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संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

२६२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५८

२६२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५८


[संस्कृत श्लोक]

उत्थाय मूर्धपर्यन्तं हंसः शुचिषदित्यृचा।
जले देवं नमस्कृत्य ततो गृहगतः पुनः॥ ९२
विधिना पुरुषसूक्तेन तत्र विष्णुं समर्चयेत्।
वैश्वदेवं ततः कुर्याद्वलिकर्म यथाविधि॥ ९३
गोदोहमात्रमतिथिं प्रतीवीक्षेत वै गृही।
अदृष्टपूर्वमतिथिमागतं प्राक् समर्चयेत्॥ ९४
आगत्य च पुनर्द्वारं प्रत्युत्थानेन साधुना।
स्वागतेनाग्नयस्तुष्टा भवन्ति गृहमेधिनाम्॥ ९५
आसनेन तु दत्तेन प्रीतो भवति देवराट्।
पादशौचेन पितरः प्रीतिमायान्ति तस्य च॥ ९६
अन्नाद्येन च दत्तेन तृप्यतीह प्रजापतिः।
तस्मादतिथये कार्यं पूजनं गृहमेधिना॥ ९७
भक्त्या च भक्तिमान्नित्यं विष्णुमभ्यर्च्य चिन्तयेत्।
भिक्षां च भिक्षवे दद्यात्परिव्राड्ब्रह्मचारिणे॥ ९८
आकल्पितान्नादुद्धृत्य सर्वव्यञ्जनसंयुतम्।
दद्याच्च मनसा नित्यं भिक्षां भिक्षोः प्रयत्नतः॥ ९९
अकृते वैश्वदेवे तु भिक्षौ भिक्षार्थमागते।
अवश्यमेव दातव्यं स्वर्गसोपानकारकम्॥ १००
उद्धृत्य वैश्वदेवान्नं भिक्षां दत्त्वा विसर्जयेत्।
वैश्वदेवाकृतं दोषं शक्तो भिक्षुर्व्यपोहितुम्॥ १०१
सुवासिनीः कुमारीश्च भोजयित्वाऽऽतुरानपि।
बालवृद्धांस्ततः शेषं स्वयं भुञ्जीत वै गृही॥ १०२
प्राङ्मुखोदङ्मुखो वापि मौनी च मितभाषणः।
अन्नं पूर्वं नमस्कृत्य प्रहृष्टेनान्तरात्मना॥ १०३
पञ्च प्राणाहुतीः कुर्यात्समन्त्रेण पृथक् पृथक्।
ततः स्वादुकरं चान्नं भुञ्जीत सुसमाहितः॥ १०४


[हिन्दी अनुवाद]

ऊँचे उठा ‘हंसः शुचिषत्·····’ इस ऋचाका पाठ करते हुए सूर्यदेवके लिये अर्घ्य दे। फिर जलमें स्थित वरुणदेवको नमस्कार कर पुनः घरपर आ जाय और वहाँ पुरुषसूक्तसे भगवान् विष्णुका विधिवत् पूजन करे। तदनन्तर विधिपूर्वक बलिवैश्वदेव कर्म करे॥ ८७—९३॥
इसके बाद जितनी देरमें गौ दुही जाती है, उतनी देरतक द्वारपर अतिथिके आनेकी प्रतीक्षा करे। यदि कई अतिथि आ जायँ तो उनमेंसे जिसे पहले कभी न देखा हो, उसका सम्मान सबसे पहले करना चाहिये। द्वारपर आकर अतिथिकी खड़े होकर भलीभाँति अगवानी करनेसे गृहस्थके ऊपर दक्षिण, गार्हपत्य और आहवनीय—तीनों अग्नि प्रसन्न होते हैं; आसन देनेसे देवराज इन्द्रको प्रसन्नता होती है, अतिथिके पैर धोनेसे उस गृहस्थके पितृगण तृप्त होते हैं, अन्न आदि भोज्य पदार्थ अर्पण करनेसे प्रजापति प्रसन्न होते हैं। इसलिये गृहस्थ पुरुषको चाहिये कि वह अतिथिका पूजन करे॥ ९४—९७॥
इसके पश्चात् भक्तिमान् पुरुष प्रतिदिन भगवान् विष्णुकी भक्तिपूर्वक पूजा करके उनका चिन्तन करे। फिर संन्यासी, विरक्त एवं ब्रह्मचारीको भिक्षा दे। सब प्रकारसे तैयार किये हुए अन्नमेंसे समस्त व्यञ्जनोंसे युक्त कुछ अन्न निकालकर प्रतिदिन यत्नपूर्वक भिक्षु (संन्यासी)-को देना चाहिये। बलिवैश्वदेव करनेके पहले भी यदि भिक्षु भिक्षाके लिये आ जाय तो उसे अवश्य भिक्षा देनी चाहिये; क्योंकि यह दान स्वर्गमें जानेके लिये सीढ़ीका काम देता है। विश्वेदेवसम्बन्धी अन्नमेंसे लेकर भिक्षुको भिक्षा देकर उसे विदा करे। वैश्वदेव कर्म न करनेके दोषको वह भिक्षु दूर कर सकता है। फिर सुवासिनी (सुहागिन) और कुमारी कन्याओं तथा रोगी व्यक्तियोंको और बालकों एवं वृद्धोंको पहले भोजन कराके उनसे बचे हुए अन्नको गृहस्थ पुरुष स्वयं भोजन करे॥ ९८—१०२॥
भोजन करते समय पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करके बैठे और मौन रहे अथवा कम बोले। भोजनसे पहले प्रसन्नचित्तसे अन्नको नमस्कार करके पृथक्-पृथक् पाँच प्राणवायुओंके नाम-मन्त्रसे अर्थात् ‘ॐ प्राणाय स्वाहा, ॐ अपानाय स्वाहा, ॐ व्यानाय स्वाहा, ॐ उदानाय स्वाहा, ॐ समानाय स्वाहा’—इस प्रकार उच्चारण करते हुए पाँच बार प्राणाग्निहोत्र करे। इसके बाद एकाग्रचित्त होकर उस स्वादिष्ट अन्नको स्वयं भोजन करे। भोजनके


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अध्याय ५८ ] क्षत्रियादि वर्णोंके धर्म और ब्रह्मचर्य तथा गृहस्थाश्रमके धर्मोंका वर्णन २६३
आचम्य देवतामिष्टां संस्मरेदुदरं स्पृशन्। बाद मुँह-हाथ धो, आचमन (कुल्ला) करके, अपने
इतिहासपुराणाभ्यां कंचित्कालं नयेद्बुधः ॥ १०५ उदरका स्पर्श करते हुए इष्टदेवका स्मरण करे। फिर
विद्वान् पुरुष इतिहास-पुराणोंके अध्ययनमें कुछ समय
ततः संध्यामुपासीत बहिर्गत्वा विधानतः। व्यतीत करे। तदनन्तर सायंकाल आनेपर बाहर (नदी
कृतहोमश्च भुञ्जीत रात्रावतिथिमार्चयेत् ॥ १०६ या जलाशयके तटपर) जाकर विधिपूर्वक संध्योपासन
करे। पुनः रात्रिकालमें हवन करके अतिथि-सत्कारके
सायं प्रातर्द्विजातीनामशनं श्रुतिचोदितम्। पश्चात् भोजन करे। द्विजातियोंके लिये प्रातः और सायं—
नान्तरा भोजनं कुर्यादग्निहोत्रसमो विधिः ॥ १०७ दो ही समय भोजन करना वेदविहित है; इसके बीचमें
भोजन नहीं करना चाहिये। जैसे अग्निहोत्र प्रातः और
शिष्यानध्यापयेत्तद्वदनध्यायं विवर्जयेत् । सायंकालमें किया जाता है, वैसे ही दो ही समय भोजनकी
स्मृत्युक्तान् सकलान् पूर्वपुराणोक्तानपि द्विजः ॥ १०८ भी विधि है ॥ १०३–१०७॥
इसके अतिरिक्त विद्वान् द्विजको चाहिये कि वह
महानवम्यां द्वादश्यां भरण्यामपि चैव हि। प्रतिदिन शिष्योंको पढ़ाये, परंतु अध्ययनके लिये वर्जित
तथाक्षय्यतृतीयायां शिष्यान्नाध्यापयेद्बुधः ॥ १०९ समयका त्याग करे। स्मृतिमें बताये हुए तथा पहलेके
पुराणोंमें वर्णित सम्पूर्ण अनध्याय-कालको त्याग दे।
माघमासे तु सप्तम्यां रथ्यामध्ययनं त्यजेत् । महानवमी (आश्विन शुक्ला नवमी) और द्वादशी तिथि,
अध्यापनमथाभ्यज्य स्नानकाले विवर्जयेत् ॥ ११० भरणी नक्षत्र और अक्षयतृतीयामें विद्वान् पुरुष शिष्योंको
न पढ़ाये। माघ मासकी सप्तमीको अध्ययन न करे,
दानं च विधिना देयं गृहस्थेन हितैषिणा । सड़कपर चलते समय और उबटन लगाकर स्नान करते
हिरण्यदानं गोदानं भूमिदानं विशेषतः ॥ १११ समय भी अध्ययनका त्याग करे ॥ १०८–११० ॥
एतानि यः प्रयच्छेत श्रोत्रियेभ्यो द्विजोत्तमः । अपना हित चाहनेवाले गृहस्थको चाहिये कि विधिपूर्वक
सर्वपापविनिर्मुक्तः स्वर्गलोके महीयते ॥ ११२ दान करे। विशेषतः सुवर्णदान, गोदान और भूमिदान
करे। जो द्विजश्रेष्ठ सुवर्ण आदि पूर्वोक्त वस्तुएँ श्रोत्रिय
मङ्गलाचारयुक्तश्च शुचिः श्रद्धापरो गृही। ब्राह्मणोंको दानमें देता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर
श्राद्धं च श्रद्धया कुर्यात्स याति ब्रह्मणः पदम् ॥ ११३ स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है। जो गृहस्थ शुभाचरणोंसे
युक्त, पवित्र और श्रद्धालु रहकर श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता
जातावुत्कर्षमायाति नरसिंहप्रसादतः । है, वह ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है। वह भगवान् नरसिंहकी
स तस्मान्मुक्तिमाप्नोति ब्रह्मणा सह सत्तमाः ॥ ११४ कृपासे जातिमें उत्कर्ष प्राप्त करता है और सत्तमो ! ब्रह्माजीके
साथ ही वह मुक्त हो जाता है। विप्रगण ! इस प्रकार मैंने
एवं हि विप्राः कथितो मया वः आप लोगोंसे यह सनातन धर्मसमूहका संक्षेपसे वर्णन
समासतः शाश्वतधर्मराशिः । किया। जो पुरुष सद्गृहस्थके उक्त धर्मका भलीभाँति
सम्यग्गृहस्थस्य सतो हि धर्मं प्रयत्नपूर्वक पालन करता है, वह मुक्त होकर भगवान्
कुर्वन् प्रयत्नाद्धरिमेति मुक्तः ॥ ११५ श्रीहरिको प्राप्त करता है ॥ १११–११५ ॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे गृहस्थधर्मो नामाष्टपञ्चाशोऽध्यायः ॥ ५८ ॥
इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'गृहस्थधर्म' नामक अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५८ ॥
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