संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
आठवाँ अध्याय
अध्याय ८ ] मृत्यु और दूतोंको समझाते हुए यमका उन्हें वैष्णवोंके पास जानेसे रोकना ३३
आठवाँ अध्याय
मृत्यु और दूतोंको समझाते हुए यमका उन्हें वैष्णवोंके पास जानेसे रोकना;
उनके मुँहसे श्रीहरिके नामकी महिमा सुनकर नरकस्थ जीवोंका
भगवान्को नमस्कार करके श्रीविष्णुके धाममें जाना
श्रीव्यास उवाच
मृत्युश्च किंकराश्चैव विष्णुदूतैः प्रपीडिताः।
स्वराज्ञस्तेऽनु निर्वेशं गत्वा ते चुक्रुशुर्भृशम् ॥ १
श्रीव्यासजी बोले—विष्णुदूतोंके द्वारा अत्यन्त पीड़ित हुए मृत्युदेव और यमदूत अपने राजा यमके भवनमें जाकर बहुत रोने-कलपने लगे॥ १॥
मृत्युकिंकरा ऊचुः
शृणु राजन् वचोऽस्माकं तवाग्रे यद् ब्रवीमहे ।
त्वदादेशाद्वयं गत्वा मृत्युं संस्थाप्य दूरतः ॥ २
ब्राह्मणस्य समीपं च भृगोः पौत्रस्य सत्तम।
तं ध्यायमानं कमपि देवमेकाग्रमानसम् ॥ ३
गन्तुं न शक्तास्तत्पार्श्वं वयं सर्वे महामते।
यावत्तावन्महाकायैः पुरुषैर्मुशलैर्हताः ॥ ४
वयं निवृत्तास्तद्वीक्ष्य मृत्युस्तत्र गतः पुनः।
अस्मान्निर्भर्त्स्य तत्रायं तैनैरैर्मुशलैर्हतः ॥ ५
एवमत्र तमानेतुं ब्राह्मणं तपसि स्थितम्।
अशक्ता वयमेवात्र मृत्युना सह वै प्रभो ॥ ६
तद्ब्रवीहि महाभाग यद्ब्रह्म ब्राह्मणस्य तु।
देवं कं ध्यायते विप्रः के वा ते यैर्हता वयम् ॥ ७
मृत्यु और यमदूत बोले—राजन् ! आपके आगे हम जो कुछ कह रहे हैं, हमारी इन बातोंको आप सुनें। हमलोगोंने आपकी आज्ञाके अनुसार यहाँसे जाकर मृत्युको तो दूर ठहरा दिया और स्वयं भृगुके पौत्र ब्राह्मण मार्कण्डेयके समीप गये। परंतु सत्पुरुषशिरोमणे ! वह उस समय एकाग्रचित्त होकर किसी देवताका ध्यान कर रहा था। महामते! हम सभी लोग उसके पासतक पहुँचने भी नहीं पाये थे कि बहुत-से महाकाय पुरुष मूसलसे हमें मारने लगे। तब हमलोग तो लौट पड़े, परंतु यह देखकर मृत्युदेव वहाँ फिर पधारे। तब हमें डाँट-फटकारकर उन लोगोंने इन्हें भी मूसलोंसे मारा। प्रभो! इस प्रकार तपस्यामें स्थित हुए उस ब्राह्मणको यहाँतक लानेमें मृत्युसहित हम सब लोग समर्थ न हो सके। महाभाग ! उस ब्राह्मणका जो तप है, उसे आप बतलाइये, वह किस देवताका ध्यान कर रहा था और जिन लोगोंने हमें मारा, वे कौन थे ? ॥ २-७ ॥
व्यास उवाच
इत्युक्तः किंकरैः सर्वैर्मृत्युना च महामते।
ध्यात्वा क्षणं महाबुद्धिः प्राह वैवस्वतो यमः ॥ ८
व्यासजी कहते हैं—महामते ! मृत्यु तथा समस्त दूतोंके इस प्रकार कहनेपर महाबुद्धि सूर्यकुमार यमने क्षणभर ध्यान करके कहा ॥ ८ ॥
यम उवाच
शृण्वन्तु किंकराः सर्वे मृत्युश्चान्ये च मे वचः।
सत्यमेतत्प्रवक्ष्यामि ज्ञानं यद्योगमार्गतः ॥ ९
भृगोः पौत्रो महाभागो मार्कण्डेयो महामतिः ।
स ज्ञात्वाद्यात्मनः कालं गतो मृत्युजिगीषया ॥ १०
भृगुणोक्तेन मार्गेण स तेपे परमं तपः।
हरिमाराध्य मेधावी जपन् वै द्वादशाक्षरम् ॥ ११
यम बोले—मृत्यु तथा मेरे अन्य सभी किंकर आज मेरी बात सुनें—योगमार्ग (समाधि)-के द्वारा मैंने इस समय जो कुछ जाना है, वही सच-सच बतला रहा हूँ। भृगुके पौत्र महाबुद्धिमान् महाभाग मार्कण्डेयजी आजके दिन अपनी मृत्यु जानकर मृत्युको जीतनेकी इच्छासे तपोवनमें गये थे। वहाँ उन बुद्धिमान्ने भृगुजीके बतलाये हुए मार्गके अनुसार भगवान् विष्णुकी आराधना एवं द्वादशाक्षर मन्त्रका जप करते हुए उत्कृष्ट तपस्या की
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३४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ८
[बायाँ स्तम्भ - मूल संस्कृत श्लोक]
एकाग्रेणैव मनसा ध्यायते हृदि केशवम्।
सततं योगयुक्तस्तु स मुनिस्तत्र किंकराः ॥ १२
हरिध्यानमहादीक्षाबलं तस्य महामुनेः।
नान्यद्वै प्राप्तकालस्य बलं पश्यामि किंकराः ॥ १३
हृदिस्थे पुण्डरीकाक्षे सततं भक्तवत्सले।
पश्यन्तं विष्णुभूतं नु को हि स्यात् केशवाश्रयम् ॥ १४
तेऽपि वै पुरुषा विष्णोर्यैर्युयं ताडिता भृशम्।
अत ऊर्ध्वं न गन्तव्यं यत्र वै वैष्णवाः स्थिताः ॥ १५
न चित्रं ताडनं तत्र अहं मन्ये महात्मभिः ।
भवतां जीवनं चित्रं यक्षैर्दत्तं कृपालुभिः ॥ १६
नारायणपरं विप्रं कस्तं वीक्षितुमुत्सहेत्।
युष्माभिश्च महापापैर्मार्कण्डेयं हरिप्रियम्।
समानेतुं कृतो यत्नः समीचीनं न तत्कृतम् ॥ १७
नरसिंहं महादेवं ये नराः पर्युपासते।
तेषां पार्श्वे न गन्तव्यं युष्माभिर्मम शासनात् ॥ १८
श्रीव्यास उवाच
स एवं किंकरानुक्त्वा मृत्युं च पुरतः स्थितम्।
यमो निरीक्ष्य च जनं नरकस्थं प्रपीडितम् ॥ १९
कृपया परया युक्तो विष्णुभक्त्या विशेषतः ।
जनस्यानुग्रहार्थाय तेनोक्ताश्च गिरः शृणु ॥ २०
नरके पच्यमानस्य यमेन परिभाषितम्।
किं त्वया नार्चितो देवः केशवः क्लेशनाशनः ॥ २१
उदकेनाप्यलाभे तु द्रव्याणां पूजितः प्रभुः ।
यो ददाति स्वकं लोकं स त्वया किं न पूजितः ॥ २२
नरसिंहो हृषीकेशः पुण्डरीकनिभेक्षणः ।
स्मरणान्मुक्तिदो नृणां स त्वया किं न पूजितः ॥ २३
इत्युक्त्वा नारकान् सर्वान् पुनराह स किंकरान्।
वैवस्वतो यमः साक्षाद्विष्णुभक्तिसमन्वितः ॥ २४
नारदाय स विश्वात्मा प्राहैवं विष्णुरव्ययः ।
अन्येभ्यो वैष्णवेभ्यश्च सिद्धेभ्यः सततं श्रुतम् ॥ २५
तद्वः प्रीत्या प्रवक्ष्यामि हरिवाक्यमनुत्तमम्।
शिक्षार्थं किंकराः सर्वे शृणुत प्रणता हरेः ॥ २६
[दायाँ स्तम्भ - हिन्दी अनुवाद]
है। दूतो ! वे मुनि निरन्तर योगयुक्त होकर वहाँ एकाग्रचित्तसे अपने हृदयमें केशवका ध्यान कर रहे हैं। किंकरो ! उस महामुनिको भगवान् विष्णुके ध्यानकी महादीक्षाका ही बल प्राप्त है; क्योंकि जिसका मरणकाल प्राप्त हो गया है, उसके लिये मैं दूसरा कोई बल नहीं देखता। भक्तवत्सल, कमललोचन भगवान् विष्णुके निरन्तर हृदयस्थ हो जानेपर उस विष्णुस्वरूप भगवच्छरणागत पुरुषकी ओर कौन देख सकता है ? ॥ ९-१४ ॥
वे पुरुष भी, जिन्होंने तुम्हें बहुत मारा है, भगवान् विष्णुके ही दूत हैं। आजसे जहाँ वैष्णव हों, वहाँ तुमलोग न जाना। उन महात्माओंके द्वारा तुम्हारा मारा जाना आश्चर्यकी बात नहीं है। आश्चर्य तो यह है कि उन दयालु महापुरुषोंने तुम्हें जीवित रहने दिया है। भला, नारायणके ध्यानमें तत्पर हुए उस ब्राह्मणको देखनेका भी साहस कौन कर सकता है? तुम महापापियोंने भगवान्के प्रिय भक्त मार्कण्डेयजीको जो यहाँ लानेका प्रयत्न किया है, यह अच्छा नहीं किया। आजसे तुमलोग मेरी आज्ञा मानकर उन महात्माओंके पास न जाना, जो महादेव भगवान् नृसिंहकी उपासना करते हों ॥ १५-१८ ॥
**श्रीव्यासजी कहते हैं—**शुकदेव ! यमने अपने सामने खड़े हुए मृत्युदेव और दूतोंसे इस प्रकार कहकर नरकमें पड़े हुए पीड़ित मनुष्योंकी ओर देखा तथा अत्यन्त कृपा एवं विशेषतः विष्णुभक्तिसे युक्त होकर नारकीय जीवोंपर अनुग्रह करनेके लिये जो बातें कहीं, उन्हें तुम सुनो। नरकमें यातना सहते हुए जीवोंसे यमने कहा—‘पापसे कष्ट पानेवाले जीव ! तुमने क्लेशनाशक भगवान् केशवकी पूजा क्यों नहीं की ? पूजन-सम्बन्धी द्रव्योंके न मिलनेपर केवल जलमात्रसे भी पूजित होनेपर जो भगवान् पूजकको अपना लोकतक दे डालते हैं, उनकी पूजा तुमने क्यों नहीं की? कमलके समान लोचनोंवाले, नरसिंहरूपधारी जो भगवान् हृषीकेश स्मरणमात्रसे ही मनुष्योंको मुक्ति देनेवाले हैं, उनकी पूजा तुमने क्यों नहीं की?' ॥ १९-२३ ॥
नरकमें पड़े हुए जीवोंके प्रति यों कहकर विष्णुभक्तिसे युक्त सूर्यनन्दन यमने अपने किंकरोंसे पुनः कहा—'किंकरो ! अविनाशी विश्वात्मा भगवान् विष्णुने नारदजीसे जैसा कहा था और अन्य वैष्णवों तथा सिद्धोंसे जैसा सदा ही सुना गया है, वह अत्यन्त उत्तम भगवद्वाक्य मैं प्रसन्न होकर तुम लोगोंसे शिक्षाके लिये कह रहा हूँ। तुम सभी भगवान्के शरणागत होकर सुनो ॥ २४-२६॥
अध्याय ८ ] मृत्य और दूतोंको समझाते हुए यमका उन्हें वैष्णवोंके पास जानेसे रोकना ३५
हे कृष्ण कृष्ण कृष्णेति यो मां स्मरति नित्यशः। | भगवान् कहते हैं—'हे कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण !'—
जलं भित्त्वा यथा पद्मं नरकादुद्धराम्यहम् ॥ २७ | इस प्रकार जो मेरा नित्य स्मरण करता है, उसको मैं
| उसी प्रकार नरकसे निकाल लेता हूँ, जैसे जलको
पुण्डरीकाक्ष देवेश नरसिंह त्रिविक्रम। | भेदकर कमल बाहर निकल आता है। 'पुण्डरीकाक्ष !
त्वामहं शरणं प्राप्त इति यस्तं समुद्धरे ॥ २८ | देवेश्वर नरसिंह ! त्रिविक्रम ! मैं आपकी शरणमें पड़ा
| हूँ'—यों जो कहता है, उसका मैं उद्धार कर देता हूँ।
त्वां प्रपन्नोऽस्मि शरणं देवदेव जनार्दन। | 'देवाधिदेव ! जनार्दन ! मैं आपकी शरणमें आ गया
इति यः शरणं प्राप्तस्तं क्लेशादुद्धराम्यहम् ॥ २९ | हूँ'—इस प्रकार जो मेरा शरणागत होता है, उसे मैं
| क्लेशसे मुक्त कर देता हूँ॥ २७-२९॥
व्यास उवाच | व्यासजी कहते हैं—वत्स ! यमराजके कहे हुए
इत्युदीरितमाकर्ण्य हरिवाक्यं यमेन च। | इस भगद्वाक्यको सुनकर नरकमें पड़े हुए जीव 'कृष्ण !
नारकाः कृष्णकृष्णेति नारसिंहेति चुक्रुशुः ॥ ३० | कृष्ण ! नरसिंह !' इत्यादि भगवन्नामोंका जोरसे उच्चारण
| करने लगे। नारकीय जीव वहाँ ज्यों-ज्यों भगवन्नामका
यथा यथा हरेर्नाम कीर्तयन्त्यत्र नारकाः। | कीर्तन करते थे, त्यों-ही-त्यों भगवद्भक्तिसे युक्त होते
तथा तथा हरेर्भक्तिमुद्वहन्तोऽब्रुवन्निदम् ॥ ३१ | जाते थे। इस तरह भक्तिभावसे पूर्ण हो वे इस प्रकार
| कहने लगे ॥ ३०-३१॥
नारका ऊचुः | नरकस्थ जीव बोले—'ॐ' जिनका नाम कीर्तन
ॐ नमो भगवते तस्मै केशवाय महात्मने। | करनेसे नरककी ज्वाला तत्काल शान्त हो जाती है, उन
यन्नामकीर्तनात् सद्यो नरकाग्निः प्रशाम्यति ॥ ३२ | महात्मा भगवान् केशवको नमस्कार है। जो यज्ञोंके
| ईश्वर, आदिमूर्ति, शान्तस्वरूप और संसारके स्वामी हैं,
भक्तप्रियाय देवाय रक्षाय हरये नमः। | उन भक्तप्रिय, विश्वपालक भगवान् विष्णुको नमस्कार
लोकनाथाय शान्ताय यज्ञेशायादिमूर्तये ॥ ३३ | है। अनन्त, अप्रमेय नरसिंहस्वरूप, शङ्ख-चक्र-गदा धारण
अनन्तायाप्रमेयाय नरसिंहाय ते नमः। | करनेवाले, लोकगुरु आप श्रीनारायणको नमस्कार है।
नारायणाय गुरवे शङ्खचक्रगदाभृते ॥ ३४ | वेदोंके प्रिय, महान् एवं विशिष्ट गतिवाले भगवान्को
| नमस्कार है। तर्कके अविषय, वेदस्वरूप, पृथ्वीको
वेदप्रियाय महते विक्रमाय नमो नमः। | धारण करनेवाले भगवान् वाराहको प्रणाम है। ब्राह्मणकुलमें
वाराहायाप्रतर्क्याय वेदाङ्गाय महीभृते ॥ ३५ | अवतीर्ण, वेद-वेदाङ्गोंके ज्ञाता और अनेक विषयोंका
नमो द्युतिमते नित्यं ब्राह्मणाय नमो नमः। | ज्ञान रखनेवाले कान्तिमान् भगवान् वामनको नमस्कार
वामनाय बहुज्ञाय वेदवेदाङ्गधारिणे ॥ ३६ | है। बलिको बाँधनेवाले, वेदके पालक, देवताओंके
| स्वामी, व्यापक, परमात्मा आप वामनरूपधारी
बलिबन्धनदक्षाय वेदपालाय ते नमः। | विष्णुभगवान्को प्रणाम है। शुद्ध द्रव्यमय, शुद्धस्वरूप
विष्णवे सुरनाथाय व्यापिने परमात्मने ॥ ३७ | भगवान् चतुर्भुजको नमस्कार है। दुष्ट क्षत्रियोंका अन्त
| करनेवाले जमदग्निनन्दन भगवान् परशुरामको प्रणाम है।
चतुर्भुजाय शुद्धाय शुद्धद्रव्याय ते नमः। | रावणका वध करनेवाले आप महात्मा श्रीरामको नमस्कार
जामदग्न्याय रामाय दुष्टक्षत्रान्तकारिणे ॥ ३८ | है। गोविन्द ! आपको बारंबार प्रणाम है। आप इस
रामाय रावणान्ताय नमस्तुभ्यं महात्मने। | दुर्गन्धपूर्ण नरकसे हमारा उद्धार करें ॥ ३२-३९॥
अस्मानुद्धर गोविन्द पूतिगन्धान्नमोऽस्तु ते ॥ ३९ |
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