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संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

२८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ७

२८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ७
भृगोः ख्यातयां समुत्पन्नो मृकण्डुर्नाम वै सुतः । भृगुजीके उनकी पत्नी ख्यातिके गर्भसे 'मृकण्डु' नामक
सुमित्रा नाम वै पत्नी मृकण्डोस्तु महात्मनः ॥ १० एक पुत्र हुआ। महात्मा मृकण्डुकी पत्नी सुमित्रा हुई।
धर्मज्ञा धर्मनिरता पतिशुश्रूषणे रता । वह धर्मको जाननेवाली, धर्मपरायणा और पतिकी
तस्यां तस्य सुतो जातो मार्कण्डेयो महामतिः ॥ ११ सेवामें लगी रहनेवाली थी। इसीके गर्भसे मृकण्डुके
भृगुपौत्रो महाभागो बालत्वेऽपि महामतिः । पुत्र मेधावी मार्कण्डेयजी हुए। ये भृगुके पौत्र महाभाग
ववृधे वल्लभो बालः पित्रा तत्र कृतक्रियः ॥ १२ मार्कण्डेय बचपनमें भी बड़े बुद्धिमान् थे। पिताके द्वारा
तस्मिन् वै जातमात्रे तु आगमी कश्चिदब्रवीत् । जातकर्म आदि संस्कार कर देनेपर माँ-बापके लाड़ले
वर्षे द्वादशमे पूर्णे मृत्युरस्य भविष्यति ॥ १३ बालक मार्कण्डेयजी क्रमशः बढ़ने लगे॥८-१२॥
श्रुत्वा तन्मातृपितरौ दुःखितौ तौ बभूवतुः । उनके जन्म लेते ही किसी भविष्यवेत्ता ज्योतिषीने
विदूयमानहृदयौ तं निरीक्ष्य महामते ॥ १४ यह कहा था कि 'बारहवाँ वर्ष पूर्ण होते ही इस
तथापि तत्पिता तस्य यत्नात् काले क्रियां ततः । बालककी मृत्यु हो जायगी।' यह सुनकर उनके माता-
चकार सर्वा मेधावी उपनीतो गुरोर्गृहे ॥ १५ पिता बहुत ही दुःखी हुए। महामते! उन्हें देख-देखकर
वेदानेवाभ्यसन्नास्ते गुरुशुश्रूषणोद्यतः । उन दोनोंका हृदय व्यथित होता रहता था, तथापि उनके
स्वीकृत्य वेदशास्त्राणि स पुनर्गृहमागतः ॥ १६ पिताने उनके नामकरण आदि सभी संस्कार किये।
मातापितॄन्नमस्कृत्य पादयोर्विनयान्वितः । तत्पश्चात् मेधावी बालक मार्कण्डेय गुरुके घर ले जाये
तस्थौ तत्र गृहे धीमान् मार्कण्डेयो महामुनिः ॥ १७ गये। वहाँ उनका उपनयन-संस्कार हुआ। वहाँ वे गुरुकी
तं निरीक्ष्य महात्मानं सत्प्रज्ञं च विचक्षणम् । सेवामें तत्पर रहकर वेदाभ्यास करते हुए ही रहने लगे।
दुःखितौ तौ भृशं तत्र तन्मातापितरौ शुचा ॥ १८ वेद-शास्त्रोंका यथावत् अध्ययन करके वे पुनः अपने
तौ दृष्ट्वा दुःखमापन्नौ मार्कण्डेयो महामतिः । घर लौट आये। घर आनेपर बुद्धिमान् महामुनि मार्कण्डेयने
उवाच वचनं तत्र किमर्थं दुःखमीदृशम् ॥ १९ विनयपूर्वक माता-पिताके चरणोंमें शीश झुकाया और
सदैतत् कुरुषे मातस्तातेन सह धीमता । तबसे वे घरपर ही रहने लगे ॥ १३-१७॥
वक्तुमर्हसि दुःखस्य कारणं मम पृच्छतः ॥ २० शुकदेव ! उस समय उन परम बुद्धिमान् महात्मा
इत्युक्ता तेन पुत्रेण माता तस्य महात्मनः । एवं विद्वान् पुत्रको देखकर माता-पिता शोकसे बहुत ही
कथयामास तत्सर्वमागमी यदुवाच ह ॥ २१ दुःखी हुए। उन्हें दुःखी देखकर महामति मार्कण्डेयजीने
तच्छ्रुत्वासौ मुनिः प्राह मातरं पितरं पुनः । कहा-'माँ! तुम बुद्धिमान् पिताजीके साथ क्यों इस
पित्रा सार्धं त्वया मातर्न कार्यं दुःखमण्वपि ॥ २२ प्रकार निरन्तर दुःखी रहा करती हो? मैं पूछता हूँ,
अपनेष्यामि भो मृत्युं तपसा नात्र संशयः । मुझसे अपने दुःखका कारण बतलाओ।' अपने पुत्र
यथा चाहं चिरायुः स्यां तथा कुर्यामहं तपः ॥ २३ मार्कण्डेयजीके इस प्रकार पूछनेपर उन महात्माकी
इत्युक्त्वा तौ समाश्वास्य पितरौ वनमभ्यगात् । माताने, ज्योतिषी जो कुछ कह गया था, वह सब कह
वल्लीवटं नाम वनं नानातृषिनिषेवितम् ॥ २४ सुनाया। यह सुनकर मार्कण्डेयमुनिने माता-पितासे
तत्रासौ मुनिभिः सार्धमासीनं स्वपितामहम् । कहा-'माँ! तुम और पिताजी तनिक भी दुःख न
भृगुं ददर्श धर्मज्ञं मार्कण्डेयो महामतिः ॥ २५ मानो। मैं तपस्याके द्वारा अपनी मृत्युको दूर हटा दूँगा,
इसमें संशय नहीं है। मैं ऐसा तप करूँगा, जिससे
चिरजीवी हो सकूँ' ॥ १८-२३॥
इस प्रकार कहकर, माता-पिताको आश्वासन देकर,
वे अनेक ऋषियोंसे सुसेवित 'वल्लीवट' नामक वनमें
गये। वहाँ पहुँचकर महामति मार्कण्डेयजीने मुनियोंके
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अध्याय ७ ] मार्कण्डेयजीके द्वारा तपस्यापूर्वक श्रीहरिकी आराधना; 'मृत्युञ्जय-स्तोत्र'का पाठ २९
अभिवाद्य यथान्यायं मुनींश्चैव स धार्मिकः।
कृताञ्जलिपुटो भूत्वा तस्थौ तत्पुरतो दमी॥ २६
गतायुषं ततो दृष्ट्वा पौत्रं बालं महामतिः।
भृगुराह महाभागं मार्कण्डेयं तदा शिशुम्॥ २७
किमागतोऽसि पुत्रात्र पितुस्ते कुशलं पुनः।
मातुश्च बान्धवानां च किमागमनकारणम्॥ २८
इत्येवमुक्तो भृगुणा मार्कण्डेयो महामतिः।
उवाच सकलं तस्मै आदेशिवचनं तदा॥ २९
पौत्रस्य वचनं श्रुत्वा भृगुस्तु पुनरब्रवीत्।
एवं सति महाबुद्धे किं त्वं कर्म चिकीर्षसि ॥ ३०
मार्कण्डेय उवाच
भूतापहारिणं मृत्युं जेतुमिच्छामि साम्प्रतम्।
शरणं त्वां प्रपन्नोऽस्मि तत्रोपायं वदस्व नः ॥ ३१
भृगुरुवाच
नारायणमनाराध्य तपसा महता सुत।
को जेतुं शक्नुयान्मृत्युं तस्मात्तं तपसार्चय ॥ ३२
तमनन्तमजं विष्णुमच्युतं पुरुषोत्तमम्।
भक्तप्रियं सुरश्रेष्ठं भक्त्या त्वं शरणं व्रज ॥ ३३
तमेव शरणं पूर्वं गतवान्नारदो मुनिः।
तपसा महता वत्स नारायणमनामयम् ॥ ३४
तत्प्रसादान्महाभाग नारदो ब्रह्मणः सुतः।
जरां मृत्युं विजित्याशु दीर्घायुर्वर्धते सुखम्॥ ३५
तमृते पुण्डरीकाक्षं नारसिंहं जनार्दनम्।
कः कुर्यान्मानवो वत्स मृत्युसत्तानिवारणम्॥ ३६
तमनन्तमजं विष्णुं कृष्णं जिष्णुं श्रियः पतिम्।
गोविन्दं गोपतिं देवं सततं शरणं व्रज ॥ ३७
नरसिंहं महादेवं यदि पूजयसे सदा।
वत्स जेतासि मृत्युं त्वं सततं नात्र संशयः ॥ ३८
व्यास उवाच
उक्तः पितामहेनैवं भृगुणा पुनरब्रवीत्।
मार्कण्डेयो महातेजा विनयात् स्वपितामहम् ॥ ३९
साथ विराजमान अपने पितामह धर्मात्मा भृगुजीका दर्शन
किया। उनके साथ ही अन्य ऋषियोंका भी यथोचित
अभिवादन करके धर्मपरायण मार्कण्डेयजी मनोनिग्रहपूर्वक
दोनों हाथ जोड़कर भृगुजीके समक्ष खड़े हो गये।
महामति भृगुजीने अपने बालक पौत्र महाभाग मार्कण्डेयको,
जिसकी आयु प्रायः बीत चुकी थी, देखकर कहा—
'वत्स! तुम यहाँ कैसे आये? अपने माता-पिता और
बान्धवजनोंका कुशल कहो तथा यह भी बतलाओ कि
यहाँ तुम्हारे आनेका क्या कारण है?' भृगुजीके इस
प्रकार पूछनेपर महाप्राज्ञ मार्कण्डेयजीने उनसे उस समय
ज्योतिषीकी कही हुई सारी बात कह सुनायी। पौत्रकी
बात सुनकर भृगुजीने पुनः कहा—'महाबुद्धे! ऐसी स्थितिमें
तुम कौन-सा कर्म करना चाहते हो?'॥ २४-३०॥
मार्कण्डेयजी बोले- भगवन्! मैं इस समय
प्राणियोंका अपहरण करनेवाले मृत्युको जीतना चाहता
हूँ, इसलिये आपकी शरणमें आया हूँ। इस उद्देश्यकी
सिद्धिके लिये आप मुझे कोई उपाय बतायें ॥ ३१ ॥
भृगुजी बोले- पुत्र ! बहुत बड़ी तपस्याके द्वारा
भगवान् नारायणकी आराधना किये बिना कौन मृत्युको
जीत सकता है? इसलिये तुम तपस्याद्वारा उन्हींका अर्चन
करो। भक्तोंके प्रियतम और देवताओंमें सर्वश्रेष्ठ उन
अनन्त, अजन्मा, अच्युत पुरुषोत्तम भगवान् विष्णुकी
शरणमें जाओ। वत्स ! पूर्वकालमें नारदमुनि भी महान्
तपके द्वारा उन्हीं अनामय भगवान् नारायणकी शरणमें गये
थे। महाभाग! ब्रह्मपुत्र नारदजी उन्हींकी कृपासे जरा और
मृत्युको शीघ्र ही जीतकर दीर्घायु हो सुखपूर्वक रहते हैं।
पुत्र! उन कमललोचन नृसिंहस्वरूप भगवान् जनार्दनके
बिना कौन मनुष्य यहाँ मृत्युकी सत्ताका निवारण कर
सकता है? तुम निरन्तर उन्हीं अनन्त, अजन्मा, विजयी,
कृष्णवर्ण, लक्ष्मीपति, गोविन्द, गोपति भगवान् विष्णुकी
शरणमें जाओ! वत्स ! यदि तुम सदा उन महान् देवता
भगवान् नरसिंहकी पूजा करते रहोगे तो सदाके लिये मृत्युपर
विजय प्राप्त कर लोगे, इसमें संशय नहीं है ॥ ३२-३८॥
व्यासजी बोले- पितामह भृगुके इस प्रकार कहनेपर
महान् तेजस्वी मार्कण्डेयजीने उनसे विनयपूर्वक
कहा ॥ ३९ ॥
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