भगवान् नरसिंहकी
प्रसन्नतासे तुम विष्णुपदको प्राप्त कर लोगे।' तुम्हारे
भाव्यमेतत्तु कथितं मया तव हि पृच्छतः। पूछनेपर मैंने ये भविष्यमें होनेवाली बातें तुमसे बतला
मन्यसे नानृतं त्वेतत् कुरु सर्वं हि मे वचः॥ ५९ दी हैं। यदि तुम इन्हें असत्य नहीं मानते, तो मेरे सब
वचनोंका पालन करो'॥ ५४—५९॥
ब्राह्मण उवाच
ब्राह्मण बोला—पतिव्रते! मैं माताकी रक्षाके लिये
गच्छामि मातृरक्षार्थमद्यैवाहं पतिव्रते। आज ही जाता हूँ। शुभेक्षणे! वहाँ जाकर तुम्हारी सब
करिष्ये त्वद्वचः सर्वं तत्र गत्वा शुभेक्षणे॥ ६० बातोंका मैं पालन करूँगा॥ ६०॥
इत्युक्त्वा गतवान् ब्रह्मन् देवशर्मा ततस्त्वरन्। ब्रह्मन्! यों कहकर देवशर्मा वहाँसे शीघ्रतापूर्वक
संरक्ष्य मातरं यत्नात् क्रोधमोहविवर्जितः॥ ६१ चला गया और क्रोध तथा मोहसे रहित होकर उसने
यत्न-पूर्वक माताकी रक्षा की। फिर विवाह करके एक
कृत्वा विवाहमुत्पाद्य पुत्रं वंशकरं शुभम्। सुन्दर वंशवर्धक पुत्र उत्पन्न किया और कुछ कालके
मृतभार्यश्च संन्यस्य समलोष्टाश्मकाञ्चनः। बाद पत्नीकी मृत्यु हो जानेपर संन्यासी होकर ढेले और
नरसिंहप्रसादेन परां सिद्धिमवाप्तवान्॥ ६२ मिट्टीको बराबर समझते हुए उसने भगवान् नृसिंहकी
पतिव्रताशक्तिरियं तवेरिता कृपासे परमसिद्धि (मोक्ष) प्राप्त कर ली। यह मैंने तुमसे
धर्मश्च मातुः परिरक्षणं परम्। पतिव्रताकी शक्ति बतायी और यह भी बतलाया कि
संसारवृक्षं च निहत्य बन्धनं माताकी रक्षा करना परम धर्म है। संसारवृक्षका उच्छेद
छित्त्वा च विष्णोः पदमेति मानवः॥ ६३ करके सब बन्धनोंको तोड़ देनेपर मनुष्य विष्णुपदको
प्राप्त करता है॥ ६१—६३॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे ब्रह्मचारिसंवादो नाम त्रयोदशोऽध्यायः॥ १३॥
इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'पतिव्रता और ब्रह्मचारीका संवाद' विषयक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १३॥
चौदहवाँ अध्याय
तीर्थसेवन और आराधनसे भगवान्‌की प्रसन्नता; 'अनाश्रमी' रहनेसे दोष तथा
आश्रमधर्मके पालनसे भगवत्प्राप्तिका कथन
व्यास उवाच व्यासजी बोले—महाबुद्धिमान् पुत्र शुकदेव! तुम
शृणु वत्स महाबुद्धे शिष्याश्चैतां परां कथाम्। और मेरे अन्य शिष्यगण भी मेरे द्वारा कही जानेवाली
मयोच्यमानां शृण्वन्तु सर्वपापप्रणाशिनीम्॥ १ इस पापहारिणी कथाको सुनो॥ १॥
पूर्वकालमें कोई वेदशास्त्रविशारद श्रेष्ठ ब्राह्मण अपनी
पुरा द्विजवरः कश्चिद्वेदशास्त्रविशारदः। पत्नीकी मृत्यु हो जानेपर तीर्थमें गया और वहाँ उसने
मृतभार्यो गतस्तीर्थं चक्रे स्नानं यथाविधि॥ २ विधिपूर्वक स्नान किया और विजन (एकान्त)-में रहकर
तपः सुतप्तं विजने निःस्पृहो दारकर्मणि। उत्तम तपस्या की। तत्पश्चात् दारकर्म (विवाह)-की
भिक्षाहारः प्रवसितो जपस्नानपरायणः॥ ३ इच्छा न रखकर वह परदेशमें रहता हुआ भिक्षा माँगकर
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यहाँ पृष्ठ का पूर्ण लिप्यन्तरण (Transcription) प्रस्तुत है:

अध्याय १४ ] तीर्थसेवन और आराधनासे भगवान्‌की प्रसन्नता ५७


[बायाँ स्तम्भ - मूल संस्कृत श्लोक]

स्नात्वा स गङ्गां यमुनां सरस्वतीं
पुण्यां वितस्तामथ गोमतीं च।
गयां समासाद्य पितॄन् पितामहान्
संतर्पयन् सन् गतवान् महेन्द्रम्॥ ४
तत्रापि कुण्डेषु गिरौ महामतिः
स्नात्वा नु दृष्ट्वा भृगुनन्दनोत्तमम्।
कृत्वा पितृभ्यस्तु तथैव तृप्तिं
व्रजन् वनं पापहरं प्रविष्टः॥ ५
धारां पतन्तीं महतीं शिलोच्चयात्
संधार्य भक्त्या त्वनु नारसिंहे।
शिरस्यशेषाघविनाशिनीं तदा
विशुद्धदेहः स बभूव विप्रः॥ ६
विन्ध्याचले सक्तमनन्तमच्युतं
भक्तैर्मुनीन्द्रैरपि पूजितं सदा।
आराध्य पुष्पैर्गिरिसम्भवैः शुभै-
स्तत्रैव सिद्धिं त्वभिकांक्ष्य संस्थितः॥ ७
स नारसिंहो बहुकालपूजया
तुष्टः सुनिद्रागतमाह भक्तम्।
अनाश्रमित्वं गृहभङ्गकारणं
ह्यतो गृहाणाश्रममुत्तमं द्विज॥ ८
अनाश्रमीति द्विजवेदपारगा-
नपि त्वहं नानुगृहामि चात्र।
तथापि निष्ठां तव वीक्ष्य सत्तम
त्वयि प्रसन्नेन मयेत्युदीरितम्॥ ९
तेनैवमुक्तः परमेश्वरेण
द्विजोऽपि बुद्ध्या प्रविचिन्त्य वाक्यम्।
हरेरलङ्घ्यं नरसिंहमूर्ते-
र्बाधं च कृत्वा स यतिर्बभूव॥ १०
त्रिदण्डवृक्षाक्षपवित्रपाणि-
राप्लुत्य तोये त्वघहारिणि स्थितः।
जपन् सदा मन्त्रमपास्तदोषं
सावित्रीमिशं हृदये स्मरन् हरिम्॥ ११
यथाकथंचित् प्रतिलभ्य शाकं
भैक्ष्याभितुष्टो वनवासवासी।
अभ्यर्च्य विष्णुं नरसिंहमूर्तिं
ध्यात्वा च नित्यं हृदि शुद्धमाद्यम्॥ १२


[दायाँ स्तम्भ - हिन्दी अनुवाद]

जीवननिर्वाह करने और जप, स्नान आदि उत्तम कर्ममें तत्पर रहने लगा। गङ्गा, यमुना, सरस्वती, पावन वितस्ता (झेलम) और गोमती आदिमें स्नान करके वह गयामें पहुँचा और वहाँ अपने पिता-पितामह आदिका तर्पण करके महेन्द्र पर्वतपर गया। वहाँ उस परम बुद्धिमान् द्विजने पर्वतीय कुण्डोंमें स्नान करनेके पश्चात् ऋषिश्रेष्ठ भृगुनन्दन परशुरामजीका दर्शन किया; फिर पूर्ववत् पितरोंके लिये तर्पण करके चलते-चलते एक वनमें प्रवेश किया, जो पापोंका नाश करनेवाला था॥ २—५॥

वहाँ एक पर्वतसे बहुत बड़ी धारा गिरती थी, जो निश्शेष पापराशिका विनाश करनेवाली थी। उसके जलको लेकर ब्राह्मणने भक्तिपूर्वक भगवान् नृसिंहके मस्तकपर चढ़ाया। इससे उसी समय उसका शरीर विशुद्ध हो गया। फिर विन्ध्याचल पर्वतपर स्थित होकर भक्तों और मुनीश्वरोंसे सदा पूजित होनेवाले अनन्त अच्युत भगवान् विष्णुकी सुन्दर पर्वतीय पुष्पोंसे पूजा करता हुआ वह ब्राह्मण सिद्धिकी कामनासे वहीं ठहर गया॥ ६-७॥

इस तरह दीर्घकालतक उसने पूजा की। उससे प्रसन्न होकर वे भगवान् नृसिंह गाढ़ निद्रामें सोये हुए अपने उस भक्तसे स्वप्नमें दर्शन देकर बोले—‘ब्रह्मन्! किसी आश्रमधर्मको स्वीकार करके न चलना गृहस्थकी मर्यादाके भङ्गका कारण होता है; अतः यदि तुम्हें गृहस्थ नहीं रहना है तो किसी दूसरे उत्तम आश्रमको ग्रहण करो। ब्रह्मन्! जो किसी आश्रममें स्थित नहीं है, वह यदि वेदोंका पारगामी विद्वान् हो, तो भी मैं यहाँ उसपर अनुग्रह नहीं करता; परंतु साधुवर! तुम्हारी निष्ठा देखकर मैं तुमपर प्रसन्न हूँ, इसीसे मैंने तुमसे यह बात कही है'॥ ८-९॥

उन परमेश्वरके इस प्रकार कहनेपर उस ब्राह्मणने भी अपनी बुद्धिसे नृसिंहस्वरूप श्रीहरिके उस कथनपर विचार करके उसे अलङ्घनीय माना और सम्पूर्ण जगत्‌का बाध (त्याग) करके वह संन्यासी हो गया॥ १०॥

फिर प्रतिदिन उस पापहारी जलमें डुबकी लगाकर तथा उसीमें खड़ा रहकर त्रिदण्ड और अक्षमाला धारण करनेसे पवित्र हाथोंवाला वह ब्राह्मण मन-ही-मन भगवान् विष्णुका स्मरण करता हुआ निर्दोष गायत्री-मन्त्रका जप करने लगा। नित्यप्रति शुद्ध आदिदेव भगवान् विष्णुका हृदयमें ध्यान करके उनके नृसिंह-विग्रहका पूजन करता


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