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संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

१७६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४७

१७६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४७
विश्वामित्रः पुनः प्राह राजानममितौजसम् ॥ ५८
नाज्ञो रामो नृपश्रेष्ठ स सर्वज्ञः समः क्षमः।
शेषनारायणावेतौ तव पुत्रौ न संशयः ॥ ५९
दुष्टानां निग्रहार्थाय शिष्टानां पालनाय च।
अवतीर्णौ न संदेहो गृहे तव नराधिप ॥ ६०
न मात्रा न त्वया राजन् शोकः कार्योऽत्र चाण्वपि।
निःक्षेपे च महाराज अर्पयिष्यामि ते सुतौ ॥ ६१
विश्वामित्रजी यह सुनकर उन अमित-तेजस्वी राजासे पुनः बोले—‘नृपश्रेष्ठ ! रामचन्द्र अबोध नहीं हैं; वे सर्वज्ञ, समदर्शी और परम समर्थ हैं। इसमें संशय नहीं कि तुम्हारे ये दोनों पुत्र राम और लक्ष्मण साक्षात् नारायण एवं शेषनाग हैं। नराधिप ! दुष्टोंको दण्ड देने और सत्पुरुषोंकी रक्षा करनेके लिये ही ये दोनों आपके घरमें अवतीर्ण हुए हैं, इसमें संदेह नहीं है। राजन् ! इनकी माता तथा आपको इस विषयमें थोड़ी-सी भी चिन्ता नहीं करनी चाहिये। महाराज ! ये मेरे पास धरोहरके तौरपर रहेंगे। यज्ञ पूर्ण हो जानेपर मैं इन दोनोंको आपके हाथमें दे दूँगा' ॥ ५८-६१॥
इत्युक्तो दशरथस्तेन विश्वामित्रेण धीमता।
तच्छापभीतो मनसा नीतामित्यभाषत ॥ ६२
कृच्छ्रात्पित्रा विनिर्मुक्तं राममादाय सानुजम्।
ततः सिद्धाश्रमं राजन् सम्प्रतस्थे स कौशिकः ॥ ६३
तं प्रस्थितमथालोक्य राजा दशरथस्तदा।
अनुव्रज्याब्रवीदेतद् वचो दशरथस्तदा ॥ ६४
अपुत्रोऽहं पुरा ब्रह्मन् बहुभिः काम्यकर्मभिः।
मुनिप्रसादादधुना पुत्रवानस्मि सत्तम ॥ ६५
मनसा तद्वियोगं तु न शक्ष्यामि विशेषतः।
त्वमेव जानासि मुने नीत्वा शीघ्रं प्रयच्छ मे ॥ ६६
बुद्धिमान् विश्वामित्रजीके यों कहनेपर दशरथजी मन-ही-मन उनके शापसे डरते हुए बोले—‘अच्छा, इन्हें ले जाइये।' राजन् ! पिताके द्वारा बड़ी कठिनाईसे छोड़े गये श्रीराम और लक्ष्मणको साथ ले विश्वामित्र मुनि तब अपने सिद्धाश्रमकी ओर प्रस्थित हुए। उन्हें जाते देख उस समय राजा दशरथ कुछ दूर पीछे-पीछे गये और तब मुनिसे इस प्रकार बोले—‘साधुश्रेष्ठ ! ब्रह्मन् ! मैं पहले दीर्घकालतक पुत्रहीन रहा; मुनियोंकी कृपासे अनेक सकाम यज्ञकर्मोंका अनुष्ठान करके अब पुत्रवान् हो सका हूँ। अतः मुने! मैं मनसे भी इन पुत्रोंका अधिक कालतक वियोग नहीं सह सकूँगा, यह बात आप ही जानते हैं; अतः इन्हें ले जाकर फिर यथासम्भव शीघ्र मेरे पास पहुँचा दीजियेगा' ॥ ६२-६६॥
इत्येवमुक्तो राजानं विश्वामित्रोऽब्रवीत्पुनः।
समाप्ययज्ञश्च पुनर्नेष्ये रामं च लक्ष्मणम् ॥ ६७
सत्यपूर्वं तु दास्यामि न चिन्तां कर्तुमर्हसि।
इत्युक्तः प्रेषयामास रामं लक्ष्मणसंयुक्तम् ॥ ६८
अनिच्छन्नपि राजासौ मुनिशापभयान्नृपः।
विश्वामित्रस्तु तौ गृह्य अयोध्याया ययौ शनैः ॥ ६९
उनके यों कहनेपर विश्वामित्रजीने पुनः राजासे कहा—‘अपना यज्ञ समाप्त हो जानेपर मैं पुनः श्रीराम और लक्ष्मणको यहाँ ले आऊँगा तथा अपने वचनको सत्य करते हुए इन्हें वापस कर दूँगा, आप चिन्ता न करें' ॥ ६७ १/२ ॥
विश्वामित्रजीके इस प्रकार आश्वासन देनेपर राजाने उनके शापकी आशङ्कासे भयभीत हो, इच्छा न रहते हुए भी, श्रीराम और लक्ष्मणको उनके साथ भेज दिया। विश्वामित्रजी उन दोनों भाइयोंको साथ ले धीरे-धीरे अयोध्यासे बाहर निकले ॥ ६८-६९॥
सरय्वास्तीरमासाद्य गच्छन्नेव स कौशिकः।
तयोः प्रीत्या स राजेन्द्र द्वे विद्ये प्रथमं ददौ ॥ ७०
बलामतिबलां चैव समन्त्रे च ससंग्रहे।
क्षुत्पिपासापनयने पुनश्चैव महामतिः ॥ ७१
अस्त्रग्राममशेषं तु शिक्षयित्वा तु तौ तदा।
आश्रमाणि च दिव्यानि मुनीनां भावितात्मनाम् ॥ ७२
दर्शयित्वा उषित्वा च पुण्यस्थानेषु सत्तमः।
गङ्गामुत्तीर्य शोणस्य तीरमासाद्य पश्चिमम् ॥ ७३
राजेन्द्र ! सरयूके तटपर पहुँचकर महामति विश्वामित्रजीने चलते-चलते ही श्रीराम और लक्ष्मणको प्रेमवश पहले 'बला' और 'अतिबला' नामकी दो विद्याएँ प्रदान कीं, जो क्षुधा और पिपासाको दूर करनेवाली हैं। मुनिने उन विद्याओंको मन्त्र और संग्रह (उपसंहार) पूर्वक सिखाया। फिर उसी समय उन्हें सम्पूर्ण अस्त्र-समुदायकी शिक्षा देकर वे साधुश्रेष्ठ मुनि श्रीराम और लक्ष्मणको अनेक आत्मज्ञानी मुनीश्वरोंके दिव्य आश्रम दिखाते और पवित्र तीर्थस्थानोंमें निवास करते हुए गङ्गा नदीको पारकर शोणभद्रके पश्चिम तटपर जा पहुँचे ॥ ७०-७३॥
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अध्याय ४७ ] | श्रीरामावतारकी कथा — श्रीरामके जन्मसे लेकर विवाहतकके चरित्र | १७७

(संस्कृत श्लोक - वाम स्तम्भ)

मुनिधार्मिकसिद्धांश्च पश्यन्तौ रामलक्ष्मणौ।
ऋषिभ्यश्च वरान् प्राप्य तेन नीतौ नृपात्मजौ ॥ ७४
ताटकाया वनं घोरं मृत्योर्मुखमिवापरम्।
गते तत्र नृपश्रेष्ठ विश्वामित्रो महातपाः ॥ ७५
राममक्लिष्टकर्माणमिदं वचनमब्रवीत्।
राम राम महाबाहो ताटका नाम राक्षसी ॥ ७६
रावणस्य नियोगेन वसत्यस्मिन् महावने।
तया मनुष्या बहवो मुनिपुत्रा मृगास्तथा ॥ ७७
निहता भक्षिताश्चैव तस्मात्तां वध सत्तम।
इत्येवमुक्तो मुनिना रामस्तं मुनिमब्रवीत् ॥ ७८
कथं हि स्त्रीवधं कुर्यामहमद्य महामुने।
स्त्रीवधे तु महापापं प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ७९
इति रामवचः श्रुत्वा विश्वामित्र उवाच तम्।
तस्यास्तु निधनाद्राम जनाः सर्वे निराकुलाः ॥ ८०
भवन्ति सततं तस्मात् तस्याः पुण्यप्रदो वधः।
इत्येवं वादिनि मुनौ विश्वामित्रे निशाचरी ॥ ८१
आगता सुमहाघोरा ताटका विवृतानना।
मुनिना प्रेरितो रामस्तां दृष्ट्वा विवृताननाम् ॥ ८२
उद्यतैकभुजयष्टिमायतीं
श्रोणिलम्बिपुरुषान्त्रमेखलाम् ।
तां विलोक्य वनितावधे घृणां
पन्त्रिणा सह मुमोच राघवः ॥ ८३
शरं संधाय वेगेन तेन तस्या उरःस्थलम्।
विपाटितं द्विधा राजन् सा पपात ममार च ॥ ८४
घातयित्वा तु तामेवं तावानीय मुनिस्तु तौ।
प्रापयामास तं तत्र नानाऋषिनिषेवितम् ॥ ८५
नानाद्रुमलताकीर्णं नानापुष्पोपशोभितम्।
नानानिर्झरतोयाढ्यं विन्ध्यशैलान्तरस्थितम् ॥ ८६
शाकमूलफलोपेतं दिव्यं सिद्धाश्रमं स्वकम्।
रक्षार्थं तावुभौ स्थाप्य शिक्षयित्वा विशेषतः ॥ ८७


(हिन्दी अनुवाद - दक्षिण स्तम्भ)

मार्गमें मुनियों, धर्मात्माओं और सिद्धोंका दर्शन करते
हुए तथा ऋषियोंसे वर प्राप्तकर, राजकुमार श्रीराम और
लक्ष्मण विश्वामित्रजीके द्वारा उस ताड़कावनमें ले जाये
गये, जो यमराजके दूसरे मुखके समान भयंकर था।
नृपश्रेष्ठ ! वहाँ पहुँचकर महातपस्वी विश्वामित्रने अनायास
ही महान् कर्म करनेवाले रामसे कहा—'महाबाहो राम !
इस महान् वनमें रावणकी आज्ञासे 'ताड़का' नामकी
एक राक्षसी रहती है। उसने बहुत-से मनुष्यों, मुनिपुत्रों
और मृगोंको मारकर अपना आहार बना लिया है; अतः
सत्तम ! तुम उसका वध करो' ॥ ७४-७७ १/२ ॥

मुनिवर विश्वामित्रके इस प्रकार कहनेपर रामने
उनसे कहा—'महामुने ! आज मैं स्त्रीका वध कैसे
करूँ? क्योंकि बुद्धिमान् लोग स्त्रीवधमें महान् पाप
बतलाते हैं।' श्रीरामकी यह बात सुनकर विश्वामित्रने
उनसे कहा—'राम! उस ताड़काको मारनेसे सभी मनुष्य
सदाके लिये निर्भय हो जायँगे, इसलिये उसका वध
करना तो पुण्यदायक है' ॥ ७८-८० १/२ ॥

मुनिवर विश्वामित्र इस प्रकार कह ही रहे थे कि वह
महाघोर राक्षसी ताड़का मुँह फैलाये वहाँ आ पहुँची। तब
मुनिकी प्रेरणासे रामने उसकी ओर देखा। वह मुँह बाये आ
रही थी। उसकी छड़ी-सरीखी एक बाँह ऊपरकी ओर
उठी थी। कटिप्रदेशमें मेखला (करधनी)-की जगह लिपटी
हुई मनुष्यकी अँतड़ी लटक रही थी। इस रूपमें आती हुई
उस निशाचरीको देखकर श्रीरामने स्त्रीवधके प्रति होनेवाली
घृणा और बाणको एक साथ ही छोड़ दिया। राजन्! उन्होंने
धनुषपर बाण रखकर उसे बड़े वेगसे छोड़ा। उस बाणने
ताड़काकी छातीके दो टुकड़े कर दिये। फिर तो वह धरतीपर
गिरी और मर गयी ॥ ८१-८४ ॥

इस प्रकार ताड़काका वध करवाकर मुनि श्रीराम
और लक्ष्मण दोनोंको अपने उस दिव्य सिद्धाश्रमपर
ले आये, जो बहुत-से मुनियोंद्वारा सेवित था। वह
आश्रम विन्ध्य पर्वतकी मध्यवर्तिनी उपत्यकामें विद्यमान
था। वहाँ नाना प्रकारके वृक्ष और लतासमूह फैले
हुए थे और भाँति-भाँतिके पुष्प उसकी शोभा बढ़ा
रहे थे। वह आश्रम अनेकानेक झरनोंके जलसे
सुशोभित तथा शाक एवं मूल-फलादिसे सम्पन्न था।
वहाँ उन दोनों राजकुमारोंको विशेषरूपसे शिक्षा देकर
मुनिने उनको यज्ञकी रक्षाके लिये नियुक्त कर दिया।


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