संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
२८४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६४
२८४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६४
पुण्डरीकः प्रसन्नात्मा तीर्थानि समसेवत। | वे नियमपूर्वक वहाँ देवह्रद तीर्थमें, पूर्वजन्मकी स्मृति
स्नात्वा देवह्रदे तीर्थे सरस्वत्यां च सुव्रतः॥ २७ | दिलानेवाली सरस्वतीके जलमें, चक्र-कुण्डमें और
जातिस्मर्यां चक्रकुण्डे चक्रनद्यामृतेष्वपि। | चक्र-नदी (नारायणी)-के जलमें भी स्नान करके उसी
तथान्यान्यपि तीर्थानि तस्मिन्नेव चचार सः॥ २८ | क्षेत्रके अन्तर्गत अन्यान्य तीर्थोंमें भ्रमण करते रहते
| थे॥ २३-२८॥
ततः क्षेत्रप्रभावेण तीर्थानां चैव तेजसा। | तदनन्तर उस क्षेत्रके प्रभावसे और वहाँके तीर्थोंके
मनः प्रसादमगमत्तस्य तस्मिन्महात्मनः॥ २९ | तेजसे उन महात्माका चित्त वहाँ बहुत ही शुद्ध एवं प्रसन्न
सोऽपि तीर्थे विशुद्धात्मा ध्यानयोगपरायणः। | हो गया। इस प्रकार शुद्धचित्त एवं ध्यानयोगमें तत्पर हो, वहाँ
तत्रैव सिद्धिमाकाङ्क्षन् समाराध्य जगत्पतिम्॥ ३० | ही सिद्धिकी इच्छासे परमभक्तियुक्त हो, वे शास्त्रोक्त विधिसे
शास्त्रोक्तेन विधानेन भक्त्या परमया युतः। | जगत्पति भगवान् विष्णुकी आराधना करने लगे। अपनी
उवास चिरमेकाकी निर्द्वन्द्वः संयतेन्द्रियः॥ ३१ | इन्द्रियोंको वशमें करके निर्द्वन्द्व रहते हुए उन्होंने अकेले ही
| बहुत दिनोंतक वहाँ निवास किया। वे शाक और मूल-
शाकमूलफलाहारः संतुष्टः समदर्शनः। | फलादिका आहार करते और सदा संतुष्ट रहते थे। उनकी
यमैश्च नियमैश्चैव तथा चासनबन्धनैः॥ ३२ | सर्वत्र समान दृष्टि थी। वे यम, नियम, आसन-बन्ध, तीव्र
प्राणायामैः सुतीक्ष्णैश्च प्रत्याहारैश्च संततैः। | प्राणायाम, निरन्तर प्रत्याहार, धारणा, ध्यान तथा समाधिके
धारणाभिस्तथा ध्यानैः समाधिभिरतन्द्रितः॥ ३३ | द्वारा निरालस्यभावसे भलीभाँति योगाभ्यास करते रहे। इस
| प्रकार समस्त पुरुषार्थोंके ज्ञाता निष्पाप महामना पुण्डरीकजीने
योगाभ्यासं तदा सम्यक् चक्रे विगतकल्मषः। | देवदेवेश्वर भगवान् विष्णुमें चित्त लगाकर उनकी आराधना
आराध्य देवदेवेशं तद्गतेनान्तरात्मना॥ ३४ | की और उन्हींमें मन लगाये हुए वे उनके परम अनुग्रहकी
पुण्डरीको महाभागः पुरुषार्थविशारदः। | आकाङ्क्षासे भजन करने लगे॥ २९-३५॥
| राजेन्द्र! महात्मा पुण्डरीकको उस शालग्रामक्षेत्रमें
प्रसादं परमाकाङ्क्षन् विष्णोस्तद्गतमानसः॥ ३५ | निवास करते बहुत समय बीत गया। तब एक दिन
तस्य तस्मिन्निवसतः शालग्रामे महात्मनः। | साक्षात् सूर्यके समान महातेजस्वी, वैष्णवहितकारी,
पुण्डरीकस्य राजेन्द्र कालोऽगच्छन्महांस्ततः॥ ३६ | परमार्थवेत्ता एवं विष्णुभक्तिपरायण देवर्षि नारदजी तपोनिधि
मुने कदाचित्तं देशं नारदः परमार्थवित्। | पुण्डरीक मुनिको देखनेकी इच्छासे उस क्षेत्रमें गये।
| समस्त आगमोंके ज्ञाता, महाबुद्धिमान्, महाप्राज्ञ, पूर्णतेजस्वी
जगाम सुमहातेजाः साक्षादादित्यसंनिभः॥ ३७ | एवं प्रभापुञ्जसे उपलक्षित नारदजीको वहाँ आया देख
तं द्रष्टुकामो देवर्षिः पुण्डरीकं तपोनिधिम्। | पुण्डरीकके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने विनीतभावसे
विष्णुभक्तिपरीतात्मा वैष्णवानां हिते रतः॥ ३८ | हाथ जोड़कर उन्हें अर्घ्य निवेदन किया, फिर यथोचितरूपसे
स दृष्ट्वा नारदं प्राप्तं सर्वतेजःप्रभान्वितम्। | उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया। तत्पश्चात् परम कान्तिमान्
महामतिं महाप्राज्ञं सर्वागमविशारदम्॥ ३९ | विप्रवर पुण्डरीकजी मन-ही-मन यह सोचने लगे कि
प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा प्रहृष्टेनान्तरात्मना। | 'ये अद्भुत दिव्य शरीरवाले, मनोरमवेषधारी, तेजस्वी
अर्घं दत्त्वा यथायोग्यं प्रणाममकरोत् ततः॥ ४० | महापुरुष कौन हैं? अहो! इनका मुखमण्डल कितना
| प्रसन्न है! इनके मस्तकपर जटा-जूट सुशोभित हो रहा
कोऽयमत्यद्भुताकारस्तेजस्वी हृद्यवेषधृक्। | है। इन्होंने हाथमें वीणा ले रखी है। इस रूपमें ये साक्षात्
आतोद्यहस्तः सुमुखो जटामण्डलभूषणः॥ ४१ | सूर्य ही तो नहीं हैं? अथवा अग्निदेव, इन्द्र और
विवस्वानथ वा वह्निरिन्द्रो वरुण एव वा। | वरुणमेंसे तो कोई नहीं हैं?' यों सोचते हुए किसी
इति संचिन्तयन् विप्रः पप्रच्छ परमद्युतिः॥ ४२ | निश्चयपर न पहुँचनेके कारण उन्होंने पूछा॥ ३६-४२॥
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अध्याय ६४ ] भगवद्भजनकी श्रेष्ठता और भक्त पुण्डरीकका उपाख्यान २८५
पुण्डरीक उवाच
को भवानिह सम्प्राप्तः कुतो वा परमद्युते।
त्वद्दर्शनं ह्यपुण्यानां प्रायेण भुवि दुर्लभम्॥ ४३
नारद उवाच
नारदोऽहमनुप्राप्तस्त्वद्दर्शनकुतूहलात् ।
पुण्डरीक हरेर्भक्तस्त्वादृशः सततं द्विज॥ ४४
स्मृतः सम्भाषितो वापि पूजितो वा द्विजोत्तम।
पुनाति भगवद्भक्तश्चाण्डालोऽपि यदृच्छया॥ ४५
दासोऽहं वासुदेवस्य देवदेवस्य शार्ङ्गिणः।
इत्युक्तो नारदेनासौ भक्तिपर्याकुलात्मना॥ ४६
प्रोवाच मधुरं विप्रस्तद्दर्शनसुविस्मितः।
पुण्डरीक उवाच
धन्योऽहं देहिनामद्य सुपूज्योऽहं सुरैरपि॥ ४७
कृतार्थाः पितरो मेऽद्य सम्प्राप्तं जन्मनः फलम्।
अनुगृह्णीष्व देवर्षे त्वद्भक्तस्य विशेषतः॥ ४८
किं किं करोम्यहं विद्वन् भ्राम्यमाणः स्वकर्मभिः।
कर्तव्यं परमं गुह्यमुपदेष्टुं त्वमर्हसि॥ ४९
त्वं गतिः सर्वलोकानां वैष्णवानां विशेषतः।
नारद उवाच
अनेकानीह शास्त्राणि कर्माणि च तथा द्विज॥ ५०
धर्ममार्गाश्च बहवस्तथैव प्राणिनः स्मृताः।
वैलक्षण्यं च जगतस्तस्मादेव द्विजोत्तम॥ ५१
पुण्डरीकजी बोले—परम कान्तिमान् दिव्य पुरुष ! आप कौन हैं और कहाँसे पधारे हैं? इस पृथ्वीपर जिन्होंने कभी पुण्य नहीं किया है, ऐसे लोगोंके लिये आपका दर्शन प्रायः दुर्लभ ही है॥ ४३॥
नारदजी बोले—पुण्डरीक ! मैं नारद हूँ। तुम्हारे दर्शनकी उत्कण्ठासे ही यहाँ आया हूँ। तुम-जैसा निरन्तर भगवद्भक्तिपरायण पुरुष दुर्लभ है। द्विजोत्तम ! भगवद्भक्त पुरुष यदि जातिका चण्डाल हो तो भी वह स्मरणमात्रसे, वार्तालापसे अथवा सम्मानित होकर, अथवा स्वेच्छासे ही लोगोंको पवित्र कर देता है; फिर तुम्हारे-जैसे भक्त ब्राह्मणके सत्सङ्गकी पावनताके विषयमें तो कहना ही क्या है। द्विज ! मैं शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले देवदेव भगवान् वासुदेवका दास हूँ॥ ४४-४५१/२॥
नारदजीके इस प्रकार अपना परिचय देनेपर उनके दर्शनसे अत्यन्त विस्मित हुए विप्रवर पुण्डरीकजी प्रेम-भक्तिसे विह्वलचित्त होकर मधुर वाणीमें बोले॥ ४६१/२॥
पुण्डरीकजीने कहा—आज मैं समस्त देहधारियोंमें धन्य हूँ, देवताओंन्द्वारा भी सम्माननीय हूँ। आज मेरे पितर कृतार्थ हो गये। मेरा जन्म सफल हो गया। देवर्षे! मैं आपका भक्त हूँ; आप मुझपर अब विशेषरूपसे अनुग्रह करें। विद्वन्! मैं अपने पूर्वजन्मकृत कर्मोंसे प्रेरित हो संसारमें भटक रहा हूँ। बताइये, इससे छुटकारा पानेके लिये मैं क्या-क्या करूँ? मेरे लिये जो परम कर्तव्य हो, वह गोपनीय हो तो भी आप मुझे उसका उपदेश कीजिये। मुने! यों तो आप समस्त लोकोंको ही सहारा देनेवाले हैं, परंतु वैष्णवोंके लिये तो आप विशेषरूपसे शरणदाता हैं॥ ४७-४९१/२॥
नारदजी बोले—द्विज ! इस जगत्में अनेक शास्त्र और अनेक प्रकारके कर्म हैं। इसी तरह यहाँ अनेकों प्राणी हैं और उनके लिये धर्मके मार्ग भी बहुत हैं। द्विजोत्तम ! इसीसे इस जगत्में विचित्रता दिखायी देती है॥ ५०-५१॥
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