संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
२१६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५०
२१६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५०
एवं तान् प्रेषयित्वा तु आज्ञापूर्वं कपीश्वरः ।
अथ ते वानरा याताः पश्चिमादिषु दिक्षु वै ॥ १२५
ते सानुषु समस्तेषु गिरीणामपि मूर्धसु ।
नदीतीरेषु सर्वेषु मुनीनामाश्रमेषु च ॥ १२६
कन्दरेषु च सर्वेषु वनेषूपवनेषु च ।
वृक्षेषु वृक्षगुल्मेषु गुहासु च शिलासु च ॥ १२७
सह्यपर्वतपार्श्वेषु विन्ध्यसागरपार्श्वयोः ।
हिमवत्यपि शैले च तथा किम्पुरुषादिषु ॥ १२८
मनुदेशेषु सर्वेषु सप्तपातालकेषु च ।
मध्यदेशेषु सर्वेषु काश्मीरेषु महाबलाः ॥ १२९
पूर्वदेशेषु सर्वेषु कामरूपेषु कोशले ।
तीर्थस्थानेषु सर्वेषु सप्तकोङ्कणकेषु च ॥ १३०
यत्र तत्रैव ते सीतामदृष्ट्वा पुनरागताः ।
आगत्य ते नमस्कृत्य रामलक्ष्मणपादयोः ॥ १३१
सुग्रीवं च विशेषेण नास्माभिः कमलेक्षणा ।
दृष्टा सीता महाभागेत्युक्त्वा तांस्तत्र तस्थिरे ॥ १३२
ततस्तं दुःखितं प्राह रामदेवं कपीश्वरः ।
सीता दक्षिणदिग्भागे स्थिता द्रष्टुं वने नृप ॥ १३३
शक्या वानरसिंहेन वायुपुत्रेण धीमता ।
दृष्टा सीतामिहायाति हनूमान्नात्र संशयः ॥ १३४
स्थिरो भव महाबाहो राम सत्यमिदं वचः ।
लक्ष्मणोऽप्याह शकुनं तत्र वाक्यमिदं तदा ॥ १३५
सर्वथा दृष्टसीतस्तु हनुमानागमिष्यति ।
इत्याश्वास्य स्थितौ तत्र रामं सुग्रीवलक्ष्मणौ ॥ १३६
अथाङ्गदं पुरस्कृत्य ये गता वानरोत्तमाः ।
यत्नादन्वेषणार्थाय रामपत्नीं यशस्विनीम् ॥ १३७
अदृष्ट्वा श्रममापन्नाः कृच्छ्रभूतास्तदा वने ।
भक्षणेन विहीनास्ते क्षुधया च प्रपीडिताः ॥ १३८
भ्रमद्भिर्गहनेऽरण्ये क्वापि दृष्टा च सुप्रभा ।
गुहानिवासिनी सिद्धा ऋषिपत्नी ह्यनिन्दिता ॥ १३९
सा च तानागतान्दृष्ट्वा स्वाश्रमं प्रति वानरान् ।
आगताः कस्य यूयं तु कुतः किं नु प्रयोजनम् ॥ १४०
कपिराज सुग्रीवने इस प्रकार आज्ञापूर्वक उन्हें भेजा
और वे वानर पश्चिम आदि दिशाओंमें चल पड़े। समस्त
पर्वतोंके सानुओं (उपत्यकाओं) और शिखरोंपर, सारी
नदियोंके तटोंपर, मुनियोंके आश्रमोंमें, खड्डोंमें, सब प्रकारके
वनों और उपवनोंमें, वृक्षों और झाड़ियोंमें, कन्दराओं तथा
शिलाओंमें, सह्यपर्वतके आस-पास, विन्ध्याचल और
समुद्रके निकट, हिमालय पर्वतपर किम्पुरुष आदि देशोंमें,
समस्त मानवीय प्रदेशोंमें, सातों पातालोंमें, सम्पूर्ण मध्यप्रदेशोंमें,
कश्मीरमें, पूर्वदिशाके सारे देशोंमें, कामरूप (आसाम)
और कोशल (अवध)-में, सम्पूर्ण तीर्थ-स्थानोंमें तथा
सातों कोङ्कण देशोंमें भी जहाँ-तहाँ सर्वत्र सीताकी खोज
करते हुए वे महाबली वानर उन्हें न पाकर लौट आये।
आकर उन्होंने श्रीराम और लक्ष्मणके चरणोंमें तथा विशेषतः
सुग्रीवको प्रणाम किया और यह कहकर कि 'हमने
कमललोचना महाभागा सीताको कहीं नहीं देखा', वहाँ
खड़े हो गये ॥ १२५-१३२ ॥
तब दुःखित हुए भगवान् रामसे कपिराज सुग्रीवने
कहा-'राजन् ! सीताजी दक्षिण दिशामें ही वनमें स्थित
हैं; उन्हें वानरश्रेष्ठ बुद्धिमान् पवनकुमार ही देख सकते
हैं। इसमें संदेह नहीं कि हनुमान्जी सीताको देखकर
ही आयेंगे। महाबाहु श्रीराम ! आप धैर्य धारण करें, मेरा
यह कथन बिलकुल सत्य है।' तब लक्ष्मणने भी
शकुन देखकर यह बात कही - 'हनुमान् सर्वथा सीताको
देखकर ही आयेंगे।' इस प्रकार सुग्रीव और लक्ष्मण
भगवान् श्रीरामको सान्त्वना देते हुए उनके पास रहने
लगे ॥ १३३-१३६ ॥
इधर जो-जो श्रेष्ठ वानर अङ्गदजीको आगे करके
यशस्विनी श्रीसीताजीकी यत्नपूर्वक खोज करनेके लिये
गये थे, वे वनमें कहीं भी सीताजीका पता न पाकर
बहुत थक गये तथा कष्टमें पड़ गये। यही नहीं, कुछ
भोजन न मिलनेके कारण वे भूखसे भी बहुत पीड़ित
हो गये। गहन वनमें घूमते हुए उन्होंने एक परम
कान्तिमयी और उत्तम गुणोंवाली ऋषिपत्नी देखी, जो
कन्दरामें निवास करनेवाली और सिद्धा थी। उसने उन
वानरोंको अपने आश्रमपर आया देख पूछा- 'आप लोग
किसके दूत हैं? कहाँसे आये हैं? और यहाँ आनेका
क्या प्रयोजन है?' ॥ १३७-१४० ॥
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अध्याय ५० ] सुग्रीवसे मैत्री; वालिवध; सुग्रीवका प्रमाद और उसकी भर्त्सना २१७
इत्युक्ते जाम्बवानाह तां सिद्धां सुमहामतिः । | उसकी बात सुनकर महामति जाम्बवान्ने उस सिद्धा
सुग्रीवस्य वयं भृत्या आगता ह्यत्र शोभने ॥ १४१ | तपस्विनीसे कहा—'शोभने! पापहीने! हम सुग्रीवके भृत्य
| हैं, श्रीरामचन्द्रजीकी भार्या सीताकी खोज करनेके लिये यहाँ
रामभार्यार्थमनघे सीतान्वेषणकर्मणि । | आये हैं। हम किस दिशाको जायँ, इसका ज्ञान हमें नहीं
कां दिग्भूता निराहारा अदृष्ट्वा जनकात्मजाम् ॥ १४२ | रह गया है। सीताजीका पता न पानेके कारण अभीतक हमने
| कुछ भोजन भी नहीं किया' ॥ १४१-१४२ ॥
इत्युक्ते जाम्बवत्यत्र पुनस्तानाह सा शुभा। | जाम्बवान्के यों कहनेपर उस कल्याणी तपस्विनीने
जानामि रामं सीतां च लक्ष्मणं च कपीश्वरम् ॥ १४३ | पुनः उन वानरोंसे कहा—'मैं श्रीराम, लक्ष्मण, सीता और
| कपिराज सुग्रीवको भी जानती हूँ। वानरेन्द्रगण! आप लोग
भुञ्जीध्वमत्र मे दत्तमाहारं च कपीश्वराः । | यहाँ मेरा दिया हुआ आहार ग्रहण करें। आप लोग
रामकार्यगतास्त्वत्र यूयं रामसमा मम ॥ १४४ | श्रीरामचन्द्रजीके कार्यसे यहाँ आये हैं, अतः हमारे लिये
| श्रीरामचन्द्रजीके समान ही आदरणीय हैं।' यों कहकर
इत्युक्त्वा चामृतं तेषां योगाद्दत्त्वा तपस्विनी । | उस तपस्विनीने अपने योगबलसे उन वानरोंको अमृतमय
भोजयित्वा यथाकामं भूयस्तानाह तापसी ॥ १४५ | मधुर पदार्थ अर्पित किया तथा यथेष्ट भोजन कराकर पुनः
| उनसे कहा—'सीताका स्थान पक्षिराज सम्पातिको ज्ञात है।
सीतास्थानं तु जानाति सम्पातिर्नाम पक्षिराट् । | वे इसी वनमें महेन्द्रपर्वतपर रहते हैं। वानरगण! आप
आस्थितो वै वने सोऽपि महेन्द्रे पर्वते द्विजः ॥ १४६ | लोग इसी मार्गसे वहाँ पहुँच जायँगे। सम्पाति बहुत
मार्गेणानेन हरयस्तत्र यूयं गमिष्यथ । | दूरतक देखनेवाले हैं, अतः वे सीताका पता बता देंगे।
स वक्ति सीतां सम्पातिर्दूरदर्शी तु यः खगः ॥ १४७ | उनके बताये हुए मार्गसे आप लोग पुनः आगे जाइयेगा।
| जनकनन्दिनी सीताको ये पवनकुमार हनुमान्जी अवश्य
तेनादिष्टं तु पन्थानं पुनरासाद्य गच्छथ। | देख लेंगे' ॥ १४३–१४८॥
अवश्यं जानकीं सीतां द्रक्ष्यते पवनात्मजः ॥ १४८ |
तयैवमुक्ताः कपयः परां प्रीतिमुपागताः । | उसके इस प्रकार कहनेपर वानरगण बहुत ही प्रसन्न
हृष्टास्तेजनमापन्नास्तां प्रणम्य प्रतस्थिरे ॥ १४९ | हुए; उन्हें बड़ा उत्साह मिला। फिर वे उस तपस्विनीको
| प्रणाम करके वहाँसे प्रस्थित हुए। सम्पातिको देखनेकी
महेन्द्राद्रिं गता वीरा वानरास्तद्दिदृक्षया । | इच्छासे वे वीर कपीश्वर महेन्द्रपर्वतपर गये तथा वहाँ बैठे
तत्र सम्पातिमासीनं दृष्टवन्तः कपीश्वराः ॥ १५० | हुए सम्पातिको उन्होंने देखा। तब पक्षिराज सम्पातिने वहाँ
| आये हुए वानरोंसे कहा—'आप लोग कौन हैं? किसके
तानुवाचाथ सम्पातिर्वानरानागतान्द्विजः । | दूत हैं? कहाँसे आये हैं? शीघ्र बतायें' ॥ १४९–१५१ ॥
के यूयमिति सम्प्राप्ताः कस्य वा ब्रूत मा चिरम् ॥ १५१ |
| सम्पातिके यों पूछनेपर वानरोंने सारा समाचार यथार्थरूपसे
इत्युक्ते वानरा ऊचुर्यथावृत्तमनुक्रमात् । | क्रमशः बताना आरम्भ किया—'पक्षिराज! हम सब
रामदूता वयं सर्वे सीतान्वेषणकर्मणि ॥ १५२ | श्रीरामचन्द्रजीके दूत हैं। कपिराज महात्मा सुग्रीवने हमें
| सीताजीकी खोजके लिये भेजा है। पक्षिवर! एक सिद्धाके
प्रेषिताः कपिराजेन सुग्रीवेण महात्मना । | कहनेसे हम आपका दर्शन करनेके लिये यहाँ आये हैं।
त्वां द्रष्टुमिह सम्प्राप्ताः सिद्धाया वचनाद्विज ॥ १५३ | महामते! महाभाग! सीताके स्थानका पता आप हमें बता
सीतास्थानं महाभाग त्वं नो वद महामते। | दें।' वानरोंके इस तरह अनुरोध करनेपर गृध्र सम्पातिने
इत्युक्तो वानरैः श्येनो वीक्षांचक्रे सुदक्षिणाम् ॥ १५४ | अपनी दृष्टि दक्षिण दिशाकी ओर दौड़ायी और पतिव्रता
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