संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
२५४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५८
२५४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५८
कृतस्नानस्तु कुर्वीत वैश्वदेवं दिने दिने।
अतिथिं चागतं भक्त्या पूजयेच्छक्तितो गृही॥ २६
अन्यांश्चागतान् दृष्ट्वा पूजयेदविरोधतः।
स्वदारनिरतो नित्यं परदारविवर्जितः॥ २७
सत्यवादी जितक्रोधः स्वधर्मनिरतो भवेत्।
स्वकर्मणि च सम्प्राप्ते प्रमादं नैव कारयेत्॥ २८
प्रियां हितां वदेद्वाचं परलोकाविरोधिनीम्।
एवं धर्मः समुद्दिष्टो ब्राह्मणस्य समासतः।
धर्ममेवं तु यः कुर्यात्स याति ब्रह्मणः पदम्॥ २९
इत्येष धर्मः कथितो मया वै
विप्रस्य विप्रा अखिलाघहारी।
वदामि राजादिजनस्य धर्मं
पृथक्पृथग्बोधत विप्रवर्याः॥ ३०
गृहस्थ ब्राह्मण स्नान आदिके बाद प्रतिदिन बलिवैश्वदेव करे और घरपर आये हुए अतिथिका अपनी शक्तिके अनुसार भक्तिपूर्वक सम्मान करे। एक अतिथिके आ जानेपर यदि दूसरे भी आ जायँ तो उन्हें भी देखकर विरोध न माने, उनका भी यथाशक्ति सम्मान करे। सदा अपनी ही स्त्रीमें अनुराग रखे, दूसरेकी स्त्रीके सम्पर्कसे सदा दूर रहे। सदा सत्य बोले, क्रोध न करे, अपने धर्मका पालन करता रहे। अपने नैतिक आदि कर्मका समय प्राप्त होनेपर प्रमाद न करे। जिससे परलोक न बिगड़े—ऐसी सत्य, प्रिय और हितकारिणी वाणी बोले। इस प्रकार मैंने ब्राह्मण-धर्मका संक्षेपसे वर्णन किया। जो ब्राह्मण इस प्रकार अपने धर्मका पालन करता है, वह नित्य ब्रह्मधाम (सत्यलोक)-को प्राप्त होता है। विप्रगण! इस प्रकार मैंने आपलोगोंसे यह ब्राह्मण-धर्म कहा है, यह समस्त पापोंको दूर करनेवाला है। विप्रवरो! अब क्षत्रियादि जातियोंका पृथक्-पृथक् धर्म बताता हूँ, आप लोग सुनें॥ २६—३०॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे ब्राह्मणधर्मकथनं नाम सप्तपञ्चाशोऽध्यायः ॥ ५७ ॥
इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'ब्राह्मणधर्मका वर्णन' नामक सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५७॥
अठ्ठावनवाँ अध्याय
क्षत्रियादि वर्णोंके धर्म और ब्रह्मचर्य तथा गृहस्थाश्रमके धर्मोंका वर्णन
हारीत उवाच
क्षत्रादीनां प्रवक्ष्यामि यथावदनुपूर्वशः।
येन येन प्रवर्तन्ते विधिना क्षत्रियादयः॥ १
राज्यस्थः क्षत्रियश्चैव प्रजा धर्मेण पालयेत्।
कुर्यादध्ययनं सम्यग्यजेद्यज्ञान् यथाविधि॥ २
दद्याद्दानं द्विजाग्र्येभ्यो धर्मबुद्धिसमन्वितः।
स्वदारनिरतो नित्यं परदारविवर्जितः॥ ३
नीतिशास्त्रार्थकुशलः संधिविग्रहतत्त्ववित्।
देवब्राह्मणभक्तश्च पितृकार्यपरस्तथा॥ ४
धर्मेणैव जयं काङ्क्षेद्धर्मं परिवर्जयेत्।
उत्तमां गतिमाप्नोति क्षत्रियोऽथैवमाचरन्॥ ५
श्रीहारीत मुनि बोले—अब मैं क्रमशः क्षत्रियादि वर्णोंके लिये विहित नियमोंका यथावत् वर्णन करूँगा, जिनके अनुसार क्षत्रियादिको अपना व्यवहार निभाना चाहिये। राजपदपर स्थित क्षत्रियको उचित है कि वह धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करे। उसे भलीभाँति वेदाध्ययन और विधिपूर्वक यज्ञ भी करने चाहिये। धर्मबुद्धिसे युक्त हो श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको दान दे, सदा अपनी ही स्त्रीमें अनुरक्त रहकर परस्त्रीका त्याग करे, नीतिशास्त्रका अर्थ समझनेमें निपुण हो, संधि और विग्रहका तत्त्व समझे। देवताओं और ब्राह्मणोंमें भक्ति रखे, पितरोंका पूजन-श्राद्धादि कर्म करे। धर्मपूर्वक ही विजयकी इच्छा करे, अधर्मको भलीभाँति त्याग दे। इस प्रकार आचरण करनेवाला क्षत्रिय उत्तम गतिको प्राप्त होता है॥ १-५॥
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अध्याय ५८ ] क्षत्रियादि वर्णोंके धर्म और ब्रह्मचर्य तथा गृहस्थाश्रमके धर्मोंका वर्णन २५५
गोरक्षाकृषिवाणिज्यं कुर्याद्वैश्यो यथाविधि। वैश्यको चाहिये कि वह विधिपूर्वक गोरक्षा, कृषि
दानधर्मं यथाशक्त्या गुरुशुश्रूषणं तथा॥ ६ और व्यापार करे तथा अपनी शक्तिके अनुसार दानधर्म
और गुरुसेवा भी करे। लोभ और दम्भसे सर्वथा दूर रहे,
लोभदम्भर्विनिर्मुक्तः सत्यवागनसूयकः। सत्यवादी हो, किसीके दोष न देखे, मन और इन्द्रियोंको
स्वदारनिरतो दान्तः परदारविवर्जितः॥ ७ संयममें रखकर परस्त्रीका त्याग करे और अपनी ही
स्त्रीमें अनुरक्त रहे। यज्ञ-कालमें शीघ्रतापूर्वक ब्राह्मणोंका
धनैर्विप्रान् समर्चेत यज्ञकाले त्वरान्वितः। धनसे सम्मान करे तथा आलस्य छोड़कर प्रतिदिन
यज्ञाध्ययनदानानि कुर्यान्नित्यमतन्द्रितः॥ ८ यज्ञ, अध्ययन और दान करता रहे। श्राद्ध-काल प्राप्त
पितृकार्यं च तत्काले नरसिंहार्चनं तथा। होनेपर पितृ-श्राद्ध अवश्य करे और नित्यप्रति भगवान्
एतद्वैश्यस्य कर्मोक्तं स्वधर्ममनुतिष्ठतः॥ ९ श्रीनृसिंहदेवका पूजन करे। अपने धर्मका पालन करनेवाले
वैश्यके लिये यही कर्तव्य कर्म बतलाया गया है। पूर्वोक्त
एतदासेवमानस्तु स स्वर्गी स्यान्न संशयः। कर्मका पालन करनेवाला वैश्य निःसंदेह स्वर्गलोकका
वर्णत्रयस्य शुश्रूषां कुर्याच्छूद्रः प्रयत्नतः॥१० अधिकारी होता है॥ ६-९ १/२ ॥
दासद्वद्ब्राह्मणानां च विशेषेण समाचरेत्। शूद्रको चाहिये कि वह यत्नपूर्वक इन तीनों
अयाचितं प्रदातव्यं कृषिं वृत्त्यर्थमाचरेत्॥ ११ वर्णोंकी सेवा करे और ब्राह्मणोंकी तो दासकी भाँति
विशेषरूपसे शुश्रूषा करे। किसीसे माँगकर नहीं, अपनी
ग्रहाणां मासिकं कार्यं पूजनं न्यायधर्मतः। ही कमाईका दान करे। जीविकाके लिये कृषि-कर्म
धारणं जीर्णवस्त्रस्य विप्रस्योच्छिष्टमार्जनम्॥ १२ करे। प्रत्येक मासमें न्याय और धर्मके अनुसार ग्रहोंका
पूजन करे, पुराना वस्त्र धारण करे। ब्राह्मणका जूठा
स्वदारेषु रतिं कुर्यात् परदारविवर्जितः। बर्तन माँजे। अपनी स्त्रीमें अनुराग रखे। परस्त्रियोंको
पुराणश्रवणं विप्रान्नृसिंहस्य पूजनम्॥ १३ दूरसे ही त्याग दे। ब्राह्मणके मुखसे पुराणकथा श्रवण
तथा विप्रनमस्कारं कार्यं श्रद्धासमन्वितम्। करे, भगवान् नरसिंहका पूजन करे। इसी प्रकार
सत्यसम्भाषणं चैव रागद्वेषविवर्जनम्॥ १४ ब्राह्मणोंको श्रद्धापूर्वक नमस्कार करे। राग-द्वेष त्याग दे
और सत्यभाषण करे। इस प्रकार मन, वाणी, शरीर
इत्थं कुर्वन् सदा शूद्रो मनोवाक्कायकर्मभिः। और कर्मसे आचरण करनेवाला शूद्र पापरहित हो
स्थानमैन्द्रमवाप्नोति नष्टपापस्तु पुण्यभाक्॥ १५ पुण्यका भागी होता है और मृत्युके पश्चात् इन्द्रलोकको
वर्णेषु धर्मा विविधा मयोक्ता प्राप्त होता है॥ १०-१५ ॥
यथाक्रमं ब्राह्मणवर्यसाधिताः। मुनीन्द्रगण! वर्णोंके ये नाना प्रकारके धर्म मैंने आप
शृणुध्वमत्राश्रमधर्ममाद्यं लोगोंसे क्रमशः कहे हैं। इन्हें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने बतलाया
मयोच्यमानं क्रमशॊ मुनीन्द्राः॥ १६ है। अब मैं क्रमसे प्रथम ब्रह्मचर्य-आश्रमके धर्म बता
रहा हूँ, आप लोग सुनें॥ १६ ॥
हारीत उवाच श्रीहारीत मुनि बोले—उपनयन-संस्कार हो जानेके
उपनीतो माणवको वसेद्गुरुकुले सदा। बाद ब्रह्मचारी बालक सदा गुरुकुलमें निवास करे। उसको
गुरोः प्रियहितं कार्यं कर्मणा मनसा गिरा॥ १७ चाहिये कि मन, वाणी और कर्मसे गुरुका प्रिय और हित
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