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संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

१५६ श्रीमन्नसिंहपुराण [ अध्याय ४३

१५६ श्रीमन्नसिंहपुराण [ अध्याय ४३
प्रह्लादं चाब्धिमध्यस्थं तमौर्वाग्निमिवापरम् ॥ ३४ बीच समुद्रमें पड़े हुए प्रह्लादको भगवान्‌के तेजसे
दूसरे वडवानलकी भाँति प्रज्वलित देख अत्यन्त भयके
ज्वलन्तं तेजसा विष्णोर्ग्राह्या भूरिभियात्यजन्। कारण ग्राहोंने उन्हें दूरसे ही त्याग दिया। प्रह्लाद भी
स चाभिन्नचिदानन्दसिन्धुमध्ये समाहितः ॥ ३५ अपनेसे अभिन्न चिदानन्दमय समुद्र (परमेश्वर)-में समाहित
होनेके कारण यह न जान सके कि 'मैं बाँधकर खारे
न वेद बद्धमात्मानं लवणाम्बुधिमध्यगम्। पानीके सागरमें डाल दिया गया हूँ।' मुनि (प्रह्लाद) जब
अथ ब्रह्मामृताम्भोधिमये स्वस्मिन् स्थिते मुनौ ॥ ३६ ब्रह्मानन्दामृतके समुद्ररूप अपने आत्मामें स्थित हो गये,
ययौ क्षोभं द्वितीयाब्धिप्रवेशादिव सागरः । उस समय समुद्र इस प्रकार क्षुब्ध हो उठा, मानो उसमें
क्लेशात् क्लेशानि वोद्धूय प्रह्लादमथ वीचयः ॥ ३७ दूसरे महासागरका प्रवेश हो गया हो। फिर समुद्रकी
लहरें प्रह्लादको धीरे-धीरे कठिनाईसे ठेलकर उस नौकारहित
निन्युस्तीरेऽप्लवाम्भोधेः गुरूक्तय इवाम्बुधेः । सागरके तटकी ओर ले गयीं—ठीक उसी प्रकार, जैसे
ध्यानेन विष्णुभूतं तं भगवान् वरुणालयः ॥ ३८ ज्ञानी गुरुके वचन क्लेशोंका उन्मूलन करके शिष्यको
भवसागरसे पार पहुँचा देते हैं। ध्यानके द्वारा विष्णुरूप
विन्यस्य तीरे रत्नानि गृहीत्वा द्रष्टुमाययौ । हुए उन प्रह्लादजीको तीरपर पहुँचाकर भगवान् वरुणालय
तावद् भगवताऽऽदिष्टः प्रहृष्टः पन्नगाशनः ॥ ३९ (समुद्र) बहुत-से रत्न ले उनका दर्शन करनेके लिये
आये। इतनेमें ही भगवान्‌की आज्ञा पाकर सर्पभक्षी
बन्धनाहीन् समभ्येत्य भक्षयित्वा पुनर्ययौ । गरुडजी वहाँ आ पहुँचे और बन्धनभूत सर्पोंको अत्यन्त
अथाबभाषे प्रह्लादं गम्भीरध्वनिरर्णवः ॥ ४० हर्षपूर्वक खाकर चले गये ॥ ३४—३९१/२ ॥
प्रणम्य दिव्यरूपः सन् समाधिस्थं हरेः प्रियम् । तत्पश्चात् गम्भीर घोषवाला दिव्यरूपधारी समुद्र
प्रह्लाद भगवद्भक्त पुण्यात्मन्नर्णवोऽस्म्यहम् ॥ ४१ समाधिनिष्ठ भगवद्भक्त प्रह्लादको प्रणाम करके यों बोला—
'भगवद्भक्त प्रह्लाद! पुण्यात्मन् ! मैं समुद्र हूँ। अपने पास
चक्षुर्भ्यामथ मां दृष्ट्वा पावयार्थिनमागतम् । आये हुए मुझ प्रार्थीको अपने नेत्रोंद्वारा देखकर पवित्र
इत्यम्बुधिगिरः श्रुत्वा स महात्मा हरेः प्रियः ॥ ४२ कीजिये।' समुद्रके ये वचन सुनकर भगवान्‌के प्रिय
भक्त महात्मा असुर-नन्दन प्रह्लादने सहसा उनकी ओर
उद्वीक्ष्य सहसा देवं तं नत्वाऽऽहासुरात्मजः । देखकर प्रणाम किया और कहा—'श्रीमन् कब पधारे?'
कदाऽऽगतं भगवता तमथाम्बुधिरब्रवीत् ॥ ४३ तब उनसे समुद्रने कहा— ॥ ४०—४३ ॥
योगिन्नज्ञातवृत्तस्त्वमपराध्दं तवासुरैः । 'योगिन्! आपको यह बात ज्ञात नहीं है, असुरोंने
बद्धस्त्वमहिभिर्दैत्यैर्मयि क्षिप्तोऽद्य वैष्णव ॥ ४४ आपका बड़ा अपराध किया है। वैष्णव! आपको साँपोंसे
बाँधकर दैत्योंने आज मेरे भीतर फेंक दिया; तब मैंने
ततस्तूर्णं मया तीरे न्यस्तस्त्वं फणिनश्च तान् । तुरंत ही आपको किनारे लगाया और उन साँपोंको
इदानीमेव गरुडो भक्षयित्वा गतो महान् ॥ ४५ अभी-अभी महात्मा गरुडजी भक्षण करके गये हैं।
महात्मन् ! मैं सत्सङ्गका अभिलाषी हूँ, आप मुझपर
महात्मन्ननुगृहीष्व त्वं मां सत्संगमार्थिनम् । अनुग्रह करें और इन रत्नोंको भेंटरूपमें स्वीकार
गृहाणेमानि रत्नानि पूज्यस्त्वं मे हरैर्यथा ॥ ४६ करें। मेरे लिये आप भगवान् विष्णुके समान ही पूज्य
हैं। यद्यपि आपको इन रत्नोंकी कोई आवश्यकता
यद्यप्येतैर्न ते कृत्यं रत्नैर्दास्याम्यथाप्यहम् । नहीं है, तथापि मैं तो इन्हें आपको दूँगा ही; क्योंकि
दीपान्निवेदयत्येव भास्करस्यापि भक्तिमान् ॥ ४७ भगवान् सूर्यका भक्त उन्हें दीप निवेदन करता ही है।
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अध्याय ४३ ] प्रह्लादजीका दैत्यपुत्रोंको उपदेश देना १५७
त्वमापत्स्वपि घोरासु विष्णुनेव हि रक्षितः। घोर आपत्तियोंमें भी भगवान् विष्णुने ही आपकी रक्षा
त्वादृशा निर्मलात्मानो न सन्ति बहवोऽर्कवत्॥ ४८ की है। सूर्यकी भाँति आप-जैसे शुद्धचित्त महात्मा
बहुना किं कृतार्थोऽस्मि यत्तिष्ठामि त्वया सह। संसारमें अधिक नहीं हैं। बहुत क्या कहूँ? आज मैं
आलपामि क्षणमपि नेक्षे ह्येतत्फलोपमाम्॥ ४९ कृतार्थ हो गया; क्योंकि आज मुझे आपके साथ स्थित
इत्यब्धिना स्तुतः श्रीशमाहात्म्यवचनैः स्वयम्। होनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ। इस समय क्षणभर भी जो
ययौ लज्जां प्रहर्षं च प्रह्लादो भगवत्प्रियः॥ ५० आपके साथ बातचीत कर रहा हूँ, इससे प्राप्त होनेवाले
प्रतिगृह्य स रत्नानि वत्सलः प्राह वारिधिम्। फलकी उपमा मैं कहीं नहीं देखता'॥४४–४९॥
महात्मन् सुतरां धन्यः शेते त्वयि हि स प्रभुः॥५१ इस प्रकार समुद्रने साक्षात् भगवान् लक्ष्मीपतिके
कल्पान्तेऽपि जगत्कृत्स्नं ग्रसित्वा स जगन्मयः। माहात्म्यसूचक वचनोंद्वारा जब उनकी स्तुति की, तब
त्वय्येवैकार्णवीभूते शेते किल महात्मनि॥५२ भगवान्‌के प्रिय भक्त प्रह्लादजीको बड़ी लज्जा हुई और हर्ष
लोचनाभ्यां जगन्नाथं द्रष्टुमिच्छामि वारिधे। भी। स्नेही प्रह्लादने समुद्रके दिये हुए रत्न ग्रहणकर उनसे
त्वं पश्यसि सदा धन्यस्तत्रोपायं प्रयच्छ मे॥५३ कहा—'महात्मन्! आप विशेष धन्यवादके पात्र हैं; क्योंकि
उक्तेति पादावनतं तूर्णमुत्थाप्य सागरः। भगवान् आपके ही भीतर शयन करते हैं। यह प्रसिद्ध है
प्रह्लादं प्राह योगीन्द्र त्वं पश्यसि सदा हृदि॥५४ कि जगन्मय प्रभु प्रलयकालमें भी सम्पूर्ण जगत्‌को अपनेमें
द्रष्टुमिच्छस्यथाक्षिभ्यां स्तुहि तं भक्तवत्सलम्। लीन करके एकार्णवरूपमें स्थित आप महात्मा महासागरमें
उक्तेति सिन्धुः प्रह्लादमात्मनः स जलेऽविशत्॥५५ ही शयन करते हैं। समुद्र! मैं इन स्थूल नेत्रोंसे भगवान्
गते नदीन्द्रे स्थित्वैको हरिं रात्रौ स दैत्यजः। जगन्नाथका दर्शन करना चाहता हूँ। आप धन्य हैं; क्योंकि
भक्त्यास्तौदिति मन्वानस्तद्दर्शनमसम्भवम्॥ ५६ सदा भगवान्‌का दर्शन करते रहते हैं। कृपया मुझे भी
प्रह्लाद उवाच उनके दर्शनका उपाय बताइये'॥ ५०-५३॥
वेदान्तवाक्यशतमारुतसम्पवृद्ध- यों कहकर प्रह्लादजी समुद्रके चरणोंपर गिर पड़े।
वैराग्यवह्निशिखया परिताप्य चित्तम्। तब समुद्रने उनको शीघ्र ही उठाकर कहा—'योगीन्द्र!
संशोधयन्ति यदवेक्षणयोग्यतायै आप तो सदा ही अपने हृदयमें भगवान्‌का दर्शन करते
धीराः सदैव स कथं मम गोचरः स्यात्॥ ५७ हैं; तथापि यदि इन नेत्रोंसे भी देखना चाहते हैं तो उन
मात्सर्यरोषस्मरलोभमोह- भक्तवत्सल भगवान्‌का स्तवन कीजिये।' यों कहकर
मदादिभिर्वा सुदृढैः सुषड्भिः। समुद्रदेव अपने जलमें प्रविष्ट हो गये॥५४-५५॥
उपर्युपर्यावरणैः सुबद्ध- समुद्रके चले जानेपर दैत्यनन्दन प्रह्लादजी रात्रिमें वहाँ
मन्धं मनो मे क्व हरिः क्व वाहम्॥ ५८ अकेले ही रहकर भगवान्‌के दर्शनको एक असम्भव
यं धातृमुख्या विबुधा भयेषु कार्य मानते हुए भक्तिपूर्वक श्रीहरिकी स्तुति करने लगे ॥ ५६ ॥
शान्त्यर्थिनः क्षीरनिधेरुपान्तम्। प्रह्लादजी बोले—धीर पुरुष जिनके दर्शनकी योग्यता
गत्वोत्तमस्तोत्रकृतः कथंचित् प्राप्त करनेके लिये सदा ही सैकड़ों वेदान्त-वाक्यरूप
पश्यन्ति तं द्रष्टुमहो ममाशा॥ ५९ वायुद्वारा अत्यन्त बढ़ी हुई वैराग्यरूप अग्निकी ज्वालासे
अपने चित्तको तपाकर भलीभाँति शुद्ध किया करते हैं,
वे भगवान् विष्णु, भला, मेरे दृष्टिपथमें कैसे आ सकते
हैं। एकके ऊपर एकके क्रमसे ऊपर-ऊपर जिनका आवरण
पड़ा हुआ है—ऐसे मात्सर्य, क्रोध, काम, लोभ, मोह, मद
आदि छः सुदृढ़ बन्धनोंसे भलीभाँति बँधा हुआ मेरा मन
अंधा (विवेकशून्य) हो रहा है। कहाँ भगवान् श्रीहरि और
कहाँ मैं! भय उपस्थित होनेपर उसकी शान्तिके लिये
क्षीरसागरके तटपर जाकर ब्रह्मादि देवता उत्तम रीतिसे
स्तवन करते हुए किसी प्रकार जिनका दर्शन कर पाते
हैं, उन्हीं भगवान्‌के दर्शनकी मुझ-जैसा दैत्य आशा करे—
यह कैसा आश्चर्य है!॥ ५७-५९॥

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