संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
५८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १५
५८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १५
विविक्तदेशे विपुले कुशासने
निवेश्य सर्वं हृदयेऽस्य सर्वम्।
बाह्यं समस्तं गुणमिन्द्रियाणां
विलीय भेदं भगवत्यनन्ते॥ १३
विज्ञेयमानन्दमजं विशालं
सत्यात्मकं क्षेमपदं वरेण्यम्।
संचिन्त्य तस्मिन् प्रविहाय देहं
बभूव मुक्तः परमात्मरूपी॥ १४
इमां कथां मुक्तिपरां यथोक्तां
पठन्ति ये नारसिंहं स्मरन्तः।
प्रयागतीर्थप्लवने तु यत्फलं
तत् प्राप्य ते यान्ति हरेः पदं महत्॥ १५
इत्येतदुक्तं तव पुत्र पृच्छतः
पुरातनं पुण्यतमं पवित्रकम्।
संसारवृक्षस्य विनाशनं परं
पुनः कमिच्छस्यभिवाञ्छितं वद॥ १६
(हिन्दी अनुवाद):
और वनवासी हो किसी प्रकार शाक आदि खाकर भिक्षावृत्तिसे ही संतोषपूर्वक रहता था। विस्तृत एकान्त प्रदेशमें कुशासनपर बैठकर वह इन्द्रियोंके समस्त बाह्य विषयों तथा भेदबुद्धिको हृदयस्थित भगवान् अनन्तमें विलीन करके विज्ञेय, अजन्मा, विराट्, सत्यस्वरूप, श्रेष्ठ, कल्याणधाम आनन्दमय परमेश्वरका चिन्तन करता हुआ आयु पूरी होनेपर शरीर त्यागकर मुक्त एवं परमात्मस्वरूप हो गया॥ ११-१४॥
जो लोग मोक्ष-सम्बन्धिनी अथवा मोक्षको ही उत्कृष्ट बनानेवाली इस कथाको भगवान् नृसिंहका स्मरण करते हुए पढ़ते हैं, वे प्रयागतीर्थमें स्नान करनेसे जो फल होता है, उसे पाकर अन्तमें भगवान् विष्णुके महान् पदको प्राप्त कर लेते हैं। बेटा! तुम्हारे पूछनेसे मैंने यह उत्तम, पवित्र, पुण्यतम एवं पुरातन उपाख्यान, जो संसारवृक्षका नाश करनेवाला है, तुमसे कहा है; अब और क्या सुनना चाहते हो? अपना मनोरथ प्रकट करो॥ १५-१६॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे चतुर्दशोऽध्यायः॥ १४॥
इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १४॥
पंद्रहवाँ अध्याय
संसारवृक्षका वर्णन तथा इसे नष्ट करनेवाले ज्ञानकी महिमा
श्रीशुक उवाच
श्रोतुमिच्छाम्यहं तात साम्प्रतं मुनिभिः सह।
संसारवृक्षं सकलं येनेदं परिवर्तते॥ १
वक्तुमर्हसि मे तात त्वयैतत् सूचितं पुरा।
नान्यो वेत्ति महाभाग संसारोच्चारलक्षणम्॥ २
श्रीशुकदेवजी बोले— तात! मैं इस समय मुनियोंके साथ संसारवृक्षका वर्णन सुनना चाहता हूँ, जिसके द्वारा यह परिवर्तनका सम्पूर्ण चक्र चलता रहता है। तात! आपने ही पहले इस वृक्षको सूचित किया है; अतः आप ही इसका वर्णन करनेके योग्य हैं। महाभाग! आपके सिवा दूसरा कोई इस संसारवृक्षका लक्षण नहीं जानता॥ १-२॥
सूत उवाच
स पुत्रैणैवमुक्तस्तु शिष्याणां मध्यगेन च।
कृष्णद्वैपायनः प्राह संसारतरुलक्षणम्॥ ३
सूतजी बोले— भरद्वाज! अपने शिष्योंके बीचमें बैठे हुए पुत्र शुकदेवजीके इस प्रकार पूछनेपर श्रीकृष्णद्वैपायन (व्यासजी)-ने उन्हें संसारवृक्षका लक्षण इस प्रकार बताया॥ ३॥
व्यास उवाच
शृण्वन्तु शिष्याः सकला वत्स त्वं शृणु भावितः।
संसारवृक्षं वक्ष्यामि येन चेदं समावृतम्॥ ४
श्रीव्यासजी बोले— मेरे सभी शिष्य इस विषयको सुनें; तथा वत्स! तुम भी सावधान होकर सुनो—मैं
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अध्याय १६ ] भगवान् विष्णुके ध्यानसे मोक्षकी प्राप्तिका प्रतिपादन ५९
अव्यक्तमूलप्रभवस्तस्मादग्रे तथोत्थितः । संसारवृक्षका वर्णन करता हूँ, जिसने इस सारे दृश्य-
बुद्धिस्कन्धमयश्चैव इन्द्रियाङ्कुरकोटरः ॥ ५ प्रपञ्चको व्याप्त कर रखा है। यह संसारवृक्ष अव्यक्त
परमात्मारूपी मूलसे प्रकट हुआ है। उन्हींसे प्रकट होकर
महाभूतविशाखश्च विशेषैः पत्रशाखवान्। हमारे सामने इस रूपमें खड़ा है। बुद्धि (महत्तत्त्व)
धर्माधर्मसुपुष्पश्च सुखदुःखफलोदयः ॥ ६ उसका तना है, इन्द्रियाँ ही उसके अङ्कुर और कोटर
हैं, पञ्चमहाभूत उसकी बड़ी-बड़ी डालियाँ हैं, विशेष
आजीव्यः सर्वभूतानां ब्रह्म वृक्षः सनातनः। पदार्थ ही उसके पत्ते और टहनियाँ हैं, धर्म-अधर्म फूल
एतद् ब्रह्म परं चैव ब्रह्म वृक्षस्य तस्य तत् ॥ ७ हैं, उससे 'सुख' और 'दुःख' नामक फल प्रकट होते
हैं, प्रवाहरूपसे सदा रहनेवाला यह संसारवृक्ष ब्रह्मकी
इत्येवं कथितं वत्स संसारवृक्षलक्षणम्। भाँति सभी भूतोंका आश्रय है। यह अपरब्रह्म और
वृक्षमेनं समारूढा मोहमायान्ति देहिनः ॥ ८ परब्रह्म भी इस संसारवृक्षका कारण है। पुत्र ! इस प्रकार
मैंने तुमसे संसारवृक्षका लक्षण बतलाया है। इस वृक्षपर
संसरन्तीह सततं सुखदुःखसमन्विताः । चढ़े हुए देहाभिमानी जीव मोहित हो जाते हैं। प्रायः
प्रायेण प्राकृता मर्त्या ब्रह्मज्ञानपराङ्मुखाः॥ ९ ब्रह्मज्ञानसे विमुख प्राकृत मनुष्य सदा सुख-दुःखसे युक्त
होकर इस संसारमें फँसे रहते हैं, ब्रह्मज्ञानी विद्वान् इस
छित्त्वैनं कृतिनो यान्ति नो यान्ति ब्रह्मज्ञानिनः। संसारवृक्षको नहीं प्राप्त होते । वे इसका उच्छेद करके
कर्मक्रिये महाप्राज्ञ नैनं छिन्दन्ति दुष्कृताः ॥ १० मुक्त हो जाते हैं। महाप्राज्ञ शुकदेव ! जो पापी हैं, वे
कर्म-क्रियाका उच्छेद नहीं कर पाते। ज्ञानी पुरुष ज्ञानरूपी
एनं छित्त्वा च भित्त्वा च ज्ञानेन परमासिना । उत्तम खड्गके द्वारा इस वृक्षको छिन्न-भिन्न करके उस
ततोऽमरत्वं ते यान्ति यस्मान्नावर्तते पुनः ॥ ११ अमरपदको प्राप्त करते हैं, जहाँसे जीव पुनः इस संसारमें
नहीं आता। शरीर तथा स्त्रीरूपी बन्धनोंसे दृढ़तापूर्वक
देहदारमयैः पाशैर्दृढं बद्धोऽपि मुच्यते । बँधा हुआ पुरुष भी ज्ञानके द्वारा मुक्त हो जाता है; अतः
ज्ञानमेव परं पुंसां श्रेयसामभिवाञ्छितम्। श्रेष्ठतम पुरुषोंको ज्ञानकी प्राप्ति ही परम अभीष्ट होती है;
तोषणं नरसिंहस्य ज्ञानहीनः पशुः पुमान् ॥ १२ क्योंकि ज्ञान ही भगवान् नृसिंहको संतोष देता है। ज्ञानहीन
पुरुष तो पशु ही है। मनुष्योंके आहार, निद्रा, भय और
आहारनिद्राभयमैथुनानि मैथुन आदि कर्म तो पशुओंके ही समान होते हैं; उनमें
समानमेतत्पशुभिनराणाम् । केवल ज्ञान ही अधिक होता है। जो ज्ञानहीन हैं, वे
ज्ञानं नराणामधिकं हि लोके पशुओंके ही तुल्य हैं ॥ ४-१३ ॥
ज्ञानेन हीनाः पशुभिः समानाः ॥ १३ ।
इति श्रीनरसिंहपुराणे पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें पन्द्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५ ॥
सोलहवाँ अध्याय
भगवान् विष्णुके ध्यानसे मोक्षकी प्राप्तिका प्रतिपादन
श्रीशुक उवाच | श्रीशुकदेवजी बोले- पिताजी ! जो संसारवृक्षपर
संसारवृक्षमारुह्य द्वन्द्वपाशशतैर्दृढैः । आरूढ़ हो; राग-द्वेषादि द्वन्द्वमय सैकड़ों सुदृढ़ पाशों
बध्यमानः सुतैश्वर्यैः पतितो योनिसागरे ॥ १ | तथा पुत्र और ऐश्वर्य आदिके बन्धनसे बँधकर योनि-
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