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संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

२३२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५२

२३२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५२

रावणे बद्धवैरस्तु अगस्त्यो वै जयप्रदम्। दिलानेवाले 'आदित्यहृदय' नामक स्तोत्र-मन्त्रका उपदेश
आदित्यहृदयं नाम मन्त्रं प्रादाज्जयप्रदम् ॥ ९८ किया। महाबली श्रीरामचन्द्रजीने भी अगस्त्यमुनिके बताये
रामोऽपि जप्त्वा तन्मन्त्रमगस्त्योक्तं जयप्रदम्। हुए उस विजयदायक मन्त्रका जप करके उनके द्वारा
तद्दत्तं वैष्णवं चापमतुलं सगुणं दृढम् ॥ ९९ अर्पित किये गये उत्तम डोरीवाले, सुदृढ़ एवं अनुपम
वैष्णव-धनुषको सादर ग्रहण किया और उसपर प्रत्यञ्चा
पूजयित्वा तदादाय सज्यं कृत्वा महाबलः। चढ़ायी। फिर प्रतापी रघुनाथजी शत्रुओंका मर्म-भेदन
सौवर्णपुङ्खैस्तीक्ष्णैस्तु शरैर्मर्मविदारणैः ॥ १०० करनेमें समर्थ सोनेकी पाँखवाले तीक्ष्ण बाणोंद्वारा राक्षसराज
युयुधे राक्षसेन्द्रेण रघुनाथः प्रतापवान्। रावणके साथ युद्ध करने लगे ॥ ९७-१००१/२ ॥
तयोस्तु युध्यतोस्तत्र भीमशक्त्योर्महामते ॥ १०१ महामते ! नृपश्रेष्ठ ! उन दोनों भयंकर शक्तिवाले
श्रीराम और रावणके परस्पर युद्ध करते समय एक-
परस्परविसृष्टस्तु व्योम्नि संवर्द्धितोऽनलः। दूसरेपर छोड़ी हुई अग्निकी ज्वाला उठ-उठकर वहाँ
समुत्थितो नृपश्रेष्ठ रामरावणयोर्युधि ॥ १०२ आकाशमें फैलने लगी। इस वर्तमान संग्राममें अवर्णनीय
संगरे वर्तमाने तु रामो दाशरथिस्तदा। पराक्रमवाले वीर दशरथनन्दन श्रीराम पैदल ही युद्ध
पदातिर्युयुधे वीरो रामोऽनुक्तपराक्रमः ॥ १०३ कर रहे थे। यह देख देवराज इन्द्रने अपने सारथि
मातुलिसहित एक महान् लोकविख्यात दिव्य रथ भेजा,
सहस्राश्वयुतं दिव्यं रथं मातलिमेव च। जिसमें एक हजार घोड़े जुते थे। प्रतापी श्रीरामचन्द्रजी
प्रेषयामास देवेन्द्रो महान्तं लोकविश्रुतम् ॥ १०४ श्रेष्ठ देवोंद्वारा प्रशंसित होकर उस रथपर आरूढ़ हुए
रामस्तं रथमारुह्य पूज्यमानः सुरोत्तमैः। और मातलिके उपदेशसे उस दुष्ट दशाननका, जिसे
मातल्युक्तोपदेशस्तु रामचन्द्रः प्रतापवान् ॥ १०५ ब्रह्माजीने वरदान दिया था, ब्रह्मास्त्रद्वारा वध किया। इस
प्रकार प्रतापी भगवान् श्रीरामने अपने क्रूर वैरी रावणका
ब्रह्मदत्तवरं दुष्टं ब्रह्मास्त्रेण दशाननम्। संहार किया ॥ १०१-१०६ ॥
जघान वैरिणं क्रूरं रामदेवः प्रतापवान् ॥ १०६ श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा शत्रु रावणका उसके गणोंसहित
रामेण निहते तत्र रावणे सगणे रिपौ। वध हो जानेपर इन्द्र आदि सभी देवता परस्पर कहने
इन्द्राद्या देवताः सर्वाः परस्परमथाब्रुवन् ॥ १०७ लगे- "साक्षात् भगवान् विष्णुने ही श्रीरामावतार लेकर
हमारे वैरी रावणका, जो दूसरोंके लिये अवध्य था,
रामो भूत्वा हरिर्यस्मादस्माकं वैरिणं रणे। युद्धमें वध किया है। इसलिये हम लोग आकाशसे
अन्यैरवध्यमप्येनं जघान युधि रावणम् ॥ १०८ उतरकर इन अनन्त पराक्रमी तथा किसीसे भी पराजित
न होनेवाले 'श्रीराम' नामक परमेश्वरकी पूजा करें।"
तस्मात्तं रामनामानमनन्तमपराजितम्। ऐसी सम्मति करके वे रुद्र, इन्द्र, वसु और चन्द्र आदि
पूजयामोऽवतीर्यैनमित्युक्त्वा ते दिवौकसः ॥ १०९ देवतागण अनेक कान्तिमान् विमानोंद्वारा पृथ्वीपर उतरे।
नानाविमानैः श्रीमद्भिरवतीर्य महीतले। वे जगत्के रचयिता, विश्वमूर्ति, सनातन पुरुष, विजयशील
रुद्रेन्द्रवसुचन्द्राद्या विधातारं सनातनम् ॥ ११० भगवान् विष्णुके स्वरूपभूत अविनाशी परमात्मा श्रीरामका
लक्ष्मणसहित विधिवत् पूजन करके उन्हें सब ओरसे
विष्णुं जिष्णुं जगन्मूर्ति सानुजं राममव्ययम्। घेरकर खड़े हो गये ॥ १०७-१११॥
तं पूजयित्वा विधिवत्परिवार्योपतस्थिरे ॥ १११ सब देवता परस्पर कहने लगे- 'देवगण! देखो-
रामोऽयं दृश्यतां देवा लक्ष्मणोऽयं व्यवस्थितः। ये श्रीरामचन्द्रजी हैं, ये लक्ष्मणजी खड़े हैं, ये सूर्यनन्दन
सुग्रीवो रविपुत्रोऽयं वायुपुत्रोऽयं व्यवस्थितः ॥ ११२ सुग्रीव हैं, ये वायुनन्दन हनुमान्जी खड़े हैं और ये

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अध्याय ५२ ] श्रीराम आदिका समुद्रतटपर जाना; विभीषणकी शरणागति और राज्याभिषेक २३३
अङ्गदाद्या इमे सर्वे इत्यूचुस्ते दिवौकसः ।
गन्धामोदितदिक्चक्रा भ्रमरालिपदानुगा ॥ ११३
देवस्त्रीकरनिर्मुक्ता राममूर्धनि शोभिता ।
पपात पुष्पवृष्टिस्तु लक्ष्मणस्य च मूर्धनि ॥ ११४
ततो ब्रह्मा समागत्य हंसयानेन राघवम् ।
अमोघाख्येन स्तोत्रेण स्तुत्वा राममवोचत ॥ ११५
ब्रह्मोवाच
त्वं विष्णुरादिर्भूतानामनन्तो ज्ञानदृक्प्रभुः ।
त्वमेव शाश्वतं ब्रह्म वेदान्ते विदितं परम् ॥ ११६
त्वया यदद्य निहतो रावणो लोकरावणः ।
तदाशु सर्वलोकानां देवानां कर्म साधितम् ॥ ११७
इत्युक्ते पद्मयोनौ तु शङ्करः प्रीतिमास्थितः ।
प्रणम्य रामं तस्मै तं भूयो दशरथं नृपम् ॥ ११८
दर्शयित्वा गतो देवः सीता शुद्धेति कीर्तयन्।
ततो बाहुबलप्राप्तं विमानं पुष्पकं शुभम् ॥ ११९
पूतामारोप्य सीतां तामादिष्टः पवनात्मजः ।
ततस्तु जानकीं देवीं विशोकां भूषणान्विताम् ॥ १२०
वन्दितां वानरेन्द्रैस्तु सार्धं भ्रात्रा महाबलः ।
प्रतिष्ठाप्य महादेवं सेतुमध्ये स राघवः ॥ १२१
लब्धवान् परमां भक्तिं शिवे शम्भोरनुग्रहात् ।
रामेश्वर इति ख्यातो महादेवः पिनाकधृक् ॥ १२२
तस्य दर्शनमात्रेण सर्वहत्यां व्यपोहति ।
रामस्तीर्णप्रतिज्ञोऽसौ भरतासक्तमानसः ॥ १२३
ततोऽयोध्यां पुरीं दिव्यां गत्वा तस्यां द्विजोत्तमैः ।
अभिषिक्तो वसिष्ठाद्यैर्भरतेन प्रसादितः ।
अकरोद्धर्मतो राज्यं चिरं रामः प्रतापवान् ॥ १२४
[दायाँ भाग - हिन्दी अनुवाद]
अङ्गद आदि सभी वानर वीर विराजमान हैं।' तत्पश्चात् श्रीरामचन्द्रजी और लक्ष्मणके मस्तकपर देवाङ्गनाओं-के हाथसे छोड़े गये फूलोंकी वर्षा हुई। उस समय वहाँकी सब दिशाएँ उन दिव्य पुष्पोंकी सुगन्धसे सुवासित हो रही थीं और उन पुष्पोंपर भ्रमरगण मँडरा रहे थे॥११२-११४॥
तदनन्तर ब्रह्माजी हंसकी सवारीसे वहाँ आये और 'अमोघ' नामक स्तोत्रसे भगवान् श्रीरामकी स्तुति करके तब उनसे बोले॥११५॥
ब्रह्माजीने कहा—आप समस्त प्राणियोंके आदिकारण, अविनाशी, ज्ञानदृष्टि भगवान् विष्णु हैं; आप ही वेदान्त-विख्यात सनातन परब्रह्म हैं। आपने आज जो सम्पूर्ण लोकोंको रुलानेवाले रावणका वध किया है, इससे समस्त लोकों तथा देवताओंका भी कार्य सद्यः सिद्ध हो गया॥११६-११७॥
ब्रह्माजीके इस प्रकार कहनेके पश्चात् भगवान् शङ्करने भी पहले श्रीरामचन्द्रजीको प्रेमपूर्वक प्रणाम किया। फिर उन्हें राजा दशरथका दर्शन कराया। उसके बाद यह कहकर कि 'श्रीसीताजी निष्कलङ्क और शुद्ध चरित्रवाली हैं'-भगवान् शंकर चले गये॥११८१/२॥
तदनन्तर पवित्रात्मा सीताजीको अपने बाहुबलसे प्राप्त सुन्दर पुष्पकविमानपर चढ़ाकर भगवान्ने हनुमान्जी-को चलनेका आदेश दिया। तब समस्त वानरेन्द्रांद्वारा वन्दित शोकरहित जानकीदेवीको आभूषणोंसे विभूषितकर महाबली रामचन्द्रजी अपने भाई लक्ष्मणके साथ चले। लौटती बार श्रीरामचन्द्रजीने समुद्रके पुलपर महादेवजीकी स्थापना की और शङ्करजीकी कृपासे उन्होंने उन शिवजीमें परमभक्ति प्राप्त की। वहाँ स्थापित हुए पिनाकधारी महादेवजी 'रामेश्वर' नामसे विख्यात हुए। उनके दर्शनमात्र-से शिवजी सब प्रकारके हत्यादि दोषोंको दूर कर देते हैं॥११९-१२२१/२॥
इस प्रकार प्रतिज्ञा पूर्ण करके श्रीरामचन्द्रजी अपना चित्त भरतजीकी ओर लगा रहनेके कारण वहाँसे दिव्यपुरी अयोध्याको गये। फिर भरतजीके मनानेपर श्रीरामचन्द्रजीने वसिष्ठ आदि उत्तम ब्राह्मणोंके द्वारा अपना राज्याभिषेक कराया। तत्पश्चात् प्रतापी भगवान् श्रीरामने चिरकालतक