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संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

१८२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४७

यहाँ पृष्ठ का देवनागरी लिप्यन्तरण प्रस्तुत है:

१८२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४७

इत्युक्ते भार्गवो रामो राममाहाग्रतः स्थितम् ॥ १४६
त्यज त्वं रामसंज्ञां तु मया वा संगरं कुरु।
इत्युक्ते राघवः प्राह भार्गवं तं पथि स्थितम् ॥ १४७
रामसंज्ञां कुतस्त्यक्ष्ये त्वया योत्स्ये स्थिरो भव।
इत्युक्त्वा तं पृथक् स्थित्वा रामो राजीवलोचनः ॥ १४८
ज्याघोषमकरोद्वीरो वीरस्यैवाग्रतस्तदा।
ततः परशुरामस्य देहान्निष्क्रम्य वैष्णवम् ॥ १४९
पश्यतां सर्वभूतानां तेजो राममुखेऽविशत् ।
दृष्ट्वा तं भार्गवो रामः प्रसन्नवदनोऽब्रवीत् ॥ १५०
राम राम महाबाहो रामस्त्वं नात्र संशयः ।
विष्णुरेव भवाञ्ज्ञातो ज्ञातोऽस्यद्य मया विभो ॥ १५१
गच्छ वीर यथाकामं देवकार्यं च वै कुरु।
दुष्टानां निधनं कृत्वा शिष्टांश्च परिपालय ॥ १५२
याहि त्वं स्वेच्छया राम अहं गच्छे तपोवनम्।
इत्युक्त्वा पूजितस्तैस्तु मुनिभावेन भार्गवः ॥ १५३
महेन्द्राद्रिं जगामाथ तपसे धृतमानसः ।
ततस्तु जातहर्षास्ते जना दशरथश्च ह ॥ १५४
पुरीमयोध्यां सम्प्राप्य रामेण सह पार्थिवः ।
दिव्यशोभां पुरीं कृत्वा सर्वतो भद्रशालिनीम् ॥ १५५
प्रत्युत्थाय ततः पौराः शङ्खतूर्यादिभिः स्वनैः ।
विशन्तं राममागत्य कृतदारं रणेऽजितम् ॥ १५६
तं वीक्ष्य हर्षिताः सन्तो विविशुस्तेन वै पुरीम् ।
तौ दृष्ट्वा स मुनिः प्राप्तौ रामं लक्ष्मणमन्तिके ॥ १५७
दशरथाय तत्पित्रे मातृभ्यश्च विशेषतः ।
तौ समर्प्य मुनिश्रेष्ठस्तेन राज्ञा च पूजितः ।
विश्वामित्रश्च सहसा प्रतिगन्तुं मनो दधे ॥ १५८


[हिन्दी अनुवाद]

वसिष्ठजी इस प्रकार कह ही रहे थे कि भृगुवंशी परशुरामजीने सामने खड़े हुए श्रीरामचन्द्रजीसे कहा— “राम ! तुम अपना यह 'राम' नाम त्याग दो, अथवा मेरे साथ युद्ध करो।” उनके यों कहनेपर रघुकुलनन्दन श्रीरामने मार्गमें खड़े हुए उन परशुरामजीसे कहा—"मैं 'राम' नाम कैसे छोड़ सकता हूँ? तुम्हारे साथ युद्ध ही करूँगा, सँभल जाओ।” उनसे इस प्रकार कहकर कमललोचन श्रीराम अलग खड़े हो गये और उन वीरवरने उस समय वीर परशुरामके सामने ही धनुषकी प्रत्यञ्चाकी टंकार की। तब परशुरामजीके शरीरसे वैष्णव तेज निकलकर सब प्राणियोंके देखते-देखते श्रीरामके मुखमें समा गया। उस समय भृगुवंशी परशुरामने श्रीरामकी ओर देख प्रसन्नमुख होकर कहा—"महाबाहु श्रीराम ! आप ही 'राम' हैं, अब इस विषयमें मुझे संदेह नहीं है। प्रभो! आज मैंने आपको पहचाना; आप साक्षात् विष्णु ही इस रूपमें अवतीर्ण हुए हैं। वीर! अब आप अपने इच्छानुसार जाइये, देवताओंका कार्य सिद्ध कीजिये और दुष्टोंका नाश करके साधु पुरुषोंका पालन कीजिये। श्रीराम! अब आप स्वेच्छानुसार चले जाइये; मैं भी तपोवनको जाता हूँ" ॥ १४६-१५२ १/२ ॥

यों कहकर परशुरामजी उन दशरथ आदिके द्वारा मुनिभावसे पूजित हुए और तपस्याके लिये मनमें निश्चय करके महेन्द्राचलको चले गये। तब समस्त बरातियों तथा महाराज दशरथको महान् हर्ष प्राप्त हुआ और वे (वहाँसे चलकर) श्रीरामचन्द्रजीके साथ अयोध्यापुरीके निकट पहुँचे। उधर सम्पूर्ण पुरवासी मङ्गलमयी अयोध्या नगरीको सब ओर दिव्य सजावटसे सुसज्जित करके शङ्ख और दुन्दुभि आदि गाजे-बाजेके साथ उनकी अगवानीके लिये निकले। नगरके बाहर आकर वे रणमें अजेय श्रीरामजीको पत्नीसहित नगरमें प्रवेश करते हुए देखकर आनन्दमग्न हो गये और उन्हींके साथ अयोध्यामें प्रविष्ट हुए ॥ १५३-१५६ १/२ ॥

तत्पश्चात् मुनिवर विश्वामित्रने श्रीराम और लक्ष्मण—दोनों भाइयोंको अपने निकट आया हुआ देखकर उन्हें उनके पिता दशरथ तथा विशेषरूपसे उनकी माताओंको समर्पित कर दिया। तब राजा दशरथद्वारा पूजित होकर मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र सहसा लौट जानेके लिये उद्यत हुए।

अध्याय ४८ ] श्रीराम-वनवास; राजा दशरथका निधन तथा वनमें राम-भरतकी भेंट १८३
समर्प्य रामं स मुनिः सहानुजं | इस प्रकार महामति मुनि विश्वामित्रजीने छोटे भाई
सभार्यमग्रे पितुरेकवल्लभम्। | लक्ष्मण तथा भार्या सीताके साथ श्रीरामजीको, जो अपने
पुनः पुनः श्राव्य हसनमहामति- | पिताको एकान्त प्रिय थे, समर्पित कर दिया और उनके
जगाम सिद्धाश्रममेवमात्मनः॥ १५९ | समक्ष बारम्बार उनका गुणगान करके हँसते हुए वे
| अपने श्रेष्ठ सिद्धाश्रमको चले गये॥ १५७-१५९॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे रामप्रादुर्भावे सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४७॥
इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'रामावतारविषयक' सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४७॥
अड़तालीसवाँ अध्याय
श्रीराम-वनवास; राजा दशरथका निधन तथा वनमें राम-भरतकी भेंट
मार्कण्डेय उवाच | मार्कण्डेयजी कहते हैं—विवाह करनेके पश्चात्
कृतदारो महातेजा रामः कमललोचनः। | महातेजस्वी कमललोचन श्रीराम अयोध्यावासियोंका आनन्द
पित्रे सुमहतीं प्रीतिं जनानामुपपादयन्॥ १ | बढ़ाते हुए सब प्रकारके भोगोंसे सम्पन्न हो, पिताके
| संतोषके लिये अयोध्यामें ही रहने लगे। नरेश्वर ! जब
अयोध्यायां स्थितो रामः सर्वभोगसमन्वितः। | रघुकुलनायक श्रीराम प्रसन्नतापूर्वक अयोध्यामें सानन्द
प्रीत्या नन्दत्ययोध्यायां रामे रघुपतौ नृप॥ २ | निवास करने लगे, तब उनके भाई भरत शत्रुघ्नको साथ
| लेकर अपने मामाके यहाँ चले गये। तदनन्तर राजा
भ्राता शत्रुघ्नसहितो भरतो मातुलं ययौ। | दशरथने अपने ज्येष्ठ पुत्र श्रीरामको अप्रतिम सुन्दर, बलिष्ठ,
ततो दशरथो राजा प्रसमीक्ष्य सुशोभनम्॥ ३ | नवयुवक, विद्वान् और राजा बनाये जानेके योग्य समझकर
| सोचा कि 'अब श्रीरामको राजपद्पर अभिषिक्त करके
युवानं बलिनं योग्यं भूपसिद्धयै सुतं कविम्। | राज्यका भार इन्हें सौंप दूँ और स्वयं भगवान् विष्णुके
अभिषिच्य राज्यभारं रामे संस्थाप्य वैष्णवम्॥ ४ | धामको प्राप्त करनेके लिये महान् यत्न करूँ॥ १-४१/२॥
| यह सोचकर राजा इस कार्यमें तत्पर हो गये और
पदं प्राप्तुं महद्यत्नं करिष्यामीत्यचिन्तयत्। | समस्त दिशाओंमें रहनेवाले बुद्धिमान् भृत्यों, अधीनस्थ
संचिन्त्य तत्परो राजा सर्वदिक्षु समादिशत्॥ ५ | राजाओं तथा मन्त्रियोंको तुरन्त आज्ञा दी—'भृत्यगण!
| श्रीरामचन्द्रजीके राज्याभिषेकके लिये जो-जो सामान
प्राज्ञान् भृत्यान् महीपालान्मन्त्रिणश्च त्वरान्वितः।| मुनियोंने बताये हैं, वे सब एकत्र करके शीघ्र ही आओ।
रामाभिषेकद्रव्याणि ऋषिप्रोक्तानि यानि वै॥ ६ | दूतो और मन्त्रियो ! तुम लोग भी मेरी आज्ञासे सब दिशाओंके
| राजाओंको बुलाकर, उन्हें साथ ले, शीघ्र यहाँ आ जाओ।
तानि भृत्याः समाहृत्य शीघ्रमागन्तुमर्हथ। | पुरवासिजनो ! तुम इस अयोध्यानागरीको उत्तम रीतिसे सजाकर
दूतामात्याः समादेशात्सर्वदिक्षु नराधिपान्॥ ७ | सर्वथा शोभा-सम्पन्न बना दो तथा सर्वत्र नृत्य-गीत आदि
| उत्सवका ऐसा प्रबन्ध करो, जिससे यह नगर समस्त
आहूय तान् समाहृत्य शीघ्रमागन्तुमर्हथ। | पुरवासियोंको आनन्द देनेवाला हो जाय और सम्पूर्ण देशके
अयोध्यापुरमत्यर्थं सर्वशोभासमन्वितम्॥ ८ | निवासियोंको मनोहर प्रतीत होने लगे। तुम सब लोग यह
जनाः कुरुत सर्वत्र नृत्यगीतादिनन्दितम्।
पुरवासिजनानन्दं देशवासिमनःप्रियम्॥ ९
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