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संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

२० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५

२० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५


[संस्कृत श्लोक]

ताभ्यः शिष्टा यवीयस्यस्तासां नामानि कीर्तये।
सम्भूतिश्चानसूया च स्मृतिः प्रीतिः क्षमा तथा ॥ २६
संनतिश्चाथ सत्या च ऊर्जा ख्यातिर्द्विजोत्तम।
तद्गतपुत्रौ महाभागौ मातरिश्वाथ सत्यवान् ॥ २७
स्वाहाथ दशमी ज्ञेया स्वधा चैकादशी स्मृता।
एताश्च दत्ता दक्षेण ऋषीणां भावितात्मनाम् ॥ २८
मरीच्यादीनां तु ये पुत्रास्तानहं कथयामि ते।
पत्नी मरीचेः सम्भूतिर्जज्ञे सा कश्यपं मुनिम् ॥ २९
स्मृतिश्चाङ्गिरसः पत्नी प्रसूता कन्यकास्तथा।
सिनीवाली कुहूश्चैव राका चानुमतिस्तथा ॥ ३०
अनसूया तथा चात्रेर्जज्ञे पुत्रानकल्मषान्।
सोमं दुर्वाससं चैव दत्तात्रेयं च योगिनम् ॥ ३१
योऽसावग्नेरभीमानी ब्रह्मणस्तनयोऽग्रजः।
तस्मात् स्वाहा सुताँल्लेभे त्रीनुदारौजसो द्विज ॥ ३२
पावकं पवमानं च शुचिं चापि जलाशिनम्।
तेषां तु संततावन्वे चत्वारिंशच्च पञ्च च ॥ ३३
कथ्यन्ते वह्नयश्चैते पिता पुत्रत्रयं च यत्।
एवमेकोनपञ्चाशद्वह्नयः परिकीर्तिताः ॥ ३४
पितरो ब्रह्मणा सृष्टा व्याख्याता ये मया तव।
तेभ्यः स्वधा सुते जज्ञे मेनां वै धारिणीं तथा ॥ ३५
प्रजाः सृजेति व्यादिष्टः पूर्वं दक्षः स्वयम्भुवा।
यथा ससर्ज भूतानि तथा मे शृणु सत्तम ॥ ३६
मनसैव हि भूतानि पूर्वं दक्षोऽसृजन्मुनिः।
देवानृषींश्च गन्धर्वानसुरान् पन्नगांस्तथा ॥ ३७
यदास्य मनसा जाता नाभ्यवर्धन्त ते द्विज।
तदा संचिन्त्य स मुनिः सृष्टिहेतोः प्रजापतिः ॥ ३८
मैथुनेनैव धर्मेण सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः।
असिक्नीमुद्वहन् कन्यां वीरणस्य प्रजापतेः ॥ ३९


[हिन्दी अनुवाद]

द्विजश्रेष्ठ! श्रद्धा आदिसे छोटी अवस्थावाली जो
उनकी शेष बहनें थीं, उनके नाम बता रहा हूँ—सम्भूति,
अनसूया, स्मृति, प्रीति, क्षमा, संनति, सत्या, ऊर्जा,
ख्याति, दसवीं स्वाहा और ग्यारहवीं स्वधा है। दक्षके
'मातरिश्वा' और 'सत्यवान्' नामक दो महाभाग पुत्र भी
हुए। उपर्युक्त ग्यारह कन्याओंको दक्षने पुण्यात्मा
ऋषियोंको दिया ॥ २६-२८ ॥
मरीचि आदि मुनियोंके जो पुत्र हुए, उन्हें मैं आपसे
बतलाता हूँ। मरीचिकी पत्नी सम्भूति थी। उसने कश्यप
मुनिको जन्म दिया। अङ्गिराकी भार्या स्मृति थी। उसने
सिनीवाली, कुहू, राका और अनुमति—इन चार कन्याओंको
उत्पन्न किया। इसी प्रकार अत्रि मुनिकी पत्नी अनसूयाने
सोम, दुर्वासा और योगी दत्तात्रेय—इन तीन पापरहित
पुत्रोंको जन्म दिया। द्विज ! ब्रह्माजीका ज्येष्ठ पुत्र, जो
अग्निका अभिमानी देवता है, उससे उसकी पत्नी स्वाहाने
पावक, पवमान और जलका भक्षण करनेवाले शुचि—
इन अत्यन्त तेजस्वी पुत्रोंको उत्पन्न किया। इन तीनोंके
(प्रत्येकके पंद्रह-पंद्रहके क्रमसे) अन्य पैंतालीस
अग्निस্বরূপ संतानें हुईं। पिता अग्नि, उसके तीनों पुत्र
तथा उनके भी ये पूर्वोक्त पैंतालीस पुत्र सब
मिलकर 'अग्नि' ही कहलाते हैं। इस प्रकार उनचास
अग्नि कहे गये हैं। ब्रह्माजीके द्वारा रचे गये जिन
पितरोंका मैंने आपके समक्ष वर्णन किया था, उनसे
उनकी पत्नी स्वधाने मेना और धारिणी—इन दो
कन्याओंको जन्म दिया ॥ २९-३५॥
साधुशिरोमणे ! पूर्वकालमें स्वयम्भू ब्रह्माजीके द्वारा
'तुम प्रजाकी सृष्टि करो' यह आज्ञा पाकर दक्षने
जिस प्रकार सम्पूर्ण भूतोंकी सृष्टि की थी, उसे सुनिये।
विप्रवर ! दक्षमुनिने पहले देवता, ऋषि, गन्धर्व, असुर
और सर्प—इन सभी भूतोंको मनसे ही उत्पन्न किया।
परंतु जब मनसे उत्पन्न किये हुए ये देवादि सर्ग
वृद्धिको प्राप्त नहीं हुए, तब उन दक्ष प्रजापति ऋषिने
सृष्टिके लिये पूर्णतः विचार करके मैथुनधर्मके द्वारा
ही नाना प्रकारकी सृष्टि रचनेकी इच्छा मनमें लिये
वीरण प्रजापतिकी कन्या असिक्नीके साथ विवाह किया।


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अध्याय ५ ] रुद्र आदि सर्गों और अनुसर्गोंका वर्णन; दक्ष प्रजापतिकी कन्याओंकी संततिका विस्तार २१
षष्टिं दक्षोऽसृजत् कन्या वीरण्यामिति नः श्रुतम्।
ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश॥ ४०
सप्तविंशति सोमाय चतस्रोऽरिष्टनेमिने।
द्वे चैव बहुपुत्राय द्वे चैवाङ्गिरसे तथा॥ ४१
द्वे कृशाश्वाय विदुषे तदपत्यानि मे शृणु।
विश्वेदेवांस्तु विश्वा या साध्या साध्यानसूत॥ ४२
मरुत्वत्यां मरुत्वन्तो वसोस्तु वसवः स्मृताः।
भानोस्तु भानवो देवा मुहूर्तायां मुहूर्तजाः ॥ ४३
लम्बायाश्चैव घोषाख्यो नागवीथिश्च जामिजा।
पृथिवीविषयं सर्वमरुन्धत्यामजायत॥ ४४
संकल्पायाश्च संकल्पः पुत्रो जज्ञे महामते।
ये त्वनेकवसुप्राणा देवा ज्योतिःपुरोगमाः ॥ ४५
वसवोऽष्टौ समाख्यातास्तेषां नामानि मे शृणु।
आपो ध्रुवश्च सोमश्च धर्मश्चैवानिलोऽनलः ॥ ४६
प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः।
तेषां पुत्राश्च पौत्राश्च शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ४७
साध्याश्च बहवः प्रोक्तास्तत्पुत्राश्च सहस्रशः।
कश्यपस्य तु भार्या यास्तासां नामानि मे शृणु।
अदितिर्दितिर्दिनुश्चैव अरिष्टा सुरसा खसा॥ ४८
सुरभिर्विनता चैव ताम्रा क्रोधवशा इरा।
कद्रूर्मुनिश्ध धर्मज्ञ तदपत्यानि मे शृणु॥ ४९
हमने सुना है कि दक्ष प्रजापतिने वीरण-कन्या असिक्नीके गर्भसे साठ कन्याएँ उत्पन्न कीं। उनमेंसे दस कन्याएँ उन्होंने धर्मको और तेरह कश्यप मुनिको ब्याह दीं*। फिर सत्ताईस कन्याएँ चन्द्रमाको, चार अरिष्टनेमिको, दो बहुपुत्रको, दो अङ्गिराको और दो कन्याएँ विद्वान् कृशाश्वको समर्पित कर दीं। अब इन सबकी संतानोंका वर्णन सुनिये॥ ३६—४१ १/२॥
जो विश्वा नामकी कन्या थी, उसने विश्वेदेवोंको और साध्याने साध्योंको जन्म दिया। मरुत्वतीके मरुत्वान् (वायु), वसुके वसुगण, भानुके भानुदेवता और मुहूर्ताके मुहूर्ताभिमानी देवगण हुए। लम्बासे घोष नामक पुत्र हुआ, जामिसे नागवीथि नामवाली कन्या हुई और अरुन्धतीसे† पृथिवीके समस्त प्राणी उत्पन्न हुए। महाबुद्धे! संकल्पा नामक कन्यासे संकल्पका जन्म हुआ, अनेक प्रकारके वसु (तेज अथवा धन) ही जिनके प्राण हैं, ऐसे जो आठ ज्योतिर्मय वसु देवता कहे गये हैं, उनके नाम सुनिये—आप, ध्रुव, सोम, धर्म, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास—ये 'आठ वसु' कहलाते हैं। इनके पुत्रों और पौत्रोंकी संख्या सैकड़ों और हजारोंतक पहुँच गयी है॥ ४२-४७॥
इसी प्रकार साध्यगणोंकी भी संख्या बहुत है और उनके भी हजारों पुत्र हैं। जो (दक्ष-कन्याएँ) कश्यप मुनिकी पत्नियाँ हुईं, उनके नाम सुनिये—वे अदिति, दिति, दनु, अरिष्टा, सुरसा, खसा, सुरभि, विनता, ताम्रा, क्रोधवशा, इरा, कद्रू और मुनि थीं। धर्मज्ञ! अब आप मुझसे उनकी संतानोंका विवरण सुनिये।

  • पाँचवें अध्यायके श्लोक बाईसमें यह चर्चा आयी है कि स्वायम्भुव मनुने प्रजापतिको अपनी पुत्री प्रसूति ब्याह दी थी। उसके गर्भसे दक्षने चौबीस कन्याएँ उत्पन्न कीं, जिनमेंसे तेरह कन्याओंका विवाह उन्होंने धर्मके साथ कर दिया था। फिर इसी अध्यायके उन्तालीस-चालीस श्लोकोंमें यह बात आती है कि दक्षने वीरण प्रजापतिकी पुत्री असिक्नीके साथ विवाह किया, जिसके गर्भसे उन्होंने साठ कन्याएँ उत्पन्न कीं, जिनमेंसे दसका विवाह उन्होंने धर्मके साथ किया था। एक ही दक्षके विषयमें ये दो प्रकारकी बातें आपाततः संदेह उत्पन्न करती हैं। विष्णुपुराणमें भी यह प्रसंग आया है। अध्याय सातके उन्नीससे चौबीसवें श्लोकतक तथा अध्याय पंद्रहके उक्त दोनों प्रसंगोंका स्पष्ट उल्लेख मिलता है। एक सौ तीनवें श्लोकमें उन प्रसंगोंके पर्यालोचनसे यह प्रतीत होता है कि उक्त दोनों दक्ष दो व्यक्ति थे और दोनों दो कालमें उत्पन्न हुए थे। पहले दक्ष ब्रह्माजीके मानस-पुत्र थे और दूसरे प्रचेताओँके पुत्र। इतनेपर भी मैत्रेयजीने यह प्रश्न उठाया है कि 'ब्रह्माजीके पुत्र दक्ष प्रचेताओँके पुत्र कैसे हो गये?' वहाँ पराशरजीने यह समाधान किया है कि 'युगे युगे भवन्त्येते दक्षाद्या मुनिसत्तम।' इस प्रकार युगभेदसे दोनों प्रसंगोंकी संगति बैठायी गयी है। वही समाधान यहाँ भी समझ लेना चाहिये।
    † यहाँ 'अरुन्धती' की जगह 'मरुत्वती' पाठ भी मिलता है, परंतु वह असंगत है। 'मरुत्वत्यां मरुत्वन्तः' कहकर मरुत्वतीकी संततिका वर्णन आ चुका है। अतः यहाँ 'अरुन्धती' पाठ ही ठीक है; अन्यत्र धर्मकी नवीं पत्नीका नाम नहीं मिलेगा। विष्णुपुराण १५।१०९वें श्लोकमें भी 'अरुन्धत्याम्' ही पाठ है।
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